Wednesday, 24 June 2026

क्या युवाओं में लक्जरी जीवन का आकर्षण कम हो रहा है ?

क्या युवाओं में लक्जरी जीवन का आकर्षण कम हो रहा है ?

समाज में प्रत्येक पीढ़ी अपनी जीवन-शैली और प्राथमिकताओं के आधार पर पहचानी जाती है। एक समय था जब युवाओं के लिए सफलता का अर्थ महंगी कार, बड़ा घर, ब्रांडेड वस्त्र और भौतिक सुख-सुविधाओं का अधिकाधिक संग्रह माना जाता था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में भारतीय युवाओं के एक बड़े वर्ग में एक नया रुझान दिखाई दे रहा है। अब अनेक युवा महंगे सामान खरीदने की अपेक्षा यात्रा, घुमक्कड़ी, साहसिक गतिविधियों, नए अनुभवों और आत्मविकास पर अधिक खर्च करना पसंद कर रहे हैं। इससे यह प्रश्न उठता है कि क्या वास्तव में भारतीय युवाओं में लक्जरी जीवन और ऐशोआराम के प्रति मोह कम हो रहा है?

डिजिटल युग ने युवाओं के सामने पूरी दुनिया खोल दी है। सोशल मीडिया, यात्रा ब्लॉग, वीडियो प्लेटफॉर्म और वैश्विक संपर्कों ने उन्हें यह समझने का अवसर दिया है कि जीवन का आनंद केवल वस्तुओं के संग्रह में नहीं, बल्कि विविध अनुभवों में भी निहित है। यही कारण है कि अनेक युवा नई जगहों पर जाना, स्थानीय संस्कृतियों को समझना, ट्रेकिंग करना, वन्य जीवन देखना, स्वयंसेवी गतिविधियों में भाग लेना या नई कलाएँ सीखना अधिक पसंद कर रहे हैं।

उनके लिए अब किसी महंगे मोबाइल या कार से अधिक महत्व उस यात्रा का हो सकता है जो उन्हें नए लोगों और नए विचारों से परिचित कराए। इस सोच को अक्सर अनुभव आधारित अर्थव्यवस्था कहा जाता है।

ऐसे में पर्यटन और घुमक्कड़ी का आकर्षण भी बढ़ता गया है। भारत में घरेलू पर्यटन का तेजी से विस्तार हुआ है। सप्ताहांत यात्राएँ, बैकपैकिंग, बाइक ट्रिप, सोलो ट्रैवल और डिजिटल नोमैड जीवनशैली जैसी अवधारणाएँ युवाओं के बीच लोकप्रिय हुई हैं। अनेक युवा अपने वेतन का एक हिस्सा नियमित रूप से यात्रा के लिए बचाकर रखते हैं।

कोविड-19 महामारी के बाद भी लोगों में प्रकृति के निकट जाने, कम भीड़ वाले स्थानों को देखने और जीवन को अधिक अर्थपूर्ण बनाने की इच्छा बढ़ी है। पहाड़, जंगल, समुद्र तट और ऐतिहासिक स्थल युवाओं को केवल मनोरंजन ही नहीं, बल्कि मानसिक ताजगी और आत्मअनुभूति भी प्रदान करते हैं।

आज का युवा अपने माता-पिता की पीढ़ी से कुछ अलग आर्थिक परिस्थितियों में जी रहा है। महानगरों में बढ़ती संपत्ति कीमतें, नौकरी की अनिश्चितता और बदलती अर्थव्यवस्था ने युवाओं को यह सोचने पर मजबूर किया है कि केवल भौतिक संपत्ति जुटाना ही जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं हो सकता।

कई युवा न्यूनतम वस्तुओं के साथ संतुलित जीवन की अवधारणा को अपनाने लगे हैं। वे अनावश्यक वस्तुओं पर खर्च करने के बजाय स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल विकास और अनुभवों में निवेश को अधिक उपयोगी मानते हैं। तो क्या यह मान लिया जाए कि वास्तव में लक्जरी का आकर्षण समाप्त हो रहा है?

हालाँकि यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि युवाओं का लक्जरी जीवन के प्रति आकर्षण समाप्त हो गया है। वस्तुतः लक्जरी की परिभाषा बदल रही है। पहले जहाँ लक्जरी का अर्थ महंगे उत्पादों का स्वामित्व था, वहीं अब अनेक युवाओं के लिए लक्जरी का अर्थ समय की स्वतंत्रता, मानसिक शांति, यात्रा करने की क्षमता और मनपसंद कार्य करने का अवसर बन गया है।

इसके साथ ही सोशल मीडिया पर दिखने वाली भव्य जीवनशैली, ब्रांडेड उत्पादों और लग्जरी पर्यटन का आकर्षण भी बना हुआ है। उच्च आय वर्ग के युवाओं में महंगे गैजेट, प्रीमियम वाहन, फैशन और लक्जरी अनुभवों की मांग अभी भी मौजूद है। इसलिए यह परिवर्तन सभी युवाओं पर समान रूप से लागू नहीं होता। युवाओं का एक बहुत बड़ा वर्ग आज भी अपनी बुनियादी जरूरतों की जद्दोजहद में परेशानियों से घिरा हुआ है।

सोशल मीडिया ने इस बदलाव को युवा वर्ग को मोहित भी दिया है और चुनौती भी दी है। एक ओर यह युवाओं को नए स्थानों, संस्कृतियों और अनुभवों के बारे में प्रेरित करता है, वहीं दूसरी ओर दिखावे और तुलना की संस्कृति को भी बढ़ाता है। कई बार यात्रा भी अनुभव प्राप्त करने के बजाय सोशल मीडिया पर आकर्षक तस्वीरें साझा करने का माध्यम बन जाती है। इसलिए यह समझना आवश्यक है कि अनुभवों की खोज और दिखावे की प्रवृत्ति के बीच एक सूक्ष्म अंतर है।

