यात्रा डायरी
चिट्ठी कनाडा से
1
हॉर्न मुक्त
अनुशासन
साल 2019 में 26 मई को मुम्बई से तड़के 1 बजे उड़े और 26 मई की दोपहर को ही 2.30 बजे टोरंटो पर विमान लेंड हो गया। समय का गणित कुछ गलत हुआ लगता है लेकिन मुम्बई से 8 घण्टे की लुफ्तांसा एयर लाइंस से म्युनिख तक की उड़ान फिर लगभग छह घण्टे म्यूनिख हवाई अड्डे पर एयर कनाडा की फ्लाइट के इंतजार के बाद 8 घण्टों की टोरंटों की यात्रा के बावजूद कनाडा में 26 मई की शाम होना बकाया थी।
साउथ एशिया के मेरे जैसे किसी व्यक्ति के लिए जो पहली बार कनाडा पहुंचा हो , यह बहुत अचरज का क्षण था कि सूरज की रोशनी इन दिनों रात को लगभग 9 बजे तक वैसी ही होती है, जैसी भारत में शाम छह बजे होती है।
*****
पूर्व से आया कोई भी व्यक्ति पश्चिम में पहुंचकर कुछ और अधिक जिज्ञासु हो उठता है। रहन सहन, वेशभूषा से लेकर रहवासी इलाकों और प्रकृति और पर्यावरण में भारत के मूल स्वभाव से काफी भिन्नता दिखाई देने लगती है। हालांकि इंडिया की मेट्रो सिटीज के कुछ पेज थ्री बाशिंदों को यह ज्यादा अटपटा न भी लगे लेकिन आम हिंदुस्तानी में नए के प्रति कुतूहल पैदा हो जाना स्वाभाविक है। लेकिन ऐसा न हो कि कुतूहल में आप किसी व्यक्ति को घूरने लग जाएं। यह शिष्टाचार के खिलाफ होता है यहां। किसी की निजता में हस्तक्षेप है ऐसा करना। यदि किसी से नजरें टकरा जाएं तो कृपया 'हेलो' कहकर मुस्कुराना कदापि न भूलियेगा।यह अलग बात है कि इधर अपने देश में हम अपने पहचान वालों से भी नजरें चुराकर कन्नी काट लेते हैं।
*****
भारत में बांयें चलने का नियम
और आदत को सबसे पहले तिलांजलि देकर दाहिने को आत्मसात करने में ही समझदारी है
यहां।
विमान से निकलते ही संकरे गलियारे में से गुजरते हुए, एक्सीलेटर की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए यह ध्यान में रखना पड़ा कि अब वामपंथी को भी दाहिने ही चलना है। यदि आप सुस्त हैं तो कृपया पीछे से तेज आने वालों को बाईं साइड से निकल जाने में सहयोग करें। अपने मोहल्ले और गलियों की तरह यहां फैलकर या चौड़े होकर कोई नहीं चलता दिखता। 'एक्सक्यूज मी','प्लीज', थेंक्यू' जैसे शब्द पल पल उछलते रहते हैं। कान तरस जाते हैं यह सुनने को कि ' अबे! किधर देख के चल रिया है!'
ट्रैफिक के नियमों को सूनी सड़कों पर भी बिना ट्रैफिक जवान के पालन होते देखना आश्चर्य में डाल देता है। कुछ आंतरिक चौराहों पर जहां सिर्फ 'स्टॉप' का बोर्ड लगा है वहां भी गाड़ियां रुकती हैं। पहले आने वाला पहले क्रास करता है। पैदल, साइकिल सवार और विकलांग को सड़क से गुजर जाने की प्रतीक्षा की जाती है। दाहिने मुड़ना हो तब भी। आंखें और आदत भारत में बाएं चलन की अभ्यस्त हैं तो लगता है अब बहू या बेटा गाड़ी बाईं ओर ले जाएंगे लेकिन गाड़ी दाईं ओर मुड़ जाती है। मुख्य मार्गों पर सिग्नल हैं, लेकिन लोग अपनी चिंता की बजाए दूसरी गाड़ियों की अधिक चिंता करते दिखाई देते हैं, सामने वाले का ध्यान ज्यादा रखा जाता है। फिर वही इशारों में हाथ हिलाकर 'थेंक्स','जस्ट ए मिनट' और प्यारी आत्मीय मुस्कान। और हाँ ! गाड़ियों के हॉर्न की आवाज मैंने टोरंटो और न्यू मार्केट शहरों में किसी सड़क या ट्रैफिक सिग्नल या भीड़ भरे इलाकों में भी कभी नहीं सुनी।
विमान से निकलते ही संकरे गलियारे में से गुजरते हुए, एक्सीलेटर की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए यह ध्यान में रखना पड़ा कि अब वामपंथी को भी दाहिने ही चलना है। यदि आप सुस्त हैं तो कृपया पीछे से तेज आने वालों को बाईं साइड से निकल जाने में सहयोग करें। अपने मोहल्ले और गलियों की तरह यहां फैलकर या चौड़े होकर कोई नहीं चलता दिखता। 'एक्सक्यूज मी','प्लीज', थेंक्यू' जैसे शब्द पल पल उछलते रहते हैं। कान तरस जाते हैं यह सुनने को कि ' अबे! किधर देख के चल रिया है!'
ट्रैफिक के नियमों को सूनी सड़कों पर भी बिना ट्रैफिक जवान के पालन होते देखना आश्चर्य में डाल देता है। कुछ आंतरिक चौराहों पर जहां सिर्फ 'स्टॉप' का बोर्ड लगा है वहां भी गाड़ियां रुकती हैं। पहले आने वाला पहले क्रास करता है। पैदल, साइकिल सवार और विकलांग को सड़क से गुजर जाने की प्रतीक्षा की जाती है। दाहिने मुड़ना हो तब भी। आंखें और आदत भारत में बाएं चलन की अभ्यस्त हैं तो लगता है अब बहू या बेटा गाड़ी बाईं ओर ले जाएंगे लेकिन गाड़ी दाईं ओर मुड़ जाती है। मुख्य मार्गों पर सिग्नल हैं, लेकिन लोग अपनी चिंता की बजाए दूसरी गाड़ियों की अधिक चिंता करते दिखाई देते हैं, सामने वाले का ध्यान ज्यादा रखा जाता है। फिर वही इशारों में हाथ हिलाकर 'थेंक्स','जस्ट ए मिनट' और प्यारी आत्मीय मुस्कान। और हाँ ! गाड़ियों के हॉर्न की आवाज मैंने टोरंटो और न्यू मार्केट शहरों में किसी सड़क या ट्रैफिक सिग्नल या भीड़ भरे इलाकों में भी कभी नहीं सुनी।
2
आसमान से सुख बरस रहा है
