Monday, 26 August 2019

यात्रा डायरी : कनाडा से चिट्ठी : दस


यात्रा डायरी 
कनाडा से चिट्ठी : दस  

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पर्यटन के चरमोत्कर्ष का 'उतारा' 

इस सप्ताहान्त लगून सिटी और ओरिलिया के तुधोप पार्क की सैर को एक तरह से हमारे कनाडा प्रवास का 'उतारा' भी माना जा सकता है। नियाग्रा प्रपात के अवलोकन की मदहोशी के बाद आज की सैर से तन,मन को सामान्य स्थिति में लाने का प्रयास किया।
सबेरे करीब 10 बजे न्यूमार्केट कनाडा के घर से निकलकर हमलोग 11 बजे के आसपास कोई 55 किलोमीटर दूर खूबसूरत 'लगून सिटी' पहुंचे।

इस खास बस्ती की विशेषता यह है कि यहां के प्रत्येक घर और कॉटेज के सामने या पीछे झील से जुड़ी नहरें इस तरह गुजरती हैं, जैसे हमारे यहां सड़कें बनी होती हैं। बेशक इन घरों के सामने सड़क तो है ही लेकिन नहरों के जरिये अपनी बोट से,नाव से भी यात्रा की जा सकती है। निकट के शहर भी जाया जा सकता है और झील में पहुंच कर वाटर स्पोर्ट्स, बीच आदि का आनन्द भी उठाया जा सकता है।

बहती नहरों के ऊपर कई ऊंचे ब्रिज बने हैं जिनसे वाहन गुजरते हैं और नीचे से बड़े छोटे जल यान, मोटर बोट्स और नावों में यहां के निवासी यात्रा करते हैं। आनन्द उठाते हैं। घरों के नीचे तक पानी इस तरह भरा होता है कि बोट्स आदि कारों की तरह घर में पार्क भी किये जा सकते हैं। इस नए दृश्य और जीवन शैली को देखना हमारे लिए बहुत रोमांचक रहा।

इसी से थोड़ा आगे कोई 25 मिनट के ड्राइव के बाद ओरिलिया कस्बे में वृहद झील के किनारे पर तुधोप पार्क है। यहां एक बीच भी है। रविवार होने से बच्चों और परिवारों की उपस्थिति ज्यादा थी। वॉलीवाल, स्केटिंग, नौकायन, तैराकी,वाटर स्पोर्ट्स आदि यहां झीलों के किनारे होने वाली आम गतिविधियां होती हैं। लोग बारबेक्यू जमाये खाने पीने में भी व्यस्त थे। रेत पर घर बनाते और खेलते बच्चों के अलावा कुछ दिव्यांगजन भी यहां अपने विशेष वाहनों पर पार्क का आनन्द उठाते नजर आए।कुछ लाइफ गार्ड्स भी यहां अपनी सेवाएं देते दिखाई दिए।

नेताओं और महान व्यक्तियों की स्मृति और युद्ध में गौरव पूर्ण विजय को यादगार बनाने के लिए अनेक स्मारक हम देखते ही रहे हैं। लेकिन ओरिलिया कस्बे के तुधोप पार्क में कनेडियन श्रमिकों के उनके अवदान और कार्य करते हुए अपनी जान गंवा देने को सम्मान व महत्व देने के लिए बने स्मारक को देखकर विशेष खुशी का अहसास हुआ।

कनाडा की लबालब झीलों और पार्कों को कभी भुलाया नहीं जा सकता। ये सुंदर हैं। व्यवस्थित हैं। साफ सुथरे और सुविधा सम्पन्न हैं। प्राकृतिक संसाधनों के रखरखाव को यहां अनुभव किया जा सकता है। लोगों की रुचियों और जीवन शैली को अनुशासित ढंग से एक सूत्र में बांधे हुए आनन्द की हिलोरें यहां सर्वत्र दिखाई देती हैं। यह अद्भुत है और अनुकरणीय भी।


Monday, 19 August 2019

यात्रा डायरी कनाडा से चिट्ठी : नौ


यात्रा डायरी 
कनाडा से चिट्ठी : नौ   

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पर्यटन का राग भैरवी : नियाग्रा प्रपात


हमारे यहां संगीत सभा का चरमोत्कर्ष और समापन सामान्यतः 'राग भैरवी' के गायन,वादन से होने की परंपरा रही है। पिछले दिनों कनाडा प्रवास और सैर सपाटे में हमारे आनन्द का सर्वोच्च निश्चित ही विश्वप्रसिद्ध 'नियाग्रा प्रपात' के रूप में प्रकृति का यह अद्भुत उपहार ही रहा।
नियाग्रा प्रपात यात्रा की इस खूबसूरत भैरवी की शुरुआत अगस्त माह की 17 तारीख को सुबह 7 बजे बारिश के रिमझिम संगीत से ही हो गई। न्यूमार्केट शहर के गो बस स्टॉप के लिए घर से निकलते ही आकाश से बूंदें बरसने लगी। दोपहर 12 बजे तक नियाग्रा फाल क्षेत्र में भी बरसात और बादल छाए रहने की संभावना थी। मुहूर्त बढ़िया था।

