Thursday, 9 July 2026

विकास की भीड़ में मनुष्यता का छोटा-सा द्वीप

 विकास की भीड़ में मनुष्यता का छोटा-सा द्वीप

दुनिया का अधिकांश इतिहास इस संघर्ष का इतिहास है कि मनुष्य अधिक भूमि, अधिक संसाधन और अधिक सुविधा कैसे प्राप्त करे। सभ्यताओं ने नदियों के किनारे नगर बसाए, जंगल काटे, पहाड़ चीर दिए और समुद्र तक को पीछे धकेलकर नई जमीन बना ली। आधुनिक विकास की पूरी अवधारणा भी मानो इसी विश्वास पर टिकी है कि जीवन जितना विस्तृत होगा, उतना बेहतर होगा। लेकिन इसी दुनिया में एक ऐसा छोटा-सा द्वीप भी है, जो इस धारणा पर मौन किंतु गहरा प्रश्नचिह्न लगाता है।

पिछले दिनों हमने यूट्यूबर और नोमेडिक टूर चैनल के वैश्विक घुमक्कड़ तोरवाशु के साथ एक अनोखे और पृथ्वी के सबसे छोटे और घने बसे द्वीप की मानस यात्रा की। कैरेबियाई सागर में कोलंबिया के तट के निकट स्थित सांता क्रूज़ डेल इस्लोटे दुनिया के सबसे घनी आबादी वाले द्वीपों में गिना जाता है। लगभग दो फुटबॉल मैदान जितने क्षेत्रफल में सैकड़ों लोग रहते हैं। पहली दृष्टि में यह स्थान किसी भी नगर नियोजक के लिए अव्यवस्था का उदाहरण लग सकता है, लेकिन थोड़ा ठहरकर देखें तो यही द्वीप आधुनिक सभ्यता की कई स्थापित धारणाओं को चुनौती देता दिखाई देता है। यह केवल भूगोल का आश्चर्य नहीं, बल्कि समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और मानवीय संबंधों की जीवित प्रयोगशाला है। इस वीडियो यात्रा ने हमे कई वैचारिक कोणों से चिंतन करने को प्रेरित किया।

कहा जाता है कि लगभग डेढ़ सौ वर्ष पहले कुछ मछुआरों ने इस स्थान को अपना ठिकाना बनाया। धीरे-धीरे उन्होंने मूंगे, पत्थरों और अन्य सामग्री से जमीन का विस्तार किया और आज का द्वीप आकार लेने लगा। अब यहां रंग-बिरंगे छोटे मकान एक-दूसरे से सटे हुए हैं। गलियां इतनी संकरी हैं कि दो लोग मुश्किल से साथ निकल पाते हैं। कोलंबिया के कैरेबियाई तट से कुछ दूरी पर स्थित सांता क्रूज़ डेल इस्लोटे  दुनिया के सबसे घनी आबादी वाले द्वीपों में गिना जाता है। लगभग 1.2 हेक्टेयर क्षेत्रफल वाले इस छोटे-से कृत्रिम द्वीप पर सैकड़ों लोग रहते हैं। जनसंख्या के बारे में अलग-अलग अनुमान हैं, लेकिन हाल के स्थानीय आँकड़े लगभग 800 के आसपास निवासियों की ओर संकेत करते हैं।हमने देखा कि यहां रहने वाले अधिकांश लोग अफ्रो-कोलंबियाई समुदाय से हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद लोगों के बीच सहयोग की भावना बहुत मजबूत है। अधिकांश परिवार एक-दूसरे को जानते हैं और विवाद प्रायः आपसी बातचीत से ही सुलझा लिए जाते हैं। द्वीप पर एक प्राथमिक विद्यालय, छोटा स्वास्थ्य केंद्र, कुछ दुकानें और एक सार्वजनिक चौक है। बच्चों का बचपन समुद्र से जुड़ा होता है। वे बहुत कम उम्र से तैरना और मछली पकड़ना सीख जाते हैं। 

आज महानगरों में रहने वाला व्यक्ति औसतन पहले से कहीं अधिक निजी स्थान का स्वामी है। घर बड़े हुए हैं, सड़कें चौड़ी हुई हैं, वाहन बढ़े हैं और सुविधाओं का विस्तार हुआ है। इसके बावजूद अकेलापन, अविश्वास और मानसिक तनाव भी लगातार बढ़ रहे हैं। दूसरी ओर, सांता क्रूज़ डेल इस्लोटे में रहने वाले लोग अत्यंत सीमित स्थान साझा करते हैं। वहां न कारों की आवाजाही है, न चौड़ी सड़कें और न ही निजी जीवन के लिए बहुत अधिक जगह। फिर भी वहां सामुदायिक जीवन की वह सहजता दिखाई देती है, जिसकी तलाश आधुनिक समाज लगातार करता रहता है।

यह विरोधाभास हमें सोचने पर मजबूर करता है कि किसी समाज की समृद्धि का वास्तविक पैमाना क्या होना चाहिए? क्या विकास का अर्थ केवल अधिक उपभोग और अधिक निजी संपत्ति है, या फिर ऐसा सामाजिक वातावरण भी विकास का हिस्सा है, जिसमें लोग एक-दूसरे को जानते हों, सुख-दुःख में साथ खड़े होते हों और जीवन प्रतिस्पर्धा की जगह सहयोग पर आधारित हो?

