Wednesday, 26 June 2019

यात्रा डायरी कनाडा से चिट्ठी : तीन





यात्रा डायरी 
कनाडा से चिट्ठी : तीन 


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बैकयार्ड में स्मृति की धूप 

जून माह की 22 तारीख है। कनाडा में ऑफिशियली समर की शुरुआत 21 जून से हो चुकी है। सुबह के 10 बजे हैं और बैकयार्ड में बैठा धूप का आनन्द ले रहा हूँ। हमारे लिए यह धूप अभी भी गुनगुनी बनी हुई है लेकिन बच्चों को कुछ तीखी महसूस हो रही,शायद यहां की ठंड से उनका शरीर थोड़ा ज्यादा तालमेल बैठा चुका है।

बैकयार्ड बोले तो घर के पीछे का बाड़ा। हमारे गांवों में आमतौर पर ऐसे बाड़े घर के लोगों की दिनभर की गतिविधियों के केंद्र में होते हैं। एक खपरैल के नीचे खटिया बिछी होती है और सामने एक बाड़ा जिसमें तुलसी क्यारा, एक पानी भरा बड़ा मटका। नल से पानी का सप्लाय हो तो टोटी लगी एक छोटी टंकी, फरशियों से बनी एक मोरी,एक नीम का पेड़, और एक कोने में बनी टापरी में खेती गृहस्थी का उपयोगी,अनुपयोगी सामान का ढ़ेर दिखाई दे जाता है। गांवों में इसी बाड़े में गोबर और पीली मिट्टी से लिपा पुता एक चौका चूल्हा भी बाड़े की शान बड़ाता रहता है। 

यद्यपि यह बाड़ा घर हैसीयत के अनुसार अक्सर अपना रूप बदलता रहता है, लेकिन मोटेतौर पर लगभग यही चित्र कल्पना में उभरता है। खपरैल की छांव सीमेंट की चद्दरों और कॉन्क्रीट की हो सकती है। नीम का पेड़ जामुन,आम या बादाम का या फिर क्रिसमस ट्री की किसी प्रजाति का भी हो सकता है। बाड़े की चारदीवारी या फैंसिंग पड़ोसी से साझा होती है   या तार, आड़ी तिरछी बल्लियों,कंटीली झाड़ियों या राजस्थान हुआ तो पत्थरों या फरशियों से कम से कम खर्च में बना ली जाती है।

यहां न्यूमार्केट कनाडा के हमारे घर के बेक यार्ड में खपरैल की जगह लकड़ी के फट्टों का एक समतल डेक बना है और एक बड़ी छतरी के नीचे चार कुर्सियां रखी गई हैं। हमारे पड़ोसी घरों में भी लगभग इसी तरह है। अधिकांश समय तो बर्फबारी और शीतकाल के कारण इसका उपयोग कम ही हो पाता है लेकिन समर में बाड़े का महत्व और उपयोग बढ़ने लगता है। सुबह शाम की चाय आदि यहीं होती है। बाड़े में लगी हरी घास पर प्यारी डॉगी 'बेट्टी' खेलती कूदती रहती है। अक्ष कभी कभार बैडमिंटन का मजा भी ले लेता है।

कनाडा में जंगल काफी हैं,लकड़ी का उत्पादन भी बेशक अधिक ही है। बाड़े की चारदीवारी या फेंसिंग भी लकड़ी के एक समान फट्टों से की जाने का चलन है। पड़ोसी की भी अपनी अलग फेंसिंग रहती है। फ्रंट यार्ड में दो पेड़ है,जिनमे एक मेपल का है। पीछे के बाड़े में एक पेड़ है,नाम तो पता नहीं, यही की किसी प्रजाति का होगा। दो तीन पेड़ों की शाखाएं पड़ोसी और पीछे के घरों से आकर हमारे बैकयार्ड को खूबसूरत बना रही हैं। मेपल सहित कुछ क्रिसमस ट्री और लगभग उसी प्रजाति के पेड़ों के दर्शन दिन भर होते रहते हैं। यह परागण का भी समय होता है। वनस्पति और प्रकृति के रोमांस का मौसम। बाड़े में इस हलचल को दिन भर महसूस कर मुग्ध हुआ जा सकता है। हम भी हो रहे हैं।
उपयोगी अनुपयोगी सामान के लिए यहां बने बनाये स्टोर शेड मिल जाते हैं। लगभग 10 बाय 10 के दो शेड हमारे बाड़े में भी पिछली फट्टा बागड़ से सटे रखे हुए हैं। जिनमें घास छीलने की मशीन, वायर, बाड़े की साफ सफाई और संवारने के कुछ औजार और साइकिलें रखी जाती हैं।
कल दफ्तर से लौटकर बेटे ने कोई एक घण्टे बाडे में घास छीलने का काम किया। आगे के यार्ड के घास की वह साफ सफाई करता उससे पहले पड़ोसी ने ही उसे साफ कर दिया। कभी बेटा भी यह पड़ोसी धर्म कर्म निभा देता है।
शनिवार है, दूसरे पड़ोसी ने बैकयार्ड की सफाई के लिए मशीन चलाने के पहले दुख व्यक्त किया कि आवाज से हमे थोड़ी परेशानी होगी। जवाब यही था- 'डोंट वरी ! इट्स नो प्रॉब्लम...थेंक्यू...'
उन्होंने मुस्कुराते हुए अपने साप्ताहिक काम की शुरुआत कर दी। इस सहज विनम्रता और सामान्य शिष्टाचार पर मैं निहाल हो गया।

धूप अब हमें भी चुभने लगी है। अब कैनेडियन छतरी की छांव में डेक पर बैठकर चाय नाश्ता करते हैं। देखें खपरैल की खटिया और पचपहाड़ के बाड़े का कितना स्मृति सुख आनन्दित करता है....!

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फैरी लेक में पोहे 

आज के दिन की शुरुआत कुछ खास रही। बच्चों की इच्छा थी कि माँ के हाथों से बनें खास इंदौरी पोहे का मजा लिया जाए। बेशक कुमुद जी के हाथों में जादू है। राजस्थान से आने के बावजूद खासतौर से इंदौरी पोहे बनाने में उनको महारत हासिल है। कभी मौका लगे तो जायका लेने घर जरूर पधारें।
बहरहाल, पोहे बनाये गए। जलेबियों की कमी जरूर रही। स्ट्राबेरी से काम चलाना पड़ा। खास बात यह रही कि पोहे पैक कर लिए गए और उनका लुत्फ उठाने के लिए न्यूमार्केट की खास सैरगाह 'फैरी लेक' का रुख किया।
कोई पन्द्रह मिनट की ड्राइव के बाद हम लोग फैरीलेक पहुंच गए। रविवार के दिन धूप खिली होने से बड़ी संख्या में लोग परिवार,बच्चे और बुजुर्गों सहित मौसम का मजा ले रहे थे। साइकिलिंग, रनिंग के साथ योग करते हुए भी बड़ी संख्या में लोग नजर आए।
यहां स्थित एक मात्र पिकनिक शेड आज पूरा भरा हुआ था। कोई बड़ा ग्रुप वहां पार्टी मना रहा था। खुली बैंचें जरूर कुछ खाली थीं लेकिन उन पर नाश्ता नहीं लगाया जा सकता था। आखिर थोड़ी देर इंतजार के बाद दो शतरंज टेबलें हमें मिल गईं। जो पास पास थीं और उनपर हम पांच लोग बैठ सकते थे।

कनाडा के फैरीलेक पार्क में बैठकर इंदौरी पोहे का मजा !! कोई इंदौरी ही महसूस कर सकता है इस बेमिसाल आनन्द को। इंदौरी बारीक सेव की जगह जरूर बीकानेरी भुजिया सेव थी। लेकिन साथ में प्याज, कोथमीर,नींबू और जीरावन! क्या कहने!!
इस स्वल्पाहार का समापन लीची के जूस से हुआ।

पार्क के बीच छोटी लेकिन लंबाई में फैली एक सुंदर झील है,जिसमें खूबसूरत बतखें तैरती रहती हैं। चारों तरफ खूबसूरत लंबे लंबे वृक्ष हैं जिनके बीच सुंदर उतार चढ़ावों में मखमली घास बिछी हैं। हरियाली के बीच सीमेंट के चमकते वाकिंग ट्रेक। बहुत मनोरम दृश्य। जैसे जीवंत पेंटिंग्स या प्रकृति के सुंदर फोटोग्राफ्स, जिनमें जीवन उतर आया हो।
अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य। यही तो कनाडा की संपदा है। खुशी से आंखें छलछलाने को आती हैं। हृदय का हाल तो पूछिये ही मत। इसके लिए जरूरी नहीं कि हम कवि ही हों....!

*****

अब घर से घूमने को निकले ही थे तो बच्चों को लगा कि हमें थोड़ा और घुमा दिया जाए। कोई 30 किलोमीटर आगे स्थित रिचमण्ड हिल्स शहर में कनाडा हिन्दू टेम्पल सोसायटी द्वारा संचालित एक विशाल दक्षिण भारतीय शैली का मंदिर है। कार उधर ही आगे बढ़ा दी गई।
इस भव्य विशाल मंदिर कॉम्पेक्स में दक्षिण भारतीय शैली में काले पत्थरों में विभिन्न देवी देवताओं की छोटी बड़ी प्रतिमाएं हैं। सबको धार्मिक मान्यताओं के अनुसार विधि विधान से स्थापित किया गया है। सर्वश्री गणेश,लक्ष्मी,सरस्वती,महादेव, पार्वती,कार्तिकेय मुरगन स्वामी ,राम दरबार, राधाकृष्ण, नवग्रह....आदि आदि। आरती हो रही थी जब हम वहां पहुंचे। अक्ष सभी दानपेटियों और आरती में दादी से कनेडियन सिक्के चढ़वाता रहा।
आरती के बाद आचमन किया तो कपूर सी वही सुगंध और स्वाद आया जो चैनई के मंदिरों में पाया था। साम्भर खिचड़ी का प्रसादम ग्रहण किया। प्रसाद क्या था। पवित्र लंच ही हो गया।
एक बात मुझे जो यहां खास अलग लगी वह यह कि कॉम्प्लेक्स के भीतर मंदिरों के शिखर दक्षिण भारतीय शैली में बहुरंगी थे लेकिन बाहर के सारे शिखर सफेद रंगे गए हैं। भीतर कॉम्लेक्स में जैसे चैनई बसा था, बाहर कनाडा की आभा मंदिर पर चमक रही थी।
हिन्दू हेरिटेज सेंटर की तरह यहां के हॉल में भी आज कोई विवाह समारोह चल रहा था।
मृदंग और अन्य वाद्यों सहित दक्षिण भारतीय संगीत सुनते हुए कुछ अपना अपना सा लगता रहा....!