एक घण्टे की यात्रा के बाद टोरंटो के यूनियन रेलवे स्टेशन से विशेष पैकेज टूर की बुकिंग थी हमारी। ‘गो ट्रेन’ से 9 बजे रवाना होकर 11 बजे नियाग्रा फाल स्टेशन पर उतरने के बाद फाल तथा अन्य पॉइंट्स तक जाने के लिए हमारे लिए ‘विगो बसेस’ सेवाएं उपलब्ध थीं।
पन्द्रह मिनट की बस यात्रा के बाद हम लोग इस विशाल और खूबसूरत प्रपात के शुरुआती छोर के सामने प्रफुल्लित खड़े थे। मौसम भीगा भीगा था। हल्की बारिश थी या प्रपात की हवा में घुलकर उछलती बूंदें कुछ कहा नहीं जा सकता। बादल भी थे और धुंध भी। लेकिन धीरे धीरे रोशनी भी बढ़ रही थी और धूप भी अठखेलियाँ खेलने लगी थी। मालवा के अपने जाने पहचाने 'चिड़ा चिड़ी' के विवाह जैसा ही मौसम था। आसामान में इंद्रधनुष खिलने का मैं इंतजार करता रहा मगर यह आस पूरी नहीं हो सकी। शायद प्रपात की उछलती बूंदों और सूर्यकिरण का कांटा नहीं भिड़ा। 12 बजते बजते मौसम बहुत साफ हो गया।

नदी किनारे कोई 100 फिट ऊपर लगी रेलिंग के साथ साथ आगे बढ़ते हुए देखने पर हर बार प्रपात की भव्यता और खूबसूरती प्रत्येक कोण से निखरती जाती है। गहराई में पर्यटकों से भरे बोट कोई 400 से अधिक यात्रियों को बिल्कुल निकट तक ले जाकर तेज बौछारों में नहलाकर इसकी भव्यता और रोमांच का अहसास करा देते हैं।

दरअसल 'नियाग्रा जलप्रपात' अमेरिका के न्यूयॉर्क और कनाडा के ओंटारियो प्रांतों के मध्य अंतरराष्ट्रीय सीमा पर बहने वाली नियाग्रा नदी पर स्थित है। यह दुनिया के सबसे बड़े और ऊँचे प्रपातों में से एक दर्शनीय जलप्रपात है। यह जलप्रपात न्यूयॉर्क के बफेलो से 27 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम और कनाडा के टोरंटो (ओन्टारियो) से 120 किलोमीटर दक्षिण पूर्व में स्थित है।

घोड़े की नाल के आकार की तरह होने के कारण कनाडा की साइड के प्रपात को 'हॉर्स शू प्रपात' कहा जाता है वहीं अमेरिका वाली साडड पर दिखाई देने वाले को 'अमेरिकन प्रपात' कहते हैं। 'हॉर्स शू प्रपात' यहाँ आने वाले पर्यटकों को ऐसे निरीक्षण कक्ष में ले जाते हैं, जहां गिरते पानी के बीच खड़े होने का अहसास होता है। अमरीका साइड और कनाडा साइड से चलने वाले विशाल बोट पर्यटकों को प्रपातों के मध्य तक दिन भर सैर करवाते रहते हैं। हम लोगों ने भी इस रोमांच का भरपूर मजा लिया।

जीवन में बहुत ज्यादा पर्यटन तो अभी तक ख़ास किया नहीं, पर जितना कुछ भी देखा उसका आनन्द बहुत दिल से लिया है। मध्यप्रदेश का भेड़ाघाट हो या गांधीसागर बांध, नेमावर हो या महेश्वर, बागली, उदयनगर या नीमच, भानपुरा क्षेत्र के जंगल, प्राकृतिक छटा हमारे यहां भी समृद्ध और अद्भुत है। लेकिन प्राकृतिक संसाधनों से राजस्व जुटाने के साथ पर्यटकों को लुभाने में हमारे नीति नियंताओं का दृष्टिकोण अभी उतना कारगर साबित नहीं हुआ है जितना इधर मुझे देखने को मिला। खासकर नियाग्रा प्रपात के आसपास।

राजस्थान, महाराष्ट्र और अन्य दक्षिण राज्यों की तुलना में मेरा अपना मध्यप्रदेश मुझे इस मामले में थोड़ा उदासीन दिखाई दिया है। अन्य राज्य भी ज्यादातर धार्मिक और प्राकृतिक सौंदर्य की वजह से पर्यटको को थोड़ा आकर्षित करते हैं। जबकि मात्र नियाग्रा प्रपात की वजह से विभिन्न रुचि के पर्यटकों के लिए इधर थोड़ी थोड़ी दूरी पर कुछ ऐसे विशेष स्थल विकसित किये गए हैं जहां जाकर और समय व्यतीत कर अपनी तरह से छुट्टियां व्यतीत कर सकता है। मसलन बड़े, लम्बे पार्कों में कैम्पिंग, फिशिंग, नौकायन, साइकिल ट्रेक्स के अलावा 'फ्लॉवर क्लॉक', 'नियाग्रा लेक विलेज','एडवेंचर स्पोर्ट्स डेस्टिनेशन', 'बर्ड किंगडम',शौकीनों के लिए 'केसीनोस' 'जिपलाइन राइड थ्रिल', ‘व्यू फ्रॉम हेलिकॉप्टर', 'फन एन्ड फ़ूड' 'स्काई लॉन टावर' आदि जैसी कई चीजों और पॉइंट्स ने नियाग्रा फाल्स का आकर्षण और बढ़ा दिया है।

इस क्षेत्र में अंगूर की खेती बहुत होती है। महाराष्ट्र के पंचगनी(महाबलेश्वर) में जिसप्रकार कई तरह के शर्बत निशुल्क चखने के लिए उपलब्ध करवाए जाते हैं। उसी तरह यहाँ वाइनरिस में यह सुविधा वाइन प्रेमियों को उपलब्ध हो जाती है।
केवल एक ख़ास आकर्षण के केंद्र को बहुविध गतिविधियों से जोडकर उसे व्यापकता देने के लिए मुझे 'नियाग्रा प्रपात' पर्यटन स्थल थोड़ा विशिष्ठ लगा।