सांता क्रूज़ डेल इस्लोटे का सामाजिक जीवन इस प्रश्न का एक व्यावहारिक उत्तर प्रस्तुत करता है। अधिकांश निवासी एक-दूसरे से परिचित हैं। विवाद प्रायः बातचीत और सामाजिक सहमति से सुलझाए जाते हैं। बच्चों का पालन-पोषण भी केवल परिवार नहीं, पूरा समुदाय मिलकर करता है। समुद्र यहां केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि सामूहिक जीवन का केंद्र है। सुबह नावों का निकलना, शाम को मछुआरों का लौटना और पूरे समुदाय का एक-दूसरे के जीवन में सहभागी होना उस सामाजिक पूंजी का निर्माण करता है, जिसे आधुनिक अर्थशास्त्र अक्सर आँकड़ों में माप नहीं पाता।

यहां की अर्थव्यवस्था भी विचार करने योग्य है। मछली पकड़ना आज भी जीवन का मुख्य आधार है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में पर्यटन ने नई संभावनाएं पैदा की हैं। दुनिया भर से लोग इस छोटे-से द्वीप को देखने आते हैं। वे यहां समुद्र की सुंदरता से अधिक मनुष्य की अनुकूलन क्षमता को देखने आते हैं। यह पर्यटन स्थानीय लोगों के लिए आय का स्रोत भी है और चुनौती भी। यदि पर्यटन केवल व्यावसायिक गतिविधि बन जाए, तो वही समुदाय, जिसकी सादगी पर्यटकों को आकर्षित करती है, धीरे-धीरे अपनी मौलिक पहचान खो सकता है। इसलिए यहां आर्थिक विकास और सांस्कृतिक संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है।

लेकिन इस द्वीप की कहानी केवल प्रेरणा की कहानी नहीं है। यह चेतावनी की कहानी भी है। सीमित भूमि, पेयजल की कमी, स्वच्छता की चुनौतियां और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव यहां के लोगों के दैनिक जीवन का हिस्सा हैं। सबसे बड़ी चिंता जलवायु परिवर्तन है। समुद्र का बढ़ता जलस्तर भविष्य में ऐसे छोटे द्वीपों के अस्तित्व को ही संकट में डाल सकता है। विडंबना यह है कि जलवायु परिवर्तन के लिए सबसे कम जिम्मेदार समुदाय ही उसके सबसे बड़े शिकार बनते जा रहे हैं। इस अर्थ में सांता क्रूज़ डेल इस्लोटे केवल एक द्वीप नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के पर्यावरणीय अन्याय का प्रतीक भी है।

यह द्वीप शहरी नियोजन पर भी नए सिरे से विचार करने का अवसर देता है। आधुनिक शहरों में स्थान बढ़ता जा रहा है, लेकिन सामाजिक दूरी भी बढ़ रही है। ऊंची-ऊंची इमारतों में रहने वाले लोग वर्षों तक अपने पड़ोसियों के नाम तक नहीं जानते। इसके विपरीत इस छोटे-से द्वीप पर निजी स्थान सीमित है, लेकिन सामाजिक निकटता बहुत गहरी है। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि भीड़ आदर्श स्थिति है, बल्कि यह समझना चाहिए कि किसी समाज की गुणवत्ता केवल उसके भौतिक ढांचे से निर्धारित नहीं होती। उसके पीछे सामाजिक विश्वास, साझा जिम्मेदारी और सामुदायिक संस्कृति की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

भारत जैसे देश के लिए भी इस द्वीप का अनुभव प्रासंगिक है। हमारे गांवों और पुराने मोहल्लों में कभी इसी प्रकार की सामुदायिक संस्कृति दिखाई देती थी। लोग एक-दूसरे के घर बिना औपचारिकता के चले जाते थे, बच्चों की देखभाल पूरे मोहल्ले की जिम्मेदारी मानी जाती थी और संकट आने पर समाज सबसे पहले खड़ा होता था। शहरीकरण और उपभोक्तावाद ने इस संस्कृति को धीरे-धीरे कमजोर किया है। आज हमारे पास पहले से कहीं अधिक सुविधाएं हैं, लेकिन सामाजिक आत्मीयता का दायरा लगातार सिमटता जा रहा है।

सांता क्रूज़ डेल इस्लोटे हमें यह भी सिखाता है कि विकास का प्रश्न केवल आर्थिक नहीं, नैतिक भी है। यदि विकास मनुष्य को समाज से काट दे, प्रकृति से दूर कर दे और उसे केवल उपभोक्ता बनाकर छोड़ दे, तो उसकी चमक कितनी भी आकर्षक क्यों न हो, वह अधूरी ही रहेगी। दूसरी ओर, यदि सीमित संसाधनों में भी मनुष्य सहयोग, विश्वास और साझा उत्तरदायित्व के साथ जीवन जीना सीख ले, तो वही समाज अधिक टिकाऊ और अधिक मानवीय बन सकता है।

संभव है कि भविष्य में यह छोटा-सा द्वीप जलवायु परिवर्तन, पर्यटन और संसाधनों के दबाव के कारण अनेक कठिन चुनौतियों का सामना करे। फिर भी यह दुनिया के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश छोड़ता है। सभ्यता की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जाएगी कि हमने कितनी ऊंची इमारतें बनाई हैं या कितना बड़ा आर्थिक उत्पादन किया है। उसकी असली कसौटी यह होगी कि क्या हमने मनुष्यों के बीच विश्वास बचाए रखा, क्या हमने प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखा और क्या हमने सीमित संसाधनों वाली पृथ्वी पर साझा जीवन जीने की कला सीखी।

शायद इसी कारण कैरेबियाई सागर के बीच बसा यह छोटा-सा द्वीप दुनिया के सबसे बड़े महानगरों से भी बड़ा संदेश देता है। वह बताता है कि मनुष्य का भविष्य केवल अधिक जगह पाने में नहीं, बल्कि उपलब्ध जगह को अधिक मानवीय बनाने में छिपा है। यही संदेश आज की दुनिया को सबसे अधिक सुनने की आवश्यकता है।