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बारबेक्यू के बहाने दाल बाफलों की याद


भारतीय गांवों में खासकर मालवा,राजस्थान आदि क्षेत्रों में बारिश की लंबी खेंच हो जाने पर गाँव के निवासी एक दिन अपने घरों में चूल्हा नहीं जलाते। वर्षा की कामना में लोग गांव छोड़कर पूरे दिन के लिए खेतों की ओर निकलकर किसी एक जगह भोजन पकाते खाते हैं। रात को फिर घर लौट आते हैं।लोकमान्यता और ग्रामीणों में विश्वास है कि ऐसा करने से इंद्र देवता प्रसन्न होकर अमृत वर्षा कर देते हैं।
इसी तरह की घर से बाहर निकलकर दाल, बाफले,लड्डू,चूरमा की गोठ (पिकनिक पार्टी) भी मित्रों,परिवारों के बीच आमतौर पर चलती रहती हैं। पिकनिक स्थल पर जाकर वहीं भोजन बनता रहता है। मनोरंजक गतिविधियां खेल आदि के बीच ठहाके लगते रहते हैं।
हमारे यहां अब जब शहरों,महानगरों में पाश्चात्य शैली की क्लब पार्टियों, रेव पार्टियों आदि का नया दौर शुरू हो चुका है तब भी गांव बाहर जाकर की जाने वाली 'आगुरनी'(बाग रसोई,उज्मनी, उज्जैनी)और 'गोठ' जैसे कस्बाई और परम्परागत आमोद प्रमोद के प्रसंग मिल जाते हैं।
कनाडा में फैरी लेक और सिब्ब्ल्ड पॉइंट की सैर के दौरान बरबस मुझे इनकी याद आती रही। पिताजी जब देवास जिले के बागली,उदयनगर और कमलापुर गांवों में पशुचिकित्सक रहे थे तब बचपन में हम लोग कई बार गांव बाहर किसी अमराई या खेत , बगीचों में ऐसी पार्टियों का मजा लेते रहे हैं।
फर्क इतना था कि वहां कंडों(गोबर के उपलों) की आंच पर बाटियाँ सिकती थीं। बाद में नौकरी के दौरान ग्रामीण पोस्टिंग के समय भी खूब 'गोठ' का मजा लिया।
इधर कनाडा में अंगारों की आंच में, धातु की सींकों पर सामिष खाद्य पदार्थ और सब्जियां आदि सिकती दिखीं। हालांकि अब हमारे इधर की नई पीढ़ी इन सबसे अनभिज्ञ बिल्कुल नहीं। इस 'सिगड़ी' भोजन का जायका अब खूब लिया जाने लगा है। लेकिन मैं यहां उस 'बारबेक्यू' की बात करना चाह रहा,जो घर के किचन से बाहर निकलकर पिकनिक स्थल या अपने बैकयार्ड में जमाया जाता है।
समर की शरुआत होते ही इधर वीकेंड पर किचन घर छोड़कर बैकयार्ड में चला आता है। गर्म धुएं और सिकते पदार्थों की गंध और उत्सवी रंग कुछ अलग नजारा पेश कर देता है।
मनुष्य संसार के किसी भी इलाके का रहा हो। कोई भी देश-काल रहा हो। भोजन और स्वाद का आपसी रिश्ता और भूख पर विजय का सुख हमेशा एक सा ही रहता है....
सोच रहे हैं अगले वीकेंड पर बैकयार्ड में अपना देसी बारबेक्यू लगाएं.....दाल बाफले, चूरमा खाया जाए... वैसे भी बहुत दिन हो गए हैं.....


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कैरम का सीक्रेट सुपर स्टार 

बचपन के दिनों में जब स्कूलों में गर्मियों की छुट्टियां लग जाती थीं तो हम बच्चों में बहुत उत्साह भर जाता था। छुट्टियों का अलग ही मजा होता था। बच्चे माँओं के साथ अपने ननिहालों में आते-जाते तो मोहल्ले की रौनक बढ़ जाती थी। नए दोस्तों के साथ गर्मियों की दोपहर में लूडो, ताश पत्ती,व्यापार जैसे खेलों के अलावा कैरम खेलने में भी बड़ा मजा आता था।
पौत्र अक्ष बाबू के साथ कैरम खेलते हुए कोई पचास बरस बाद फिर से अपने बचपन के उसी आनन्द में लौटना हुआ।
कनाडा में पांच दिनों का कार्य सप्ताह होता है। स्कूलों में भी। शनिवार को अक्ष बाबू की तरफ से ऐलान हो गया कि आज घर में 'नो मोबाइल,नो टीवी डे' रहेगा। दादा दादी से लेकर मम्मी पापा और खुद अक्ष बाबू टीवी और मोबाइल को हाथ नहीं लगायेंगें।
एक तरह से यह बहुत बढ़िया बात थी। हम दोनों भी इन दिनों लगातार एक दो फिल्में रोज ही देख रहे थे। फेसबुक पर कनाडा से चिट्ठियां लिखते हुए ज्यादातर समय मोबाइल हाथ में बना रहता।
हालांकि यहां यह समय भारत से थोड़ा कम जरूर हो गया है।
ज्यादा से ज्यादा प्रवास का आनन्द लेने के लिए सैर सपाटों, प्रकृति और यहां के लोकजीवन को जानने समझने में ही प्राथमिकता रहती है। मोबाइल के कैमरे से तस्वीरें उतारना तो जरूरी है ही। बेहतरीन समय को फेसबुक पर पर दर्ज करना एक तरह से आने वाले समय में स्मृति सुख को सुनिश्चित कर लेना होता है। प्रति वर्ष ये दिन पुनःआएंगे... फेसबुक हमें दोबारा इन पलों को जीने का अवसर देगा...
बहरहाल, ऐलान के मुताबिक जब मोबाइल,टीवी से दूर रहना है तो फिर घर में बैठकर करेंगे क्या? हमारे सुझाव पर समाधान भी तुरन्त निकल आया और कैरम बोर्ड सज गया ड्राइंगरूम की टेबल पर। पर्याप्त खिलाड़ी भी चाहिए। तो हो गए चार जन। दादा,दादी,अक्ष बाबू और उनकी मम्मी। पापा को डॉगी 'बेट्टी' को संभालना भी था और बाहर घुमाने भी ले जाना था।
काली गोटी 10 डॉलर,सफेद 20 डॉलर और लाल गोटी(क्वीन) 50 डॉलर मूल्य की निर्धारित की गईं। हमारे बचपन में इन गोटियों के मूल्य पैसों में हुआ करते थे। क्रमशः चवन्नी(25 पैसे), अठन्नी(50 पैसे) और क्वीन होती थी पूरे एक रुपये याने 100 पैसों की।
अक्ष बाबू ने पहला स्ट्राइक किया और गोटियां बिखर गईं। वर्षों बाद स्ट्राइकर को छुआ था हमने लेकिन खिलाड़ी तो ठीक ही थे अपने समय में। थोड़ी देर में ही हाथ जम गया और हम अमीर होते गए। अक्ष और उसकी मम्मी भी ठीक ठाक खेल रहे थे। हाँ,अक्ष की दादी जरूर थोड़ी दिक्कत में थीं। घर गृहस्थी को जीवन में साधते साधते कैरम में लक्ष्य से भटकती सी लगीं। हमने रेखागणितीय सूत्र उन्हें समझाने के प्रयास किये। थोड़ी देर में उन्होंने कुछ निशाने लगाए भी। स्ट्राइकर को दो बार होल में पहुंचाया। कुछ गोटियां भी अर्जित कीं।
कैरम के इस शानदार खेल की सबसे दिलचस्प और अप्रत्याशित घटना यह रही कि सबसे युवा खिलाड़ी अक्ष बाबू दिवालिया हो गए। आखिर में बोर्ड पर केवल दादा दादी संघर्ष कर रहे थे।
दादी ने अद्भुत कमाल दिखाया। क्वीन के साथ एक गोटी का कवर लेना होता है। दो बार ऐसे मौके आये जब बोर्ड पर केवल क्वीन और एक दो गोटियां रह गईं। लेकिन यह बड़ा रोमांचक था कि जैसे ही अक्ष की दादी ने स्ट्राइकर को उंगली से हिट किया वह किसी भी गोटी से नहीं टकराया। लेकिन आश्चर्य यह कि बोर्ड की एक दीवार से टकराने के बाद वह क्वीन से जा भिड़ा, क्वीन सीधे होल में....यहीं से वह एक सफेद गोटी की किनारी से स्पर्श करता हुआ निकला...सफेद गोटी दूसरे होल में....!
सब भौचक्क। यकायक खिलखिलाहट गूंज उठी....हंसी के फव्वारे छूट गए। हंसते हंसते पेट में बल पड़ गए और आंखों से खुशी के आंसू निकल आए....!
ये अद्भुत प्रसंग था। कुमुदजी को यह सफलता पूरे खेल के दौरान दो बार मिली। यह और भी अधिक रोमांचक था।
खेल में सीक्रेट सुपर स्टार के संघर्ष और सफलता के हम सब कायल हो गए....
अक्ष के स्कूल में प्रति सोमवार प्रत्येक बच्चे को किसी रोचक प्रसंग को सबके सामने अभिव्यक्त करना पड़ता है। कैरम में दादी की सफलता की कहानी सुनाकर सब बच्चों को भी खूब आनन्दित किया कल उसने....!


यात्रा डायरी कनाडा से चिट्ठी : दो


यात्रा डायरी 
कनाडा से चिट्ठी : दो 

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करीब करीब...भीगे अल्फाज


मुझे लग रहा है कि कोई न कोई मित्र कह ही देगा कि 'जरा घर भी रह लिया करो यार!' लेकिन अच्छा ही हुआ यह सदवाक्य अभी तक सुनना नहीं पड़ा।

दरअसल, यहां सप्ताह का अधिकांश समय घर में ही गुजरात है हम दोनों का। और यही कारण है कि थोड़ा थोड़ा घूमने के बाद पर्यटन और घर के बाहर देखे नजारों और परिदृश्य पर चिंतन मनन और उसे अभिव्यक्त करने का पर्याप्त समय मिल जाता है।
तो थोड़ी हमारे उस वक्त की बात करते हैं जब सुबह बच्चों के स्कूल और दफ्तरों में चले जाने के बाद हम सार्थक रूप से गुजार रहे हैं।

पिछले कुछ वर्षों में भारत के खबरिया टीवी चैनलों में इतनी रुचि बढ़ गई  थी कि बहुत देर से पता चल पाया कि हम अपना तन, मन और विवेक को खोते जा रहे हैं। विशेषकर आम चुनावों के दौरान जो गन्दगी फैलाई जाने लगी और मीडिया आतंक हावी होने लगा तब हमने टीवी देखना लगभग छोड़ ही दिया था। दूरदर्शन के पुराने धारावाहिक 'ये जो है जिंदगी', नुक्कड़,ऑफिस ऑफिस जैसे हास्य व्यंग्य के ख्यात धारावाहिक यू ट्यूब पर देखने लगे थे। 

इसी बीच 23 मई को उधर चुनाव परिणाम आना शुरू हुए हम इंदौर से मुम्बई और फिर इधर 26 को कनाडा पहुंच गए। तो किसी प्रकार के राजनैतिक,वैचारिक तनाव से लगभग मुक्ति ही मिल गई।

