Thursday, 20 August 2020

स्मृति के एकांत से.... स्वान्तः सुखाय 49


स्मृति के एकांत से.... स्वान्तः सुखाय 49

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देवताले जी की याद में 


उस दिन एक फोन आया था। उधर से किसी ने कहा 'मैं एक शोधार्थी बोल रहा हूँ उज्जैन से। आज जनसत्ता में आपका पत्र पढ़ा। मैं आपका मुरीद हूँ,आपकी कविताएँ बहुत अच्छी लगती हैं। बड़ी मुश्किल से आपका फोन नंबर मिला।'


पहले तो मैं हतप्रभ रह गया लेकिन थोड़ी देर में ही अटकती आवाज के खास लहजे से पहचान गया। वे आदरणीय चंद्रकांत देवताले थे। 

मैंने कहा 'सर,ये उल्टी गंगा क्यों बहा रहे हैं।' तो जवाब में उनका जोरदार ठहाका सुनाई दिया।


एक मायने में देवताले सर कविता में हमारे प्रशिक्षक की तरह रहे। प्रलेस और प्राची के रचना शिविरों में आदरणीय भगवत रावत, कमलाप्रसाद जी और देवताले जी की सहज बातचीत नुमा व्याख्यानों से कविता को सीखने समझने में बड़ी मदद मिली। ये कहना गलत भी नही होगा कि ये रचनात्मक अवसर बैंक कर्मचारी नेता व सामाजिक कार्यकर्ता श्री आलोक खरे तथा मित्र और महत्वपूर्ण कवि कुमार अम्बुज की रचनात्मक सूझबूझ का परिणाम थे।


हास्य विनोद और चुहल,चुटकियों से भरे होने के साथ देवताले जी इतने भावुक और संवेदनशील थे कि बात करते हुए विह्वल से हो जाते थे। 

तंगबस्ती के बच्चों के शिविर में जब एक बार वे बच्चों से बातचीत कर रहे थे,उनका कंठ भर आया। कुछ कविताएँ भी उन्होंने सुनाई। उनके सत्र के बाद  हर बच्चा उनको छूने,उनसे हाथ मिलाने को लालायित हो गया। देवताले जी सबसे हाथ मिलाते रहे, उनकी आंखें डबडबाती रहीं।

इंदौर से उज्जैन चले जाने से बच्चों के शिविर में पुनः उनका आना हो नहीं पाया।

देवताले जी की वे स्मृतियां और कविताएं अब हमारी याद में हमेशा रहती हैं...


आइए आज यहां पढ़ते हैं देवताले जी की यह कविता...


अगर तुम्हें नींद नहीं आ रही...

चंद्रकांत देवताले


अगर तुम्हें नींद नहीं आ रही

तो मत करो कुछ ऐसा

कि जो किसी तरह सोए हैं उनकी नींद हराम हो जाए


हो सके तो बनो पहरुए

दुःस्वप्नों से बचाने के लिए उन्हें

गाओ कुछ शान्त मद्धिम

नींद और पके उनकी जिससे


सोए हुए बच्चे तो नन्हें फरिश्ते ही होते हैं

और सोई स्त्रियों के चेहरों पर

हम देख ही सकते हैं थके संगीत का विश्राम

और थोड़ा अधिक आदमी होकर देखेंगे तो

नहीं दिखेगा सोये दुश्मन के चेहरे पर भी

दुश्मनी का कोई निशान


अगर नींद नहीं आ रही हो तो

हँसो थोड़ा , झाँको शब्दों के भीतर

ख़ून की जाँच करो अपने

कहीं ठंडा तो नहीं हुआ।


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ब्रजेश कानूनगो