यदि युवा अनुभव आधारित जीवनशैली की ओर बढ़ते हैं तो पर्यटन, आतिथ्य, स्थानीय हस्तशिल्प, साहसिक खेल और सांस्कृतिक उद्योगों को लाभ मिल सकता है। इससे छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर भी उत्पन्न हो सकते हैं।

भारतीय युवाओं में लक्जरी जीवन के प्रति आकर्षण पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है, लेकिन उनकी प्राथमिकताओं में निश्चित रूप से बदलाव दिखाई दे रहा है। भौतिक वस्तुओं के संग्रह की तुलना में अनुभव, यात्रा, आत्मविकास, मानसिक स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता को अधिक महत्व मिलने लगा है। यह परिवर्तन आधुनिक जीवन की नई समझ को दर्शाता है, जहाँ सफलता केवल संपत्ति के आकार से नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों की समृद्धि से भी मापी जा रही है।

फिर भी संतुलन आवश्यक है। न तो भौतिक उपलब्धियों को पूरी तरह नकारा जा सकता है और न ही केवल अनुभवों को जीवन का एकमात्र लक्ष्य माना जा सकता है। आदर्श स्थिति वही है जहाँ युवा आर्थिक जिम्मेदारियों का निर्वाह करते हुए नए अनुभवों, सीखने और जीवन के आनंद के लिए भी पर्याप्त स्थान बना सकें।


ब्रजेश कानूनगो 


Friday, 19 June 2026

पैदल चलने का अधिकार : क्या हमारे शहर कभी पैदल यात्रियों के भी होंगे?

पैदल चलने का अधिकार : क्या हमारे शहर कभी पैदल यात्रियों के भी होंगे?

किसी भी सभ्य समाज की पहचान केवल उसकी चौड़ी सड़कों, फ्लाईओवरों और तेज रफ्तार वाहनों से नहीं होती, बल्कि इस बात से भी होती है कि वहां एक सामान्य नागरिक कितनी सुरक्षित और सम्मानजनक ढंग से पैदल चल सकता है। भारत में वर्षों से विकास का अर्थ मोटर वाहनों के लिए अधिक से अधिक जगह बनाना माना गया है, जबकि पैदल चलने वाले नागरिकों को अक्सर योजना निर्माण के केंद्र से बाहर रखा गया है। ऐसे समय में सर्वोच्च न्यायालय का यह कहना कि पैदल चलना नागरिक का मौलिक अधिकार है और हर सड़क के साथ सुरक्षित फुटपाथ होना चाहिए, एक ऐतिहासिक और दूरगामी महत्व का निर्णय है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सुरक्षित फुटपाथ पर चलने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(1)(d) में निहित आवागमन की स्वतंत्रता तथा अनुच्छेद 21 में वर्णित जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से जुड़ा हुआ है। न्यायालय ने यह भी कहा कि पैदल यात्रियों का अधिकार मोटर वाहनों की सुविधा से कम महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि कई परिस्थितियों में उसे प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

यह दृष्टिकोण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में लाखों लोग प्रतिदिन पैदल चलकर विद्यालय, बाजार, कार्यालय, बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन तक पहुंचते हैं। गरीब, बुजुर्ग, दिव्यांग, महिलाएं और बच्चे सबसे अधिक पैदल यात्री होते हैं, लेकिन शहरी योजनाओं में उनकी आवश्यकताएं अक्सर उपेक्षित रह जाती हैं।

देश के अधिकांश शहरों में फुटपाथ या तो हैं ही नहीं, और यदि हैं तो वे अधूरे, टूटे-फूटे अथवा अतिक्रमण से घिरे हुए मिलते हैं। कहीं उन पर दुकानों का कब्जा है, कहीं वाहन पार्क किए जाते हैं, तो कहीं बिजली के ट्रांसफार्मर, पोल या अन्य निर्माण सामग्री रख दी जाती है। परिणामस्वरूप पैदल यात्रियों को सड़क पर उतरना पड़ता है और दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है। विभिन्न न्यायिक टिप्पणियों में भी कहा गया है कि फुटपाथों का अतिक्रमण हटाना तथा उन्हें आम नागरिक और  दिव्यांगजन-अनुकूल बनाना प्रशासन की जिम्मेदारी है।

वास्तव में भारत में सड़क दुर्घटनाओं में पैदल यात्रियों की हिस्सेदारी चिंताजनक है। अनेक नगरों में सड़कें वाहन-केंद्रित बनती गईं, जबकि पैदल चलने वालों के लिए सुरक्षित स्थान सिकुड़ता गया। सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों को बार-बार इस विषय में हस्तक्षेप करना पड़ा है।

दुनिया के अन्य देशों की बात करें तो नीदरलैंड में सड़क डिजाइन का मूल सिद्धांत है कि सबसे पहले पैदल यात्री, फिर साइकिल चालक और उसके बाद मोटर वाहन। शहरों में चौड़े, निरंतर और बाधारहित फुटपाथ अनिवार्य माने जाते हैं। स्कूलों और आवासीय क्षेत्रों में वाहनों की गति सीमित रखी जाती है। जापान में पैदल यात्रियों की सुरक्षा को अत्यधिक महत्व दिया जाता है। रेलवे स्टेशनों, बाजारों और आवासीय क्षेत्रों में पैदल मार्गों का सुव्यवस्थित नेटवर्क है। अतिक्रमण के प्रति प्रशासन लगभग शून्य सहनशीलता की नीति अपनाता है।