ब्रजेश कानूनगो


Tuesday, 7 July 2026

नकली लक्जरी सामानों का बढ़ता कारोबार : सस्ते सौदे की असली कीमत

नकली लक्जरी सामानों का बढ़ता कारोबार : सस्ते सौदे की असली कीमत

हाल के महीनों में वियतनाम द्वारा नकली लक्जरी सामानों के विरुद्ध चलाया गया व्यापक अभियान केवल कानून-व्यवस्था की कार्रवाई नहीं है, बल्कि बदलते वैश्विक व्यापार की नई वास्तविकता का संकेत भी है। अमेरिका लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि वियतनाम नकली ब्रांडेड वस्तुओं, पायरेटेड सॉफ्टवेयर और चीनी उत्पादों के पुनः-निर्यात का प्रमुख केंद्र बनता जा रहा है। अमेरिकी दबाव और ऊँचे आयात शुल्क की आशंकाओं के बीच वियतनाम सरकार ने बड़े पैमाने पर छापेमारी शुरू की। हो ची मिन्ह सिटी सहित अनेक स्थानों पर हजारों नकली उत्पाद जब्त किए गए और ऑनलाइन बिक्री नेटवर्क पर भी शिकंजा कसा गया। वियतनाम अकेला नहीं है। हाल के वर्षों में अमेरिका, हांगकांग, थाईलैंड और कई अन्य देशों ने भी नकली लक्जरी वस्तुओं के विरुद्ध अभियान तेज किए हैं। यह इसलिए भी आवश्यक हो गया है क्योंकि नकली सामानों का कारोबार अब केवल कुछ फुटपाथी दुकानों तक सीमित नहीं रहा। यह संगठित अपराध, कर चोरी, मनी लॉन्ड्रिंग, ऑनलाइन धोखाधड़ी और बौद्धिक संपदा अधिकारों के उल्लंघन से जुड़ा बहु-अरब डॉलर का वैश्विक कारोबार बन चुका है।

आज किसी भी बड़े शहर के बाजार, पर्यटन स्थल या ई-कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म पर "फर्स्ट कॉपी", "मिरर कॉपी" और "एएए कॉपी" जैसे शब्द आम हो चुके हैं। महंगे ब्रांडों के जूते, बैग, घड़ियाँ, कपड़े, इत्र और चश्मे उनकी वास्तविक कीमत के छोटे से हिस्से में उपलब्ध मिल जाते हैं। दिलचस्प तथ्य यह है कि अधिकांश खरीदार जानते हैं कि वे नकली वस्तु खरीद रहे हैं, फिर भी उन्हें कोई अपराधबोध नहीं होता। उनके लिए यह कम कीमत में प्रतिष्ठा का अनुभव खरीदने जैसा सौदा है।

यही इस समस्या की सबसे बड़ी चुनौती है। नकली सामानों का बाजार केवल आर्थिक कारणों से नहीं, बल्कि सामाजिक मनोविज्ञान के कारण भी फल-फूल रहा है। लक्जरी ब्रांड आज उपयोगिता से अधिक सामाजिक पहचान का माध्यम बन चुके हैं। सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और तीव्र किया है। तस्वीरों और वीडियो की दुनिया में वस्तु की गुणवत्ता से अधिक उसका लोगो दिखाई देता है। ऐसे में यदि कम कीमत पर वही बाहरी स्वरूप मिल जाए तो अनेक उपभोक्ता उसे स्वीकार करने में संकोच नहीं करते।

नकली उत्पाद बनाने वालों के लिए भी यह अत्यंत लाभकारी कारोबार है। उन्हें न अनुसंधान पर खर्च करना पड़ता है, न डिज़ाइन, गुणवत्ता परीक्षण, विज्ञापन या ब्रांड निर्माण पर। वे केवल प्रसिद्ध ब्रांड की पहचान का अनुचित लाभ उठाकर कम लागत में भारी मुनाफा अर्जित करते हैं। यही कारण है कि यूरोप, अमेरिका, चीन, तुर्किये, दक्षिण-पूर्व एशिया और भारत सहित अनेक देशों में यह समानांतर बाजार लगातार विस्तार कर रहा है।

भारत भी इससे अछूता नहीं है। दिल्ली के पालिका बाजार से लेकर मुंबई, कोलकाता, अहमदाबाद, सूरत और जयपुर जैसे शहरों तक नकली ब्रांडों का कारोबार वर्षों से चलता आ रहा है। अब डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म ने इसे और व्यापक बना दिया है। सोशल मीडिया और छोटे ई-कॉमर्स माध्यमों के जरिए नकली उत्पाद सीधे ग्राहकों तक पहुँच रहे हैं। कई बार उपभोक्ता स्वयं भी यह पहचान नहीं पाता कि उसने असली वस्तु खरीदी है या उसकी नकल।

इसका दूसरा पक्ष भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। मूल ब्रांड बनाने वाली कंपनियाँ वर्षों तक अनुसंधान, डिज़ाइन, गुणवत्ता नियंत्रण और विपणन पर भारी निवेश करती हैं। नकली उत्पाद बिना किसी बौद्धिक या वित्तीय निवेश के उसी प्रतिष्ठा का लाभ उठा लेते हैं। इससे केवल उनकी बिक्री प्रभावित नहीं होती, बल्कि ब्रांड की विश्वसनीयता और विशिष्टता भी कमजोर पड़ती है। यदि कोई उपभोक्ता खराब गुणवत्ता वाले नकली उत्पाद को असली समझ ले, तो उसके मन में ब्रांड की छवि भी धूमिल हो सकती है। 

दीर्घकाल में यह नवाचार और अनुसंधान पर निवेश के उत्साह को भी प्रभावित करता है।

लेकिन इसका प्रभाव केवल कंपनियों तक सीमित नहीं रहता। नकली वस्तुओं के कारण सरकारों को कर राजस्व का नुकसान होता है, वैध उद्योगों में रोजगार प्रभावित होता है और संगठित अपराध को आर्थिक आधार मिलता है। इससे भी अधिक चिंताजनक तथ्य यह है कि दवाइयों, सौंदर्य प्रसाधनों, विद्युत उपकरणों और वाहन के पुर्जों जैसे क्षेत्रों में नकली उत्पाद सीधे उपभोक्ताओं की सुरक्षा के लिए खतरा बन सकते हैं।