फ़िल्म देखने सिनेमा हॉल गए तो कोई 20 वर्ष हो गए होंगे हमें। टीवी पर जरूर कुछ फिल्में देखी होंगी।  कुछ बेहतरीन कला फिल्में अनुज मित्र बहादुर पटेल और  कुछ बेटी एकता के सुझाव पर कम्प्यूटर पर यू ट्यूब से निकालकर अवश्य देखीं हैं। लेकिन बहुत सी चर्चित फिल्में अब यहां नेटफ्लिक्स, यू ट्यूब आदि पर देख रहे हैं दोपहर को।कुछ नए प्रतिभाशाली कलाकारों के चर्चे ही सुने थे। फिल्में देखकर पता चला कि न सिर्फ  वे बेहद मेहनती हैं बल्कि यदि बेहतरीन निर्देशक मिलता है तो कुछ अर्थों में हमारे लीजेंड्स से भी आगे निकल जाने की क्षमता उनमें दिखाई देती है।
जोधा अकबर,स्वदेस, स्त्री,पद्मावत,हाई वे, बाजीराव मस्तानी,ठाकरे, गंगा जमुना, बरसात की रात,बरेली की बर्फी,गली बॉय,मानसून डेटिंग, सीक्रेट सुपर स्टार आदि जैसी कुछ देख भी चुके हैं और यहां रहते प्रति सप्ताह तीन,चार तो अवश्य ही देखेंगे। मजा आ रहा है।
न चाहते हुए भी बहुत से समाचार और गतिविधियां  सोशल मीडिया पर मिल ही जाती हैं। भारत के समाचार पत्र यहां शाम को ई पेपर खोलकर देखने में आ जाते हैं। दिनचर्या लगभग वैसी ही है जो इंदौर में रहती थी। बस अहिल्या लायब्रेरी की गोष्ठियां नहीं है, तंग बस्ती के बच्चों के शिविर मिस हो रहे हैं।फिर भी अपने आपको भारत और अपने मित्रों से लगातार जोड़े रखने का रचनात्मक प्रयास कर रहा हूँ...देखते हैं कितना हासिल कर पाता हूँ और कितना रचनात्मक दे पाता हूँ....हाँ डायरी के नोट्स के बाद उन्हें संवारने का काम तो जारी रहना ही है। मित्रों की शुभेच्छाएँ और परामर्श सर्वोपरि है....
बहरहाल, आज बहू अभिरुचि ने दो फिल्में सुझाई हैं - 'करीब करीब सिंगल सिंगल' और 'कुछ भीगे अल्फाज'....


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बेट्टी का साथ,जिप्सी की याद

इधर के ज्यादातर घरों में एक न एक पालतू पशु अवश्य देखने को मिलता है। पशु से मेरा तातपर्य कुत्ता,बिल्ली जैसे पेट्स से है। 
गायें,भैसें आदि जैसे अन्य दुधारू पशु अलग से बड़े और व्यावसायिक स्तर पर रखे जाते हैं। मुर्गियाँ, पिग्स आदि भी। घोड़ों के कई अस्तबल और प्रशिक्षण केंद्र भी बहुतायत से नजर आ जाते हैं।

सामान्य परिवारों में बिल्लियों, पिल्लों को भी बहुत लाड़ प्यार से घर के किसी  सदस्य की तरह ही रखा जाता है। उनका पालन पोषण और देखभाल भी बहुत वैज्ञानिक और पशुपालन के निर्देशों के अनुसार की जाती है। कुछ घरों में तो दो  या तीन कुत्ते या बिल्लियाँ तक दिख जाती हैं।

सुबह शाम कई लोग अपने पेट्स का पट्टा थामें विचरण करते नजर आते हैं।हमारे यहां भी बच्चों ने एक डॉगी को यही स्थान दिया हुआ है। जब ये लोग भारत आते हैं उसे केनेल (डॉग बोर्डिंग) में छोड़कर आते हैं। इस बार भी ऐसा ही हुआ था।
लेकिन इसबार लौटने पर 'बेट्टी' को दादा ,दादी भी मिल गए हैं। एकाध दिन हमें सूँघ कर,बदन पर चढ़ चढ़ाकर उसने हमसे अपना रिश्ता बना ही लिया। शुरू शुरू में थोड़ी बहुत परेशानी हुई, लेकिन उसने भी जब हमारे प्रेम की सीमा जान ली तो फिर बच्चों के घर आने पर ही शैतानी करती है। बाकी समय किसी समझदार बच्चे की तरह हमारे आसपास भ्रमण करती है। हमारे आराम करने के समय वह भी नींद निकाल लेती है।थोड़ी देर बेक यार्ड में घूम आती है। 
बहरहाल, उसकी उपस्थिति से घर में रौनक रहती है। पोते अक्ष और बेट्टी का आपस में खेलना, लड़ना झगड़ना रोज की बात है। कभी गुस्सा भी आता है लेकिन लाड़ भी कुछ कम नही उमड़ता। 

उसके साथ रहकर हमें देवास की अपनी 'जिप्सी' याद आती है। अग्रज (बेटे) और बेटी  दादा जी ने प्रोमिस किया था कि जब वे अपने घर में रहने जाएंगे तब कुत्ता पालने की अनुमति देंगे। और जब 'बसंत बसेराहमारा(पापा) का मकान किरायेदार के कब्जे से 40 साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद मुक्त हुआ तब बेटे को  दो माह की 'जिप्सी' मिल गई थी। तरह साल बाद जिप्सी के न रहने पर मैने एक कविता लिखी थी,जिसे अग्रज को टोरंटों में फोन पर सुनाते हुए मेरा गला भर आया था। अग्रज भी कुछ जवाब नहीं दे सका।
इधर कनाडा में फिर दो साल पहले 10 जून को  'बेट्टी' आई।जो बहुत कुछ 'जिप्सी' की तरह ही दिखती है। मेरे मुंह से उसके लिए बेट्टी की बजाय संबोधन ' जिप्सी' ही निकलता है।
अभी उसके बाल बहुत बढ़ गए हैं पिछले तीन चार महीनों में। डॉग ग्रूमर (पेट्स पार्लर) में अपॉइंट ले लिया है एक सप्ताह बाद  हेयर ड्रेसर उसके बदन के बाल हल्के करके संवार देगा। 
पेट्स से प्रेम बहुत आनन्द देता है लेकिन उनसे बिछोह भी  बहुत रुलाता है। पशुप्रेमी इस वेदना को बहुत अच्छी तरह जानते हैं।
भारत  लौटने पर याद तो 'बेट्टी' की भी बहुत आएगी। 


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घर में जलपरियां


कल मैंने पेट्स की बातें की थीं। आज घर में ही मन मुग्ध करने वाली खूबसूरत जलपरियों के बहाने थोड़ा बाजार भी हो आते हैं।

पढ़ा था कि घर में लाफिंग बुद्धा की प्रतिमा या सफेद कबूतरों की  जोड़ी का शो पीस सजाने से अथवा घर मे छोटा सा मछली घर रखने से सुख समृद्धि के रास्ते खुल जाते हैं। 

कनाडा के हमारे घर के ड्राइंग रूम  में एक छोटा सा खूबसूरत फिश एक्वेरियम सजा है, सुख समृद्धि का वह कितना साधन बना होगा यह तो पता नहीं लेकिन अग्रज को बचपन से ही मछलियों से लगाव रहा है। भारत में जब वह था तब भी दिल्ली और चैनई में भी हमेशा फिश पॉट सजे रहते थे। यहां थोड़ा बड़ा और चौकोर एक्वेरियम है। जिनमें कुछ छोटी बड़ी रंगबिरंगी मछलियां विचरती रहती हैं।

बच्चों के लगभग एक माह भारत प्रवास के बाद लौटने पर एक्वेरियम का पानी थोड़ा कम हो गया था। मछलियां भी उदास और कुछ निढाल सी नजर आईं। पहली फुरसत में बेटे अग्रज ने एक्वेरियम की साफ सफाई आदि की। दाना पानी और एयर प्रेशर आदि संयोजित किया। 

एक शाम मछलियों के कुछ और साथियों को लाने के लिए हम सबलोग  मार्केट के लिए निकले। इस बहाने हमें बहुत व्यवस्थित और बड़ा एक्वेरियम माल और सुंदर मछलियों के स्टोर का आनन्द लेने का अवसर मिला। यहां मछलीघर में प्रयुक्त होने वाली सभी सामग्री मिलती थी।

कोई 500 से ऊपर विभिन्न प्रजातियों की खूबसूरत मछलियां इतने ही छोटे छोटे एक्वेरियम्स में सजीव पेंटिंग्स की तरह कम रोशनी के हॉल में अद्भुत आभा बिखर रही थीं। दाम और प्रति मछली या मछलियों के समूह की कीमत भी चस्पा थीं।इन्ही में देखकर ग्राहक मनपसंद मछली चुनकर दी गई शीट पर पर नोट करते जा रहे थे। 

अक्ष और अग्रज ने पूरे एक घंटे में घर ले जाने के लिए आखिरकार कुछ मछलियां चुन ही लीं। इस बीच हमे यह देखकर बड़ा ही अचम्भा हुआ कि यहां केवल फिश ही नहीं विभिन्न नस्लों के सुंदर सांप,छिपकलियां, केकड़े,मगरमच्छ और अब तक अनदेखे कुछ ऐसे प्राणी भी संग्रहित थे जिनको देखने में ही हमें डर लगता है,सिहरन दौड़ जाती है उन्हें कुछ लोग घर ले जाकर एक्वेरियम में सजा लेते हैं।

बहरहाल, कुछ रंगीन छोटी नई मछलियां थोड़े से जतन के बाद हमारे ड्राइंगरूम के एक्वेरियम का हिस्सा बन गईं। एकाध दिन नए पानी और नए साथियों के साथ सामंजस्य बनाने में थोड़ी दिक्कत आई लेकिन आज वे भी  छोटे से संसार में अठखेलियाँ करती हमारा मन मोह रहीं हैं।

सच तो एक्वेरियम की इन खूबसूरत रंगीन मछलियों में से अधिकांश प्रजातियां साउथ एशिया से आयात होकर इधर आती हैं। क्या पता इनमें से कोई उधर उदयपुर या भोपाल की किसी झील के पानी को छोड़कर यहां आई हों....!