लगातार शून्य डिग्री से नीचे के तापमान वाले लंबे शीतकाल और बर्फीले मौसम के बाद कनाडा में मई माह से जब तापमान बढ़ने लगता है लोगों के चेहरे और मन उत्सवी चमक से खिलने लगते हैं।
14 से 20 डिग्री तापमान के बीच जब धूप निकल आती है तो लोग घरों से निकलकर परिवार सहित आउटिंग को निकलने लगते हैं। कोई साइकिल चला रहा है तो कोई दौड़ लगा रहा है। हरियाली के बीच कई किलोमीटर तक साइकिलिंग,वाकिंग, रनिंग लम्बे ट्रेक बने हुए हैं।
यह अलग बात है कि जिस वक्त हमारा इंदौर में 42℃ तापमान पर झुलस रहा था, हमने इधर कनाडा के न्यूमार्केट शहर में धूप में भी कंटोपी और हुडी धारण कर रखी थी।
धूप के बावजूद हवा बर्फीली लग रही थी। लेकिन यहां के लोग, बहू, पोता महज टी शर्ट, हेलमेट पहनकर साइकिल चला रहे थे। वाक कर रहे थे। डॉगी 'बेट्टी' का पट्टा थामें बेटा अग्रज दौड़ लगा रहा था।
बच्चों के छह बजे ऑफिस से आने के बाद तक दिन अस्त नहीं हुआ है। धूप खिली है। कौन कनेडियन होगा जो ये दुर्लभ और गोल्डन गिफ्ट गवांना चाहेगा। उन सबके साथ हम भी हो लिए हैं। स्वास्थ्य नर्म है, शीत गर्मी की तासीर है। बचकर रहना है। लेकिन सबका साथ...सबका सुख है। विकास तो यहां सबका पहले से हो ही चुका है।
हम वाकिंग ट्रेक से गुजर रहे हैं। परिवार सहित हम लोगों को आनन्दित होते देख दौड़ती दो महिलाएं मुस्कुराकर 'हेलो' कहती हैं। एक साइकिलिस्ट क्रॉसिंग पर ठहरकर पोते की साइकिल को रास्ता देता है। दोनों मुस्कुराते हैं। दोनों के मुंह से निकलता है- ' इट्स ओके...थेंक्स'।
बेटा डॉगी की लीश थामें उसके साथ साथ खुद भी दौड़ रहा है। डॉगी रुक जाती है। हरी मखमली घास को सूँघती है और निवृत्त होती है। बेटा अपनी जेब से गार्बेज बेग निकालकर अपने हाथ पर लपेटता है। डॉगी की पोटी उठाता है। निर्विकार भाव से किनारे पर खड़े हरे रंग के एक बीन में डालकर पुनः दौड़ने लगता है।
मुझे इंदौर का अपना घर याद आता है। डॉगी संग सुबह की सैर को निकले मेरे अपने शहरवासी याद आते हैं। सफाई करती, अपनी पत्नी का रोज सुबह का कुढ़ना याद आता है। हालांकि बीन लगाने की शुरुआत अब हमारे यहां हो चुकी है....स्वच्छता के मूल्यांकन में हमारा शहर दो बार ‘नंबर वन’ का खिताब अर्जित कर चुका है लेकिन.....!
धूप तेज हो गई है। तापमान शायद 23℃ हो गया है। मैंने कनटोप उतार दिया है। दौड़ने वाले पसीने से नहा लिए हैं। कुछ ने बदन से शर्ट उतार फैंका है।
कोई उन्हें घूर नहीं रहा। सब सामान्य सा है।
आसमान से सुख बरस रहा है।
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लगातार शून्य डिग्री से नीचे के तापमान वाले लंबे शीतकाल और बर्फीले मौसम के बाद कनाडा में मई माह से जब तापमान बढ़ने लगता है लोगों के चेहरे और मन उत्सवी चमक से खिलने लगते हैं।
14 से 20 डिग्री तापमान के बीच जब धूप निकल आती है तो लोग घरों से निकलकर परिवार सहित आउटिंग को निकलने लगते हैं। कोई साइकिल चला रहा है तो कोई दौड़ लगा रहा है। हरियाली के बीच कई किलोमीटर तक साइकिलिंग,वाकिंग, रनिंग लम्बे ट्रेक बने हुए हैं।
यह अलग बात है कि जिस वक्त हमारा इंदौर में 42℃ तापमान पर झुलस रहा था, हमने इधर कनाडा के न्यूमार्केट शहर में धूप में भी कंटोपी और हुडी धारण कर रखी थी।
धूप के बावजूद हवा बर्फीली लग रही थी। लेकिन यहां के लोग, बहू, पोता महज टी शर्ट, हेलमेट पहनकर साइकिल चला रहे थे। वाक कर रहे थे। डॉगी 'बेट्टी' का पट्टा थामें बेटा अग्रज दौड़ लगा रहा था।
बच्चों के छह बजे ऑफिस से आने के बाद तक दिन अस्त नहीं हुआ है। धूप खिली है। कौन कनेडियन होगा जो ये दुर्लभ और गोल्डन गिफ्ट गवांना चाहेगा। उन सबके साथ हम भी हो लिए हैं। स्वास्थ्य नर्म है, शीत गर्मी की तासीर है। बचकर रहना है। लेकिन सबका साथ...सबका सुख है। विकास तो यहां सबका पहले से हो ही चुका है।
हम वाकिंग ट्रेक से गुजर रहे हैं। परिवार सहित हम लोगों को आनन्दित होते देख दौड़ती दो महिलाएं मुस्कुराकर 'हेलो' कहती हैं। एक साइकिलिस्ट क्रॉसिंग पर ठहरकर पोते की साइकिल को रास्ता देता है। दोनों मुस्कुराते हैं। दोनों के मुंह से निकलता है- ' इट्स ओके...थेंक्स'।
बेटा डॉगी की लीश थामें उसके साथ साथ खुद भी दौड़ रहा है। डॉगी रुक जाती है। हरी मखमली घास को सूँघती है और निवृत्त होती है। बेटा अपनी जेब से गार्बेज बेग निकालकर अपने हाथ पर लपेटता है। डॉगी की पोटी उठाता है। निर्विकार भाव से किनारे पर खड़े हरे रंग के एक बीन में डालकर पुनः दौड़ने लगता है।
मुझे इंदौर का अपना घर याद आता है। डॉगी संग सुबह की सैर को निकले मेरे अपने शहरवासी याद आते हैं। सफाई करती, अपनी पत्नी का रोज सुबह का कुढ़ना याद आता है। हालांकि बीन लगाने की शुरुआत अब हमारे यहां हो चुकी है....स्वच्छता के मूल्यांकन में हमारा शहर दो बार ‘नंबर वन’ का खिताब अर्जित कर चुका है लेकिन.....!