हम लोगों ने भी अपने सीमित समय में अधिक से अधिक मजा लेने की कोशिश की। नियाग्रा लेक विलेज भी गए। फ्लॉवर क्लॉक के सामने तस्वीरें भी खिंचवाईं। विशाल बोट से प्रपात की धारा के करीब पहुंचने का रोमांच भी खूब अनुभव किया। बच्चों ने जीपलाइन राइड जैसे एडवेंचर के रोमांच का मजा लिया।
रात को रोशनी में नहाए प्रपात और आसपास का खूबसूरत नजारा देखने के बाद गो बस से 18 अगस्त को तड़के 3 बजे के आसपास हम लोग घर लौट आए।

अक्टूबर के बाद सर्दियों में यह ख़ूबसूरत और विशाल प्रपात अपना नया रूप धारण करने लगता है। बर्फ जमें प्रपात को निहारना हमें किसी और ही दुनिया में ले जाता है। भविष्य में इस नज़ारे को भी देखने की आकांक्षा के साथ ‘नियाग्रा नदी’ और विश्व के इस सुन्दरतम ‘प्रपात’ को ‘गुड बाय’ कहकर विदा ली।

Monday, 12 August 2019

यात्रा डायरी : कनाडा से चिट्ठी : आठ


यात्रा डायरी 
कनाडा से चिट्ठी: आठ  

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लड्डू के बीच इलायची का दाना

अगस्त के दूसरे सप्ताहांत में एक बार फिर टोरंटो भ्रमण का कार्यक्रम बन गया। पिछली बार सीएन टावर, रिप्लीज फिश एक्वेरियम और हार्बर फ्रंट क्षेत्र का आनन्द उठाया था। इस बार टोरंटो डाउन टाउन में यूनियन स्टेशन क्षेत्र के अलावा 'रॉयल ओंटेरियो म्यूजियम' और 'आर्ट गैलरी ऑफ ओंटेरियो' का अवलोकन हमारा खास मकसद रहा।

न्यूमार्केट शहर से गो ट्रेन से करीब 11 बजे के आसपास हम लोग यूनियन स्टेशन पहुंच गये थे। स्टेशन के बाहर निकलकर कुछ देर पैदल ही घूमने निकले। टोरंटों के इस क्षेत्र में बहुत ऊंची इमारतें सारे आसमान को जैसे ढंक ही लेती हैं। इमारतें शायद 50 मंजिलों या उससे भी अधिक ऊंचाई की हैं। बहुत सटी हुई और घनी होने के बावजूद बीच में सड़कें और खुला क्षेत्र और चौराहे काफी खूबसूरत नजर आते हैं। और सबसे ऊपर आकाश में सीएन टॉवर का शीष तो हर जगह से नजर आ ही जाता है।

अनेक अंतरराष्ट्रीय बैंकों के कार्यालयों के अलावा स्टेट बैंक का नीला सफेद बोर्ड दिखाई दिया तो किसी इंदौरी को जैसे पोहा जलेबी ही मिल गया। यह अनुभूति अद्भुत थी, मोतीचूर के लड्डू के बीच जैसे इलायची का दाना मुंह में खुशबू बिखेर गया हो। सप्ताहांत होने से सभी दफ्तर बन्द थे। भारत होता तो शायद मेरा मालवी मन गार्ड से ही उसकी खैर खबर अवश्य पूछकर लौटता।

इस इलाके में काफी भीड़ भाड़ दिखाई दी। ट्रैफिक भी सिग्नलों की वजह से बहुत रुक रुककर आगे बढ़ रहा था। उपयुक्त मौसम और वीकेंड होने से पर्यटक काफी तादाद में दिखाई दिए। ज्यादातर लोग मौज मस्ती के मूड में तस्वीरें लेते, कॉफी पीते,ठिठकते,मुस्कुराते नजर आए। बिल्डिंगों और सड़कों के साथ खूबसूरत हिरयाली, सुंदर स्टेचू और स्ट्रक्चर आकर्षित करते रहे।

इसी बीच हमारी उबर कैब आ गई। कोई 10 मिनट की यात्रा के बाद हम लोग विश्व के एक बड़े और महत्वपूर्ण संग्रहालय 'रॉयल ओंटेरियो म्यूजियम' जिसे यहां संक्षेप में 'आर ओ एम' 'रोम' कहा जाता है के सामने तस्वीरें ले रहे थे।



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टोरंटो का 'रोम'


'रोम' अर्थात टोरंटों में स्थित 'रॉयल ओंटेरियो म्यूजियम' के टिकिट काउंटर पर पर्यटकों भीड़ तो थी लेकिन काउंटरों की संख्या भी पर्याप्त होने से ज्यादा समय नहीं लगा और 5 मिनट में हम लोग इस विशाल संग्रहालय के पहले तल में प्रवेश कर गए।

संग्रहालयों के बारे में सोचते ही हमारे मन में एकदम हैदराबाद का 'सालारजंग म्यूजियम' आ जाता है। विशालता में यह उसके बराबर ही मुझे लगा। थोड़ा बहुत 21/20 का फर्क होगा। कुल पांच तलों में इसका विस्तार है। सीढ़ियों के अलावा लिफ्ट्स भी हैं, तो ज्यादा दिक्कत नहीं है लेकिन गैलरियों और प्रखंडों में तो चलकर जाना ही होता है। कम से कम 5 किलोमीटर का वॉक तो हो ही जाता होगा। प्रवेश द्वार पर ही नक्शा मिल जाता है, तदनुसार हम आगे बढ़ते रहे।