हालाँकि इस बहस का एक दूसरा पक्ष भी है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। कई विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ लक्जरी ब्रांड अपनी वास्तविक उत्पादन लागत की तुलना में अत्यधिक ऊँचे मूल्य वसूलते हैं। उपभोक्ता का बड़ा भुगतान उत्पाद की उपयोगिता के बजाय उसकी ब्रांड छवि और विशिष्टता के लिए होता है। परिणामस्वरूप अनेक लोग यह महसूस करते हैं कि वे केवल नाम के लिए अत्यधिक कीमत चुका रहे हैं। यह धारणा भी नकली उत्पादों की मांग को बढ़ाती है। इसलिए समस्या केवल अवैध कारोबार की नहीं, बल्कि अत्यधिक महंगी उपभोक्ता संस्कृति की भी है।

स्पष्ट है कि इस चुनौती का समाधान केवल छापेमारी या दंडात्मक कार्रवाई नहीं हो सकता। बौद्धिक संपदा कानूनों का प्रभावी पालन, सीमा शुल्क एजेंसियों के बीच अंतरराष्ट्रीय सहयोग, ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर नकली उत्पादों की त्वरित पहचान और हटाने की व्यवस्था तथा आधुनिक डिजिटल प्रमाणीकरण तकनीकों का व्यापक उपयोग आवश्यक होगा। क्यूआर कोड, ब्लॉकचेन आधारित सत्यापन और डिजिटल प्रमाणपत्र जैसी तकनीकें इस दिशा में उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं।

इसके साथ ही ब्रांड कंपनियों को भी आत्ममंथन करना होगा। यदि वे बेहतर गुणवत्ता के साथ अपेक्षाकृत सुलभ मूल्य वाली उत्पाद श्रृंखलाएँ विकसित करें, तो नकली बाजार का आकर्षण स्वाभाविक रूप से घट सकता है। भारत जैसे देशों में स्थानीय गुणवत्ता आधारित ब्रांडों को प्रोत्साहन देकर उपभोक्ताओं को विश्वसनीय और किफायती विकल्प उपलब्ध कराना भी दीर्घकालिक समाधान का हिस्सा होना चाहिए।

दरअसल नकली लक्जरी वस्तुओं का कारोबार केवल सस्ती खरीदारी का प्रश्न नहीं है। यह उपभोक्ता मनोविज्ञान, सामाजिक प्रतिष्ठा, वैश्विक व्यापार, कानून, नवाचार और नैतिकता के जटिल अंतर्संबंधों का परिणाम है। जब तक कम कीमत में प्रतिष्ठा पाने की मानसिकता बनी रहेगी, तब तक नकली बाजार भी किसी न किसी रूप में जीवित रहेगा। इसलिए आवश्यक है कि सरकारें प्रभावी कानून लागू करें, कंपनियाँ मूल्य और उपलब्धता के बीच संतुलन स्थापित करें तथा उपभोक्ता भी मौलिकता और गुणवत्ता के महत्व को समझें। स्वस्थ और निष्पक्ष बाजार व्यवस्था की रक्षा का यही सबसे टिकाऊ मार्ग है।

ब्रजेश कानूनगो


Monday, 6 July 2026

प्रतिमा में घोड़े के उठे हुए पैर और यौद्धा की मृत्यु का सच

प्रतिमा में घोड़े के उठे हुए पैर और यौद्धा की मृत्यु का सच

हमारे एक प्रिय यूट्यूबर ने जब वाशिंगटन में एक घुड़सवार योद्धा की मूर्ति चौराहे पर स्थापित देखी तो बताया कि मूर्ति में घोड़े के अगले पैरों को देखकर बताया जा सकता है कि योद्धा की मृत्यु किन परिस्थितियों में हुई थी। घोड़े के पैरों या टांगों को देखकर सवार योद्धा की मृत्यु के कारणों का पता हो जाना एक बहुत ही दिलचस्प और व्यापक रूप से फैला हुआ भ्रम (अर्बन लेजेंड) है। अक्सर सोशल मीडिया पर या गाइडों द्वारा भी यह बताया जाता है कि किसी घुड़सवार मूर्ति  में घोड़े की टांगों की स्थिति देखकर आप राजा या योद्धा की मौत का कारण जान सकते हैं।

आमतौर पर सोशल मीडिया पर जो कहानी चलती है, उसके अनुसार यदि घोड़े की ​दोनों आगे की टांगें हवा में हों तो योद्धा युद्ध में शहीद हुआ था। ​एक आगे की टांग हवा में हो तो योद्धा की मौत युद्ध में लगे घावों या बीमारी के कारण हुई थी और यदि घोड़े की ​चारों टांगें जमीन पर हों तो यह मान लिया जाता है कि योद्धा की मृत्यु प्राकृतिक कारणों (बुढ़ापे या सामान्य बीमारी) से हुई थी। 

दरअसल सच्चाई यह है कि इतिहास और मूर्तिकला (Sculpture) के विज्ञान में ऐसा कोई सार्वभौमिक (Universal) नियम नहीं है। यह केवल एक लोककथा है। यदि हम दुनिया भर के और भारत के महान राजाओं और योद्धाओं की मूर्तियों का अध्ययन करेंगे, तो यह 'नियम' पूरी तरह टूट जाता है। 

इसके पक्ष में कुछ प्रमुख उदाहरण दिए जा सकते हैं। भारतीय संदर्भ में कहें तो रानी लक्ष्मीबाई युद्ध के मैदान में वीरगति को प्राप्त हुई थीं। लेकिन देश भर में उनकी कई ऐसी मूर्तियां हैं जिनमें घोड़े की चारों टांगें जमीन पर हैं, कुछ में एक टांग हवा में है और कुछ में दो। मूर्तिकार ने इस नियम को नहीं, बल्कि कलात्मक दृश्य को प्राथमिकता दी। इसी तरह  शिवाजी महाराज की मृत्यु बीमारी के कारण रायगढ़ में हुई थी। लेकिन गेटवे ऑफ इंडिया (मुंबई) के पास लगी उनकी प्रसिद्ध मूर्ति में घोड़े की एक टांग हवा में उठाई गई है, जो इस कथित नियम से मेल खाती है, लेकिन कई अन्य जगहों पर उनकी मूर्तियों में घोड़े की दोनों टांगें हवा में दिखाई देती हैं। चेतक पर सवार महाराणा प्रताप की कई मूर्तियां हैं। चेतक ने हल्दीघाटी के युद्ध के बाद अपने प्राण त्यागे थे और महाराणा प्रताप की मृत्यु बाद में प्राकृतिक कारणों से हुई थी। लेकिन उनकी कई भव्य मूर्तियों में चेतक की दोनों टांगें हवा में दिखाई गई हैं ताकि उनका आक्रामक और वीर रूप प्रदर्शित किया जा सके।

