यात्रा डायरी
कनाडा से चिट्ठी : तीन
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बैकयार्ड में स्मृति की धूप
बैकयार्ड में स्मृति की धूप
जून माह की 22 तारीख है। कनाडा में ऑफिशियली समर की शुरुआत 21
जून से हो चुकी है। सुबह के 10 बजे हैं और
बैकयार्ड में बैठा धूप का आनन्द ले रहा हूँ। हमारे लिए यह धूप अभी भी गुनगुनी बनी
हुई है लेकिन बच्चों को कुछ तीखी महसूस हो रही,शायद यहां की
ठंड से उनका शरीर थोड़ा ज्यादा तालमेल बैठा चुका है।
बैकयार्ड बोले तो घर के पीछे का बाड़ा।
हमारे गांवों में आमतौर पर ऐसे बाड़े घर के लोगों की दिनभर की गतिविधियों के केंद्र
में होते हैं। एक खपरैल के नीचे खटिया बिछी होती है और सामने एक बाड़ा जिसमें तुलसी
क्यारा, एक पानी भरा बड़ा मटका। नल
से पानी का सप्लाय हो तो टोटी लगी एक छोटी टंकी, फरशियों से
बनी एक मोरी,एक नीम का पेड़, और एक कोने
में बनी टापरी में खेती गृहस्थी का उपयोगी,अनुपयोगी सामान का
ढ़ेर दिखाई दे जाता है। गांवों में इसी बाड़े में गोबर और पीली मिट्टी से लिपा पुता
एक चौका चूल्हा भी बाड़े की शान बड़ाता रहता है।
यद्यपि यह बाड़ा घर हैसीयत के अनुसार अक्सर अपना रूप बदलता रहता है, लेकिन मोटेतौर पर लगभग यही चित्र कल्पना में उभरता है। खपरैल की छांव सीमेंट की चद्दरों और कॉन्क्रीट की हो सकती है। नीम का पेड़ जामुन,आम या बादाम का या फिर क्रिसमस ट्री की किसी प्रजाति का भी हो सकता है। बाड़े की चारदीवारी या फैंसिंग पड़ोसी से साझा होती है या तार, आड़ी तिरछी बल्लियों,कंटीली झाड़ियों या राजस्थान हुआ तो पत्थरों या फरशियों से कम से कम खर्च में बना ली जाती है।
यहां न्यूमार्केट कनाडा के हमारे घर के
बेक यार्ड में खपरैल की जगह लकड़ी के फट्टों का एक समतल डेक बना है और एक बड़ी छतरी
के नीचे चार कुर्सियां रखी गई हैं। हमारे पड़ोसी घरों में भी लगभग इसी तरह है।
अधिकांश समय तो बर्फबारी और शीतकाल के कारण इसका उपयोग कम ही हो पाता है लेकिन समर
में बाड़े का महत्व और उपयोग बढ़ने लगता है। सुबह शाम की चाय आदि यहीं होती है। बाड़े
में लगी हरी घास पर प्यारी डॉगी 'बेट्टी'
खेलती कूदती रहती है। अक्ष कभी कभार बैडमिंटन का मजा भी ले लेता है।
कनाडा में जंगल काफी हैं,लकड़ी का उत्पादन भी बेशक अधिक ही है। बाड़े की
चारदीवारी या फेंसिंग भी लकड़ी के एक समान फट्टों से की जाने का चलन है। पड़ोसी की
भी अपनी अलग फेंसिंग रहती है। फ्रंट यार्ड में दो पेड़ है,जिनमे
एक मेपल का है। पीछे के बाड़े में एक पेड़ है,नाम तो पता नहीं,
यही की किसी प्रजाति का होगा। दो तीन पेड़ों की शाखाएं पड़ोसी और पीछे
के घरों से आकर हमारे बैकयार्ड को खूबसूरत बना रही हैं। मेपल सहित कुछ क्रिसमस
ट्री और लगभग उसी प्रजाति के पेड़ों के दर्शन दिन भर होते रहते हैं। यह परागण का भी
समय होता है। वनस्पति और प्रकृति के रोमांस का मौसम। बाड़े में इस हलचल को दिन भर
महसूस कर मुग्ध हुआ जा सकता है। हम भी हो रहे हैं।
उपयोगी अनुपयोगी सामान के लिए यहां बने
बनाये स्टोर शेड मिल जाते हैं। लगभग 10 बाय 10 के दो शेड हमारे बाड़े में भी पिछली फट्टा
बागड़ से सटे रखे हुए हैं। जिनमें घास छीलने की मशीन, वायर,
बाड़े की साफ सफाई और संवारने के कुछ औजार और साइकिलें रखी जाती हैं।
कल दफ्तर से लौटकर बेटे ने कोई एक घण्टे
बाडे में घास छीलने का काम किया। आगे के यार्ड के घास की वह साफ सफाई करता उससे
पहले पड़ोसी ने ही उसे साफ कर दिया। कभी बेटा भी यह पड़ोसी धर्म कर्म निभा देता है।
शनिवार है, दूसरे पड़ोसी ने बैकयार्ड की सफाई के लिए मशीन चलाने के पहले दुख व्यक्त
किया कि आवाज से हमे थोड़ी परेशानी होगी। जवाब यही था- 'डोंट
वरी ! इट्स नो प्रॉब्लम...थेंक्यू...'