1914 में स्थापित, 'रॉयल ओंटारियो संग्रहालय' दुनिया भर की कला, संस्कृति और प्रकृति की कुछ खास चीजों को प्रदर्शित करता है। उत्तरी अमेरिका के शीर्ष 10 सांस्कृतिक संस्थानों में इसका शुमार होता है। कनाडा के इस सबसे बड़े और सबसे व्यापक संग्रहालय में 13 मिलियन कलाकृतियों, सांस्कृतिक वस्तुओं और प्राकृतिक इतिहास के नमूनों का एक विश्व स्तरीय संग्रहण किया गया है। लगभग 40 गैलरियों और प्रदर्शनी स्थलों में विश्व के विभिन्न महाद्वीपीय खण्डों पर केंद्रित वस्तुओं को स्थान देने के प्रयास किये गए हैं।

चीन,जापान,कोरिया, अफ्रीका,यूरोप,कनाडा आदि के अलावा भारतीय उप महाद्वीप के सांस्कृतिक,कलात्मक और ऐतिहासिक मॉडल्स को भी यहां देखा जा सकता है। एक गैलरी में विश्व की थल सेनाओं के मॉडल्स के बीच बंगाल रेजिमेंट भी दिख गई। वन्य जीवों, जल प्राणियों के अलावा एक बड़ा प्रखंड डायनोसोर केंद्रित है। न सिर्फ बच्चों को बल्कि बड़ों को भी यह बहुत प्रभावित करता है। आकर्षण के लिहाज से यह हाल फिलहाल सबसे आगे है।
यहां कुछ अंतराल से सांकृतिक गतिविधियां भी होती रहती हैं।जोधपुर राजस्थान पर केंद्रित एक सांकृतिक शो भी यहां अतिरिक्त शुल्क के साथ चल रहा था। लेकिन वक्त की कमी की वजह से हमने इसका लाभ नहीं लिया।

कनाडा के प्रमुख क्षेत्र अनुसंधान संस्थान के रूप में 'रोम' नई खोजों के साथ कलात्मक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक दुनिया की हमारी समझ को और आगे बढ़ाने में निसंदेह एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
सबसे अनोखी गैलरी खनिज और ज्वेल्स और विभिन्न उल्का पिंडों के टुकड़ों के संग्रहण, प्रदर्शन की थी। मंगल, चाँद से लेकर पृथ्वी के गर्भ से प्राप्त स्टोन्स और उनके तराशे स्वरूप यहां बहुत रोमांचित कर देते हैं। गोल्ड,सिल्वर और अन्य धातुओं के रा और फिनिश्ड स्वरूप देखना अच्छा लगता है। चमगादड़ों से संबंधित गैलरी भी देखना कुछ अलग अनुभूति रही।
टेक्सटाइल से प्रदर्शनी में चीन से सम्बंधित चीजों ने आकर्षित किया,वहीं कुछ पुरातन वाद्य यंत्रों को देखना,सुनना भी रुचिकर था।

इस म्यूजियम में एक बात ख़ास लगी कि प्रत्येक गैलरी में रखी चीज से संबंधित जानकारी और उसका वीडियो पास में रखे कम्प्यूटर स्क्रीन पर बटन दबाकर देखी,समझी जा सकती थी। इसके अलावा पर्यटकों के भोजन के लिए यहां एक सुसज्जित लंच रूम की व्यवस्था है जहां हमने भी सुकून से साथ लाया लंच किया और थोड़ा सुस्ताए भी।

डेनियल लिबेस्काइन्ड द्वारा डिज़ाइन किये माइकल ली-चिन क्रिस्टल द्वारा अपनी मूल वास्तुकला के साथ विकसित ROM (संग्रहालय) टोरंटो में आये सांस्कृतिक,प्रकृति,जन जीवन और इतिहास में रुचि रखने वाले हरेक पर्यटक का मन मोह लेता है।

दोपहर तीन बजते हमने 'आर्ट गैलरी ऑफ ओंटेरियो' का रुख किया। जो टैक्सी से यहां से 10 मिनट की दूरी पर स्थित थी।


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कलायात्रा में साथ थे मेरे अपने


टोरंटो स्थित 'आर्ट गैलरी ऑफ ओंटेरियो' को देखने की अधिक इच्छा इसलिए भी हो गई कि 'रॉयल म्यूजियम' में पेंटिंग्स और शिल्प की भूख ठीक से शांत नही हो पाई थी। आधुनिक चित्र कला और शिल्प के नए प्रयोग यहां थोड़ा कम प्रदर्शित किये गए लगे। जो लगभग नहीं के बराबर थे। सालारजंग म्यूजियम हैदराबाद में कला दीर्घा कुछ अधिक विस्तारित है। आर्ट गैलरी ऑफ ओंटेरियो AGO हमारी क्षुधा को कुछ हद तक शांत करने में सक्षम रही।

कनाडा के सबसे बड़े शहर टोरंटो में स्थित यह आर्ट गैलरी (AGO) उत्तरी अमेरिका के सबसे बड़े कला संग्रहालयों में से एक है। लगभग 95,000 कृतियों के संग्रह में अत्याधुनिक समकालीन कला से लेकर यूरोपीय कृतियों के बड़े कलाकार इसमें शामिल हैं। स्थानीय कनाडाई कलाकारों के समूहों तथा उदयीमान युवाओं के काम भी यहां संजोए गए हैं। इसके अलावा फोटोग्राफी,वास्तुशिल्प कलाकृतियां, मॉडर्न शिल्प कला , फर्नीचर शिल्प,काष्ठकला में विश्व के कई कलाकारों के नए प्रयोग भी देखे जा सकते हैं।