12 
कनाडा की पब्लिक लायब्रेरी में विष्णु नागर

कनाडा के न्यूमार्केट शहर की सरकारी पब्लिक लायब्रेरी में कल प्रिय कवि ,व्यंग्यकार और पत्रकार श्री विष्णु नागर जी से मुलाकात हो जाना मन को बहुत प्रफुल्लित कर गया।

दरअसल, पोते अक्ष को लायब्रेरी से ईमेल संदेश आया कि उसके द्वारा चाही गई पुस्तकें वहां आ चुकी हैं। ईशू करवा लें। अक्ष और उसके पेरेंट्स के निशुल्क रजिस्ट्रेशन वहां किये हुए हैं। अग्रज को भी अपने कार्ड का नवीनीकरण करवाना था।

न्यूमार्केट के पुरानी खूबसूरत ' हेरिटेज स्ट्रीट' से होते हुए कोई पन्द्रह मिनट की ड्राइव के बाद हम सब इस सरकारी पब्लिक लायब्रेरी में पहुंच गए। बहुत विशाल पुस्तकालय है यह। बहुत व्यवस्थित और कम्प्यूटराइज्ड। विविध विषयों मसलन बागवानी,इतिहास से लेकर ज्ञान विज्ञान,कौशल,साहित्य आदि सभी पर विभिन्न भाषाओं में लाखों पुस्तकें तीन मंजिलों में फैली इस लायब्रेरी में संग्रहित हैं। एक पूरा फ्लोर तो मात्र किड्स और टीन्स के लिए ही बना है। जहां हमे अनेक बच्चे पढ़ते, कम्प्यूटरों पर रचनात्मक कार्य करते,पुस्तकें छांटते, ईशू कराते नजर आए। स्वयं ही ईशू कराई पुस्तकों को मशीन पर सकेन करके दर्ज करना होता है। अपने कार्ड से लॉगिन और चेक आउट करके पूरी प्रक्रिया सम्पन्न हो जाती है। 

अक्ष ने दो बड़े झोलों भर पुस्तकें कोई आधा,पौन घण्टों में चयन की। कुछ की पहले से ऑनलाइन डिमांड की हुईं थीं। इस बीच अग्रज ने भी अपने कार्ड का नवीनीकरण कराया। मुझसे पूछा भी कि मुझे कुछ लेना हो तो ईशू करा लेते हैं। मगर मैं इन दिनों अधिक पढनें में नही व्यस्त होना चाहता। बस खूब देखना,समझना और एन्जॉय के मूड में हूँ। इसलिए मैंने लायब्रेरी से पुस्तकें अभी ईशू नहीं करवाईं। अगले चक्कर में शायद कुछ ले भी लूँ।

विविध भाषाओं के लिए बने हिस्से में मुझे भारतीय भाषाओं की पुस्तकें देखने का बड़ा मन था। बेटे ने वहां लगे कम्प्यूटर भी सर्च किया।
आखिर हम लोग विभिन्न भाषाओं वाले एडल्ट खण्ड में भी पहुंच गए। बच्चों के खंड को पहले देख  चुके थे। बच्चों के लिए अनेक पुस्तकें वहां उपलब्ध थीं। ज्यादातर कॉमिक्स और कुछ कहानियों वाली।
बड़ों के लिए यहां गुजराती सहित अन्य भारतीय भाषाओं की पुस्तकें दिखाई दीं। हिंदी खण्ड में भी अनेक जाने पहचाने नाम और कितस्बें सजी थीं।  कुछ को उलट पुलट कर देखा। 

इसी शेल्फ पर आदरणीय विष्णु नागर जी की गद्य संग्रह की पुस्तक दिख गई नाम इस वक्त जुबान पर आ नहीं रहा। शायद किताबघर या राधाकृष्ण प्रकाशन की रही होगी। उन्ही के पास हमारे इंदौर के स्व सनत कुमार जी की पुस्तक दिख गई। वह शायद ज्ञानपीठ से आई थी। प्रकाशन यही तीन याद रहे। लेकिन विष्णु जी और सनत जी को वहां पाकर मन अतिरिक्त खुशी से भर उठा। 

हमने भी वहाँ अपनी  पुस्तिकाएं 'चिड़िया का सितार' और ' फूल शुभकामनाओं के ' प्रबंधक को भेंट कीं। 
यह संयोग है कि आज आदरणीय विष्णु नागर जी का जन्म दिन भी है। उनकी पुस्तकों को पढ़ते हुए एक कविता हमने लिखी थी जो ज्ञानोदय में प्रकाशित हुई थी,आज पुनः पढ़ लीजिये.... 

कविता 
किताब की आखिरी पंक्ति तक 
ब्रजेश कानूनगो

पुस्तक मेले मे 
दिख गए गौरीनाथ के पास बैठे विष्णु नागर 
साथ आने को कहा तो स्टाल से उतर कर 
तुरंत चले आए मेरे साथ
गौरीनाथ घिरे रहे 
पुस्तक प्रेमियों की भीड़ से

साथ आने का कहने में संकोच नहीं हुआ मुझे 
रोक नहीं रही थी कोई दिव्यता 
बल्कि लगता था कह रहे हों-ले चलो मुझे बाहर 
मालवा की हवा में सांस लेना चाहता हूँ थोड़ी देर

वे मेरे साथ हो लिए 
बहुत सरल और इतने सहज कि 
जब मैंने बताया कल लीलाधर मंडलोई भी आए थे मेरे साथ 
तो वे खुश हुए 
यह जानकर तो और भी कि 
चंद्रकांत देवताले, असगर वजाहत और मंगलेश डबराल के आने के पहले 
निराला और मुक्तिबोध भी पिताजी के साथ इसी तरह आ चुके हैं 

उनके चश्में से स्नेह और संतोष बरसता नजर आया 
मेरे कंधे पर प्रेम से हाथ रख दिया विष्णु नागर ने
शायद स्वभाव नहीं था उनका 
फिर भी बताते रहे कि किस तरह जीवन भी कविता हो जाता है

घर पहुँच कर सुनाने लगे घर के बाहर का हाल 
बहुत दुखी थे अपने रिश्तेदारों के बारे में बताते हुए 
मुम्बई के बम विस्फोट का क़िस्सा सुनाते हुए भीग गईं उनकी आँखें

आश्चर्य तो तब हुआ जब हिटलर के नाम पर उन्हें गुस्सा आया 
पर आँगन में लगे पेड़ पर चिड़िया को देखकर खिल पड़े विष्णु नागर

बाल-बच्चों की खबर लेने-देने का हुआ जरूरी काम 
साथ बैठकर खाए हमने दाल बाफले, चौराहे तक गए पान चबाने 

प्रेम के बारे में टुकड़ोंटुकड़ों में करते रहे बात
इस तरह बने रहे विष्णु नागर मेरे साथ किताब की आखिरी पंक्ति तक




13
बाजार में जायका 

आबादी की तुलना में उपलब्ध जमीन का अनुपात कनाडा में अधिक दिखाई देता है। यही कारण है कि यहां के बाजार बहुमंजिला होने के बजाय भूतल पर ही फैले दिखाई दिए। एक एक स्टोर की लंबाई चौड़ाई इतनी अधिक कि उनमें हमारी चालीस पैतालीस रो हाउसेस वाली कॉलोनी निकल आये। 

लगभग हर सप्ताह ही दूध,दही,ब्रेड,अंडा,सब्जियां आदि के लिए न्यूमार्केट शहर के बड़े बड़े स्टोरों में जाने का मौका मिलता रहा। वालमार्ट,नोफ्रिल, कॉस्टको आदि जैसे बड़े शॉपिंग मॉल्स बड़े भूतल पर फैले दिखाई दिए। विविध सामग्री के लिए कई पंक्तियों में खुले शोकेस इस तरह सजे हुए कि पहली पंक्ति से आखिरी तक जाते हुए बिना सामान लिए भी 30 मिनट से कम समय न लगे।
पेट्स और मछलियों आदि तथा उनसे संबंधित सामग्री के लिए भी स्टोर्स भी लगभग हमारे परिवार की जरूरतों के उपयोग की वस्तुओं की तरह ही जरूरी होते हैं यहां। आखिर पेट्स भी तो यहां के परिवारों का एक सदस्य होता है।

जितने भूखण्ड में बाजार बने हैं उससे कोई दो तीन गुना तक विशाल गाड़ियों  के लिए व्यवस्थित पार्किंग उपलब्ध है। 

सप्ताह भर की खरीद के लिए हमें एक डेढ़ घण्टे से कम का समय कभी नहीं लगा। दूध एक साथ खरीदकर बिना गर्म किये थैलियां फ्रीज में रखना थोड़ा अटपटा जरूर लगा। लेकिन कभी खराब होने,फट जाने या गुलाबी हो जाने की शिकायत नही हुई। हमेशा ताजा। रेडी टू ईट सामग्री अब भारत में भी चलन में आ गई है लेकिन वहां भोजन बनाने के लिए घर पर सेविकाएं आसानी से मिल  जाती हैं। फ्रोजन फ़ूड का चलन  इधर कुछ अधिक दिखा। उधर टीवी पर 'मिराज पराठे' का विज्ञापन देखकर हंसी आती थी कि कुछ लोग बासी क्यों खाते हैं। लेकिन यहां के सादे,मैथी,प्याज,चीज के फ्रोजन पराठों का जायका लिया तो सचमुच मजा आया। तवे पर रखो और गर्म करके तुरन्त तैयार। उन लोगों को जिनका अधिकतम समय नौकरी में गुजरता हो और आने जाने में हुई भारी  थकान के बाद एक दो पराठें बड़ी राहत दे देते हैं। इसके अलावा चटनियाँ,इडली का बेटर और वे सभी खाद्य सामग्री यहां मिल जाती हैं जो हम अब भारत में भी डिब्बाबन्द के रूप में अपना चुके हैं। बहुत सी सामग्री भारत,पाकिस्तान, चीन,बांग्लादेश साउथ एशियन देशों से ही आती हैं लेकिन गुणवत्ता में हमने उन्हें भारत में उपलब्ध उसी ब्रांड की सामग्री से बेहतर पाया। हल्दीराम, मदर्स डेरी सहित और भी जाने पहचाने ब्रांड्स देखने को मिले।यूएसए की 'दीप' ब्रांड के खाद्य पदार्थ भी यहां बहुत पसंद किए जाते हैं। स्थानीय गुणवत्तापूर्ण और बढ़िया ड्राय फ्रूट्स और फल और सब्जियां पूरी दुनिया से आयात होकर यहां मिल जाते हैं। 

इससे भी ज्यादा भारतीय सामग्री की दरकार हो तो 'इंडियन बाजार' उन कई स्थलों पर मौजूद हैं जहां साउथ एशियन मूल या अप्रवासी भारतीयों की बसाहट है। ऐसे ही टोरंटों के एक स्टोर से हमने रोटी बेलने का नया चकला, झंडू बाम,दालें मसाले,अचार, पापड़ और रतलामी  नमकीन और बीकानेरी भुजिया के अलावा भुनी हुई मूंगफलियां,सेवइयां,चिक्की आदि खरीदीं।
इसी इंडिया बाजार से लगे हुए स्टोर में कव्वालियां बज रहीं थीं। होम्योपैथ की दुकान भी नजर आई। 

भोजन का समय हुआ तो 'ब्रार रेस्टोरेंट' का रुख किया। पंजाबी छोले भटूरे से लेकर उत्तर भारतीय थाली और साउथ इंडियन व्यंजन सभी कुछ उपलब्ध। मिठाइयां भी। हिंदी,पंजाबी,उर्दू भाषी लोगों का जमावड़ा। लोग परिवार सहित भारतीय भोजन का आनन्द उठा रहे थे। कुछ यूरोपीय और कैनेडियन भी लुत्फ उठाते दिखे। कुछ पैक कराकर ले गए। 

मैंने और बेटे ने छोले भटूरे और कचोरी खाई। पत्नी ने डोसा, बहू ने भारतीय थाली सबसे शेयर की। बढ़िया था खाना। चोटीवाला या अप्सरा से कुछ ज्यादा कम नहीं लगा। हाँ, उन्नीस जरूर था। मगर परदेस में देसी का जायका उसे इक्कीस बना गया। मिल्ककेक हमने पैक करवा ली थी।