धूप तेज हो गई है। तापमान शायद 23℃ हो गया है। मैंने कनटोप उतार दिया है। दौड़ने वाले पसीने से नहा लिए हैं। कुछ ने बदन से शर्ट उतार फैंका है।
कोई उन्हें घूर नहीं रहा। सब सामान्य सा है।
आसमान से सुख बरस रहा है।
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3
सप्ताहांत की सैर
जून माह की 9 तारीख की सुबह हो गई है। सप्ताहांत की शुरुआत हो चुकी है। पांच दिनों तक लगातार काम करने के बाद शुक्रवार की शाम से ही उत्साह का वातावरण बनने लगता है इधर। शुक्रवार की शाम का बड़ा हिस्सा भारत में अपनों से वीडियो/ऑडियो बातचीत करने में, सबकी खैर खबर लेने में गुजर जाता है। इसी दिन सप्ताहांत की मौज मस्ती, पर्यटन और आमोद प्रमोद के कार्यक्रम और योजनाएं आकार लेने लगती हैं।
बहरहाल, शनिवार की सुबह धूप खिली है। कनाडा में सुबह के साढ़े आठ बजे हैं। भारत में शाम के छह बजे का समय हुआ होगा। तापमान 18℃ है। दोपहर तक 24 तक पहुंचने के आसार हैं। मतलब एक बेहद खुशगवार दिन की शुरुआत। न्यूमार्केट (कनाडा) के अपने घर से सुबह का नाश्ता करके कोई 50 मिनट के ड्राइव की दूरी पर मनोरम प्राकृतिक झील 'सिब्बल पॉइंट' पहुंचने का कार्यक्रम तय होता है।
फोल्डिंग चेयर्स, पिकनिक क्रोकरी, दोपहर का आहार, बैडमिंटन रैकेट्स, शटल कॉक्स आदि जैसे साजो सामान से लैस होकर हमारी गाड़ी 12 बजे के आसपास निकल पड़ती है। सामान्यतः हाई वे अवॉयड किये जाते हैं। क्षेत्रीय रास्तो से गुजरना अधिक सुखद, तनाव मुक्त होता है। बाहर के मनोरम दृश्य थोड़े इत्मीनान से निहारे जा सकते हैं। ये सड़कें भी गुणवत्ता और सुविधाओं में हाइवे से कुछ कम नहीं होती। बस स्पीड सीमा 120/100 की बजाय 70/80 प्रति घंटा बनाकर रखना होती है।
रास्ते के दोनों ओर खूबसूरत घने पेड़ और हरियाली फैली हुई है। इन्ही के बीच खूबसूरत घर। कुछ खेत भी। कुछ खेतों के गोडाउन्स। लेकिन भारतीय ग्रामीण परंपरा से थोड़ा अलग। एक मायने में विकसित। अब इसकी थोड़ी झलक हमारे यहां भी कुछ बड़े शहरों से लगे बायपासों, एक्सप्रेस हाईवेज़ पर भी दिखाई देने लगी हैं। लेकिन यहां आच्छादित घनी हरियाली और शहरी लेकिन प्राकृतिक जंगलों की कल्पना भी नहीं जा सकती। और स्वच्छ पर्यावरण, प्रदूषण मुक्त हवा अलग ही वातावरण का निर्माण कर स्वार्गिक अनुभूति से तन-मन को प्रफुल्लित कर देता है।
जहां मैदान दिखाई देते हैं वहां दरअसल घोड़ों के अस्तबल, ट्रेनिंग सेंटर, पोलो ग्राउंड या फिर बेहतरीन गोल्फ फील्ड होते हैं। जिनके बीच छोटे छोटे जलाशय वहां के सौंदर्य में और वृद्धि कर देते हैं।
रास्तेभर इन खूबसूरत दृश्यों का मजा लेते हुए हम लोग हमारे गंतव्य के करीब पहुंचने लगते हैं। सैलानियों की गाड़ियों की आवाजाही दिखाई देने लगती है। कुछ ही देर में हमारी गाड़ी एंट्री गेट के बूथ की खिड़की के पास जाकर रुक जाती है। एक युवती मुस्कुराकर 'हेलो' कहकर हमारा स्वागत करती है। हमारी बहू अभिरुची यहां के कल्चर, संवाद और जानकारियों से अच्छी तरह बावस्ता है। उनके पास यहां के पार्कों और अन्य स्थलों के लिए सुगम 'गेटपास' वर्षभर के लिए उपलब्ध है। टिकिट का हमें कोई शुल्क नहीं चुकाना पड़ा। सारी जानकारी कम्प्यूटर में दर्ज करने और मुस्कुराहटों और अभिवादन के आदान प्रदान के बाद हमारी गाड़ी पॉर्क में प्रवेश कर लेती है।
बेटे ने बताया गेटपास खिड़की पर सेवाएं देने वाली किशोरी एक स्कूली छात्रा थी। यहां वेकेशन्स में विभिन्न सरकारी संस्थाओं के विभागों में अपनी पार्ट टाइम सेवाएं देकर युवा अपने लिए धन अर्जित करने के साथ साथ भविष्य में अपनी रुचि के जॉब में प्रवेश की दिशा भी स्वयं सुनिश्चित कर लेते हैं।
जिस वक्त हमारे स्कूलों में 'प्राप्तांक' केंद्रित ज्ञान गुणवत्ता का मूल्यांकन प्रमुख है, सुखद आश्चर्य रहा कि यहां 'स्किल डेवलपमेंट' अपनी भूमिका निभा रहा है। हमारे यहां अब यह विचार के स्तर पर शुरू हुआ है। जमीनी हकीकत और सफलता में अभी वर्षों लगेंगे। पालकों की मानसिकता में बदलाव और जोखिम लेने का साहस थोड़ी दूर की बात लगती है। हिन्दी,अंग्रेजी को साथ लेकर बच्चों को स्नातक डिग्री दिलवाने और स्क्रिप्ट लेखन,अनुवाद और सब टाइटलिंग, डबिंग के बड़ी कमाई वाले क्षेत्र में प्रवेश का जोखिम मैं स्वयं न ले सका। पढ़ाई कुछ की। काम कुछ और किये। इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट की पढ़ाई और 97% और 99% की आकांक्षा ने सब कुछ बदल कर रख दिया है हमारे देश में।
बहरहाल, कनाडा में कैरियर चुनने की भूमिका बचपन से आकार लेने लगती है। भविष्य में अपने मन का करने का शायद बच्चे सोचने तो लगते है।
जून माह की 9 तारीख की सुबह हो गई है। सप्ताहांत की शुरुआत हो चुकी है। पांच दिनों तक लगातार काम करने के बाद शुक्रवार की शाम से ही उत्साह का वातावरण बनने लगता है इधर। शुक्रवार की शाम का बड़ा हिस्सा भारत में अपनों से वीडियो/ऑडियो बातचीत करने में, सबकी खैर खबर लेने में गुजर जाता है। इसी दिन सप्ताहांत की मौज मस्ती, पर्यटन और आमोद प्रमोद के कार्यक्रम और योजनाएं आकार लेने लगती हैं।
बहरहाल, शनिवार की सुबह धूप खिली है। कनाडा में सुबह के साढ़े आठ बजे हैं। भारत में शाम के छह बजे का समय हुआ होगा। तापमान 18℃ है। दोपहर तक 24 तक पहुंचने के आसार हैं। मतलब एक बेहद खुशगवार दिन की शुरुआत। न्यूमार्केट (कनाडा) के अपने घर से सुबह का नाश्ता करके कोई 50 मिनट के ड्राइव की दूरी पर मनोरम प्राकृतिक झील 'सिब्बल पॉइंट' पहुंचने का कार्यक्रम तय होता है।