उन्होंने मुस्कुराते हुए अपने साप्ताहिक काम की शुरुआत कर दी। इस सहज विनम्रता और सामान्य शिष्टाचार पर मैं निहाल हो गया।
उन्होंने मुस्कुराते हुए अपने साप्ताहिक काम की शुरुआत कर दी। इस सहज विनम्रता और सामान्य शिष्टाचार पर मैं निहाल हो गया।
धूप अब हमें भी चुभने लगी है। अब कैनेडियन
छतरी की छांव में डेक पर बैठकर चाय नाश्ता करते हैं। देखें खपरैल की खटिया और
पचपहाड़ के बाड़े का कितना स्मृति सुख आनन्दित करता है....!
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फैरी लेक में पोहे
फैरी लेक में पोहे
आज के दिन की शुरुआत कुछ
खास रही। बच्चों की इच्छा थी कि माँ के हाथों से बनें खास इंदौरी पोहे का मजा लिया
जाए। बेशक कुमुद जी के हाथों में जादू है। राजस्थान से आने के बावजूद खासतौर से
इंदौरी पोहे बनाने में उनको महारत हासिल है। कभी मौका लगे तो जायका लेने घर जरूर
पधारें।
बहरहाल, पोहे बनाये गए। जलेबियों की कमी जरूर
रही। स्ट्राबेरी से काम चलाना पड़ा। खास बात यह रही कि पोहे पैक कर लिए गए और उनका
लुत्फ उठाने के लिए न्यूमार्केट की खास सैरगाह 'फैरी लेक'
का रुख किया।
कोई पन्द्रह मिनट की ड्राइव
के बाद हम लोग फैरीलेक पहुंच गए। रविवार के दिन धूप खिली होने से बड़ी संख्या में
लोग परिवार,बच्चे और
बुजुर्गों सहित मौसम का मजा ले रहे थे। साइकिलिंग, रनिंग के
साथ योग करते हुए भी बड़ी संख्या में लोग नजर आए।
यहां स्थित एक मात्र पिकनिक
शेड आज पूरा भरा हुआ था। कोई बड़ा ग्रुप वहां पार्टी मना रहा था। खुली बैंचें जरूर
कुछ खाली थीं लेकिन उन पर नाश्ता नहीं लगाया जा सकता था। आखिर थोड़ी देर इंतजार के
बाद दो शतरंज टेबलें हमें मिल गईं। जो पास पास थीं और उनपर हम पांच लोग बैठ सकते
थे।
कनाडा के फैरीलेक पार्क में
बैठकर इंदौरी पोहे का मजा !! कोई इंदौरी ही महसूस कर सकता है इस बेमिसाल आनन्द को।
इंदौरी बारीक सेव की जगह जरूर बीकानेरी भुजिया सेव थी। लेकिन साथ में प्याज, कोथमीर,नींबू और
जीरावन! क्या कहने!!