वैश्विक संदर्भ में भी कई ऐसे उदाहरण उपलब्ध हैं जिनमें यह कहानी ठीक नहीं बैठती। नेपोलियन की मृत्यु सेंट हेलेना द्वीप पर बीमारी से हुई थी। लेकिन उनकी सबसे प्रसिद्ध पेंटिंग और मूर्तियों में उनका घोड़ा 'मारेन्गो' अपनी दोनों आगे की टांगें हवा में उठाए हुए बेहद आक्रामक मुद्रा में दिखता है। रोम के इस प्रसिद्ध सम्राट मार्कोस की मूर्ति में घोड़े का एक पैर हवा में है, लेकिन उनकी मृत्यु बीमारी से हुई थी।

अगर यह कोई नियम नहीं है, तो मूर्तिकार घोड़े के पैरों को अलग-अलग मुद्राओं में क्यों बनाते हैं? इसके पीछे मुख्य रूप से दो महत्वपूर्ण कारण होते हैं। पहला कारण शिल्प में ​कलात्मकता और गतिशीलता दर्शाना।  एक योद्धा को पराक्रमी और साहसी दिखाने के लिए घोड़े को दौड़ते हुए या उछलते हुए दिखाना ज्यादा प्रभावी होता है। चारों पैर जमीन पर होने से मूर्ति थोड़ी शांत या स्थिर लगती है, जबकि पैर हवा में होने से उसमें 'एक्शन' और ऊर्जा दिखाई देती है।दूसरा कारण है शिल्प की इंजीनियरिंग और संतुलन, कांसे (Bronze) या पत्थर की भारी मूर्ति बनाते समय संतुलन बनाना सबसे बड़ी चुनौती होती है। अगर घोड़े की दो टांगें हवा में होंगी, तो मूर्ति का पूरा वजन पीछे की दो टांगों और पूंछ पर आ जाता है। मूर्तिकार अपनी तकनीकी सुविधा और वजन के संतुलन के हिसाब से तय करते हैं कि कितनी टांगें जमीन पर रखनी हैं

​गाइडों द्वारा बताई और सोशल मीडिया पर प्रसारित  यह कहानी सुनने में बहुत रोमांचक लगती है और मूर्तियों को देखने का एक नया नजरिया देती है, लेकिन ऐतिहासिक रूप से यह पूरी तरह से एक मिथक  है कि घोड़े की टांगों के हवा में उठने की स्थिति से योद्धा की मृत्यु का अनुमान लगता हो। किसी भी मूर्तिकार या राजा ने इस नियम को अनिवार्य रूप से कभी स्वीकार नहीं किया। मूर्तियां इतिहास को दर्ज करने के साथ-साथ कला का एक बेहतरीन नमूना होती हैं, और उनमें दिखने वाली मुद्राएं इतिहास से ज्यादा मूर्तिकार की कल्पना और कला का हिस्सा होती हैं।


ब्रजेश कानूनगो 


Sunday, 5 July 2026

नायकों की मूर्तियाँ : इतिहास, राजनीति और सामूहिक स्मृति का सफ़र

नायकों की मूर्तियाँ : इतिहास, राजनीति और सामूहिक स्मृति का सफ़र

किसी भी शहर के प्रमुख चौराहे पर यदि किसी योद्धा, स्वतंत्रता सेनानी, राजा या महापुरुष की प्रतिमा दिखाई दे, तो वह केवल पत्थर या धातु की कलाकृति नहीं होती। वह उस समाज की सामूहिक स्मृति, राजनीतिक विचारधारा, सांस्कृतिक पहचान और इतिहास-बोध का सार्वजनिक घोषणापत्र भी होती है। इसलिए यह प्रश्न रोचक है कि आखिर चौराहों और सार्वजनिक स्थलों पर ऐतिहासिक नायकों की मूर्तियाँ स्थापित करने की परंपरा कब और कैसे शुरू हुई?

इस परंपरा की जड़ें हजारों वर्ष पुरानी हैं, लेकिन इसका आधुनिक स्वरूप मुख्यतः उन्नीसवीं शताब्दी में विकसित हुआ। प्राचीन सभ्यताओं—विशेषकर मिस्र, यूनान और रोम—में विशाल मूर्तियाँ बनाई जाती थीं। मिस्र के फ़राओ अपनी सत्ता के प्रदर्शन के लिए विशाल प्रतिमाएँ बनवाते थे। यूनान में विजयी खिलाड़ियों और वीरों की मूर्तियाँ मंदिरों और सार्वजनिक स्थानों पर स्थापित होती थीं। रोमन साम्राज्य ने इस परंपरा को और आगे बढ़ाया तथा सम्राटों और विजयी सेनानायकों की अश्वारोही प्रतिमाएँ साम्राज्य की शक्ति के प्रतीक के रूप में नगरों में स्थापित कीं। 

मध्यकाल में यूरोप में सार्वजनिक मूर्तियों का महत्व अपेक्षाकृत कम हो गया। धार्मिक मूर्तियाँ चर्चों तक सीमित रहीं। पुनर्जागरण  के बाद मानव-केंद्रित कला के पुनर्जन्म के साथ फिर से शासकों और महान व्यक्तियों की मूर्तियाँ बनने लगीं।