फोल्डिंग चेयर्स, पिकनिक क्रोकरी, दोपहर का आहार, बैडमिंटन रैकेट्स, शटल कॉक्स आदि जैसे साजो सामान से लैस होकर हमारी गाड़ी 12 बजे के आसपास निकल पड़ती है। सामान्यतः हाई वे अवॉयड किये जाते हैं। क्षेत्रीय रास्तो से गुजरना अधिक सुखद, तनाव मुक्त होता है। बाहर के मनोरम दृश्य थोड़े इत्मीनान से निहारे जा सकते हैं। ये सड़कें भी गुणवत्ता और सुविधाओं में हाइवे से कुछ कम नहीं होती। बस स्पीड सीमा 120/100 की बजाय 70/80 प्रति घंटा बनाकर रखना होती है।
रास्ते के दोनों ओर खूबसूरत घने पेड़ और हरियाली फैली हुई है। इन्ही के बीच खूबसूरत घर। कुछ खेत भी। कुछ खेतों के गोडाउन्स। लेकिन भारतीय ग्रामीण परंपरा से थोड़ा अलग। एक मायने में विकसित। अब इसकी थोड़ी झलक हमारे यहां भी कुछ बड़े शहरों से लगे बायपासों, एक्सप्रेस हाईवेज़ पर भी दिखाई देने लगी हैं। लेकिन यहां आच्छादित घनी हरियाली और शहरी लेकिन प्राकृतिक जंगलों की कल्पना भी नहीं जा सकती। और स्वच्छ पर्यावरण, प्रदूषण मुक्त हवा अलग ही वातावरण का निर्माण कर स्वार्गिक अनुभूति से तन-मन को प्रफुल्लित कर देता है।
जहां मैदान दिखाई देते हैं वहां दरअसल घोड़ों के अस्तबल, ट्रेनिंग सेंटर, पोलो ग्राउंड या फिर बेहतरीन गोल्फ फील्ड होते हैं। जिनके बीच छोटे छोटे जलाशय वहां के सौंदर्य में और वृद्धि कर देते हैं।
रास्तेभर इन खूबसूरत दृश्यों का मजा लेते हुए हम लोग हमारे गंतव्य के करीब पहुंचने लगते हैं। सैलानियों की गाड़ियों की आवाजाही दिखाई देने लगती है। कुछ ही देर में हमारी गाड़ी एंट्री गेट के बूथ की खिड़की के पास जाकर रुक जाती है। एक युवती मुस्कुराकर 'हेलो' कहकर हमारा स्वागत करती है। हमारी बहू अभिरुची यहां के कल्चर, संवाद और जानकारियों से अच्छी तरह बावस्ता है। उनके पास यहां के पार्कों और अन्य स्थलों के लिए सुगम 'गेटपास' वर्षभर के लिए उपलब्ध है। टिकिट का हमें कोई शुल्क नहीं चुकाना पड़ा। सारी जानकारी कम्प्यूटर में दर्ज करने और मुस्कुराहटों और अभिवादन के आदान प्रदान के बाद हमारी गाड़ी पॉर्क में प्रवेश कर लेती है।
बेटे ने बताया गेटपास खिड़की पर सेवाएं देने वाली किशोरी एक स्कूली छात्रा थी। यहां वेकेशन्स में विभिन्न सरकारी संस्थाओं के विभागों में अपनी पार्ट टाइम सेवाएं देकर युवा अपने लिए धन अर्जित करने के साथ साथ भविष्य में अपनी रुचि के जॉब में प्रवेश की दिशा भी स्वयं सुनिश्चित कर लेते हैं।
जिस वक्त हमारे स्कूलों में 'प्राप्तांक' केंद्रित ज्ञान गुणवत्ता का मूल्यांकन प्रमुख है, सुखद आश्चर्य रहा कि यहां 'स्किल डेवलपमेंट' अपनी भूमिका निभा रहा है। हमारे यहां अब यह विचार के स्तर पर शुरू हुआ है। जमीनी हकीकत और सफलता में अभी वर्षों लगेंगे। पालकों की मानसिकता में बदलाव और जोखिम लेने का साहस थोड़ी दूर की बात लगती है। हिन्दी,अंग्रेजी को साथ लेकर बच्चों को स्नातक डिग्री दिलवाने और स्क्रिप्ट लेखन,अनुवाद और सब टाइटलिंग, डबिंग के बड़ी कमाई वाले क्षेत्र में प्रवेश का जोखिम मैं स्वयं न ले सका। पढ़ाई कुछ की। काम कुछ और किये। इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट की पढ़ाई और 97% और 99% की आकांक्षा ने सब कुछ बदल कर रख दिया है हमारे देश में।
बहरहाल, कनाडा में कैरियर चुनने की भूमिका बचपन से आकार लेने लगती है। भविष्य में अपने मन का करने का शायद बच्चे सोचने तो लगते है।
पार्किंग में हम अपनी कार लगा चुके हैं। ‘सिब्बल्ड पॉइंट’ अपनी हरियाली और गहरी नीली आत्मीय विशाल जलराशि से परिपूर्ण मोहक मुस्कान लिए अपनी बाहें फैलाये हमारा स्वागत कर रहा है......
4
सिब्बल्ड पॉइंट के मजे
सिब्बल्ड पॉइंट दरअसल ओंटारियो प्रांत में एक विशाल प्राकृतिक झील के किनारे का वह स्थल है जहां बीच हैं, वाटर स्पोर्टिंग के लिए व्यवस्थाएं की गईं हैं। चारों तरफ हरियाली से भरपूर ‘डे पार्क’ है। खूबसूरत पेड़ों से आच्छादित झील किनारे और हरी मखमली घास से युक्त मैदान और लघु घाटियाँ हैं। इन्ही के बीच खूबसूरत पिकनिक शेड्स लगाए गए हैं, जिनमें लकड़ी की अनेक बैंचों और टेबलों पर पर्यटक दिन भर के लिए अपने परिवार का अस्थायी बसेरा बना सकते हैं। महिला, पुरुषों के लिए साफ सुथरे आधुनिक प्रसाधन गृहों के अलावा खुली धूप में आनन्द लेने के लिए वॉलीबॉल और बैडमिंटन कोर्ट भी उपलब्ध हैं। आप अपनी कुर्सियां, टेंट आदि भी लगा सकते हैं।
कार से उतरकर सबसे पहले हमने एक शेड के नीचे एक टेबल पर अपना कब्जा जमाया। थोड़ा साफ करके टेबल क्लॉथ पर पिकनिक की सामग्री रख दी। साथ लाए भोजन पैकेट्स आदि वहीं छोड़कर हम दोनों, बेटे,बहू, पोते अक्ष के साथ टहलने को निकल गए।
बेशक डॉगी ' बेट्टी' को कैसे छोड़ सकते थे। सबसे ज्यादा तो वही खुश थी। उछल रही थी। पार्क में हमने उसी क्षेत्र को खास तौर से अपने ठिये के लिए चुना था जहां 'पेट्स' का प्रवेश प्रतिबंधित नहीं था।
हमारे शेड में सम्भवतः गल्फ मूल का कोई परिवार भी ‘बारबेक्यू’ सजाये अपने खान पान की तैयारी में जुटा हुआ था। बच्चे खेल रहे थे, बुजुर्ग बैंचों पर पसरे मौसम का ले रहे थे। सुख और स्वाद की जानी पहचानी खुशबू महसूस की जा सकती थी वहां। एक परिवार ने खुली धूप में अपनी कुर्सियां लगाई हुई थीं। कुछ लोग बदन पर क्रीम लगाए अपनी पीठ सेंकते भी नजर आए।
दिन के लगभग एक बजे गए थे, बच्चों को भूख लग आई तो पहले पेट पूजा के लिए शेड में आकर साथ लाये गए सेंडविचेस और फलों का मजा लिया। बेशक थोड़ा सा इंदौरी नमकीन भी साथ था। यहीं के बाजार से लाये मक्का से बने ‘बुगली फिंगर्स’ (फ्लेक्स/क्रेकर्स) भी चबाये जा रहे थे।
क्रेकर्स के स्वाद के साथ बरबस माँ के बनाये मक्की के पापड़ों की याद आ गई। वही जायका...वही कुरकुरापन.... बचपन के दिनों में देवास के अपने मुहल्ले में ईद के समय टोकनियों में बिकते बड़े बड़े तले हुए मक्की के पापड़ों का स्वाद आज भी स्मृति में छाया हुआ है। इसी बहाने हमारे साथ माँ भी आ गईं और जन्मस्थली देवास भी चली आई...!