इस स्वल्पाहार का समापन लीची के जूस से हुआ।
इस स्वल्पाहार का समापन लीची के जूस से हुआ।
पार्क के बीच छोटी लेकिन
लंबाई में फैली एक सुंदर झील है,जिसमें खूबसूरत बतखें तैरती रहती हैं। चारों तरफ खूबसूरत लंबे लंबे वृक्ष
हैं जिनके बीच सुंदर उतार चढ़ावों में मखमली घास बिछी हैं। हरियाली के बीच सीमेंट
के चमकते वाकिंग ट्रेक। बहुत मनोरम दृश्य। जैसे जीवंत पेंटिंग्स या प्रकृति के
सुंदर फोटोग्राफ्स, जिनमें जीवन उतर आया हो।
अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य।
यही तो कनाडा की संपदा है। खुशी से आंखें छलछलाने को आती हैं। हृदय का हाल तो
पूछिये ही मत। इसके लिए जरूरी नहीं कि हम कवि ही हों....!
*****
अब घर से घूमने को निकले ही
थे तो बच्चों को लगा कि हमें थोड़ा और घुमा दिया जाए। कोई 30 किलोमीटर आगे स्थित रिचमण्ड हिल्स शहर
में कनाडा हिन्दू टेम्पल सोसायटी द्वारा संचालित एक विशाल दक्षिण भारतीय शैली का
मंदिर है। कार उधर ही आगे बढ़ा दी गई।
इस भव्य विशाल मंदिर
कॉम्पेक्स में दक्षिण भारतीय शैली में काले पत्थरों में विभिन्न देवी देवताओं की
छोटी बड़ी प्रतिमाएं हैं। सबको धार्मिक मान्यताओं के अनुसार विधि विधान से स्थापित
किया गया है। सर्वश्री गणेश,लक्ष्मी,सरस्वती,महादेव,
पार्वती,कार्तिकेय मुरगन स्वामी ,राम दरबार, राधाकृष्ण, नवग्रह....आदि
आदि। आरती हो रही थी जब हम वहां पहुंचे। अक्ष सभी दानपेटियों और आरती में दादी से
कनेडियन सिक्के चढ़वाता रहा।
आरती के बाद आचमन किया तो
कपूर सी वही सुगंध और स्वाद आया जो चैनई के मंदिरों में पाया था। साम्भर खिचड़ी का
प्रसादम ग्रहण किया। प्रसाद क्या था। पवित्र लंच ही हो गया।
एक बात मुझे जो यहां खास
अलग लगी वह यह कि कॉम्प्लेक्स के भीतर मंदिरों के शिखर दक्षिण भारतीय शैली में
बहुरंगी थे लेकिन बाहर के सारे शिखर सफेद रंगे गए हैं। भीतर कॉम्लेक्स में जैसे
चैनई बसा था, बाहर कनाडा
की आभा मंदिर पर चमक रही थी।
हिन्दू हेरिटेज सेंटर की
तरह यहां के हॉल में भी आज कोई विवाह समारोह चल रहा था।
मृदंग और अन्य वाद्यों सहित दक्षिण भारतीय संगीत सुनते हुए कुछ अपना अपना सा लगता रहा....!
मृदंग और अन्य वाद्यों सहित दक्षिण भारतीय संगीत सुनते हुए कुछ अपना अपना सा लगता रहा....!