उन्नीसवीं शताब्दी में "स्टैच्यू मेनिया" का दौर आया।आज जिस प्रकार शहरों के चौराहों पर महापुरुषों की प्रतिमाएँ दिखाई देती हैं, उसकी वास्तविक शुरुआत उन्नीसवीं शताब्दी के यूरोप में हुई। इतिहासकार इसे "प्रतिमा-उन्माद" का युग भी कहते हैं। यह वह समय था जब आधुनिक राष्ट्र-राज्य बन रहे थे। सरकारें चाहती थीं कि नागरिक स्वयं को एक साझा इतिहास और साझा राष्ट्रीय पहचान से जोड़ें। इसलिए शहरों के चौक, पार्क और प्रमुख मार्ग राष्ट्रीय नायकों, सेनानायकों, साहित्यकारों और राजनेताओं की प्रतिमाओं से सजाए जाने लगे। इनका उद्देश्य केवल सम्मान देना नहीं, बल्कि नागरिकों में राष्ट्रवाद, गौरव और प्रेरणा का भाव जगाना भी था।

ब्रिटिश शासन ने इस परंपरा को भारत में बड़े पैमाने पर अपनाया। कलकत्ता, बम्बई, मद्रास और दिल्ली जैसे शहरों में महारानी विक्टोरिया, लॉर्ड कर्जन, लॉर्ड कॉर्नवालिस तथा अन्य अंग्रेज़ अधिकारियों की मूर्तियाँ स्थापित की गईं। यह केवल स्मारक नहीं थे, बल्कि औपनिवेशिक सत्ता की दृश्य उपस्थिति थे। उनका संदेश स्पष्ट था—साम्राज्य स्थायी है और उसकी शक्ति सर्वत्र विद्यमान है। 

स्वतंत्र भारत में 1947 के बाद सार्वजनिक स्थानों की प्रतीकात्मक भाषा बदल गई । अनेक ब्रिटिश अधिकारियों की मूर्तियाँ हटाकर संग्रहालयों या विशेष उद्यानों में स्थानांतरित कर दी गईं। उनकी जगह महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव आंबेडकर, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, छत्रपति शिवाजी महाराज, रानी लक्ष्मीबाई और क्षेत्रीय नायकों की प्रतिमाएँ स्थापित होने लगीं। इससे सार्वजनिक स्थान भारतीय इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृतियों के वाहक बन गए।

विश्व में भी कुछ रोचक उदाहरण मिल जाते हैं। हीरोस स्क्वेयर में हंगरी के राष्ट्रीय इतिहास के प्रमुख नायकों का विशाल स्मारक राष्ट्रीय पहचान का प्रतीक है।पार्लियामेंट स्क्वेयर  में ब्रिटेन के अनेक प्रधानमंत्रियों और विश्व नेताओं की प्रतिमाएँ लोकतांत्रिक परंपरा का प्रतीक हैं।  अमेरिका के न्यूयॉर्क में स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी  किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि स्वतंत्रता के आदर्श की प्रतिमा है। भारत के गुजरात में सरदार पटेल की प्रतिमा स्टेच्यू ऑफ यूनिटी के रूप में प्रसिद्ध हुई है।

मूर्तियाँ केवल इतिहास नहीं बतातीं, वे यह भी बताती हैं कि समाज किसे याद रखना चाहता है। इसलिए समय बदलने पर अनेक प्रतिमाएँ विवादों में आ जाती हैं।

हाल के वर्षों में यूरोप, अमेरिका और अफ्रीका में उपनिवेशवाद, दास-व्यापार और नस्लवाद से जुड़े व्यक्तियों की प्रतिमाएँ हटाने या संग्रहालयों में ले जाने की मांग उठी। इससे यह स्पष्ट हुआ कि सार्वजनिक स्मृति स्थिर नहीं होती; प्रत्येक पीढ़ी अपने नायकों का पुनर्मूल्यांकन करती है। 

आज भारत में केवल राष्ट्रीय नेताओं की ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय नायकों, जनजातीय वीरों, समाज सुधारकों और स्थानीय महापुरुषों की प्रतिमाएँ भी बड़ी संख्या में स्थापित की जा रही हैं। कई राज्यों में नई प्रतिमाएँ सांस्कृतिक अस्मिता और सामाजिक प्रतिनिधित्व का माध्यम बन रही हैं। साथ ही न्यायालयों ने यह भी कहा है कि सार्वजनिक मार्गों पर प्रतिमाएँ स्थापित करते समय नागरिकों की सुविधा और सुरक्षा का ध्यान रखा जाना चाहिए।

यद्यपि प्रारंभ में सार्वजनिक स्थानों पर प्रतिमाएँ मुख्यतः राजाओं और विजयी सेनानायकों की लगाई जाती थीं। किंतु उन्नीसवीं शताब्दी में मूर्तियों के चरित्रों में विस्तार हुआ। इतिहासकार इस दौर को स्टेच्यू मेनिया का युग कहते हैं। स्वतंत्रता के बाद भारत में भी अनेक औपनिवेशिक प्रतिमाएँ हटाकर राष्ट्रीय नेताओं की प्रतिमाएँ स्थापित की गईं।

आज प्रतिमाएँ केवल कला नहीं, बल्कि राजनीति, इतिहास, पर्यटन और स्थानीय पहचान का भी महत्वपूर्ण माध्यम बन चुकी हैं।दरअसल सार्वजनिक स्थलों पर स्थापित प्रतिमाएँ केवल अतीत का स्मरण नहीं करातीं; वे वर्तमान समाज के मूल्यों का भी दर्पण होती हैं। हर प्रतिमा एक प्रश्न पूछती है—हम किसे अपना नायक मानते हैं और आने वाली पीढ़ियों को किस इतिहास से परिचित कराना चाहते हैं? इसलिए ये मूर्तियाँ केवल पत्थर नहीं, बल्कि समाज की जीवित स्मृति, उसकी आकांक्षाओं और उसकी बदलती चेतना की अभिव्यक्ति हैं।

ब्रजेश कानूनगो


Friday, 3 July 2026

ई रिक्शा, मोबाइल ऐप और साइबर सुरक्षा : क्या यह किसी बड़े डिजिटल खतरे की चेतावनी है?

-रिक्शा, मोबाइल ऐप और साइबर सुरक्षा : क्या यह किसी बड़े डिजिटल खतरे की चेतावनी है?