भोजन के लिए हम लोग एक दिन 'कोरास ब्रेकफास्ट एन्ड लंच' में भी पाश्चात्य जायके के मोह में गए। दरअसल शाकाहारियों के लिए इस तरह के रेस्टोरेंट में बहुत कम विकल्प होते हैं। कठिनाइयों के बावजूद हमारा पूरा परिवार अभी तक अंडे तक सीमित शाकाहारी ही बना हुआ है। कोरास रेस्टोरेंट इस क्षेत्र का बहुत लोकप्रिय पाश्चात्य रेस्टोरेंट है। खासबात यह है कि ब्रेकफास्ट और लंच का मेनू एक ही रहता है कार्ड में। सुबह खाओ तो ब्रेकफास्ट दोपहर को लंच। डिनर मिलता ही नहीं। शाम को 4 बजे रेस्टोरेंट बन्द हो जाता है।
रविवार का दिन होने से हमें 15 मिनट का वेटिंग मिला। इंदौर में भी  'चोटीवाला' के यहां भी अक्सर इंतजार होता रहा है। बस यहां इंतजार में बैठने को कुर्सियां या सोफा नहीं लगा था। सब कतार में लगे थे। 
यहां हमने 'बनाना मेंगो दही शेक' पिया। खाने में डबल ऑमलेट जिसमें पालक,चीज और अन्य सब्जियां पड़ी हुईं थीं। ब्रेड,बटर साथ में आलू की फ्रेंच फ्राइस, खरबूजे और पाइनेपल की फांक और एक स्ट्रॉ बैरी।
यह भोजन भी पर्याप्त और स्वादिष्ट था। परिवार के साथ बैठने  खाने से स्वाद भी बढ़ गया भोजन का। जरूरी केलोरीज़ का शानदार तालमेल बैठ गया। 

भोजन की बात चली है तो एक जायके की बात और कर लेते हैं। पोता अक्ष स्वीमिंग के 9 वें स्तर में सफल हुआ तो उसकी दादी ने पार्टी का प्रस्ताव रख दिया। तय हुआ कि दक्षिण भारतीय  दंपत्ति द्वारा यहां चलाये जा रहे रेस्टोरेंट 'गोल्डन टेस्ट ऑफ साउथ एशिया' में लंच किया जाए।
न्यूमार्केट से कोई 30 km दूर जब हम वहां पहुंचे तो एक भारतीय परिवार वहां पहले से ही लंच कर रहा था। 
रेस्टोरेंट को संचालित कर रहे पति पत्नी ने बहुत आत्मीयता से हमारा स्वागत किया। बहू बेटे पहले ही वहां के भोजन का आनन्द उठा चुके थे। 
दरअसल रेस्टोरेंट में कोई अन्य कर्मचारी नहीं था। पति पत्नी ही सब कार्य देखते थे। आर्डर लेना,बनाना,खिलाना,बिल देना,पेमेंट लेना आदि सब कुछ। 
जब हमने पूछा की यहां तो सिर्फ साउथ एशियन या भारतीय लोग ही आते होंगे । तब संचालिका ने बताया कि नहीं यूरोप और कनाडा,यूएसए के भी बहुत सारे उनके ग्राहक हैं जो थोड़ा चटपटा पसंद करते हैं। परिवार सहित आते हैं,खाते हैं और पैक कराकर ले जाते हैं। ग्राहकों की कोई समस्या नहीं है।
हमने यहां थाली ऑर्डर की। बेटे ने उत्तपम और पोते ने चीज सेन्डविच। गोभी,बैगन,दाल, चांवल,रसम,दही,चटनी,रोटी के बाद साबूदाने की खीर। पत्नी ने जीरा युक्त छाछ का अतिरिक्त सेवन किया। इंदौरी शब्दों में कहें तो  पेट ही क्या हम लोगों की आत्मा तक तृप्त हो गई। भिया क्या केने। मजा आ गिया.....!



यात्रा डायरी चिट्ठी कनाडा से : एक


यात्रा डायरी
चिट्ठी कनाडा से


1
हॉर्न मुक्त अनुशासन 

साल  2019  में 26 मई को  मुम्बई से तड़के 1 बजे उड़े और 26 मई की दोपहर को ही  2.30 बजे टोरंटो पर विमान लेंड हो गया। समय का गणित कुछ गलत हुआ लगता है लेकिन मुम्बई से 8 घण्टे की लुफ्तांसा एयर लाइंस से  म्युनिख तक की उड़ान फिर लगभग छह घण्टे म्यूनिख हवाई अड्डे पर एयर कनाडा की फ्लाइट के इंतजार के बाद 8 घण्टों की टोरंटों की यात्रा के बावजूद कनाडा में 26 मई की शाम होना बकाया थी। 

साउथ एशिया के मेरे जैसे किसी व्यक्ति के लिए जो पहली बार कनाडा पहुंचा हो , यह बहुत अचरज का क्षण था कि सूरज की रोशनी इन दिनों रात को लगभग 9 बजे तक वैसी ही होती है, जैसी भारत में शाम छह बजे होती है।

*****

पूर्व से आया कोई भी व्यक्ति पश्चिम में पहुंचकर कुछ और अधिक जिज्ञासु हो उठता है। रहन सहन, वेशभूषा से लेकर रहवासी इलाकों और प्रकृति और पर्यावरण में भारत के मूल स्वभाव से काफी भिन्नता दिखाई देने लगती है। हालांकि इंडिया की मेट्रो सिटीज के कुछ पेज थ्री बाशिंदों को यह ज्यादा अटपटा न भी लगे लेकिन आम हिंदुस्तानी में नए के प्रति  कुतूहल पैदा हो जाना स्वाभाविक है। लेकिन ऐसा न हो कि कुतूहल में आप किसी व्यक्ति को घूरने लग जाएं। यह शिष्टाचार के खिलाफ होता है यहां। किसी की निजता में हस्तक्षेप है ऐसा करना। यदि किसी से नजरें टकरा जाएं तो कृपया 'हेलो' कहकर मुस्कुराना कदापि न भूलियेगा।यह अलग बात है कि इधर अपने देश में हम अपने पहचान वालों से भी नजरें चुराकर कन्नी काट लेते हैं।

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भारत में बांयें चलने का नियम और आदत को सबसे पहले तिलांजलि देकर दाहिने को आत्मसात करने में ही समझदारी है यहां।
विमान से निकलते ही संकरे गलियारे में से गुजरते हुए, एक्सीलेटर की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए यह ध्यान में रखना पड़ा कि अब वामपंथी को भी दाहिने ही चलना है। यदि आप सुस्त हैं तो कृपया पीछे से तेज आने वालों को बाईं साइड से निकल जाने में सहयोग करें। अपने मोहल्ले और गलियों की तरह यहां फैलकर या चौड़े होकर कोई नहीं चलता दिखता। 'एक्सक्यूज मी','प्लीज', थेंक्यू' जैसे शब्द  पल पल उछलते रहते हैं। कान तरस जाते हैं यह सुनने को कि ' अबे! किधर देख के चल रिया है!'

ट्रैफिक के नियमों को सूनी सड़कों पर भी बिना ट्रैफिक जवान के पालन होते देखना आश्चर्य में डाल देता है। कुछ आंतरिक चौराहों पर जहां सिर्फ 'स्टॉप' का बोर्ड लगा है वहां भी गाड़ियां रुकती हैं। पहले आने वाला पहले क्रास करता है। पैदल, साइकिल सवार और विकलांग को सड़क से गुजर जाने की प्रतीक्षा की जाती है। दाहिने मुड़ना हो तब भी।  आंखें और आदत भारत में बाएं चलन की अभ्यस्त हैं तो लगता है अब बहू या बेटा गाड़ी बाईं ओर ले जाएंगे लेकिन गाड़ी दाईं ओर मुड़ जाती है। मुख्य मार्गों पर सिग्नल हैं, लेकिन लोग अपनी चिंता की बजाए दूसरी गाड़ियों की अधिक चिंता करते दिखाई देते हैं, सामने वाले का ध्यान ज्यादा रखा जाता है। फिर वही इशारों में हाथ हिलाकर 'थेंक्स','जस्ट ए मिनट' और प्यारी आत्मीय मुस्कान। और हाँ ! गाड़ियों के हॉर्न की आवाज मैंने  टोरंटो और न्यू मार्केट शहरों में किसी सड़क या ट्रैफिक सिग्नल या भीड़ भरे इलाकों में भी कभी नहीं सुनी।


2
आसमान से सुख बरस रहा है 

लगातार शून्य डिग्री से नीचे के तापमान वाले लंबे शीतकाल और  बर्फीले मौसम के बाद कनाडा में मई माह से जब तापमान बढ़ने लगता है लोगों के चेहरे और मन उत्सवी चमक से खिलने लगते हैं। 

14
से 20 डिग्री तापमान के बीच जब धूप निकल आती है तो लोग घरों से निकलकर परिवार सहित आउटिंग को निकलने लगते हैं। कोई साइकिल चला रहा है तो कोई दौड़ लगा रहा है। हरियाली के बीच कई किलोमीटर तक साइकिलिंग,वाकिंग, रनिंग लम्बे ट्रेक बने हुए हैं। 

यह अलग बात है कि जिस वक्त हमारा इंदौर में 42 तापमान पर झुलस रहा था, हमने इधर कनाडा के न्यूमार्केट शहर में धूप में भी कंटोपी और हुडी धारण कर रखी थी। 

धूप के बावजूद हवा बर्फीली लग रही थी। लेकिन यहां के लोग, बहू, पोता महज टी शर्ट, हेलमेट पहनकर साइकिल चला रहे थे।  वाक कर रहे थे।  डॉगी 'बेट्टी' का पट्टा थामें बेटा अग्रज दौड़ लगा रहा था। 

बच्चों के छह बजे ऑफिस से आने के बाद तक दिन अस्त नहीं हुआ है। धूप खिली है। कौन कनेडियन होगा जो ये दुर्लभ और गोल्डन गिफ्ट गवांना चाहेगा। उन सबके साथ हम भी हो लिए हैं। स्वास्थ्य नर्म है, शीत गर्मी की तासीर है। बचकर रहना है। लेकिन सबका साथ...सबका सुख है। विकास तो यहां सबका पहले से हो ही चुका है।

हम वाकिंग ट्रेक से गुजर रहे हैं। परिवार सहित हम लोगों को आनन्दित होते देख दौड़ती दो महिलाएं मुस्कुराकर 'हेलो' कहती हैं। एक साइकिलिस्ट क्रॉसिंग पर ठहरकर पोते की साइकिल को रास्ता देता है। दोनों मुस्कुराते हैं। दोनों के मुंह से निकलता है- ' इट्स ओके...थेंक्स'

बेटा डॉगी की लीश थामें उसके साथ साथ खुद भी दौड़ रहा है। डॉगी रुक जाती है। हरी मखमली घास को सूँघती है और निवृत्त होती है। बेटा अपनी जेब से गार्बेज बेग निकालकर अपने हाथ पर लपेटता है। डॉगी की पोटी उठाता है। निर्विकार भाव से किनारे पर खड़े  हरे रंग के एक बीन में डालकर पुनः दौड़ने लगता है।

मुझे इंदौर का अपना घर याद आता है। डॉगी संग सुबह की सैर को निकले मेरे अपने शहरवासी याद आते हैं। सफाई करती, अपनी पत्नी का रोज सुबह का कुढ़ना याद आता है। हालांकि  बीन लगाने की शुरुआत अब हमारे यहां हो चुकी है....स्वच्छता के मूल्यांकन में हमारा शहर दो बार ‘नंबर वन’ का खिताब अर्जित कर चुका है लेकिन.....!

