अनोखे विरोध प्रदर्शन : जब प्रतीक बन जाते हैं सबसे प्रभावी भाषा
छत्तीसगढ़ के जांजगीर में खराब सड़कों के विरोध का एक अनोखा दृश्य सामने आया। नागरिक सड़क के गड्ढों में भरे गंदे पानी में उतरकर नहाने लगे। उनका संदेश स्पष्ट था—यदि सड़कें तालाब बन चुकी हैं, तो प्रशासन को भी इस विडंबना का सामना करना चाहिए। यह प्रदर्शन न हिंसक था, न आक्रामक; फिर भी उसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया। यही प्रतीकात्मक विरोध की सबसे बड़ी शक्ति है।
लोकतंत्र में विरोध केवल नारे लगाने या ज्ञापन सौंपने तक सीमित नहीं रहता। जब लोगों को लगता है कि उनकी आवाज़ लगातार अनसुनी की जा रही है, तब वे ऐसे तरीके खोजते हैं जो व्यवस्था को झकझोर दें और समाज का ध्यान भी खींचें। ऐसे विरोध कभी व्यंग्य का सहारा लेते हैं, कभी कला का, कभी हास्य का और कभी किसी गहरे प्रतीक का।
भारत में प्रतीकात्मक विरोध की अनेक मिसालें मिलती हैं। कई शहरों में लोगों ने सड़क के गड्ढों में धान रोपकर यह बताया कि सड़कें खेत बन चुकी हैं। कहीं गड्ढों में मछली पकड़ने का नाटक किया गया, तो कहीं नाव चलाकर यह संदेश दिया गया कि बरसात में सड़क और तालाब का अंतर मिट गया है। किसानों ने कभी सड़कों पर दूध बहाकर, तो कभी सब्जियां मुफ्त बांटकर अपनी आर्थिक पीड़ा व्यक्त की। इन प्रदर्शनों का उद्देश्य नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि एक ऐसी तस्वीर बनाना था जिसे अनदेखा करना कठिन हो।
विश्व के अनेक देशों में भी ऐसे रचनात्मक विरोध लोकतांत्रिक संस्कृति का हिस्सा बन चुके हैं। दक्षिण कोरिया में लाखों नागरिक हाथों में मोमबत्तियां लेकर शांतिपूर्वक सड़कों पर उतरे। बिना हिंसा के हुए इन 'कैंडललाइट' प्रदर्शनों ने जनमत की शक्ति का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया, जिसने अंततः राजनीतिक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया।
ब्रिटेन में पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने सड़कों पर स्वयं को चिपकाकर, धीमी गति से मार्च निकालकर और सार्वजनिक स्थलों पर प्रदर्शन करके जलवायु संकट को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया। उनके तरीकों पर मतभेद रहे, लेकिन यह निर्विवाद है कि उन्होंने पर्यावरण पर चर्चा को नई ऊंचाई दी।
फ्रांस के किसानों ने ट्रैक्टरों के लंबे काफिलों से शहरों का रुख किया, सार्वजनिक भवनों के बाहर गोबर और मिट्टी डालकर अपनी नाराज़गी व्यक्त की। यह उनके लिए केवल विरोध नहीं था, बल्कि यह बताने का माध्यम था कि कृषि संकट को अब और अनदेखा नहीं किया जा सकता।
हांगकांग में लोकतंत्र समर्थक आंदोलन के दौरान साधारण छाता प्रतिरोध का वैश्विक प्रतीक बन गया। पुलिस की कार्रवाई से बचने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली छतरी देखते-देखते नागरिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रतीक बन गई।
चिली में महिलाओं ने सामूहिक गीत और नृत्य के माध्यम से महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के खिलाफ ऐसा सांस्कृतिक प्रतिरोध खड़ा किया, जिसकी गूंज दुनिया के अनेक देशों तक पहुंची। यह प्रदर्शन बताता है कि कला भी विरोध की प्रभावशाली भाषा हो सकती है।
हाल के वर्षों में सोशल मीडिया ने भी विरोध की प्रकृति बदल दी है। अब किसी प्रदर्शन की सफलता केवल उसमें शामिल लोगों की संख्या से नहीं, बल्कि उसके संदेश की प्रभावशीलता और दृश्यात्मकता से भी तय होने लगी है। एक अनोखी तस्वीर या छोटा-सा वीडियो कुछ ही घंटों में करोड़ों लोगों तक पहुंच सकता है। इसलिए आज विरोध प्रदर्शन अधिक प्रतीकात्मक, रचनात्मक और मीडिया-अनुकूल होते जा रहे हैं।
लेकिन इस प्रवृत्ति के साथ एक सावधानी भी जुड़ी है। केवल वायरल होना किसी आंदोलन की सफलता का प्रमाण नहीं हो सकता। यदि प्रदर्शन से आम नागरिकों को अनावश्यक कठिनाई हो, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचे या हिंसा फैलने लगे, तो उसका नैतिक आधार कमजोर पड़ जाता है। लोकतंत्र में सबसे प्रभावी विरोध वही है जो व्यवस्था पर प्रश्न उठाए, लेकिन समाज को नुकसान न पहुंचाए।
जांजगीर जैसे विरोध प्रदर्शन इसी कारण उल्लेखनीय होते हैं। जो प्रशासन की लापरवाही को एक ऐसे दृश्य में बदल देते हैं जिसे शब्दों से कहीं अधिक प्रभावशाली ढंग से समझा जा सकता है। ऐसे प्रदर्शन हमें यह भी याद दिलाते हैं कि लोकतंत्र में नागरिक केवल मतदाता नहीं होते, बल्कि वे रचनात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से शासन को उसकी जिम्मेदारियों का स्मरण कराने वाले सक्रिय सहभागी भी होते हैं।
जब शिकायतें सुनाई नहीं देतीं, तब प्रतीक बोलने लगते हैं। और कई बार, इतिहास गवाह है कि ऐसे प्रतीक ही बड़े बदलावों की शुरुआत बन जाते हैं।
ब्रजेश कानूनगो
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