बहरहाल, भोजन करके हमलोग झील के किनारे टहलते हुए बोटिंग पॉइंट पर आए। झील के भीतर बोट उतारने के लिए चार लंबे प्लेटफॉर्म बने हुए थे। यह बहुत दिलचस्प है कि हमारे यहां की बोटिंग की तरह यहां कोई संस्थागत व्यवस्था नहीं थी। लोग अपने खुद के बोट और बोटिंग सामग्री लेकर आते हैं। अपनी कारों के पीछे लगे ट्रेलर पर रेसिंग बोट्स, पतवार से चलाई जाने वाली नांवें, छायादार कुर्सीदार बोट हों या बैटरी या फ्यूल जनरेटेट मोटरबोट सभी अपने निजी घर से लेकर आते हैं।
'चांदनी रात में नौका विहार' विषय पर निबंध लिखकर परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले मेरे जैसे व्यक्ति के लिए भरी दुपहरी में नौकायन का यह नजारा अद्भुत था। राज कपूर,शम्मी कपूर या शर्मिला टैगोर जैसे अभिनेताओं को फिल्मों में कभी ऐसा करते देखने के बाद बहुत देर तक हम लोग कनाडा की इस विशाल झील में साक्षात रोमांचक जलक्रीड़ा का आनन्द लेते रहे।
यद्यपि स्कूल और कॉलेज के दिनों में एनसीसी प्रशिक्षण के दौरान हर साल दशहरा दीपावली अवकाश में कैम्पिंग का थोड़ा बहुत अनुभव तो रहा है लेकिन सिब्बल्ड पॉइंट के कैम्पिंग क्षेत्र को देख समझकर इसकी व्यापकता अचंभित कर देती है। घने वन क्षेत्र के बीच कुछ ऐसे स्थान निर्धारित किये गए हैं जहां कई रातें और दिन पर्यटक और स्थानीय नागरिक अपने अस्थायी आवास के साथ वन्य जीवन के अनुभव प्राप्त करने के लिए एडवेंचर एक्टिविटी को नियोजित कर सकते हैं। गाड़ियों सहित टेंट लगाकर भोजन से लेकर रोजमर्रा की सारी गतिविधियां इन्ही टेंटों में रहकर कैम्पिंग के दौरान जारी रहती हैं। कुछ तो अपने लिए ट्रेलर पर बने बनाये घर तक साथ लेकर आते हैं जिनमें सारी व्यवस्थाएं होती हैं। हम लोग इस तरह की कुछ गाड़ियों को फ़िल्म कलाकारों की वेनिटी वेन या 'स्वदेश' फ़िल्म में दिखाए वाहन 'करेवान' में महसूस कर सकते हैं। कश्मीर के 'बोट हाउस' की तरह हमारी सेवा में कोई अन्य नहीं होता बल्कि कैम्पिंग के दैरान परिवार को स्वयं अपना ख्याल रखना होता है। आत्मनिर्भरता इसके केंद्र में है। यद्यपि ऑथरिटी अपनी ओर से सावधानियां, खतरों और प्राकृतिक संकटों के बारे हिदायतें और चेतावनियां जारी करती है लेकिन किसी भी विपरीत स्थिति के लिए सारी जिम्मेदारी सैलानी या एन्जॉय करने वाले परिवार की रहती है। कैम्पिंग के दौरान लोग साइकिलों पर जंगलों और सैरगाहों पर खूब भ्रमण करते हैं। हमने ऐसे ही कैम्पों को खूब देखा,समझा, आनन्द लिया।
बेटे ने बताया नए लोगों को यहां का प्रशासन कैम्पिंग का एक दो दिवसीय
प्रशिक्षण निशुल्क देता रहता है। बेटे ने बताया ऐसे ही एक दिवसीय शिविर का अभ्यास
वे भी ले चुके हैं।
वहां बने एक छोटे से म्यूजियम का अवलोकन करने के बाद हमने कनाडा प्रशासन
द्वारा सहेजे और गुड गवर्नड प्रकृति के अनमोल उपहार से बिदा ली।
5
श्रम के सूरजमुखी
पर्यटन की दृष्टि से देखे कनाडा में सबकुछ हराभरा ही है यह मत समझ लीजियेगा। हर समुदाय के अपने संघर्ष और जीवन जीने की अपनी परिस्थितिजन्य और भौगोलिक शर्तें और सीमाएं भी होती है।
इस विशाल भूभाग का बहुत छोटा सा हिस्सा ही ही लोगों के रहने के लिए उपयोगी है। गूगल गुरु से पता कर लीजियेगा। मैं अपने नजरिये से अपनी बात कह रहा हूँ जिसमें मैं अपने कवि मन की बात सुन रहा। किसी समाजशास्त्री या अर्थशास्त्री और किसी खास विचारधारा के तथ्यों और तर्कों को थोड़ी देर के लिए अलग रखकर ही मेरे साथ चलिएगा।
श्रम के सूरजमुखी
पर्यटन की दृष्टि से देखे कनाडा में सबकुछ हराभरा ही है यह मत समझ लीजियेगा। हर समुदाय के अपने संघर्ष और जीवन जीने की अपनी परिस्थितिजन्य और भौगोलिक शर्तें और सीमाएं भी होती है।
इस विशाल भूभाग का बहुत छोटा सा हिस्सा ही ही लोगों के रहने के लिए उपयोगी है। गूगल गुरु से पता कर लीजियेगा। मैं अपने नजरिये से अपनी बात कह रहा हूँ जिसमें मैं अपने कवि मन की बात सुन रहा। किसी समाजशास्त्री या अर्थशास्त्री और किसी खास विचारधारा के तथ्यों और तर्कों को थोड़ी देर के लिए अलग रखकर ही मेरे साथ चलिएगा।
भारत के हमारे भूखण्ड की सबसे बड़ी विशेषता ही यह है की कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और अटक से लेकर कटक तक (बहुत पुराना मुहावरा है लेकिन टाइम टेस्टेड है) हर बात में विविधता पसरी पड़ी है। आबोहवा हो, भाषा,भूषा या भोजन हो , 'विविधता में एकता' का आदर्श बोध वाक्य यूं ही नही बन पड़ा है। 'सर्व धर्म समभाव' का विचार अनेक प्रकार की उद्दण्डताओं के बावजूद हरेक भारतीय के मन में गहरे तक पैठा हुआ है। यह हमारे लोकतंत्र की बड़ी ताकत भी है।
बहरहाल, भारत की यही विशालता, विविधता और सतरंगी स्वरूप एक ओर यदि इसकी ताकत है तो दूसरी ओर किसी एकतरह की व्यवस्था और समझ स्थापित करने में कतिपय बाधाओं को भी ला खड़ा कर देती है। सरकार और तंत्र को इनसे निपटने में उतनी सुगमता भारत में नही हो सकती जितनी कनाडा जैसी विकसित लेकिन छोटी आबादी के कल्याण के लिए यहां के प्रशासन को रहती होगी।
घनी आबादी और बहुत बड़ी जनसंख्या के कारण देश की अर्थ व्यवस्था और अन्य समस्याओं के हल खोजना भारत में थोड़ा कठिन कार्य हो सकता है जबकि कनाडा जैसे देशों में लोगों की कमी होना ही अपनी एक समस्या कही जा सकती है। प्रशासन की कोशिश होती हैं कि लोग यहां बसें। नई आबादियाँ विकसित हों। जो भूखण्ड बर्फ से ज्यादा समय तक ढंके रहते हैं वहां भी धीरे-धीरे नई बसाहटों को प्रोत्साहित किया जा रहा है।
बिजली, पानी की असीमित उपलब्धता और आधुनिक टेक्नोलॉजी ने इस लक्ष्य को संभव भी किया है। घरों,दफ्तरों,सार्वजनिक स्थलों का लगातार वातानुकूलन, सीधे टेप(नल) से शुद्ध ठंडा,गर्म पानी का निर्बाध सप्लाय आदि बहुत बुनियादी चीजें हैं जो सरकारी स्तर पर सुलभ है।
स्वास्थ्य और प्रारंभिक शिक्षा में सरकारी सेवाओं की गुणवत्ता का बोलबाला है। उनमें विश्वास कायम है। उच्च शिक्षा सम्भवतः महंगी है परंतु इसका लाभ बहुत कम युवाओं को लेना पड़ता है, इसके पूर्व ही बच्चे अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश करने लगते हैं।
अपना घर का सपना हमारी तरह यहां भी है। घर, गाड़ी जरूरी है। बाकी हर अपना वह कार्य जो खुद किया जा सकता है उसे किसी और से करवाने के लिए पहले तो कोई व्यक्ति मिलता नहीं और कराना ही चाहें तो उसका सेवा शुल्क बहुत ज्यादा होगा। हमारे यहां ऐसे कामों के लिए सहज सुलभ और सस्ते सेवादार उपलब्ध होते हैं। कनाडा में हमारे पड़ोसी का पूरा परिवार सप्ताहांत में श्रम करता रहा और आगे के दालान में फर्शीकरण और बेक यार्ड में टूट चुके पूल की मरम्मत करके शाम को इत्मीनान से गुनगुनी धूप में कॉफी पी रहा था।
उनसे प्रेरित होकर हमने भी थोड़ी देर अक्ष बाबू के साथ बैडमिंटन का मजा लिया और अपने घर की क्यारी में सूरजमुखी के कुछ बीज रोप दिए......