धूप तेज हो गई है। तापमान शायद 23 हो गया है। मैंने कनटोप उतार दिया है। दौड़ने वाले पसीने से नहा लिए हैं। कुछ ने बदन से शर्ट उतार फैंका है। 
कोई उन्हें घूर नहीं रहा। सब सामान्य सा है। 
आसमान से सुख बरस रहा है।

*****


3
सप्ताहांत की सैर

जून माह की 9 तारीख की सुबह हो गई है। सप्ताहांत की शुरुआत हो चुकी है। पांच दिनों तक लगातार काम करने के बाद शुक्रवार की शाम से ही उत्साह का वातावरण बनने लगता है इधर।  शुक्रवार की शाम का बड़ा हिस्सा भारत में अपनों से वीडियो/ऑडियो  बातचीत करने में, सबकी खैर खबर लेने में गुजर जाता है। इसी दिन सप्ताहांत की मौज मस्ती, पर्यटन और आमोद प्रमोद के कार्यक्रम और योजनाएं आकार लेने लगती हैं। 

बहरहाल,  शनिवार की सुबह धूप खिली है। कनाडा में सुबह के साढ़े आठ बजे हैं। भारत में शाम के छह  बजे का समय हुआ होगा। तापमान 18 है। दोपहर तक 24  तक पहुंचने के आसार हैं। मतलब एक बेहद खुशगवार दिन की शुरुआत। न्यूमार्केट (कनाडा) के अपने घर से सुबह का नाश्ता करके कोई 50 मिनट के ड्राइव की दूरी पर मनोरम  प्राकृतिक झील 'सिब्बल पॉइंट' पहुंचने का कार्यक्रम तय होता है।

फोल्डिंग चेयर्स, पिकनिक क्रोकरी, दोपहर का आहार, बैडमिंटन रैकेट्स, शटल कॉक्स आदि जैसे साजो सामान से लैस होकर हमारी गाड़ी 12 बजे के आसपास निकल पड़ती है। सामान्यतः हाई वे अवॉयड किये जाते हैं। क्षेत्रीय रास्तो से गुजरना अधिक सुखद, तनाव मुक्त होता है। बाहर के  मनोरम दृश्य थोड़े इत्मीनान से निहारे जा सकते हैं। ये सड़कें भी गुणवत्ता और सुविधाओं में हाइवे से कुछ कम नहीं होती। बस स्पीड सीमा 120/100 की बजाय 70/80  प्रति घंटा बनाकर रखना होती है।

रास्ते के दोनों ओर खूबसूरत घने पेड़ और हरियाली फैली हुई है। इन्ही के बीच खूबसूरत घर। कुछ खेत भी। कुछ खेतों के गोडाउन्स। लेकिन भारतीय ग्रामीण  परंपरा से थोड़ा अलग। एक मायने में विकसित। अब इसकी थोड़ी झलक हमारे यहां भी कुछ बड़े शहरों से लगे बायपासों, एक्सप्रेस हाईवेज़ पर भी दिखाई देने लगी हैं। लेकिन यहां आच्छादित घनी हरियाली और शहरी लेकिन प्राकृतिक जंगलों की कल्पना भी नहीं जा सकती। और स्वच्छ पर्यावरण, प्रदूषण मुक्त हवा अलग ही वातावरण का निर्माण कर स्वार्गिक अनुभूति से तन-मन को प्रफुल्लित कर देता है।
जहां मैदान दिखाई देते हैं वहां दरअसल घोड़ों के अस्तबल, ट्रेनिंग सेंटर, पोलो ग्राउंड या फिर बेहतरीन गोल्फ फील्ड होते हैं। जिनके बीच छोटे छोटे जलाशय वहां के सौंदर्य में और वृद्धि कर देते हैं।

रास्तेभर इन खूबसूरत दृश्यों का मजा लेते हुए हम लोग हमारे गंतव्य के करीब पहुंचने लगते हैं। सैलानियों की गाड़ियों की आवाजाही दिखाई देने लगती है। कुछ ही देर में हमारी गाड़ी एंट्री गेट के बूथ की खिड़की के पास जाकर रुक जाती है। एक युवती मुस्कुराकर 'हेलो' कहकर हमारा स्वागत करती है। हमारी बहू अभिरुची यहां के कल्चर, संवाद और जानकारियों से अच्छी तरह बावस्ता है। उनके पास यहां के पार्कों और अन्य स्थलों के लिए सुगम 'गेटपास' वर्षभर के लिए उपलब्ध है। टिकिट का हमें कोई शुल्क नहीं चुकाना पड़ा। सारी जानकारी कम्प्यूटर में दर्ज करने और मुस्कुराहटों और अभिवादन के आदान प्रदान के बाद हमारी गाड़ी पॉर्क में प्रवेश कर लेती है। 

बेटे ने बताया गेटपास खिड़की पर सेवाएं देने वाली किशोरी एक स्कूली छात्रा थी। यहां वेकेशन्स में विभिन्न सरकारी संस्थाओं के विभागों में अपनी पार्ट टाइम सेवाएं देकर युवा अपने लिए धन अर्जित करने के साथ साथ भविष्य में अपनी रुचि के जॉब में प्रवेश की दिशा भी स्वयं सुनिश्चित कर लेते हैं। 
जिस वक्त हमारे स्कूलों में  'प्राप्तांक' केंद्रित ज्ञान गुणवत्ता का मूल्यांकन प्रमुख है, सुखद आश्चर्य रहा कि यहां 'स्किल डेवलपमेंट' अपनी भूमिका निभा रहा है। हमारे यहां अब यह विचार के स्तर पर शुरू हुआ है। जमीनी हकीकत और सफलता में अभी वर्षों लगेंगे। पालकों की मानसिकता में बदलाव और जोखिम लेने का साहस थोड़ी दूर की बात लगती है। हिन्दी,अंग्रेजी को साथ लेकर बच्चों को स्नातक डिग्री दिलवाने और स्क्रिप्ट लेखन,अनुवाद और सब टाइटलिंग, डबिंग के बड़ी कमाई वाले क्षेत्र में प्रवेश का जोखिम मैं स्वयं न ले सका। पढ़ाई कुछ की। काम कुछ और किये। इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट की पढ़ाई और 97% और 99% की आकांक्षा ने सब कुछ बदल कर रख दिया है हमारे देश में।

बहरहाल, कनाडा में कैरियर चुनने की भूमिका बचपन से आकार लेने लगती है। भविष्य में अपने मन का  करने का शायद बच्चे सोचने तो लगते है।

पार्किंग में हम अपनी कार लगा चुके हैं। ‘सिब्बल्ड पॉइंट’ अपनी हरियाली और गहरी नीली आत्मीय विशाल जलराशि से परिपूर्ण मोहक मुस्कान लिए अपनी बाहें फैलाये हमारा स्वागत कर रहा है......



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सिब्बल्ड पॉइंट के मजे

सिब्बल्ड पॉइंट दरअसल ओंटारियो प्रांत में एक विशाल प्राकृतिक झील  के किनारे का वह स्थल है जहां बीच हैं, वाटर स्पोर्टिंग के लिए  व्यवस्थाएं की गईं हैं। चारों तरफ हरियाली से भरपूर ‘डे पार्क’ है। खूबसूरत पेड़ों से आच्छादित झील किनारे और हरी मखमली घास से युक्त मैदान और लघु घाटियाँ हैं। इन्ही के बीच खूबसूरत पिकनिक शेड्स लगाए गए हैं, जिनमें लकड़ी की अनेक बैंचों और टेबलों पर पर्यटक दिन भर के लिए अपने परिवार का अस्थायी बसेरा बना सकते हैं। महिला, पुरुषों के लिए साफ सुथरे आधुनिक प्रसाधन गृहों के अलावा खुली धूप में आनन्द लेने के लिए वॉलीबॉल और बैडमिंटन कोर्ट भी उपलब्ध हैं। आप अपनी कुर्सियां, टेंट आदि भी लगा सकते हैं।

कार से उतरकर सबसे पहले हमने एक शेड के नीचे  एक टेबल पर अपना कब्जा जमाया। थोड़ा साफ करके टेबल क्लॉथ पर पिकनिक की सामग्री रख दी। साथ लाए भोजन पैकेट्स आदि वहीं छोड़कर हम दोनों, बेटे,बहू, पोते अक्ष के साथ टहलने को निकल गए।

बेशक डॉगी ' बेट्टी' को कैसे छोड़ सकते थे। सबसे ज्यादा तो वही खुश थी। उछल रही थी। पार्क में हमने उसी क्षेत्र को खास तौर से अपने ठिये के लिए चुना था जहां 'पेट्स' का प्रवेश प्रतिबंधित नहीं था।

हमारे शेड में सम्भवतः गल्फ मूल का कोई परिवार भी ‘बारबेक्यू’ सजाये अपने खान पान की तैयारी में जुटा हुआ था। बच्चे खेल रहे थे, बुजुर्ग बैंचों पर पसरे मौसम का  ले रहे थे। सुख और स्वाद की जानी पहचानी खुशबू महसूस की जा सकती थी वहां। एक परिवार ने खुली धूप में अपनी कुर्सियां लगाई हुई थीं। कुछ लोग बदन पर क्रीम लगाए अपनी पीठ सेंकते भी नजर आए।

दिन के लगभग एक बजे गए थे, बच्चों को भूख लग आई तो पहले पेट पूजा के लिए शेड में आकर साथ लाये गए सेंडविचेस और फलों का मजा लिया। बेशक थोड़ा सा इंदौरी नमकीन भी साथ था। यहीं के बाजार से लाये मक्का से बने ‘बुगली फिंगर्स’ (फ्लेक्स/क्रेकर्स) भी चबाये जा रहे थे।
क्रेकर्स के स्वाद के साथ बरबस माँ के बनाये मक्की के पापड़ों की याद आ गई। वही जायका...वही कुरकुरापन.... बचपन के दिनों में देवास के अपने मुहल्ले में ईद के समय टोकनियों में बिकते बड़े बड़े तले हुए मक्की के पापड़ों का स्वाद आज भी स्मृति में छाया हुआ है। इसी बहाने हमारे साथ माँ भी आ गईं और जन्मस्थली देवास भी चली आई...!