इस आर्ट गैलरी में छोटे बड़े मूर्ति शिल्प के अलावा छायाचित्र, रेखांकन, विभिन्न शैलियों और माध्यमों में आकर्षक पेंटिंग्स देखकर बहुत से अपने याद आये। इन्हें देखते हुए काश हमारे साथ प्रभु जोशी या रवींद्र व्यास भी साथ रहे होते। कई छाया चित्रों को देखकर देवास के भाई कैलाश सोनी का कला के प्रति वह आग्रह याद आया जो खास किस्म के प्रकाश के लिए मीठा तालाब पर सूर्यास्त की प्रतीक्षा किया करते थे।

कुछ काष्ठ शिल्पों में प्रो नईम साहब को रंदा और रेजमाल रगड़ते लकड़ी पर गणेश प्रतिमा उभारते महसूस किया। प्रो अफजल का रंग भरा चाकू, प्रभु दा के जलरंग चित्रों का वह अनोखा लाल रंग का छींटा ढूंढता रहा यहां। रवींद्र व्यास का हरा रंग गुलाबी और पीली आभा में ठहाका लगाता नजर आया। स्केचों में विष्णु भटनागर और संतोष जड़िया को कुछ शिल्पों के जरिये अपने साथ बनाये रखने की कोशिश की।

स्व वाकणकर गुरूजी उस वक्त बहुत याद आये जब बैग्स और जूतों के माध्यम से बनाये शिल्प दिखाई दिए।गुरुजी दीवार के उखड़े पलस्तर और यूँही बिखरी वस्तुओं को अरेंज कर पेंटिंग बना देते थे। कोलाज के अनोखे प्रदर्शनों पर ऐसा लगा जैसे मित्र श्रीराम जोग मेरे साथ हो गए हों। इन सबका स्नेह और उनसे जुड़ाव का ही नतीजा था कि आर्ट गैलरी के आनन्द को भीतर तक महसूस कर पाया।

ब्रायन जुंगेन फ्रेंडशिप सेंटर की मूर्तिकला बेहद अनोखी लेकिन आधुनिकतम थी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसित कलाकारों का यह नया दृष्टिकोण था जिसमें केनवास बैग्स, जूतों,फीतों आदि के फाइलिंग से शिल्प और मुखौटों की रचना की गई थी।
यहां इस तरह के काम की यह अब तक की सबसे बड़ी प्रदर्शनी थी। कलाकारों ने मौजूदा उपभोक्ता उत्पादों के साथ बार-बार ऐसे अनेक प्रयोग किये हैं, उन्हें नए रूप देकर दर्शकों को काफी प्रभावित भी किया है।
इसी तरह फर्नीचर शिल्प, मिरर शिल्प और कंस्ट्रक्शन शिल्प भी बहुत भौचक्क कर देने वाला था। एक पूरे कमरे के कोने में मिरर और गिट्टियां कुछ इस तरह रखी गईं थीं कि शिल्प का निर्माण करती थीं। एक कमरे में सीमेंट की बोरियों,बल्लियों के मात्र संयोजन से कलाकृति बनाई गई थी।

एक कलाकार ब्रास ने कपड़े और शरीर के अंगों के प्लास्टर का उपयोग करते हुए अनोखे शिल्प का सृजन किया था। सामग्री से उन्होंने एक झांकी बनाई थी जिसमें पहले कोई मॉडल सामग्रियों को शरीर पर ढालते हुए विशिष्ट वस्त्रों के साथ काम करती है। बाद में ब्लास कास्टिंग, नक्काशी और वस्तुओं के संयोजन से उन्हें अपनी मूर्तियों में बदल देतीं हैं। इस तरह वे यथार्थवाद, अतिसूक्ष्मवाद और क्यूबिज़्म पर ड्राइंग करके वह अमूर्त, मानव और निर्जीव रूपों के इस शून्य स्थानों को अभिव्यक्त करती हैं। इस शिल्प को देखना अद्भुत और नवीनतम अनुभव रहा हमारा।

ओंटारियो के पर्यटन, संस्कृति और खेल मंत्रालय द्वारा वित्त पोषित इस समृद्ध आर्ट गैलरी को 'फिर मिलेंगे' कहकर हमने विदा ली तो सचमुच मन में सतरंगी इंद्रधनुष खिला हुआ था......



Monday, 22 July 2019

यात्रा डायरी: कनाडा से चिट्ठी: सात


यात्रा डायरी 
कनाडा से चिट्ठी: सात  


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‘स्ट्रीट डॉग' और संवेदना

बचपन से लेकर बड़ा होने तक मोहल्लों,गलियों में स्वच्छन्द विचरण करते कुत्तों को ही कुत्ता समझता था। लेकिन अब भारत के  हमारे अपने इन स्वच्छंद प्राणियों को सम्मान से 'स्ट्रीट डॉग्स' कहना ही ठीक रहेगा। 
राह चलते श्वानों से संवाद करने में अक्सर घबराता रहा हूँ। किसी ने हिदायत भी दी थी कि 'स्ट्रीट डॉग' से नजर नहीं मिलाना चाहिए। स्कूटर और कार के पीछे कभी कभी जब ‘गलियों के राजा’ जबड़ा फैलाए लपकते हैं तो जान सूख जाती है।