सिंगापुर ने "वॉकएबल सिटी" की अवधारणा विकसित की है। वहां फुटपाथ केवल सड़क के किनारे की पट्टी नहीं, बल्कि सार्वजनिक परिवहन से जुड़े एकीकृत नेटवर्क का हिस्सा हैं। बुजुर्गों और दिव्यांगजनों की सुविधा के लिए रैंप, टैक्टाइल पथ और सुरक्षित क्रॉसिंग अनिवार्य हैं। ब्रिटेन में स्थानीय निकायों पर यह कानूनी दायित्व है कि वे सार्वजनिक मार्गों को सुरक्षित और सुगम बनाए रखें। फुटपाथों पर अवैध पार्किंग और अवरोधों पर भारी जुर्माना लगाया जाता है। ऑस्ट्रेलिया और कनाडा में सड़क निर्माण परियोजनाओं के अनुमोदन से पहले पैदल यात्री प्रभाव मूल्यांकन (Pedestrian Impact Assessment) किया जाता है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि विकास कार्यों से पैदल चलने वालों की सुविधा प्रभावित न हो।

यदि इन देशों के उदाहरण से सबक लें तो भारत में भी कुछ कदम उठाए जा सकते हैं मसलन फुटपाथ अधिकार कानून बनाया जाए, जिसमें प्रत्येक सड़क पर न्यूनतम चौड़ाई के फुटपाथ का प्रावधान हो। अतिक्रमण और अवैध पार्किंग के विरुद्ध नियमित अभियान चलाए जाएं। दिव्यांगजन-अनुकूल डिजाइन को अनिवार्य बनाया जाए।नई सड़क परियोजनाओं में पैदल यात्री सुरक्षा ऑडिट आवश्यक हो। स्कूलों, अस्पतालों और बाजारों के आसपास पैदल प्राथमिकता क्षेत्र (Pedestrian Priority Zones) विकसित किए जाएं। नगर निगमों की जवाबदेही तय हो कि फुटपाथ टूटने, गायब होने या अतिक्रमित होने पर समयबद्ध कार्रवाई करें। शहरी परिवहन नीति में "कार-केंद्रित" सोच के स्थान पर "मानव-केंद्रित" दृष्टिकोण अपनाया जाए।

वस्तुतः पैदल चलना केवल एक गतिविधि नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक समानता का प्रतीक है। जो व्यक्ति कार नहीं खरीद सकता, वह भी उतना ही सम्मान और सुरक्षा का अधिकारी है जितना किसी महंगी गाड़ी में चलने वाला नागरिक। यदि फुटपाथ सुरक्षित, स्वच्छ और अवरोधमुक्त होंगे तो सड़क दुर्घटनाएं कम होंगी, प्रदूषण घटेगा, स्वास्थ्य सुधरेगा और शहर अधिक मानवीय बनेंगे। शहर केवल वाहनों के लिए नहीं बनाए जाते; वे मनुष्यों के लिए बनाए जाते हैं। जब तक भारत के शहरों में एक बच्चा, एक बुजुर्ग, एक महिला और एक दिव्यांग व्यक्ति निश्चिंत होकर पैदल नहीं चल सकता, तब तक हमारा शहरी विकास अधूरा माना जाएगा।

ब्रजेश कानूनगो


Tuesday, 16 June 2026

श्रम की मृत्यु और चेतना के पुनर्जन्म का नया समय दस्तक दे रहा है!

श्रम की मृत्यु और चेतना के पुनर्जन्म का नया समय दस्तक दे रहा है!

​यह मानव इतिहास का सबसे अनूठा विरोधाभास है—जिस 'श्रम' से मुक्ति पाने के लिए मनुष्य ने सदियों तक तकनीक का विकास किया, आज जब वह मुक्ति सामने खड़ी है, तो मनुष्य भयभीत है। जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), रोबोट और स्वचालित मशीनें हमारे सारे उत्पादक, प्रशासनिक और तार्किक काम संभाल लेंगे, तब यह सवाल उठना लाजिमी है कि यदि जीवन में कुछ 'करना' ही नहीं बचेगा, तो मनुष्य होने का अर्थ क्या रह जाएगा? क्या हम एक अंतहीन ऊब (Existential Boredom) के दलदल में धंस जाएंगे, या यह युग मानव चेतना के एक नए, अधिक समृद्ध अध्याय की शुरुआत करेगा? 

​औद्योगिक क्रांति के बाद से मनुष्य की पहचान उसके काम से जुड़ गई—"आप क्या करते हैं?" ही यह तय करता है कि "आप कौन हैं।" जब मशीनें इस काम को छीन लेंगी, तो शुरुआत में एक गहरा शून्य और असंतोष पैदा होगा, क्योंकि हमने 'सफलता' और 'संतोष' को केवल उत्पादकता (Productivity) से जोड़ना सीख लिया है।

भविष्य में संभावित इस ऊब से निपटने के लिए मनुष्य को अपनी परिभाषा बदलनी होगी। जब 'पेट भरने का संघर्ष' समाप्त हो जाएगा, तब काम 'मजबूरी' न रहकर 'आत्म-अभिव्यक्ति' (Self-expression) का माध्यम बनेगा। ऐसा लगता है तब हमारे जीवन में ​कला की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाएगी।फाइन आर्ट (चित्रकला, मूर्तिकला) जैसी प्रक्रियाएं मनुष्य को उत्पादकता के इस नए संकट से बचाएंगी। जब एक चित्रकार कैनवास पर रंग बिखेरता है, तो वह किसी बाजार के लिए नहीं, बल्कि अपने भीतर के कोलाहल को शांत करने के लिए करता है। कला मनुष्य को 'उपभोक्ता' से वापस 'स्रष्टा' (Creator) बनाएगी। हमारे पूर्वजों की चट्टानों, पहाड़ों, शिलाओं को तराश कर बनाए मंदिरों, मूर्तियों में उस शिल्प कला के बारे में विचार करिए, कितने लंबे समय तक तत्कालीन मनुष्य इन कलाओं में अपने एकांत को सुख से भर देने का सफल प्रयास करता रहा होगा।