बहरहाल,  भोजन करके हमलोग झील के किनारे  टहलते हुए बोटिंग पॉइंट पर आए। झील के भीतर बोट उतारने के लिए चार लंबे प्लेटफॉर्म बने हुए थे। यह बहुत दिलचस्प है कि हमारे यहां की बोटिंग की तरह यहां कोई संस्थागत व्यवस्था नहीं थी। लोग अपने खुद के बोट और बोटिंग सामग्री लेकर आते हैं। अपनी कारों के पीछे लगे ट्रेलर पर रेसिंग बोट्स, पतवार से चलाई जाने वाली नांवें, छायादार कुर्सीदार बोट हों या बैटरी या फ्यूल जनरेटेट मोटरबोट सभी अपने निजी घर से लेकर आते हैं।
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चांदनी रात में नौका विहार' विषय पर निबंध लिखकर परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले मेरे जैसे व्यक्ति के लिए भरी दुपहरी में नौकायन का यह नजारा अद्भुत था। राज कपूर,शम्मी कपूर या शर्मिला टैगोर जैसे अभिनेताओं को फिल्मों में कभी ऐसा करते देखने के बाद बहुत देर तक हम लोग कनाडा की इस विशाल झील में साक्षात रोमांचक जलक्रीड़ा का आनन्द लेते रहे।

यद्यपि स्कूल और कॉलेज के दिनों में एनसीसी प्रशिक्षण के दौरान हर साल दशहरा दीपावली अवकाश में कैम्पिंग का थोड़ा बहुत अनुभव तो रहा है लेकिन सिब्बल्ड पॉइंट के कैम्पिंग क्षेत्र को देख समझकर इसकी व्यापकता अचंभित कर देती है।  घने वन क्षेत्र के बीच कुछ ऐसे स्थान निर्धारित किये गए हैं जहां कई रातें और दिन पर्यटक और स्थानीय नागरिक अपने अस्थायी आवास के साथ वन्य जीवन के अनुभव प्राप्त करने के लिए एडवेंचर एक्टिविटी को नियोजित कर सकते हैं। गाड़ियों सहित टेंट लगाकर भोजन से लेकर  रोजमर्रा की सारी गतिविधियां इन्ही टेंटों में रहकर कैम्पिंग के दौरान जारी रहती हैं। कुछ तो अपने लिए ट्रेलर पर बने बनाये घर तक साथ लेकर आते हैं जिनमें सारी व्यवस्थाएं होती हैं। हम लोग इस तरह की कुछ गाड़ियों को फ़िल्म कलाकारों की वेनिटी वेन या 'स्वदेश' फ़िल्म में दिखाए वाहन 'करेवान' में महसूस कर सकते हैं। कश्मीर के 'बोट हाउस' की तरह हमारी सेवा में कोई अन्य नहीं होता बल्कि कैम्पिंग के दैरान परिवार को स्वयं अपना ख्याल रखना होता है। आत्मनिर्भरता इसके केंद्र में है। यद्यपि ऑथरिटी अपनी ओर से सावधानियां, खतरों और प्राकृतिक संकटों के बारे हिदायतें और चेतावनियां जारी करती है लेकिन किसी भी विपरीत स्थिति के लिए सारी जिम्मेदारी सैलानी या एन्जॉय करने वाले परिवार की रहती है। कैम्पिंग के दौरान लोग साइकिलों पर जंगलों और सैरगाहों पर खूब भ्रमण करते हैं। हमने ऐसे ही कैम्पों को खूब देखा,समझा, आनन्द लिया। 
बेटे ने बताया नए लोगों को यहां का प्रशासन कैम्पिंग का एक दो दिवसीय प्रशिक्षण निशुल्क देता रहता है। बेटे ने बताया ऐसे ही एक दिवसीय शिविर का अभ्यास वे भी ले चुके हैं।

वहां बने एक छोटे से म्यूजियम का अवलोकन करने के बाद हमने कनाडा प्रशासन द्वारा सहेजे और गुड गवर्नड प्रकृति के अनमोल उपहार से बिदा ली।



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श्रम के सूरजमुखी 

पर्यटन की दृष्टि से देखे कनाडा में सबकुछ हराभरा ही है यह मत समझ लीजियेगा। हर समुदाय के अपने संघर्ष और जीवन जीने की अपनी परिस्थितिजन्य और भौगोलिक शर्तें और सीमाएं भी होती है।
इस विशाल भूभाग का बहुत छोटा सा हिस्सा ही ही लोगों के रहने के लिए उपयोगी है। गूगल गुरु से पता कर लीजियेगा। मैं अपने नजरिये से अपनी बात कह रहा हूँ जिसमें मैं अपने कवि मन की बात सुन रहा। किसी समाजशास्त्री या अर्थशास्त्री और किसी खास विचारधारा  के तथ्यों और तर्कों को थोड़ी देर के लिए अलग रखकर ही मेरे साथ चलिएगा।
  
भारत के हमारे भूखण्ड की सबसे बड़ी विशेषता ही यह है की कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और अटक से लेकर कटक तक (बहुत पुराना मुहावरा है लेकिन टाइम टेस्टेड है) हर बात में विविधता पसरी पड़ी है। आबोहवा हो, भाषा,भूषा या भोजन हो , 'विविधता में एकता' का आदर्श बोध वाक्य यूं ही नही बन पड़ा है। 'सर्व धर्म समभाव' का विचार अनेक प्रकार की उद्दण्डताओं के बावजूद हरेक भारतीय के मन में गहरे तक पैठा हुआ है। यह हमारे लोकतंत्र की बड़ी ताकत भी है।

बहरहाल, भारत की यही विशालता, विविधता और सतरंगी स्वरूप एक ओर यदि इसकी ताकत है तो दूसरी ओर किसी एकतरह की व्यवस्था और समझ स्थापित करने में कतिपय बाधाओं को भी ला खड़ा कर देती है। सरकार और तंत्र को इनसे निपटने में उतनी सुगमता भारत में नही हो सकती जितनी कनाडा जैसी विकसित लेकिन छोटी आबादी के कल्याण के लिए यहां के प्रशासन को रहती होगी।
घनी आबादी और बहुत बड़ी जनसंख्या के कारण देश की अर्थ व्यवस्था और अन्य समस्याओं के हल खोजना भारत में थोड़ा कठिन कार्य हो सकता है जबकि कनाडा जैसे देशों में लोगों की कमी होना ही अपनी एक समस्या कही जा सकती है। प्रशासन की कोशिश होती हैं कि लोग यहां बसें। नई आबादियाँ विकसित हों। जो भूखण्ड बर्फ से ज्यादा समय तक ढंके रहते हैं वहां भी धीरे-धीरे नई बसाहटों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। 

बिजली, पानी की असीमित उपलब्धता और आधुनिक टेक्नोलॉजी  ने इस लक्ष्य को संभव भी किया है। घरों,दफ्तरों,सार्वजनिक स्थलों का लगातार वातानुकूलन, सीधे टेप(नल) से शुद्ध ठंडा,गर्म पानी का निर्बाध सप्लाय आदि बहुत बुनियादी चीजें हैं जो सरकारी स्तर पर सुलभ है।

स्वास्थ्य और प्रारंभिक शिक्षा में सरकारी सेवाओं की गुणवत्ता का बोलबाला है। उनमें विश्वास कायम है। उच्च शिक्षा सम्भवतः महंगी है परंतु इसका लाभ बहुत कम युवाओं को लेना पड़ता है, इसके पूर्व ही बच्चे अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश करने लगते हैं।

अपना घर का सपना हमारी तरह यहां भी है। घर, गाड़ी जरूरी है। बाकी हर अपना वह कार्य जो खुद किया जा सकता है उसे किसी और से करवाने के लिए पहले तो कोई व्यक्ति मिलता नहीं और कराना ही चाहें तो उसका सेवा शुल्क बहुत ज्यादा होगा। हमारे यहां ऐसे कामों के लिए सहज सुलभ और सस्ते सेवादार उपलब्ध होते हैं। कनाडा में हमारे पड़ोसी का पूरा परिवार सप्ताहांत में श्रम करता रहा और आगे के दालान में फर्शीकरण और बेक यार्ड में  टूट चुके पूल की मरम्मत करके शाम को इत्मीनान से गुनगुनी धूप में कॉफी पी रहा था।

उनसे प्रेरित होकर हमने भी थोड़ी देर अक्ष बाबू के साथ बैडमिंटन का मजा लिया और अपने घर की क्यारी में सूरजमुखी के कुछ बीज रोप दिए......


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मेपल से पीपल तक 

यशराज बैनर  की फिल्मों के  रोमांटिक दृश्यों में जिस पेड़ के नीचे नीचे प्रायः नायक नायिका मोहब्बत के गीत गाते हैं वे अक्सर मेपल के होते हैं.... खूबसूरत विविध रंगी तिकोनी पत्तियां जो पेड़ से झरकर वातावरण को और अधिक प्रेममय बना देती हैं.....इसी खूबसूरत मेपल पेड़ की एक लाल पत्ति को कनाडा के राष्ट्रीय चिन्ह के रूप में ध्वज पर स्थान पाने का गौरव हासिल है।

कहा जाता है यह प्रकृति व पर्यावरण के उत्‍सव का प्रतीक है. तो प्रकृति के सौंदर्य से मालामाल कनाडा में इन  पत्‍तों को इतना बड़ा सम्‍मान मिलना स्वाभाविक ही है। मैंने कहीं पढ़ा है कि यूरोपीय देशों में खुशी के तराने तब तक पूरे नहीं होते जब तक कि उनमें मेपल के घने और हरे भरे पेड़ का जिक्र न हों और दर्द भरी कहानियों में मेपल के उदास पत्‍तों का गिरना जारी रहता है।

कनाडा के हमारे घर में भी मेपल का एक पेड़ है। आसपास के घरों में भी बहुतायत से दिखाई देते हैं। पत्तियों के रंग भी थोड़े अलग अलग हैं। कहीं लाल पत्तियां हैं तो कहीं हरी,पीली भी। शायद पेड़ की उम्र और प्रजाति का अंतर रहता होगा। ज्यादा जानना चाहें तो आप गूगल सर्च कर लें। मैं अपने किचन की बात करता हूँ।
मेपल जूस हर घर मे शहद की तरह मौजूद होता है।  मैंने भी चखा। सचमुच बहुत मधुर। गुणकारी भी। बच्चे जिम से लौटकर अथवा एक्सरसाइज के बाद पौष्टिक पेय में इसे मिलाकर लेते हैं। ब्रेड पर भी लगाया जा सकता है।

जिस देश में प्रति व्यक्ति पेड़ों की संख्या 8960 हो, उस देश में मेपल जैसे पेड़ की पत्ती को राष्ट्रीय गौरव हासिल होना सचमुच महत्वपूर्ण और युक्तियुक्त है। मेरे देश में मुझे सिर्फ 28 पेड़  का आंकड़ा प्राप्त है। इसलिए यात्रा वृत्तांत में मेपल की बात न की जाए तो ठीक नहीं होगा। 

भारत में मेरे घर के गमले में पीपल लगा है। अफसोस है कई लोग सलाह देते हैं पीपल को घर में मत लगाइए। अब लगता है शायद पीपल को नहीं हटाकर हमने कोई गलती नहीं की है। घर जाकर पीपल में हम कनाडा के मेपल की स्मृतियां खोजने की कोशिश करते रहेंगे ... 