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बारबेक्यू के बहाने दाल बाफलों की याद
बारबेक्यू के बहाने दाल बाफलों की याद
भारतीय गांवों में खासकर मालवा,राजस्थान आदि क्षेत्रों में बारिश की लंबी खेंच हो
जाने पर गाँव के निवासी एक दिन अपने घरों में चूल्हा नहीं जलाते। वर्षा की कामना
में लोग गांव छोड़कर पूरे दिन के लिए खेतों की ओर निकलकर किसी एक जगह भोजन पकाते
खाते हैं। रात को फिर घर लौट आते हैं।लोकमान्यता और ग्रामीणों में विश्वास है कि
ऐसा करने से इंद्र देवता प्रसन्न होकर अमृत वर्षा कर देते हैं।
इसी तरह की घर से बाहर निकलकर दाल, बाफले,लड्डू,चूरमा की गोठ (पिकनिक पार्टी) भी मित्रों,परिवारों के बीच आमतौर पर चलती रहती हैं। पिकनिक स्थल पर जाकर वहीं भोजन बनता रहता है। मनोरंजक गतिविधियां खेल आदि के बीच ठहाके लगते रहते हैं।
हमारे यहां अब जब शहरों,महानगरों में पाश्चात्य शैली की क्लब पार्टियों, रेव पार्टियों आदि का नया दौर शुरू हो चुका है तब भी गांव बाहर जाकर की जाने वाली 'आगुरनी'(बाग रसोई,उज्मनी, उज्जैनी)और 'गोठ' जैसे कस्बाई और परम्परागत आमोद प्रमोद के प्रसंग मिल जाते हैं।
इसी तरह की घर से बाहर निकलकर दाल, बाफले,लड्डू,चूरमा की गोठ (पिकनिक पार्टी) भी मित्रों,परिवारों के बीच आमतौर पर चलती रहती हैं। पिकनिक स्थल पर जाकर वहीं भोजन बनता रहता है। मनोरंजक गतिविधियां खेल आदि के बीच ठहाके लगते रहते हैं।
हमारे यहां अब जब शहरों,महानगरों में पाश्चात्य शैली की क्लब पार्टियों, रेव पार्टियों आदि का नया दौर शुरू हो चुका है तब भी गांव बाहर जाकर की जाने वाली 'आगुरनी'(बाग रसोई,उज्मनी, उज्जैनी)और 'गोठ' जैसे कस्बाई और परम्परागत आमोद प्रमोद के प्रसंग मिल जाते हैं।
कनाडा में फैरी लेक और सिब्ब्ल्ड पॉइंट की
सैर के दौरान बरबस मुझे इनकी याद आती रही। पिताजी जब देवास जिले के बागली,उदयनगर और कमलापुर गांवों में पशुचिकित्सक रहे थे तब
बचपन में हम लोग कई बार गांव बाहर किसी अमराई या खेत , बगीचों
में ऐसी पार्टियों का मजा लेते रहे हैं।
फर्क इतना था कि वहां कंडों(गोबर के उपलों) की आंच पर बाटियाँ सिकती थीं। बाद में नौकरी के दौरान ग्रामीण पोस्टिंग के समय भी खूब 'गोठ' का मजा लिया।
इधर कनाडा में अंगारों की आंच में, धातु की सींकों पर सामिष खाद्य पदार्थ और सब्जियां आदि सिकती दिखीं। हालांकि अब हमारे इधर की नई पीढ़ी इन सबसे अनभिज्ञ बिल्कुल नहीं। इस 'सिगड़ी' भोजन का जायका अब खूब लिया जाने लगा है। लेकिन मैं यहां उस 'बारबेक्यू' की बात करना चाह रहा,जो घर के किचन से बाहर निकलकर पिकनिक स्थल या अपने बैकयार्ड में जमाया जाता है।
समर की शरुआत होते ही इधर वीकेंड पर किचन घर छोड़कर बैकयार्ड में चला आता है। गर्म धुएं और सिकते पदार्थों की गंध और उत्सवी रंग कुछ अलग नजारा पेश कर देता है।
मनुष्य संसार के किसी भी इलाके का रहा हो। कोई भी देश-काल रहा हो। भोजन और स्वाद का आपसी रिश्ता और भूख पर विजय का सुख हमेशा एक सा ही रहता है....