​मशीनी युग में सबसे बड़ा खतरा शारीरिक और मानसिक जड़ता का होगा। जब उंगलियां केवल स्क्रीन छुएंगी और रोबोट सारा शारीरिक श्रम कर देंगे, तब मनुष्य अपने ही शरीर से कटने लगेगा। यहीं पर हमारी आदिम कलाएं—विशेषकर मार्शल आर्ट और परफॉर्मेंस आर्ट (नृत्य, थिएटर)—एक सुरक्षा कवच की तरह उभरेंगी। कलारीपयट्टू, कुंग-फू या कराटे जैसी विधाएं केवल आत्मरक्षा के साधन नहीं हैं; ये मन और शरीर के गहरे अनुशासन की यात्रा हैं। मशीनों के दौर में, जब पसीना बहाने की कोई व्यावहारिक जरूरत नहीं होगी, तब मार्शल आर्ट और योगाभ्यास  मनुष्य को उसकी शारीरिक सीमाओं, ताकत और आदिम प्रवृत्तियों से जोड़े रखेगा। यह उस 'अनचाही ऊब' को तोड़ने का सबसे प्रखर तरीका होगा।

डिजिटल और आभासी (Virtual) दुनिया के चरम पर होने के कारण लोग इंसानी स्पर्श और उपस्थिति के लिए तरसेंगे। थिएटर, लाइव म्यूजिक या नृत्य जैसी कलाएं 'उसी क्षण' (In the moment) जीने का अहसास कराती हैं। मशीनों के पास भूतकाल का डेटा है और भविष्य का प्रेडिक्शन, लेकिन 'वर्तमान क्षण' का जो उत्सव परफॉर्मेंस आर्ट में है, वह केवल मनुष्य ही महसूस और साझा कर सकता है।

​हो सकता है एआई  हर काम को परफेक्ट (त्रुटिहीन) तरीके से करने में सक्षम हो। वह एक आदर्श राग गा सकता है, बिना किसी व्याकरण की गलती के कहानी लिख सकता है और सटीक ज्यामितीय चित्र बना सकता है। लेकिन कला का सौंदर्य अक्सर उसकी 'कमियों' (Imperfections) में होता है। हाथ से बुने हुए कपड़े की असमान बुनावट में, या मिट्टी के घड़े पर कुम्हार की उंगलियों के टेढ़े-मेढ़े निशानों में जो मानवीय स्पर्श होता है, वह मशीन की गणितीय सटीकता में कभी नहीं मिल सकता।

भविष्य में, 'हैंडमेड' (Handmade) और 'ह्यूमन-मेड' (Human-made) दुनिया के सबसे महंगे लक्ज़री ब्रांड बन जाएंगे। लोग मशीन के बनाए परफेक्ट संगीत के बजाय किसी इंसान की कांपती हुई, लेकिन भावनाओं से भरी आवाज सुनना पसंद करेंगे। यह कमियों का उत्सव ही मनुष्य को संतोष देगा। इतिहास गवाह है कि जब-जब मनुष्य अत्यधिक खाली समय से घिरा है, समाज में अवसाद या अराजकता बढ़ी है। यदि एआई युग में आदिम कलाओं को संस्थागत रूप से नहीं अपनाया गया, तो शायद मनुष्य आत्मघाती ऊब का शिकार भी हो सकता है।

इन सब संभावनाओं, आशंकाओं के चलते हमें अभी से जीवन में कला को केवल 'शौक' नहीं, बल्कि 'जीवन पद्धति' (Lifestyle) बनाना होगा। पुराने समय में कबीलों के अपने नृत्य होते थे, त्योहार होते थे और मार्शल आर्ट के अखाड़े, योग केंद्र होते थे, जो समाज को आपस में जोड़ते थे।​भविष्य के समाज में ये आदिम प्रक्रियाएं नए 'अनुष्ठान' (Rituals) बनेंगी। लोग शाम को कम्युनिटी सेंटर्स में इकट्ठा होंगे—कोई मिट्टी को आकार दे रहा होगा, कोई तलवारबाजी सीख रहा होगा, तो कोई मंच पर कविता पाठ कर रहा होगा। यह साझा रचनात्मकता मनुष्यों को अकेलेपन और ऊब के अवसाद से बचाएगी।

​कृत्रिम बुद्धिमता और रोबोटिक्स का आना मानव श्रम का अंत जरूर है, लेकिन यह मानवीय संवेदनाओं का अंत नहीं है। बल्कि, यह पहली बार मनुष्य को इस योग्य बनाएगा कि वह 'मशीन की तरह काम करना' बंद करे और 'मनुष्य की तरह जीना' शुरू करे।

​जब पेट भरने और उत्तरजीविता (Survival) का संघर्ष मशीनें संभाल लेंगी, तब मनुष्य अपनी चेतना के उच्चतम शिखर की ओर बढ़ सकेगा। फाइन आर्ट, परफॉर्मेंस आर्ट और मार्शल आर्ट जैसी आदिम विधाएं मनोरंजन के साधन मात्र नहीं रहेंगी; वे उस युग में मनुष्य के 'मनुष्य बने रहने' की अनिवार्य शर्तें बन जाएंगी। तकनीक हमें सुविधा देगी, लेकिन संतोष और खुशी केवल हमारी आदिम रचनात्मकता ही दे पाएगी।


ब्रजेश कानूनगो

Friday, 12 June 2026

वर्दी की आड़ में डकैती: नकली पुलिस का बढ़ता खतरा

 वर्दी की आड़ में डकैती: नकली पुलिस का बढ़ता खतरा

इंदौर के पंढरीनाथ क्षेत्र में गत दिनों रात घिरने के पहले करीब साढ़े आठ बजे ही अपराधियों ने युवक के पास से 30 लाख रुपयों से भरा बैग पुलिस के भेष में सरेराह लूट लिया। इसके पहले भी कई बुजुर्ग महिलाओं को फुसलाकर गहने उतरवाने की घटनाएं भी यहां वहां होती ही रहती हैं।