सर्वपित्री अमावस्या पर एक सर्वे किया था, जिस पर आधारित एक लेख भी लिखा था। उस खास दिन मेरी छत पर कौआ तो एक नहीं आया मगर घर के आसपास एक किलोमीटर दायरे में 50 से अधिक 'स्ट्रीट डॉग्स' और  30 से अधिक गौवंश प्राणियों की स्वतंत्र उपस्थिति दिखाई दी थी। इधर कनाडा में मुझे 'स्ट्रीट डॉगकहीं दिखाई नहीं दिए अन्य पशुओं का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। हाँकोई न कोई 'पेट' अवश्य पाला जाता है।

हमारे आसपास के लगभग हरेक घर में कोई न कोई  कुत्ता या बिल्ली जैसा पेट देखने को मिल जाता है। बाएं पड़ोसी के यहां दो कुत्ते हैं वहीं दाहिनी ओर दो गबरू बिल्लियाँ घूमती रहती हैं। हमारे यहाँ मिली जुली नस्ल Cockapoo काकापू की एक दो वर्षीय डॉगी है। बच्चों ने उसका नामकरण ' बेट्टी' किया हुआ है। उन्होंने बताया तो उसकी नस्ल का पता चला वरना मैं तो उसे पामेरियन ही समझता था। 
इस मामले में मेरी समझ सीमित ही रही है। भारत में किसी मित्र के यहां कुत्तों से मुलाकात होती है तो यातो वे ‘अल्सेशियन’ होते थे या फिर ‘पामेरियन’। इनके अलावा मेरे लिए सभी कुत्ते ‘स्ट्रीट डॉग’ या वहीं से बच्चों द्वारा उठाए ‘पिल्ले’ ही बड़े होकर ‘लायन’, ‘टाइगर’ ‘टामी’ आदि बनते रहे हैं।

लेकिन इधर ‘बेट्टी’ नें मन मोह लिया है। पहले एक संस्मरण में मैंने ‘बेट्टी’ के बारे में थोड़ा बहुत बताया भी था लेकिन तब जान पहचान कम हुई थी। अब वह पहचान आत्मीयता में बदल गयी है। अब उसकी ‘कू..कू..’ और ‘भों..भों...’ करने के फर्क को हम समझने लगें हैं। उसकी आँखों में ‘प्रेम, और ‘याचना’ को पढ़ लेते हैं। समझ जाते हैं कि कब उसको कब्ज की शिकायत हो गयी है और कब उसे खेलने का मन हो रहा है। शाम को बेटे के साथ सैर को निकले बिना वह ठीक से सो नहीं पाती। पोते को तो बोलकर समझाबुझा कर साधा जा सकता है मगर इस मासूम को तो अपनी बातें सब संकेतों में ही कहना होती है।

कनाडा की घरेलू पेट ‘बेट्टी’ हो या इंदौर के हमारे ‘स्ट्रीट डॉग’, संवेदनाओं का संचार तो कर ही देते हैं। उधर जब सुबह सुबह सैर को निकली महिला मोहल्ले के कुत्तों को ढेर सारे टोस्ट खिलाती हैं, लगभग ‘श्री दत्त भगवान’ के अवतार के रूप में दिखाई देती हैं, दर्जनों श्वान उनके आसपास तब तक जुटे रहते हैं, जब तक कि उनके सारे टोस्ट ख़त्म नहीं हो जाते.... पशुओं के प्रति हम भारतवासियों की यह प्रेम और करुणा का भी अपना अलग महत्त्व है।
आज इसी सन्दर्भ में एक कविता पुनः पढ़ लीजिये...     

कविता
दृश्य
ब्रजेश कानूनगो


1
एक कुतिया पूरी लय में 
खुरचती रही पेड़ के पास की जमीन
जैसे चिड़िया घोसला बनाती है डाली पर पत्तियों के बीच
जैसे छोटा मौजा बुनती है गुनगुनाते हुए कोई नवेली

और एक सुबह
पेड़ के ऊपर नई चहचहाट के साथ साथ
नीचे भी आबाद हो जाती है छोटी-सी खोह
दुनिया थोड़ी और घनी
कुछ और बड़ी हो जाती है

जब हड्डियां तक बजने लगती है हमारी
घर से निकलना तो दूर की बात है
रजाई से बाहर निकलने में ही छूटता हैं पसीना
पिल्ले बन जाते हैं ऊन के गोले और
ऐसे गुँथ जाते हैं एक दूसरे में कि एकाकार हो जाते हैं
तैयार करते हैं खुद अपना कम्बल
घुसे रहते हैं उसमें सूरज के उगने तक

बच्चों को सर्दी से बचाने के जतन में
कुतिया का जबड़ा रूई का फोहा बन जाता है
निकालती है उन्हें खोह से 
जैसे रजाई खींच कर जगाया जाता है सुबह-सुबह बच्चों को
धूप की सिगड़ी के पास गोटियाँ खेलने लगते हैं पिल्ले 

अपने टुकड़ों का पेट भरने के लिए
टुकड़ों के इंतजाम में गई माँ जब लौटती है तो
ऐसे लपकते हैं पिल्ले 
जैसे टाफियाँ लेकर दफ्तर से लौटे पिता को घेर लेते हैं बच्चे
माँ की छाती से चिपक संसार का सारा सुख
उनके भीतर उतर जाता है
संतोष से भर जाती है एक पृथ्वी.


2
भरी बस में बह रहा है खून 
बर्छियों की तरह चुभ रही है कुछ नजरें
बाहर देखते रहते हैं खिड़की के पास बैठे यात्री
एक मादा को घेरे घूम रहा है कुत्तों का झुंड    

3
सड़क बंद है
बड़ा जाम लगा है
रुक गया है पहियों का घूमना
आक्रोश इतना अधिक है कि 
पैदल भी गुजरने की हिम्मत नहीं किसी में

एक पिल्ला पड़ा है
लहुलुहान बीच सड़क में

लाश के पास 
गुस्से से भरी बैठी है दुखी माँ.