देश के विभिन्न हिस्सों से हाल के दिनों में ई-रिक्शाओं के अचानक बंद हो जाने अथवा उनके संचालन में व्यवधान आने की शिकायतों ने एक नया प्रश्न खड़ा कर दिया है। आशंका व्यक्त की जा रही है कि कुछ मोबाइल एप्स या डिजिटल माध्यमों के जरिए इन वाहनों के संचालन को प्रभावित किया गया। सरकार द्वारा ऐसे कुछ संदिग्ध एप्स को हटाने या उनके विरुद्ध कार्रवाई के निर्देश दिए जाने की खबरों ने इस विषय को और गंभीर बना दिया है।

यद्यपि इन घटनाओं की जांच पूरी होने से पहले किसी निष्कर्ष पर पहुँचना उचित नहीं होगा, फिर भी यह घटनाक्रम एक बड़े प्रश्न की ओर अवश्य संकेत करता है—क्या भारत की तेजी से डिजिटल होती अर्थव्यवस्था और परिवहन व्यवस्था साइबर हमलों के प्रति पर्याप्त रूप से सुरक्षित है?

आज ई-रिक्शा केवल एक वाहन नहीं, बल्कि लाखों परिवारों की आजीविका का आधार है। इनमें से अनेक वाहन मोबाइल ऐप, क्लाउड सर्वर, जीपीएस, बैटरी प्रबंधन प्रणाली और दूरस्थ (रिमोट) सॉफ्टवेयर अपडेट जैसी तकनीकों पर निर्भर हैं। यदि इनमें किसी प्रकार की सुरक्षा कमजोरी हो, तो केवल एक वाहन ही नहीं, बल्कि हजारों वाहन एक साथ प्रभावित हो सकते हैं।

दुनिया में पहले भी ऐसे उदाहरण सामने आ चुके हैं, जब साइबर हमलों ने बिजली ग्रिड, तेल पाइपलाइन, अस्पताल, बंदरगाह, बैंकिंग सेवाओं और दूरसंचार नेटवर्क को प्रभावित किया। इससे स्पष्ट है कि आधुनिक युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि डिजिटल नेटवर्क के भीतर भी लड़े जा सकते हैं। ऐसे में यदि किसी देश के छोटे-छोटे डिजिटल तंत्रों की सुरक्षा कमजोर हो, तो वे बड़े हमलों के लिए आसान लक्ष्य बन सकते हैं।

हालांकि यह कहना कि ई-रिक्शाओं की घटनाएँ निश्चित रूप से किसी बड़े साइबर युद्ध की "रिहर्सल" हैं, अभी तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। लेकिन सुरक्षा विशेषज्ञ लंबे समय से यह चेतावनी देते रहे हैं कि हमलावर अक्सर पहले छोटे स्तर पर कमजोरियों की पहचान करते हैं, फिर बड़े और महत्वपूर्ण तंत्रों को निशाना बनाते हैं। इसलिए ऐसी हर घटना को गंभीरता से लेकर उसकी वैज्ञानिक और निष्पक्ष जांच आवश्यक है।

भारत में डिजिटल भुगतान, स्मार्ट मीटर, इंटरनेट से जुड़े वाहन, ड्रोन, स्मार्ट ट्रैफिक सिस्टम, रेलवे, मेट्रो, अस्पताल और सरकारी सेवाएँ तेजी से डिजिटल प्लेटफॉर्म पर निर्भर होती जा रही हैं। यह परिवर्तन सुविधाजनक और विकासोन्मुख है, लेकिन इसके साथ साइबर सुरक्षा की जिम्मेदारी भी कई गुना बढ़ जाती है। यदि किसी महत्वपूर्ण डिजिटल तंत्र में सेंध लगती है, तो उसका प्रभाव केवल तकनीकी नहीं बल्कि आर्थिक, सामाजिक और राष्ट्रीय सुरक्षा तक पहुँच सकता है।

इसलिए अब साइबर सुरक्षा को केवल आईटी विभाग का विषय मानना पर्याप्त नहीं है। वाहन निर्माता कंपनियों को अपने सॉफ्टवेयर का नियमित सुरक्षा परीक्षण करना चाहिए। रिमोट कंट्रोल और ऐप आधारित सुविधाओं में मजबूत एन्क्रिप्शन, बहु-स्तरीय प्रमाणीकरण और सुरक्षित अपडेट प्रणाली अनिवार्य होनी चाहिए। सरकार को भी इंटरनेट से जुड़े वाहनों और अन्य स्मार्ट उपकरणों के लिए स्पष्ट साइबर सुरक्षा मानक लागू करने चाहिए। साथ ही, संदिग्ध ऐप्स, विदेशी सर्वरों और आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) से जुड़े जोखिमों की सतत निगरानी आवश्यक है।

इसके अतिरिक्त, साइबर घटनाओं की त्वरित रिपोर्टिंग, डिजिटल फोरेंसिक जांच, स्वतंत्र सुरक्षा ऑडिट तथा नागरिकों और वाहन चालकों में साइबर जागरूकता बढ़ाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अक्सर छोटी-सी लापरवाही बड़े संकट का कारण बन जाती है।

डिजिटल भारत की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि हम सुविधाओं के साथ सुरक्षा को कितना महत्व देते हैं। तकनीक जितनी अधिक शक्तिशाली होगी, उसकी सुरक्षा उतनी ही मजबूत होनी चाहिए। ई-रिक्शाओं से जुड़ी हालिया घटनाएँ चाहे अंततः तकनीकी खराबी सिद्ध हों या साइबर हस्तक्षेप, उन्होंने एक महत्वपूर्ण चेतावनी अवश्य दी है—डिजिटल अवसंरचना की सुरक्षा अब राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता का अभिन्न अंग बन चुकी है।

घबराने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन सतर्क रहने की आवश्यकता अवश्य है। यही सतर्कता भविष्य के संभावित डिजिटल संकटों को टालने का सबसे प्रभावी उपाय सिद्ध हो सकती है।