​आज के दौर में अपराध के तौर-तरीके तेजी से बदल रहे हैं। अब अपराधी केवल हथियारों के बल पर ही नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक दबाव बनाकर भी लोगों को अपना शिकार बना रहे हैं। इनमें से सबसे चिंताजनक और हैरान करने वाला तरीका है—नकली पुलिस बनकर राहगीरों को लूटना। कानून के रखवाले और सुरक्षा के प्रतीक 'वर्दी' का इस्तेमाल जब अपराधी अपनी ढाल के रूप में करने लगें, तो यह न केवल आम जनता की सुरक्षा बल्कि पुलिस प्रशासन की साख पर भी एक बड़ा प्रहार है।

​नकली पुलिस बनकर लूटपाट करने वाले गिरोह आमतौर पर बेहद शातिर और सधे हुए होते हैं। वे अक्सर सुनसान सड़कों, हाईवे या सुबह-शाम टहलने वाले बुजुर्गों और महिलाओं को निशाना बनाते हैं। उनके काम करने का तरीका भी कुछ ऐसा होता है कि सामने वाला व्यक्ति भ्रम में पड़ जाता है। ​चेकिंग के बहाने अपराधी खाकी वर्दी या सादे कपड़ों में कई बार खुद को क्राइम ब्रांच या विशेष अधिकारी बताकर आते हैं और राहगीरों को रोकते हैं। दस्तावेजों की जांच के लिए वाहनों को रोककर लाइसेंस या कागजात मांगने के बहाने डराना और फिर चालान या गिरफ्तारी का खौफ दिखाकर पैसे ऐंठ लेते हैं।

कई बार ​भय का माहौल बनाने के लिए मनोवैज्ञानिक तरीका अपनाते हैं। पीड़ित से कहते हैं कि "आगे मर्डर हुआ है" या "आगे चेकिंग चल रही है, आपके गहने और नकदी सुरक्षित नहीं हैं।" कई उदाहरण हैं ऐसे प्रकरणों के जब  वे पीड़ित को अपने गहने या पैसे उतारकर एक रुमाल या लिफाफे में रखने को कहते हैं। मदद करने के बहाने वे खुद ही सामान पैक करते हैं और पलक झपकते ही उसे नकली सामान या पत्थरों से बदल देते हैं।

​इस तरह के अपराधों के लगातार बढ़ने के पीछे कई सामाजिक और प्रशासनिक कारण होते हैं। भारतीय समाज में पुलिस की वर्दी का एक रसूख है। आम नागरिक अक्सर पुलिस से बहस करने से बचते हैं और उनके आदेशों का बिना सवाल किए पालन करते हैं। अपराधी इसी मानसिक स्थिति का फायदा उठाते हैं। पुलिस की वर्दी, बेल्ट, कैप और यहां तक कि नकली आईडी कार्ड और वॉकी-टॉकी जैसी चीजें भी आसानी से तैयार कर ली जाती हैं। कुछ हूबहू नकली वस्तुएं बाजार में भी उपलब्ध हो जाती हैं। इसके लिए कोई सख्त वेरिफिकेशन सिस्टम न होना अपराधियों का काम आसान कर देता है। अधिकांश लोगों को यह नहीं पता होता कि असली पुलिस अधिकारी के पास क्या अधिकार हैं और वे चेकिंग के दौरान किस प्रक्रिया का पालन करने के लिए बाध्य हैं। अपराधी जानते हैं कि बुजुर्ग या अकेले चल रहे लोग आसानी से डर जाते हैं और शारीरिक रूप से विरोध नहीं कर पाते।

​लूटपाट की इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए समाज और प्रशासन दोनों को मिलकर प्रयास करने होंगे। प्रशासनिक स्तर पर ​वर्दी की बिक्री पर कड़ा नियंत्रण होना जरूरी होगा।पुलिस की वर्दी और लोगो (Logo) बेचने वाली दुकानों का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन होना चाहिए। बिना वैध आईडी कार्ड के किसी को भी वर्दी न बेची जाए। पुलिस गश्त (Patrolling) में तेजी के  लिए पुलिस को अपने-अपने क्षेत्रों में, विशेषकर सुबह और देर शाम के समय गश्त बढ़ानी चाहिए ताकि अपराधी सक्रिय न हो सकें। स्थानीय मुखबीर प्रणाली को बढ़ावा दिया जाना आवश्यक है। हेल्पलाइन नंबरों पर आने वाली ऐसी शिकायतों पर पुलिस को तुरंत एक्शन लेना चाहिए ताकि गिरोह को रंगे हाथों पकड़ा जा सके।

नागरिक को खुद भी अपने को सचेत और सावधान बनाना होगा। यदि रास्ते में कोई खुद को पुलिसकर्मी बताकर रोकता है, तो घबराने के बजाय उनसे पहले आईडी कार्ड (ID Card) की मांग की जाए। हर पुलिसकर्मी का यह कर्तव्य है कि वह मांगने पर अपनी पहचान दिखाए। अगर कोई खुद को 'क्राइम ब्रांच' का बताता है, तो तुरंत उसका आधिकारिक पहचान पत्र मांगें। गहने उतारने की बात पर तुरंत सतर्क हो जाएं  असली पुलिस कभी भी आपको सुरक्षा का हवाला देकर सड़क पर गहने उतारकर रुमाल में रखने को नहीं कहेगी। अगर कोई ऐसा कहता है, तो समझ जाएं कि वे ठग हैं। यदि कोई संदिग्ध व्यक्ति आपको सुनसान जगह पर रोकने का प्रयास करे, तो गाड़ी न रोकें। वाहन को किसी पेट्रोल पंप, मार्केट या भीड़भाड़ वाले इलाके में ले जाकर ही रोकें। संदिग्ध पुलिसकर्मियों की गाड़ी का नंबर, उनका हुलिया और बातचीत के लहजे पर ध्यान दें। असली पुलिसकर्मी आमतौर पर सरकारी या विशेष नंबर प्लेट वाले वाहनों का उपयोग करते हैं। अगर शक हो, तो तुरंत 112 (या स्थानीय पुलिस हेल्पलाइन) पर कॉल करके पूछें कि क्या उस इलाके में कोई आधिकारिक चेकिंग चल रही है। अपने मोबाइल को अपने नियंत्रण और सुरक्षा में मजबूती से रखें। इंदौर की घटना में अपराधियों ने सबसे पहले पीड़ित का मोबाइल फोन बंद कर दिया था।​