फर्क इतना था कि वहां कंडों(गोबर के उपलों) की आंच पर बाटियाँ सिकती थीं। बाद में नौकरी के दौरान ग्रामीण पोस्टिंग के समय भी खूब 'गोठ' का मजा लिया।
इधर कनाडा में अंगारों की आंच में, धातु की सींकों पर सामिष खाद्य पदार्थ और सब्जियां आदि सिकती दिखीं। हालांकि अब हमारे इधर की नई पीढ़ी इन सबसे अनभिज्ञ बिल्कुल नहीं। इस 'सिगड़ी' भोजन का जायका अब खूब लिया जाने लगा है। लेकिन मैं यहां उस 'बारबेक्यू' की बात करना चाह रहा,जो घर के किचन से बाहर निकलकर पिकनिक स्थल या अपने बैकयार्ड में जमाया जाता है।
समर की शरुआत होते ही इधर वीकेंड पर किचन घर छोड़कर बैकयार्ड में चला आता है। गर्म धुएं और सिकते पदार्थों की गंध और उत्सवी रंग कुछ अलग नजारा पेश कर देता है।
मनुष्य संसार के किसी भी इलाके का रहा हो। कोई भी देश-काल रहा हो। भोजन और स्वाद का आपसी रिश्ता और भूख पर विजय का सुख हमेशा एक सा ही रहता है....
सोच रहे हैं अगले वीकेंड पर बैकयार्ड में
अपना देसी बारबेक्यू लगाएं.....दाल बाफले, चूरमा खाया जाए... वैसे भी बहुत दिन हो गए हैं.....
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कैरम का सीक्रेट सुपर स्टार
कैरम का सीक्रेट सुपर स्टार
बचपन के दिनों में जब स्कूलों में
गर्मियों की छुट्टियां लग जाती थीं तो हम बच्चों में बहुत उत्साह भर जाता था।
छुट्टियों का अलग ही मजा होता था। बच्चे माँओं के साथ अपने ननिहालों में आते-जाते
तो मोहल्ले की रौनक बढ़ जाती थी। नए दोस्तों के साथ गर्मियों की दोपहर में लूडो, ताश पत्ती,व्यापार जैसे खेलों
के अलावा कैरम खेलने में भी बड़ा मजा आता था।
पौत्र अक्ष बाबू के साथ कैरम खेलते हुए
कोई पचास बरस बाद फिर से अपने बचपन के उसी आनन्द में लौटना हुआ।
कनाडा में पांच दिनों का कार्य सप्ताह होता है। स्कूलों में भी। शनिवार को अक्ष बाबू की तरफ से ऐलान हो गया कि आज घर में 'नो मोबाइल,नो टीवी डे' रहेगा। दादा दादी से लेकर मम्मी पापा और खुद अक्ष बाबू टीवी और मोबाइल को हाथ नहीं लगायेंगें।
कनाडा में पांच दिनों का कार्य सप्ताह होता है। स्कूलों में भी। शनिवार को अक्ष बाबू की तरफ से ऐलान हो गया कि आज घर में 'नो मोबाइल,नो टीवी डे' रहेगा। दादा दादी से लेकर मम्मी पापा और खुद अक्ष बाबू टीवी और मोबाइल को हाथ नहीं लगायेंगें।
एक तरह से यह बहुत बढ़िया बात थी। हम दोनों
भी इन दिनों लगातार एक दो फिल्में रोज ही देख रहे थे। फेसबुक पर कनाडा से
चिट्ठियां लिखते हुए ज्यादातर समय मोबाइल हाथ में बना रहता।
हालांकि यहां यह समय भारत से थोड़ा कम जरूर हो गया है।
ज्यादा से ज्यादा प्रवास का आनन्द लेने के लिए सैर सपाटों, प्रकृति और यहां के लोकजीवन को जानने समझने में ही प्राथमिकता रहती है। मोबाइल के कैमरे से तस्वीरें उतारना तो जरूरी है ही। बेहतरीन समय को फेसबुक पर पर दर्ज करना एक तरह से आने वाले समय में स्मृति सुख को सुनिश्चित कर लेना होता है। प्रति वर्ष ये दिन पुनःआएंगे... फेसबुक हमें दोबारा इन पलों को जीने का अवसर देगा...
हालांकि यहां यह समय भारत से थोड़ा कम जरूर हो गया है।
ज्यादा से ज्यादा प्रवास का आनन्द लेने के लिए सैर सपाटों, प्रकृति और यहां के लोकजीवन को जानने समझने में ही प्राथमिकता रहती है। मोबाइल के कैमरे से तस्वीरें उतारना तो जरूरी है ही। बेहतरीन समय को फेसबुक पर पर दर्ज करना एक तरह से आने वाले समय में स्मृति सुख को सुनिश्चित कर लेना होता है। प्रति वर्ष ये दिन पुनःआएंगे... फेसबुक हमें दोबारा इन पलों को जीने का अवसर देगा...