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मेपल से पीपल तक
यशराज बैनर की फिल्मों के रोमांटिक दृश्यों में जिस पेड़ के नीचे नीचे प्रायः नायक नायिका मोहब्बत के गीत गाते हैं वे अक्सर मेपल के होते हैं.... खूबसूरत विविध रंगी तिकोनी पत्तियां जो पेड़ से झरकर वातावरण को और अधिक प्रेममय बना देती हैं.....इसी खूबसूरत मेपल पेड़ की एक लाल पत्ति को कनाडा के राष्ट्रीय चिन्ह के रूप में ध्वज पर स्थान पाने का गौरव हासिल है।
कहा जाता है यह प्रकृति व पर्यावरण के उत्सव का प्रतीक है. तो प्रकृति के सौंदर्य से मालामाल कनाडा में इन पत्तों को इतना बड़ा सम्मान मिलना स्वाभाविक ही है। मैंने कहीं पढ़ा है कि यूरोपीय देशों में खुशी के तराने तब तक पूरे नहीं होते जब तक कि उनमें मेपल के घने और हरे भरे पेड़ का जिक्र न हों और दर्द भरी कहानियों में मेपल के उदास पत्तों का गिरना जारी रहता है।
कनाडा के हमारे घर में भी मेपल का एक पेड़ है। आसपास के घरों में भी बहुतायत से दिखाई देते हैं। पत्तियों के रंग भी थोड़े अलग अलग हैं। कहीं लाल पत्तियां हैं तो कहीं हरी,पीली भी। शायद पेड़ की उम्र और प्रजाति का अंतर रहता होगा। ज्यादा जानना चाहें तो आप गूगल सर्च कर लें। मैं अपने किचन की बात करता हूँ।
मेपल जूस हर घर मे शहद की तरह मौजूद होता है। मैंने भी चखा। सचमुच बहुत मधुर। गुणकारी भी। बच्चे जिम से लौटकर अथवा एक्सरसाइज के बाद पौष्टिक पेय में इसे मिलाकर लेते हैं। ब्रेड पर भी लगाया जा सकता है।
जिस देश में प्रति व्यक्ति पेड़ों की संख्या 8960 हो, उस देश में मेपल जैसे पेड़ की पत्ती को राष्ट्रीय गौरव हासिल होना सचमुच महत्वपूर्ण और युक्तियुक्त है। मेरे देश में मुझे सिर्फ 28 पेड़ का आंकड़ा प्राप्त है। इसलिए यात्रा वृत्तांत में मेपल की बात न की जाए तो ठीक नहीं होगा।
भारत में मेरे घर के गमले में पीपल लगा है। अफसोस है कई लोग सलाह देते हैं पीपल को घर में मत लगाइए। अब लगता है शायद पीपल को नहीं हटाकर हमने कोई गलती नहीं की है। घर जाकर पीपल में हम कनाडा के मेपल की स्मृतियां खोजने की कोशिश करते रहेंगे ...
यशराज बैनर की फिल्मों के रोमांटिक दृश्यों में जिस पेड़ के नीचे नीचे प्रायः नायक नायिका मोहब्बत के गीत गाते हैं वे अक्सर मेपल के होते हैं.... खूबसूरत विविध रंगी तिकोनी पत्तियां जो पेड़ से झरकर वातावरण को और अधिक प्रेममय बना देती हैं.....इसी खूबसूरत मेपल पेड़ की एक लाल पत्ति को कनाडा के राष्ट्रीय चिन्ह के रूप में ध्वज पर स्थान पाने का गौरव हासिल है।
कहा जाता है यह प्रकृति व पर्यावरण के उत्सव का प्रतीक है. तो प्रकृति के सौंदर्य से मालामाल कनाडा में इन पत्तों को इतना बड़ा सम्मान मिलना स्वाभाविक ही है। मैंने कहीं पढ़ा है कि यूरोपीय देशों में खुशी के तराने तब तक पूरे नहीं होते जब तक कि उनमें मेपल के घने और हरे भरे पेड़ का जिक्र न हों और दर्द भरी कहानियों में मेपल के उदास पत्तों का गिरना जारी रहता है।
कनाडा के हमारे घर में भी मेपल का एक पेड़ है। आसपास के घरों में भी बहुतायत से दिखाई देते हैं। पत्तियों के रंग भी थोड़े अलग अलग हैं। कहीं लाल पत्तियां हैं तो कहीं हरी,पीली भी। शायद पेड़ की उम्र और प्रजाति का अंतर रहता होगा। ज्यादा जानना चाहें तो आप गूगल सर्च कर लें। मैं अपने किचन की बात करता हूँ।
मेपल जूस हर घर मे शहद की तरह मौजूद होता है। मैंने भी चखा। सचमुच बहुत मधुर। गुणकारी भी। बच्चे जिम से लौटकर अथवा एक्सरसाइज के बाद पौष्टिक पेय में इसे मिलाकर लेते हैं। ब्रेड पर भी लगाया जा सकता है।
जिस देश में प्रति व्यक्ति पेड़ों की संख्या 8960 हो, उस देश में मेपल जैसे पेड़ की पत्ती को राष्ट्रीय गौरव हासिल होना सचमुच महत्वपूर्ण और युक्तियुक्त है। मेरे देश में मुझे सिर्फ 28 पेड़ का आंकड़ा प्राप्त है। इसलिए यात्रा वृत्तांत में मेपल की बात न की जाए तो ठीक नहीं होगा।
भारत में मेरे घर के गमले में पीपल लगा है। अफसोस है कई लोग सलाह देते हैं पीपल को घर में मत लगाइए। अब लगता है शायद पीपल को नहीं हटाकर हमने कोई गलती नहीं की है। घर जाकर पीपल में हम कनाडा के मेपल की स्मृतियां खोजने की कोशिश करते रहेंगे ...