​नकली पुलिस बनकर लूटने की घटनाएं केवल एक आर्थिक अपराध नहीं हैं, बल्कि यह आम जनता के मन में कानून व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा करती हैं। सतर्कता ही इसका सबसे बड़ा बचाव है। जब नागरिक अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होंगे और बिना डरे सवाल पूछने की हिम्मत रखेंगे, तो ऐसे अपराधियों के हौसले पस्त होना निश्चित है। 'डरें नहीं, सतर्क रहें'—यही इस अपराध पर लगाम लगाने का सबसे अचूक मंत्र है।


ब्रजेश कानूनगो 


सोशल मीडिया पर बच्चे : बचपन को बचाने की वैश्विक छटपटाहट

सोशल मीडिया पर बच्चे : बचपन को बचाने की वैश्विक छटपटाहट

डिजिटल युग में सोशल मीडिया बच्चों और किशोरों के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। मनोरंजन, शिक्षा, मित्रता और अभिव्यक्ति के अवसर देने वाला यही माध्यम अब मानसिक स्वास्थ्य, साइबर बुलिंग, अश्लील सामग्री, फर्जी सूचनाओं और डिजिटल लत जैसी समस्याओं का कारण भी माना जा रहा है।

​एक दौर था जब बच्चों की सुबह खेल के मैदानों, तितलियों के पीछे भागने और दोस्तों के साथ शरारतों से शुरू होती थी। लेकिन आज की सुबह 'स्क्रॉलिंग', 'लाइक', 'शेयर' और 'रील्स' के अंतहीन चक्रव्यूह में सिमट कर रह गई है। सोशल मीडिया, जो कभी दूरियों को पाटने का माध्यम बनकर उभरा था, आज बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक विकास और मासूमियत के लिए एक गंभीर संकट बन चुका है। हाल ही में ब्रिटेन द्वारा 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूर्ण या आंशिक प्रतिबंध लगाने के विचार ने इस वैश्विक चिंता को एक नई दिशा दी है। यह केवल एक प्रशासनिक कदम नहीं है, बल्कि यह इस बात का स्वीकार है कि डिजिटल दुनिया के अनियंत्रित प्रसार से बच्चों को बचाना अब अनिवार्य हो चुका है।

​सिर्फ ब्रिटेन ही नहीं, बल्कि दुनिया के तमाम विकसित और विकासशील देश इस 'डिजिटल महामारी' से अपने नौनिहालों को बचाने के लिए कड़े कानून बना रहे हैं। वैश्विक स्तर पर उठाए गए कुछ सबसे कड़े कदमों पर एक नज़र डालना महत्वपूर्ण होगा। 

उपलब्ध जानकारी के अनुसार ​ऑस्ट्रेलिया इस मामले में सबसे आगे रहा है। उसने दिसंबर 2025 से 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए टिकटॉक, इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब जैसे प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पूर्ण प्रतिबंध  लागू कर दिया। इस कानून की खास बात यह है कि इसमें माता-पिता की सहमति की भी कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी गई है। नियमों का उल्लंघन करने वाली कंपनियों पर 4.95 करोड़ ऑस्ट्रेलियाई डॉलर (लगभग 33 मिलियन अमरीकी डॉलर) तक के भारी जुर्माने का प्रावधान है।

​​पश्चिमी देशों की राह पर चलते हुए एशियाई देशों ने भी इस दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाए हैं। मार्च 2026 से इंडोनेशिया ने यूट्यूब, फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे 'हाई रिस्क' प्लेटफॉर्म्स पर 16 साल से कम उम्र के बच्चों के अकाउंट्स को ब्लॉक/निष्क्रिय करना शुरू कर दिया है। मलेशिया ने जून 2026 से उन सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए प्रतिबंध लागू कर दिया है, जिनके पास 80 लाख से अधिक यूजर्स हैं।

यूरोपीय संघ (EU): यूरोपीय संसद ने सोशल मीडिया के लिए न्यूनतम आयु 16 वर्ष तय करने का प्रस्ताव पारित किया है, जिसमें 13 से 15 वर्ष के बच्चों को केवल माता-पिता की सहमति से ही सीमित पहुंच की अनुमति होगी। इसके अलावा 'इन्फिनिट स्क्रॉलिंग' (अनंत रील्स देखना) और ऑटो-प्ले पर भी रोक लगाने की तैयारी है।

फ्रांस में 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन का कानून प्रक्रिया में है। वहीं डेनमार्क ने 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए प्रतिबंध लागू किया है, हालांकि 13 वर्ष से ऊपर के बच्चों के लिए माता-पिता की विशेष अनुमति का प्रावधान है। ब्राजील ने 'डिजिटल ईसीए' कानून के तहत सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेम्स में बच्चों के लिए सख्त 'एज वेरिफिकेशन' (आयु सत्यापन) और फेशियल स्कैन अनिवार्य कर दिया है।

चीन ने सोशल मीडिया पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने के बजाय 'यूथ मोड' लागू किया है। इसके तहत 18 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए रात में स्क्रीन टाइम सीमित कर दिया गया है और वे एक निश्चित समय से अधिक सोशल मीडिया या गेमिंग ऐप्स का उपयोग नहीं कर सकते। साथ ही वहां की सरकार कड़े कंटेंट सेंसरशिप के जरिए बच्चों को नकारात्मक सामग्री से दूर रखती है।