*****

  

29
शहरी कनेडियन की 'कॉटेज कंट्री'


अपनी छुट्टियों के दौरान खासतौर पर 'समर' के दिनों में कनाडा के शहरी लोगों में परिवार के साथ मौज मस्ती पूर्ण 'कॉटेज जीवन' व्यतीत करना बहुत लोकप्रिय शौक के रूप में विकसित हुआ है।
झीलों के निकट ग्रामीण क्षेत्रों में बसाई गई 'कॉटेज कंट्री' में मनोरंजन,फिशिंग,तैराकी और वाटर स्पोर्ट्स के अलावा,बीचों पर तफरीह और अन्य सुख सुविधाओं से युक्त खूबसूरत कॉटेज स्वयं की मालकियत के अलावा किराए पर भी लिए जा सकते हैं। एक तरह से यहां पर यह एक व्यवसाय की तरह भी विकसित हुआ है।

हमारी बहुत इच्छा थी कि यहां विकसित 'कॉटेज कन्ट्री' को स्वयं देखें और थोड़ा बहुत इस जीवन को निकट से अनुभव भी करें। हालांकि यह 'कंट्री होम' कनाडा के ग्रामीण लोक जीवन से बिल्कुल अलग हटकर शहरों में निवास करने वालों के लिए ही ग्रामीण परिवेश वाला नितांत अवकाशकालीन अस्थायी निवास या ‘घर के बाहर एक और घर’ जैसा ही होता है, लेकिन हमारी दिलचस्पी इस बहाने यहां के लोगों की इस जीवन शैली और यहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य का आनन्द उठाने में भी थी।
सप्ताहांत में बच्चों ने एक टूर नियोजित किया जिसके तहत हम कवारथा लेक के नजदीक विकसत हो रही ऐसी ‘कॉटेज बस्ती’ और वहां के जीवन और नजारों का थोड़ा जायजा ले सकें।

घर से कोई 2 घण्टों की कार यात्रा के बाद हम लोग कवारथा के नजदीक राइस लेक पर विकसित की जा रही बेल्मेर विंड्स गोल्फ रिसोर्ट (Bellmere winds golf resort) 'कॉटेज कंट्री' की साइट पर पहुंच गए। खूबसूरत विशाल लेक के बीच हमें कुछ छोटे छोटे आइलैंड भी नजर आए। इस कॉटेज बस्ती का स्वागत कक्ष और दफ्तर थोड़ा ऊँचाई पर स्थित था। वहां ऊपर डेक से जो विहंगम दृश्य दिखाई दिया वह बहुत मन मोहने वाला था। यहीं डेक पर बैठकर रिसोर्ट प्रतिनिधि ने यहां कॉटेज खरीदने या किराये पर लेने सम्बन्धी जानकारी उपलब्ध कराई।
बैटरी चलित वाहन से हमें नीचे झील किनारे बनी कॉटेज बस्ती तक ले जाकर वहां बने 'जिम', बॉस्केट बॉल कोर्ट, स्वीमिंग पूल और कॉटेज के भीतर की साज-सज्जा का अवलोकन कराया। कॉटेज में निवास कर रहे कई लोग हमें वहां झील में बोटिंग करते नजर आए। बीच पर कुछ धूप सेक रहे थे तो कुछ मछलियों को पकड़ने के लिए कांटा डाले हुए भी दिखाई दिए। कुछ लोग ‘बारबेक्यू’ लगाए खाना पकाते, गर्म करते नजर आए। हम लोग अपना शाकाहारी भोजन साथ लेकर गए  थे।
बने बनाये वुडन स्ट्रक्चरों को गाड़ियों से लाकर यहां स्थापित करने के बाद इन्हें बहार-भीतर से सुसज्जित कर दिया जाता है। ख़ूबसूरत इंटीरियर के तहत किचन में फ्रीज, गैस चूल्हा, मैक्रोवेव, डाइनिंग सेट, ड्राइंग रूम में सोफ़ा,टीवी, डेक आदि के अलावा इन कॉटेजों में एक या दो छोटे बेड रूम्स और प्रसाधन केबिन भी होते हैं। और हाँ चौबीसों घंटे वातानुकूलन तो होता ही है।

कोई दो घण्टा समय हमने यहां बिताया। यहां गोल्फ फील्ड का होना और क्लब की निशुल्क सदस्यता रिसोर्ट की खास विशेषता थी। गोल्फ और वाटर स्पोर्ट और फिशिंग के शौकीन लोगों द्वारा ऐसी बस्ती में अधिक रुचि दिखाई देती है। गोल्फ फील्ड में कई क्लब सदस्यों को हमने बैटरी चलित इको गाड़ियों पर आते जाते और खेलते देखा।

यहाँ से विदा लेकर हम लोग 27 किलोमीटर आगे सीमोर लेक पर इन्ही डेवलपर की पुरानी स्थापित योजना वुडलैंड्स एस्टेट्स (Woodlands estates) भी गए। पुरानी होकर भी यह ‘कॉटेज कंट्री’ खूबसूरत और अधिक आकर्षक लगी। यहां की खास बात यह थी कि हरेक कॉटेज का अपना एक पृथक बोटिंग प्लेटफॉर्म था जो सीधे झील से जुड़ता था। यह बस्ती पूरी तरह विकसित थी और इसमें अब आगे किसी नए फेज की शुरुआत भी नहीं होनी थी।
सैर सपाटे के साथ ओंटारियो राज्य की तीन में से एक कवारथा 'कॉटेज कंट्री' का थोड़ा बहुत जायजा लेना और इस कांसेप्ट से रू-बरु होना हमारा इस वीकेंड का नया और स्मरणीय अनुभव रहा।