ब्रजेश कानूनगो

Wednesday, 1 July 2026

अनोखे विरोध प्रदर्शन : जब प्रतीक बन जाते हैं सबसे प्रभावी भाषा

अनोखे विरोध प्रदर्शन : जब प्रतीक बन जाते हैं सबसे प्रभावी भाषा

छत्तीसगढ़ के जांजगीर में खराब सड़कों के विरोध का एक अनोखा दृश्य सामने आया। नागरिक सड़क के गड्ढों में भरे गंदे पानी में उतरकर नहाने लगे। उनका संदेश स्पष्ट था—यदि सड़कें तालाब बन चुकी हैं, तो प्रशासन को भी इस विडंबना का सामना करना चाहिए। यह प्रदर्शन न हिंसक था, न आक्रामक; फिर भी उसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया। यही प्रतीकात्मक विरोध की सबसे बड़ी शक्ति है।

लोकतंत्र में विरोध केवल नारे लगाने या ज्ञापन सौंपने तक सीमित नहीं रहता। जब लोगों को लगता है कि उनकी आवाज़ लगातार अनसुनी की जा रही है, तब वे ऐसे तरीके खोजते हैं जो व्यवस्था को झकझोर दें और समाज का ध्यान भी खींचें। ऐसे विरोध कभी व्यंग्य का सहारा लेते हैं, कभी कला का, कभी हास्य का और कभी किसी गहरे प्रतीक का।

भारत में प्रतीकात्मक विरोध की अनेक मिसालें मिलती हैं। कई शहरों में लोगों ने सड़क के गड्ढों में धान रोपकर यह बताया कि सड़कें खेत बन चुकी हैं। कहीं गड्ढों में मछली पकड़ने का नाटक किया गया, तो कहीं नाव चलाकर यह संदेश दिया गया कि बरसात में सड़क और तालाब का अंतर मिट गया है। किसानों ने कभी सड़कों पर दूध बहाकर, तो कभी सब्जियां मुफ्त बांटकर अपनी आर्थिक पीड़ा व्यक्त की। इन प्रदर्शनों का उद्देश्य नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि एक ऐसी तस्वीर बनाना था जिसे अनदेखा करना कठिन हो।

विश्व के अनेक देशों में भी ऐसे रचनात्मक विरोध लोकतांत्रिक संस्कृति का हिस्सा बन चुके हैं। दक्षिण कोरिया में लाखों नागरिक हाथों में मोमबत्तियां लेकर शांतिपूर्वक सड़कों पर उतरे। बिना हिंसा के हुए इन 'कैंडललाइट' प्रदर्शनों ने जनमत की शक्ति का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया, जिसने अंततः राजनीतिक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया।

ब्रिटेन में पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने सड़कों पर स्वयं को चिपकाकर, धीमी गति से मार्च निकालकर और सार्वजनिक स्थलों पर प्रदर्शन करके जलवायु संकट को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया। उनके तरीकों पर मतभेद रहे, लेकिन यह निर्विवाद है कि उन्होंने पर्यावरण पर चर्चा को नई ऊंचाई दी।

फ्रांस के किसानों ने ट्रैक्टरों के लंबे काफिलों से शहरों का रुख किया, सार्वजनिक भवनों के बाहर गोबर और मिट्टी डालकर अपनी नाराज़गी व्यक्त की। यह उनके लिए केवल विरोध नहीं था, बल्कि यह बताने का माध्यम था कि कृषि संकट को अब और अनदेखा नहीं किया जा सकता।

हांगकांग में लोकतंत्र समर्थक आंदोलन के दौरान साधारण छाता प्रतिरोध का वैश्विक प्रतीक बन गया। पुलिस की कार्रवाई से बचने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली छतरी देखते-देखते नागरिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रतीक बन गई।

चिली में महिलाओं ने सामूहिक गीत और नृत्य के माध्यम से महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के खिलाफ ऐसा सांस्कृतिक प्रतिरोध खड़ा किया, जिसकी गूंज दुनिया के अनेक देशों तक पहुंची। यह प्रदर्शन बताता है कि कला भी विरोध की प्रभावशाली भाषा हो सकती है।

हाल के वर्षों में सोशल मीडिया ने भी विरोध की प्रकृति बदल दी है। अब किसी प्रदर्शन की सफलता केवल उसमें शामिल लोगों की संख्या से नहीं, बल्कि उसके संदेश की प्रभावशीलता और दृश्यात्मकता से भी तय होने लगी है। एक अनोखी तस्वीर या छोटा-सा वीडियो कुछ ही घंटों में करोड़ों लोगों तक पहुंच सकता है। इसलिए आज विरोध प्रदर्शन अधिक प्रतीकात्मक, रचनात्मक और मीडिया-अनुकूल होते जा रहे हैं।

लेकिन इस प्रवृत्ति के साथ एक सावधानी भी जुड़ी है। केवल वायरल होना किसी आंदोलन की सफलता का प्रमाण नहीं हो सकता। यदि प्रदर्शन से आम नागरिकों को अनावश्यक कठिनाई हो, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचे या हिंसा फैलने लगे, तो उसका नैतिक आधार कमजोर पड़ जाता है। लोकतंत्र में सबसे प्रभावी विरोध वही है जो व्यवस्था पर प्रश्न उठाए, लेकिन समाज को नुकसान न पहुंचाए।

जांजगीर जैसे  विरोध प्रदर्शन इसी कारण उल्लेखनीय होते हैं। जो प्रशासन की लापरवाही को एक ऐसे दृश्य में बदल देते हैं जिसे शब्दों से कहीं अधिक प्रभावशाली ढंग से समझा जा सकता है। ऐसे प्रदर्शन हमें यह भी याद दिलाते हैं कि लोकतंत्र में नागरिक केवल मतदाता नहीं होते, बल्कि वे रचनात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से शासन को उसकी जिम्मेदारियों का स्मरण कराने वाले सक्रिय सहभागी भी होते हैं।

जब शिकायतें सुनाई नहीं देतीं, तब प्रतीक बोलने लगते हैं। और कई बार, इतिहास गवाह है कि ऐसे प्रतीक ही बड़े बदलावों की शुरुआत बन जाते हैं।

ब्रजेश कानूनगो