​सोशल मीडिया के खिलाफ सरकारों का यह सख्त रवैया बेवजह नहीं है। इसके पीछे गहरे मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारण हैं। जैसे  अत्यधिक सोशल मीडिया के उपयोग से बच्चों में अवसाद , एंग्जायटी, और हीनभावना तेजी से बढ़ रही है। टेक कंपनियों के 'रील्स' और 'शॉर्ट्स' के एल्गोरिदम इस तरह डिजाइन किए गए हैं जो बच्चों के दिमाग में डोपामाइन रिलीज करते हैं, जिससे उन्हें स्क्रीन की लत  लग जाती है। कम उम्र के बच्चे ऑनलाइन प्रेडेटर्स (शिकारियों) और अनुचित या हिंसक सामग्री के प्रति बेहद संवेदनशील होते हैं। ब्रिटेन का हालिया रुख भी बच्चों को स्मार्टफोन के जरिए अश्लील या हानिकारक तस्वीरों के आदान-प्रदान से बचाने पर केंद्रित है।

​भले ही दुनिया भर की सरकारें कानून बना रही हैं, लेकिन इसके कार्यान्वयन में कई बड़ी चुनौतियां भी हैं। मसलन कुछ ​तकनीकी खामियों  के कारण बच्चे अक्सर वीपीएन या फर्जी जन्मतिथि का उपयोग करके इन प्रतिबंधों को बाईपास कर लेते हैं। आयु सत्यापन के लिए फेशियल स्कैन या सरकारी आईडी मांगना यूजर्स की प्राइवेसी पर सवाल खड़े करता है। कई बड़ी टेक कंपनियों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पैरोकारों को इन कानूनों को अदालत में चुनौती देने के लिए अधिकार उपलब्ध हैं।

​सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने की यह वैश्विक होड़ यह साबित करती है कि अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। डिजिटल स्पेस बच्चों के विकास के लिए एक 'जहरीला वातावरण' बनता जा रहा है। ​लेकिन यह भी उतना ही सच है कि  सिर्फ कानून बनाकर बच्चों को स्क्रीन से दूर नहीं किया जा सकता। राज्य सरकारों के कड़े नियमों के साथ-साथ 'डिजिटल पैरेंटिंग' की भी उतनी ही जरूरत है। जब तक माता-पिता स्वयं अपने स्क्रीन टाइम को कम नहीं करेंगे और बच्चों को मैदानी खेलों, कला, और किताबों की दुनिया में वापस नहीं लाएंगे, तब तक यह प्रतिबंध केवल कागजी बनकर रह जाएंगे।

​ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के कदम पूरी दुनिया के लिए एक चेतावनी है। भारत दुनिया के सबसे बड़े इंटरनेट उपयोगकर्ता देशों में से एक है और करोड़ों बच्चे स्मार्टफोन तक पहुँच रखते हैं। इसलिए यहां केवल कानूनी प्रतिबंध पर्याप्त नहीं होंगे। कुछ व्यावहारिक कदम अधिक प्रभावी हो सकते हैं। मसलन विद्यालयों में डिजिटल साक्षरता को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए।अभिभावकों को पैरेंटल कंट्रोल और ऑनलाइन सुरक्षा के बारे में प्रशिक्षित किया जाए। तकनीकी कंपनियों पर बच्चों के लिए सुरक्षित डिजाइन और मजबूत आयु सत्यापन की जिम्मेदारी तय हो। बच्चों के स्क्रीन समय के लिए परिवार में स्पष्ट नियम बनें। खेल, पुस्तकें, कला और सामाजिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाए ताकि डिजिटल निर्भरता कम हो। हमारे देश में जहां इंटरनेट की पहुंच बहुत सस्ती और व्यापक है, इस दिशा में गंभीरता से सोचने और एक संतुलित नीति बनाने का समय आ गया है ताकि देश का भविष्य आभासी दुनिया के अंधेरे में न खो जाए।

ब्रजेश कानूनगो





Thursday, 11 June 2026

भारत में फूड डिलीवरी बॉय: आधुनिक सुविधा की रीढ़ और अनसुने संघर्षों का चेहरा

भारत में फूड डिलीवरी बॉय: आधुनिक सुविधा की रीढ़ और अनसुने संघर्षों का चेहरा

​स्मार्टफोन और इंटरनेट क्रांति ने हमारे जीवन और विशेषकर भोजन मंगाने के तौर-तरीकों को पूरी तरह बदल दिया है। आज महानगरों से लेकर छोटे कस्बों तक, चंद क्लिक्स पर मनपसंद भोजन घर या कार्यालय पहुंच जाता है। इस सुगम डिजिटल व्यवस्था के पीछे लाखों फूड डिलीवरी कर्मियों की दिन-रात की कड़ी मेहनत छिपी है। ये कर्मी आधुनिक 'गिग इकोनॉमी' (Gig Economy) के वे मुख्य स्तंभ हैं जो ग्राहकों, रेस्टोरेंट्स और तकनीकी प्लेटफॉर्म्स के बीच एक अनिवार्य कड़ी का काम करते हैं। हालांकि, जिस गति और सुविधा का आनंद उपभोक्ता उठाते हैं, उसके पीछे इन कर्मियों का मानसिक-शारीरिक संघर्ष, आर्थिक असुरक्षा और दैनिक चुनौतियां अक्सर अदृश्य रह जाती हैं।