बहरहाल, ऐलान के मुताबिक जब मोबाइल,टीवी से दूर रहना है तो
फिर घर में बैठकर करेंगे क्या? हमारे सुझाव पर समाधान भी
तुरन्त निकल आया और कैरम बोर्ड सज गया ड्राइंगरूम की टेबल पर। पर्याप्त खिलाड़ी भी
चाहिए। तो हो गए चार जन। दादा,दादी,अक्ष
बाबू और उनकी मम्मी। पापा को डॉगी 'बेट्टी' को संभालना भी था और बाहर घुमाने भी ले जाना था।
काली गोटी 10 डॉलर,सफेद 20 डॉलर और लाल
गोटी(क्वीन) 50 डॉलर मूल्य की निर्धारित की गईं। हमारे बचपन
में इन गोटियों के मूल्य पैसों में हुआ करते थे। क्रमशः चवन्नी(25 पैसे), अठन्नी(50 पैसे) और
क्वीन होती थी पूरे एक रुपये याने 100 पैसों की।
अक्ष बाबू ने पहला स्ट्राइक किया और
गोटियां बिखर गईं। वर्षों बाद स्ट्राइकर को छुआ था हमने लेकिन खिलाड़ी तो ठीक ही थे
अपने समय में। थोड़ी देर में ही हाथ जम गया और हम अमीर होते गए। अक्ष और उसकी मम्मी
भी ठीक ठाक खेल रहे थे। हाँ,अक्ष
की दादी जरूर थोड़ी दिक्कत में थीं। घर गृहस्थी को जीवन में साधते साधते कैरम में
लक्ष्य से भटकती सी लगीं। हमने रेखागणितीय सूत्र उन्हें समझाने के प्रयास किये।
थोड़ी देर में उन्होंने कुछ निशाने लगाए भी। स्ट्राइकर को दो बार होल में पहुंचाया।
कुछ गोटियां भी अर्जित कीं।
कैरम के इस शानदार खेल की सबसे दिलचस्प और
अप्रत्याशित घटना यह रही कि सबसे युवा खिलाड़ी अक्ष बाबू दिवालिया हो गए। आखिर में
बोर्ड पर केवल दादा दादी संघर्ष कर रहे थे।
दादी ने अद्भुत कमाल दिखाया। क्वीन के साथ
एक गोटी का कवर लेना होता है। दो बार ऐसे मौके आये जब बोर्ड पर केवल क्वीन और एक
दो गोटियां रह गईं। लेकिन यह बड़ा रोमांचक था कि जैसे ही अक्ष की दादी ने स्ट्राइकर
को उंगली से हिट किया वह किसी भी गोटी से नहीं टकराया। लेकिन आश्चर्य यह कि बोर्ड
की एक दीवार से टकराने के बाद वह क्वीन से जा भिड़ा, क्वीन सीधे होल में....यहीं से वह एक सफेद गोटी की किनारी से स्पर्श करता
हुआ निकला...सफेद गोटी दूसरे होल में....!
सब भौचक्क। यकायक खिलखिलाहट गूंज
उठी....हंसी के फव्वारे छूट गए। हंसते हंसते पेट में बल पड़ गए और आंखों से खुशी के
आंसू निकल आए....!
ये अद्भुत प्रसंग था। कुमुदजी को यह सफलता
पूरे खेल के दौरान दो बार मिली। यह और भी अधिक रोमांचक था।
खेल में सीक्रेट सुपर स्टार के संघर्ष और सफलता के हम सब कायल हो गए....
खेल में सीक्रेट सुपर स्टार के संघर्ष और सफलता के हम सब कायल हो गए....
अक्ष के स्कूल में प्रति सोमवार प्रत्येक
बच्चे को किसी रोचक प्रसंग को सबके सामने अभिव्यक्त करना पड़ता है। कैरम में दादी
की सफलता की कहानी सुनाकर सब बच्चों को भी खूब आनन्दित किया कल उसने....!