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लाइफ सेविंग स्किल तैराकी
प्रत्येक रविवार को पोते अक्ष की स्वीमिंग क्लास होती है सुबह 11 बजे से 12 बजे के बीच। आज उसका रिजल्ट भी आने वाला था। भारत प्रवास के कारण बीच में कुछ प्रेक्टिस और प्रशिक्षण अवरुद्ध भी रहा था उसका। उसे तैरते हुए देखने की हमारी बहुत इच्छा थी। पौने ग्यारह पर हम सब सामुदायिक केंद्र जाने के लिये घर से निकल गए।
कनाडा के प्रत्येक शहर में नगर पालिका प्रशासन द्वारा सामुदायिक केंद्र याने कम्युनिटी सेंटर्स स्थापित किये गए हैं। जिनमे लोक कल्याण से संबंधित अनेक गतिविधियों को भी संचालित किया जाता है। बच्चों से लेकर वृद्धों तक के लिए विभिन्न सांस्कृतिक,कला,कौशल और खेल गतिविधियों के लिए व्यवस्थाएं और कार्यक्रम यहां साल भर के लिए निर्धारित किये गए होते हैं। जिनकी जानकारी केंद्र के प्रकाशनों और अन्य सूचना माध्यमों के जरिये उपलब्ध होती रहती है। इन केंद्रों पर बर्फ के फ्लोर पर स्केटिंग, स्वीमिंग पूल्स, बॉस्केट बॉल, बैडमिंटन, जिम सहित अनेक खेलों के लिए आधुनिकतम व्यवस्थाएं की गईं हैं।
अक्ष भी प्रति रविवार यहां तैराकी का नियमित प्रशिक्षण प्राप्त करता है। कनाडा प्रशासन भी इस बात पर जोर देता है कि यहां का प्रत्येक बच्चा और नागरिक तैराकी का अवश्य प्रशिक्षण ले। तैराकी को कनाडा में हॉबी की बजाए लाइफ सेविंग स्किल के रूप में मान्यता प्रदान की गई है।
न्यूमार्केट सामुदायिक केंद्र पर ग्यारह वर्षीय अक्ष के साथ पहुंचना हमारे लिए बहुत रोमांचपूर्ण रहा। तैराकी प्रशिक्षण के 9 वें स्तर के अंतिम चरण में था वह।
तैराकी के लिए बनें विभिन्न लेनों में अलग अलग आयु वर्गों और प्रशिक्षण स्तरों के बच्चे अपने ट्रेनर्स से प्रशिक्षण ले रहे थे। कुतूहल बना हुआ था कि अक्ष कैसे तैरता है। पहली बार हम उसका तैरना देखने वाले थे।
आखिर ऊपर गैलरी में लगी बैंचों पर से हमें स्वीमिंग कॉस्ट्यूम में चश्मा लगाए अक्ष दिखाई दे ही गया। पूरे एक घण्टे हम उसे विभिन्न शैलियों में तैराकी करते,डाइव लगाते देख मन्त्र मुग्ध होते रहे। सचमुच वह बहुत अच्छा कर रहा था। मन में आशंका थी कि प्रशिक्षण में हुए गैप के कारण कहीं यह स्तर दोबारा न करना पड़े उसे।
इस बीच हमने बहुत छोटे बच्चों को प्रशिक्षकों द्वारा स्नेहपूर्ण और मनोवैज्ञानिक तरीकों से तैराकी के प्रति उत्साहित करते देखा तो दंग रह गए। थोड़ी ही देर में पानी में उतरने का डर गायब हो गया था और वे पूल में उतरने के प्रति लालायित होते नजर आए। यह और भी चौकाने वाला अनुभव था कि कुछ दृष्टिबाधित बच्चे भी यहां उत्साह से तैराकी सीखते दिखे।
स्वीमिंग के बाद जब तक अक्ष तैयार होकर बाहर आया हमने बच्चों को बर्फ पर मुग्ध करने वाली कलात्मक स्केटिंग करते देखा। थोड़ी ही देर में अक्ष अपने प्रमाण पत्र के साथ हमारे पास आया तो बहुत खुश था। उसने तैराकी का 9 वां चरण सफलता पूर्वक पार कर लिया था। अब 10 वें चरण के प्रशिक्षण के बाद स्वयं स्वीमिंग प्रशिक्षक बनने की उसकी राह आसान हो जाएगी।
दादी ने पोते को गले लगा लिया और खुशी के इस खास मौके पर थोड़ी देर बाद हम लोग दक्षिण भारतीय रेस्टोरेंट में शानदार भोजन की पार्टी एन्जॉय कर रहे थे।
पोते की किसी सफलता पर पहली बार हम उसके साथ थे.....
लाइफ सेविंग स्किल तैराकी
प्रत्येक रविवार को पोते अक्ष की स्वीमिंग क्लास होती है सुबह 11 बजे से 12 बजे के बीच। आज उसका रिजल्ट भी आने वाला था। भारत प्रवास के कारण बीच में कुछ प्रेक्टिस और प्रशिक्षण अवरुद्ध भी रहा था उसका। उसे तैरते हुए देखने की हमारी बहुत इच्छा थी। पौने ग्यारह पर हम सब सामुदायिक केंद्र जाने के लिये घर से निकल गए।
कनाडा के प्रत्येक शहर में नगर पालिका प्रशासन द्वारा सामुदायिक केंद्र याने कम्युनिटी सेंटर्स स्थापित किये गए हैं। जिनमे लोक कल्याण से संबंधित अनेक गतिविधियों को भी संचालित किया जाता है। बच्चों से लेकर वृद्धों तक के लिए विभिन्न सांस्कृतिक,कला,कौशल और खेल गतिविधियों के लिए व्यवस्थाएं और कार्यक्रम यहां साल भर के लिए निर्धारित किये गए होते हैं। जिनकी जानकारी केंद्र के प्रकाशनों और अन्य सूचना माध्यमों के जरिये उपलब्ध होती रहती है। इन केंद्रों पर बर्फ के फ्लोर पर स्केटिंग, स्वीमिंग पूल्स, बॉस्केट बॉल, बैडमिंटन, जिम सहित अनेक खेलों के लिए आधुनिकतम व्यवस्थाएं की गईं हैं।
अक्ष भी प्रति रविवार यहां तैराकी का नियमित प्रशिक्षण प्राप्त करता है। कनाडा प्रशासन भी इस बात पर जोर देता है कि यहां का प्रत्येक बच्चा और नागरिक तैराकी का अवश्य प्रशिक्षण ले। तैराकी को कनाडा में हॉबी की बजाए लाइफ सेविंग स्किल के रूप में मान्यता प्रदान की गई है।
न्यूमार्केट सामुदायिक केंद्र पर ग्यारह वर्षीय अक्ष के साथ पहुंचना हमारे लिए बहुत रोमांचपूर्ण रहा। तैराकी प्रशिक्षण के 9 वें स्तर के अंतिम चरण में था वह।
तैराकी के लिए बनें विभिन्न लेनों में अलग अलग आयु वर्गों और प्रशिक्षण स्तरों के बच्चे अपने ट्रेनर्स से प्रशिक्षण ले रहे थे। कुतूहल बना हुआ था कि अक्ष कैसे तैरता है। पहली बार हम उसका तैरना देखने वाले थे।
आखिर ऊपर गैलरी में लगी बैंचों पर से हमें स्वीमिंग कॉस्ट्यूम में चश्मा लगाए अक्ष दिखाई दे ही गया। पूरे एक घण्टे हम उसे विभिन्न शैलियों में तैराकी करते,डाइव लगाते देख मन्त्र मुग्ध होते रहे। सचमुच वह बहुत अच्छा कर रहा था। मन में आशंका थी कि प्रशिक्षण में हुए गैप के कारण कहीं यह स्तर दोबारा न करना पड़े उसे।
इस बीच हमने बहुत छोटे बच्चों को प्रशिक्षकों द्वारा स्नेहपूर्ण और मनोवैज्ञानिक तरीकों से तैराकी के प्रति उत्साहित करते देखा तो दंग रह गए। थोड़ी ही देर में पानी में उतरने का डर गायब हो गया था और वे पूल में उतरने के प्रति लालायित होते नजर आए। यह और भी चौकाने वाला अनुभव था कि कुछ दृष्टिबाधित बच्चे भी यहां उत्साह से तैराकी सीखते दिखे।
स्वीमिंग के बाद जब तक अक्ष तैयार होकर बाहर आया हमने बच्चों को बर्फ पर मुग्ध करने वाली कलात्मक स्केटिंग करते देखा। थोड़ी ही देर में अक्ष अपने प्रमाण पत्र के साथ हमारे पास आया तो बहुत खुश था। उसने तैराकी का 9 वां चरण सफलता पूर्वक पार कर लिया था। अब 10 वें चरण के प्रशिक्षण के बाद स्वयं स्वीमिंग प्रशिक्षक बनने की उसकी राह आसान हो जाएगी।
दादी ने पोते को गले लगा लिया और खुशी के इस खास मौके पर थोड़ी देर बाद हम लोग दक्षिण भारतीय रेस्टोरेंट में शानदार भोजन की पार्टी एन्जॉय कर रहे थे।
पोते की किसी सफलता पर पहली बार हम उसके साथ थे.....