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लाइफ सेविंग स्किल तैराकी 


प्रत्येक रविवार को पोते अक्ष की स्वीमिंग क्लास होती है सुबह 11 बजे से 12 बजे के बीच। आज उसका रिजल्ट भी आने वाला था। भारत प्रवास के कारण बीच में कुछ प्रेक्टिस और प्रशिक्षण अवरुद्ध भी रहा था उसका। उसे तैरते हुए देखने की हमारी बहुत इच्छा थी। पौने ग्यारह पर हम सब सामुदायिक केंद्र जाने के लिये घर से निकल गए।

कनाडा के प्रत्येक शहर में नगर पालिका प्रशासन द्वारा सामुदायिक केंद्र याने कम्युनिटी सेंटर्स स्थापित किये गए  हैं। जिनमे लोक कल्याण से संबंधित अनेक गतिविधियों को भी संचालित किया जाता है। बच्चों से लेकर वृद्धों तक के लिए विभिन्न सांस्कृतिक,कला,कौशल और खेल गतिविधियों के लिए व्यवस्थाएं और कार्यक्रम यहां साल भर के लिए निर्धारित किये गए होते हैं। जिनकी जानकारी केंद्र के प्रकाशनों और अन्य सूचना माध्यमों के जरिये उपलब्ध होती रहती है। इन केंद्रों पर बर्फ के फ्लोर पर स्केटिंग, स्वीमिंग पूल्स, बॉस्केट बॉल, बैडमिंटन, जिम सहित अनेक खेलों के लिए आधुनिकतम व्यवस्थाएं की गईं हैं।

अक्ष भी प्रति रविवार यहां तैराकी का नियमित प्रशिक्षण प्राप्त करता है। कनाडा प्रशासन भी इस बात पर जोर देता है कि यहां का प्रत्येक बच्चा और नागरिक तैराकी का अवश्य प्रशिक्षण ले। तैराकी को कनाडा में हॉबी की बजाए लाइफ सेविंग स्किल के रूप में मान्यता प्रदान की गई है।
न्यूमार्केट सामुदायिक केंद्र पर ग्यारह वर्षीय अक्ष के साथ पहुंचना हमारे लिए बहुत रोमांचपूर्ण रहा। तैराकी प्रशिक्षण के 9 वें स्तर के अंतिम चरण में था वह।
तैराकी के लिए बनें विभिन्न लेनों में अलग अलग आयु वर्गों और प्रशिक्षण स्तरों के बच्चे अपने ट्रेनर्स से प्रशिक्षण ले रहे थे। कुतूहल बना हुआ था कि अक्ष कैसे तैरता है। पहली बार हम उसका तैरना देखने वाले थे।

आखिर ऊपर गैलरी में लगी बैंचों पर से हमें स्वीमिंग  कॉस्ट्यूम में चश्मा लगाए अक्ष दिखाई दे ही गया। पूरे एक घण्टे हम उसे विभिन्न शैलियों में तैराकी करते,डाइव लगाते देख मन्त्र मुग्ध होते रहे। सचमुच वह बहुत अच्छा कर रहा था। मन में आशंका थी कि प्रशिक्षण में हुए गैप के कारण कहीं यह स्तर दोबारा न करना पड़े उसे।

इस बीच हमने बहुत छोटे बच्चों को प्रशिक्षकों द्वारा स्नेहपूर्ण और मनोवैज्ञानिक तरीकों से तैराकी के प्रति उत्साहित करते देखा तो दंग रह गए। थोड़ी ही देर में पानी में उतरने का डर गायब हो गया था और वे पूल में उतरने के प्रति लालायित होते नजर आए। यह और भी चौकाने वाला अनुभव था कि कुछ दृष्टिबाधित बच्चे भी यहां उत्साह से तैराकी सीखते दिखे।

स्वीमिंग के बाद जब तक अक्ष तैयार होकर बाहर आया हमने बच्चों को बर्फ पर मुग्ध करने वाली कलात्मक स्केटिंग करते देखा। थोड़ी ही देर में अक्ष अपने प्रमाण पत्र के साथ हमारे पास आया तो बहुत खुश था। उसने तैराकी का 9 वां चरण सफलता पूर्वक पार कर लिया था। अब 10 वें चरण के प्रशिक्षण के बाद स्वयं स्वीमिंग प्रशिक्षक बनने की उसकी राह आसान हो जाएगी। 

दादी ने पोते को  गले लगा लिया और खुशी के इस खास मौके पर थोड़ी देर बाद हम लोग दक्षिण भारतीय रेस्टोरेंट में शानदार भोजन की पार्टी एन्जॉय कर रहे थे।
पोते की किसी सफलता पर पहली बार हम उसके साथ थे.....


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मिलना अधबीच के मेले से बिछुड़े मित्र का

भारतीय हिंदी भाषी समुदाय की उपस्थिति के कारण कनाडा में साहित्य और हिंदी प्रचार-प्रसार की रचनात्मक गतिविधियों के बारे में सोशल मीडिया के माध्यम से जानकारियां अक्सर मिलती रहती थीं। 

फेसबुक के कुछ समूहों और मित्रों से भी थोड़ा बहुत जुड़ा रहा था। श्री धर्म जैन मेरे बहुत पुराने और हमपेशा रचनाकार रहे हैं। यद्यपि कोई 35 बरस के बाद पता चला कि मेरे शुरुआती लेखन समय में वे भी नईदुनिया(इंदौर) के लोकप्रिय स्तंभ 'अधबीच'में लिखने वाले वही  प्रिय व्यंग्यकार श्री धर्मपाल महेंद्र जैन हैं,जिनका उल्लेख मैं  सदैव अधबीच से कलम भांजकर निकलने वाले बेहतरीन व्यंग्यकारों में करता रहा था। 1984 में ही उनका प्रथम व्यंग्य संग्रह' सर क्यों दांत फाड़ रहा है' शाया हो चुका था।मेरा संग्रह 'पुनः पधारेंअधबीच में लिखते हुए वर्ष 1995 में बाद में आया था। यद्यपि अधबीच स्तंभ का प्रकाशन 1981 की21 अप्रेल से अब तक जारी है। 

बहरहाल, हमारा दोबारा मिलन प्रकाश मेहरा की फिल्मों के कुम्भ में बिछडे भाइयों की तर्ज पर  'अधबीच में बिछड़े रचनाकारों' के रूप में 35 बरस बाद हुआ। धर्म जी बैंक ऑफ इंडिया में कार्य करते हुए जब धार क्षेत्र में पदस्थ थे तब भाई सतीश राठी के मित्र हुआ करते थे। मैं उनके व्यंग्य लेखन का प्रशंसक रहा लेकिन व्यक्तिगत मुलाकात का अवसर कभी आया नहीं। उनके लेखन में बीच का एक लंबा अंतराल आया। कहीं दिखाई नहीं दिए।अब इतनी सक्रियता है कि व्यंग्य के आलवा बड़ी सार्थक और सुंदर कविताएं देशभर की पत्र पत्रिकाओं में हर माह देखी पढ़ी जा सकती हैं।

कोई छह माह पहले मुझे श्री धर्म जैन का नया  कविता संग्रह 'इस समय तक' महत्वपूर्ण युवा कथाकर,व्यंग्यकार भाई पंकज सुबीर के शिवना प्रकाशन, विदिशा(म प्र)से धर्म जी के सौजन्य से प्राप्त हुआ था।संग्रह की सुंदर कविताओं को मैने पढ़कर अपनी पाठकीय टिप्पणी भी लिखी थी,जो भोपाल के विचार प्रधान अखबार 'सुबह सवेरे' के साहित्य पृष्ठ पर प्रकाशित हुई थी।फेसबुक पर हुए संवादों में जब धर्म जी को पता चला कि मेरे कनाडा प्रवास का योग बन रहा है,उनके आत्मीय संदेशे आने लगे कि कनाडा के हिंदी आयोजनों में मैं भी शामिल रहूं।

26
मई को हम लोग कनाडा पहुंचे थे। धर्म जी का मेसेंजर और फोन दोनों आये। मिसिसॉगा के हिन्दू हेरिटेज सेंटर में श्री कैलाश भटनागर जी की 85 वीं वर्षगांठ पर एक कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया था। यहां बसे और प्रवास पर आए रचनाकारों को बहुत आत्मीयता से आमंत्रित किया गया था। डिनर की भी व्यवस्था थी। धर्म जी ने मेरे कनाडा पहुंचने की सूचना आयोजकों को देकर मुझे भी निमंत्रण पत्र मेल किया। एक रचनाकार के नाते यह अवसर और अपने प्रिय रचनाकार मित्र से पहली बार मिलने का कुतूहल इतना बढ़ गया कि बच्चों को वहां हमे ले जाने के लिए कहा। उस दिन शनिवार होने से कोई दिक्कत नहीं थी। जेट लेग और निंद्रा अनिंद्रा से लड़ते हुए आखिर हम लोग घर से 80 किलोमीटर दूर कार्यक्रम स्थल पहुंच ही गए। कार्यक्रम भी थोड़ा देर से शुरू हुआ था। बारिश भी हुई थी। कुछ  विलम्ब से भी पहुंचे।
 
आंखें धर्म जी को ढूंढ रहीं थी। लेकिन फेसबुक पर उनकी प्रोफ़ाइल तस्वीर ने मदद की हमने उनको पहचान लिया,उन्होंने हमें। चर्चित कथाकार और धर्मजी की सहधर्मिणी डॉ हंसा दीप भी उठकर उत्साह से आईं।बहुत आत्मीयता से हम लोगों का उन्होंने स्वागत किया। बच्चों से भी मिले।
संचालक जी को उन्होंने कह रखा था की धर्मजी स्वयं मेरे पहुंच जाने के बाद ही काव्य पाठ करेंगे सो कुछ कवियों के पाठ के बाद धर्म जी को आमंत्रित किया गया। उन्होंने दो बहुत प्रभावी व्यंग्य कविताओं का पाठ किया। अपना पाठ समाप्तकरने के बाद उन्होंने कुछ आत्मीय शब्द मेरे स्वागत में भी कहे।  मुझे आमंत्रित किया गया। मैंने भी अपने संग्रह 'कोहरे में सुबह' दो छोटी कविताएँ जंगली फूल के अलावा दूरियां सुनाईं।
आप भी एक कविता का जायजा लीजिये आज...

कविता 
दूरियाँ

1
बहुत दूर थे..
इतने दूर कि 
मोबाइल से बात कर रहे थे
एक पलंग के दो छोर पर थे दोनों !


एक छींक आती है उनको स्क्रीन पर  
तो हम बीमार हो जाते हैं  
इतने करीब हैं वे 
जैसे लेपटॉप पर कैमरे की आँख. 

3
शाम की सैर के बाद 
आरामकुर्सी पर सुस्ताएंगे अभी आकर   
दाल बघारने की वही अद्भुत खुशबू 
फिर बिखर जाएगी थोड़ी देर में 
चौथाई सदी की दूरी के बावजूद 
साथ-साथ हैं वे अभी-तक.  

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