लौटते हुए सड़क मार्ग पर एक जगह पर पुल के गेट बंद होने लगे। गाड़ी रोकना पड़ी। धीरे धीरे पुल की सड़क हटकर साइड में हो गई। वस्तुतः पुल के नीचे से जल मार्ग गुजरता था। जल मार्ग से एक बड़ा बोट गुजरने के बाद,धीरे धीरे सड़क अपनी जगह फिर लौट आई। गेट खुले और हम फिर न्यूमार्केट शहर की ओर आगे बढ़ गए।
दरअसल, यह ओंटारियो राज्य का एक ऐतिहासिक जल मार्ग और ब्रिज था। यह अनोखा दृश्य पहले फिल्मों में या यू ट्यूब वीडियो पर अवश्य देखा था, प्रत्यक्ष देखने का अवसर आज की यात्रा में हमें उपहार के रूप में अनायास मिल गया था।



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सहज सरल व्यवस्थित कचरा संग्रहण 

स्वच्छता अभियान में तीन बार देश में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले इंदौर शहर का वाशिंदा होने का गौरव प्राप्त व्यक्ति हूँ, इसलिए एक नजर न्यूमार्केट शहर के अपने घर और स्ट्रीट के कचरा निपटान प्रणाली पर डालना स्वाभाविक था।

प्रत्येक मंगलवार शाम 7 बजे के बाद यहां घर का कचरा कंटेनरों में बाहर सड़क किनारे रखना होता है। रिसायकल किये जाने वाला कचरा और खाद में बदले जाने वाले कचरे को अलग अलग कंटेनर में रखना पड़ता है। नीले कन्टेनरों में रिसाइकिल होने वाला, हरे में वानस्पतिक, किचन वेस्ट  तथा ब्राउन कंटेनर  में वह कचरा रखा जाता है जिसे रिसायकल नहीं किया जा सकता और नहीं जिसे खाद में परिवर्तित किया जा सकता है। संक्रामक और रासायनिक कचरा भी अलग ही रखकर विशेष स्थलों पर ही स्वयं ड्राप करना होता है। 

हर सप्ताह घरों से नीले और हरे कन्टेनरों का कचरा संग्रहण होता है। बाकी कचरा पाक्षिक रूप से लिया जाता है।

निर्धारित दिन की पूर्व रात होते होते सड़क किनारे हरेक घर के बाहर व्यवस्थित रूप से कंटेनर रखे जा चुके होते हैं । इधर कनाडा के शहरों  की स्ट्रीट्स पर  रात को कचरा बिखर जाने का कोई खतरा नहीं होता है। वैसे भी यहां कोई आवारा पशु मुंह मारने को दिखाई नहीं देता है।  हाँ, 'रकून' नाम का एक जानवर अवश्य भोजन के लालच में हरे कचरा बीन की ओर आकर्षित होता है, इसलिए हरा कंटेनर विशेष रूप से निर्मित किया गया होता है।उसके ढक्कन को इस ढंग से सील किया जाता है कि रकून  पहुंचकर उसे बिखेर न सके। 

कचरा बीनकर जीवन चलाने वाले व्यक्तियों की बातें यहां किसी परिकल्पना की तरह ही है। हाँ यह जरूर सुना है कि कुछ नशेडची यहां भी कचरे में से अपने काम की बोतलें अवश्य तलाशते मिल जाते हैं।

बुधवार को दिन भर म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के स्वच्छता विभाग की कचरा गाड़ियां चक्कर लगाती हैं। कुछ मशीन द्वारा तो कुछ कर्मचारी घर के बाहर रखे कंटेनरों का कचरा लिफ्ट कर गाड़ी में उंडेलते रहते हैं। कचरा संग्रहण के बाद कंटेनरों को पुनः उलट कर उसी स्थान पर व्यवस्थित रूप से रख देंगे। 

इधर भी इस काम के लिए हमारी तरह ही कॉरपोरेशन द्वारा एक कम्पनी को नियुक्त किया हुआ है। जिसके कर्मचारी निर्धारित गणवेश, ग्लोव्स और मास्क आदि धारण किये होते हैं। हमारे द्वारा यदि कुछ गलत तरीके से कचरा अलग किया गया होता है तो कंटेनर पर एक पर्ची चिपका कर बिना कुछ कहे लौट जाते हैं।  इससे हम समझ लेते हैं कि कचरा सहेजने,विलग करने में हमसे कुछ गलती हुई है।

कांच के टूटे हुए हिस्सों को एक गार्बेज बेग में सील कर उस पर चिट्ठी लगाना जरूरी है। बगीचे की पत्तियों, टहनियों के लिए अलग से कागज के ब्राउन बैग्स नियत हैं। उनके संग्रहण के लिए दिन भी अलग है। नियत दिन उन्हें भी इसी तरह सड़क किनारे घर के सामने रखा जाना होता है।

न घर के किसी व्यक्ति के पास या स्वच्छता कर्मचारी के पास फिजूल बातों और बहस के लिए समय है और न ही कोई मानसिक तनाव उत्त्पन्न करने वाली  बेवजह की कोई प्रक्रिया। रोजमर्रा जीवन का हिस्सा है यह सब....

खुशी है भारत में भी अब हम इस दिशा में आगे बढ़ने को थोड़ा संकल्पित हुए हैं, लेकिन मंजिल अभी बहुत दूर है....!