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मिलना अधबीच के मेले से बिछुड़े मित्र का
भारतीय हिंदी भाषी समुदाय की उपस्थिति के कारण कनाडा में साहित्य और हिंदी प्रचार-प्रसार की रचनात्मक गतिविधियों के बारे में सोशल मीडिया के माध्यम से जानकारियां अक्सर मिलती रहती थीं।
फेसबुक के कुछ समूहों और मित्रों से भी थोड़ा बहुत जुड़ा रहा था। श्री धर्म जैन मेरे बहुत पुराने और हमपेशा रचनाकार रहे हैं। यद्यपि कोई 35 बरस के बाद पता चला कि मेरे शुरुआती लेखन समय में वे भी नईदुनिया(इंदौर) के लोकप्रिय स्तंभ 'अधबीच'में लिखने वाले वही प्रिय व्यंग्यकार श्री धर्मपाल महेंद्र जैन हैं,जिनका उल्लेख मैं सदैव अधबीच से कलम भांजकर निकलने वाले बेहतरीन व्यंग्यकारों में करता रहा था। 1984 में ही उनका प्रथम व्यंग्य संग्रह' सर क्यों दांत फाड़ रहा है' शाया हो चुका था।मेरा संग्रह 'पुनः पधारें' अधबीच में लिखते हुए वर्ष 1995 में बाद में आया था। यद्यपि अधबीच स्तंभ का प्रकाशन 1981 की21 अप्रेल से अब तक जारी है।
बहरहाल, हमारा दोबारा मिलन प्रकाश मेहरा की फिल्मों के कुम्भ में बिछडे भाइयों की तर्ज पर 'अधबीच में बिछड़े रचनाकारों' के रूप में 35 बरस बाद हुआ। धर्म जी बैंक ऑफ इंडिया में कार्य करते हुए जब धार क्षेत्र में पदस्थ थे तब भाई सतीश राठी के मित्र हुआ करते थे। मैं उनके व्यंग्य लेखन का प्रशंसक रहा लेकिन व्यक्तिगत मुलाकात का अवसर कभी आया नहीं। उनके लेखन में बीच का एक लंबा अंतराल आया। कहीं दिखाई नहीं दिए।अब इतनी सक्रियता है कि व्यंग्य के आलवा बड़ी सार्थक और सुंदर कविताएं देशभर की पत्र पत्रिकाओं में हर माह देखी पढ़ी जा सकती हैं।
कोई छह माह पहले मुझे श्री धर्म जैन का नया कविता संग्रह 'इस समय तक' महत्वपूर्ण युवा कथाकर,व्यंग्यकार भाई पंकज सुबीर के शिवना प्रकाशन, विदिशा(म प्र)से धर्म जी के सौजन्य से प्राप्त हुआ था।संग्रह की सुंदर कविताओं को मैने पढ़कर अपनी पाठकीय टिप्पणी भी लिखी थी,जो भोपाल के विचार प्रधान अखबार 'सुबह सवेरे' के साहित्य पृष्ठ पर प्रकाशित हुई थी।फेसबुक पर हुए संवादों में जब धर्म जी को पता चला कि मेरे कनाडा प्रवास का योग बन रहा है,उनके आत्मीय संदेशे आने लगे कि कनाडा के हिंदी आयोजनों में मैं भी शामिल रहूं।
26 मई को हम लोग कनाडा पहुंचे थे। धर्म जी का मेसेंजर और फोन दोनों आये। मिसिसॉगा के हिन्दू हेरिटेज सेंटर में श्री कैलाश भटनागर जी की 85 वीं वर्षगांठ पर एक कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया था। यहां बसे और प्रवास पर आए रचनाकारों को बहुत आत्मीयता से आमंत्रित किया गया था। डिनर की भी व्यवस्था थी। धर्म जी ने मेरे कनाडा पहुंचने की सूचना आयोजकों को देकर मुझे भी निमंत्रण पत्र मेल किया। एक रचनाकार के नाते यह अवसर और अपने प्रिय रचनाकार मित्र से पहली बार मिलने का कुतूहल इतना बढ़ गया कि बच्चों को वहां हमे ले जाने के लिए कहा। उस दिन शनिवार होने से कोई दिक्कत नहीं थी। जेट लेग और निंद्रा अनिंद्रा से लड़ते हुए आखिर हम लोग घर से 80 किलोमीटर दूर कार्यक्रम स्थल पहुंच ही गए। कार्यक्रम भी थोड़ा देर से शुरू हुआ था। बारिश भी हुई थी। कुछ विलम्ब से भी पहुंचे।
आंखें धर्म जी को ढूंढ रहीं थी। लेकिन फेसबुक पर उनकी प्रोफ़ाइल तस्वीर ने मदद की हमने उनको पहचान लिया,उन्होंने हमें। चर्चित कथाकार और धर्मजी की सहधर्मिणी डॉ हंसा दीप भी उठकर उत्साह से आईं।बहुत आत्मीयता से हम लोगों का उन्होंने स्वागत किया। बच्चों से भी मिले।
संचालक जी को उन्होंने कह रखा था की धर्मजी स्वयं मेरे पहुंच जाने के बाद ही काव्य पाठ करेंगे सो कुछ कवियों के पाठ के बाद धर्म जी को आमंत्रित किया गया। उन्होंने दो बहुत प्रभावी व्यंग्य कविताओं का पाठ किया। अपना पाठ समाप्तकरने के बाद उन्होंने कुछ आत्मीय शब्द मेरे स्वागत में भी कहे। मुझे आमंत्रित किया गया। मैंने भी अपने संग्रह 'कोहरे में सुबह' दो छोटी कविताएँ जंगली फूल के अलावा दूरियां सुनाईं।
आप भी एक कविता का जायजा लीजिये आज...
कविता
दूरियाँ
1
बहुत दूर थे..
इतने दूर कि
मोबाइल से बात कर रहे थे
एक पलंग के दो छोर पर थे दोनों !
2
एक छींक आती है उनको स्क्रीन पर
तो हम बीमार हो जाते हैं
इतने करीब हैं वे
जैसे लेपटॉप पर कैमरे की आँख.
3
शाम की सैर के बाद
आरामकुर्सी पर सुस्ताएंगे अभी आकर
दाल बघारने की वही अद्भुत खुशबू
फिर बिखर जाएगी थोड़ी देर में
चौथाई सदी की दूरी के बावजूद
साथ-साथ हैं वे अभी-तक.
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