​पिछले कुछ वर्षों में भारत का ऑनलाइन फूड डिलीवरी उद्योग तेजी से फला-फूला है। ऐप-आधारित कंपनियों ने देश के कोने-कोने में युवाओं के लिए रोजगार के नए द्वार खोले हैं। विशेष रूप से कोविड-19 महामारी के दौर में—जब पूरी दुनिया घरों में कैद थी—इन कर्मियों ने 'फ्रंटलाइन वॉरियर्स' की तरह आवश्यक सेवाओं को बहाल रखा। कम शैक्षणिक योग्यता वाले युवाओं, छात्रों और अंशकालिक (Part-time) आय की तलाश करने वालों के लिए यह क्षेत्र जीविकोपार्जन का एक त्वरित और सुलभ माध्यम बनकर उभरा है।

लेकिन यह भी सच है कि डिलीवरी कर्मियों के सामने अनेक चुनौतियां हैं और उनके अपने अंतर्निहित दर्द भी कम नहीं हैं। अधिकांश डिलीवरी कर्मी किसी निश्चित मासिक वेतन पर काम नहीं करते; उनकी आय पूरी तरह प्रति डिलीवरी मिलने वाले भुगतान पर टिकी होती है। ऑर्डर कम होने पर उनकी कमाई सीधे प्रभावित होती है। इसके अलावा, कंपनियों द्वारा समय-समय पर बोनस और प्रोत्साहन नीतियों में किए जाने वाले बदलाव उनकी वित्तीय स्थिरता को डगमगा देते हैं।

इसके अलावा अत्यधिक कार्य समय का दबाव हमेशा बना रहता है। अधिक से अधिक कमाने की होड़ में इन युवाओं को प्रतिदिन 10 से 14 घंटे तक सड़कों पर बिताना पड़ता है। त्योहारों, सप्ताहांतों (Weekends) और खराब मौसम के दौरान जब लोग घरों में उत्सव मनाते हैं, तब इन कर्मियों पर काम का दबाव चरम पर होता है।

अपने काम के चलते सड़क दुर्घटनाओं का निरंतर जोखिम भी मंडराता रहता है। 'समय पर डिलीवरी' सुनिश्चित करने की आपाधापी और कंपनियों के एल्गोरिदम के दबाव में कई बार इन्हें यातायात नियमों को ताक पर रखकर तेज गति से वाहन चलाना पड़ता है। टूटी सड़कें, भारी ट्रैफिक और भारी बारिश या कोहरे जैसी प्रतिकूल परिस्थितियां हर वक्त सड़क दुर्घटनाओं के खतरे को बढ़ाए रखती हैं।

​चूंकि ये कर्मी औपचारिक कर्मचारी न होकर "गिग वर्कर" (स्वतंत्र ठेकेदार) माने जाते हैं, इसलिए ये पारंपरिक श्रम कानूनों के दायरे से बाहर रह जाते हैं। इन्हें भविष्य निधि (PF), पेंशन, सवैतनिक अवकाश (Paid Leaves) और पर्याप्त स्वास्थ्य बीमा जैसी बुनियादी सामाजिक सुरक्षा का लाभ नहीं मिल पाता।

मनुष्य होने के नाते जो व्यवहार मिलना चाहिए कभी कभी सामने वाले से प्रतिकूल व्यवहार के कारण इन्हें भारी मानसिक तनाव से गुजरना पड़ जाता है।भोजन की गुणवत्ता खराब होने या रेस्टोरेंट की देरी के कारण यदि डिलीवरी में विलंब होता है, तो अक्सर ग्राहकों के गुस्से का शिकार इन कर्मियों को होना पड़ता है। ऐप पर मिलने वाली एक भी 'नकारात्मक रेटिंग' (Negative Rating) उनके भविष्य के ऑर्डर्स और कमाई को सीधे प्रभावित कर सकती है, जो निरंतर मानसिक तनाव का कारण बनता है।

​अपने काम की तत्परता में झुलसा देने वाली गर्मी, मूसलाधार बारिश, कड़कड़ाती ठंड और शहरों के दमघोंटू प्रदूषण के बीच लगातार बाइक चलाने से इनके स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ता है। निसंदेह समय पर भोजन न मिलना और आराम की कमी इनके शारीरिक स्वास्थ्य को समय से पहले जर्जर बना देने में भूमिका निभाती है। 

इन तमाम विसंगतियों के बीच इस क्षेत्र के कुछ सकारात्मक पहलू भी हैं जिनसे थोड़ा संतोष मिलता है। इस व्यवसाय ने देश में बड़े पैमाने पर तत्काल रोजगार का सृजन किया है। ​कार्य के घंटों में लचीलापन (Flexibility) होने के कारण अनेक छात्र अपनी पढ़ाई के साथ-साथ कमाई कर पा रहे हैं। ​युवाओं में डिजिटल साक्षरता, नेविगेशन कौशल और ग्राहक सेवा (Customer Relations) के थोड़े व्यावहारिक अनुभव का विकास हो रहा है।

इस क्षेत्र में सुधार की दृष्टि से एक सुरक्षित भविष्य की रूपरेखा अवश्य ही बनाई जा सकती है। जिसमे गिग अर्थव्यवस्था को मानवीय और न्यायसंगत बनाने के लिए कुछ कदम उठाए जाने अनिवार्य किए जाएं।

डिलीवरी बॉयस को ​न्यूनतम आय की गारंटी मिले इसके लिए नीति निर्माताओं और कंपनियों को मिलकर एक ऐसा ढांचा तैयार करना चाहिए जो ईंधन की बढ़ती कीमतों को ध्यान में रखते हुए कर्मियों को एक सम्मानजनक न्यूनतम दैनिक आय सुनिश्चित करे। सभी पंजीकृत गिग वर्कर्स के लिए अनिवार्य स्वास्थ्य और दुर्घटना बीमा सुनिश्चित हो। सरकार को इनके लिए एक विशेष कल्याण कोष (Welfare Fund) का गठन करना चाहिए। '10-20 मिनट में डिलीवरी' के अवास्तविक और खतरनाक दावों पर लगाम लगनी चाहिए ताकि सड़क सुरक्षा से समझौता न हो। कंपनियों को अपनी पे-आउट और इंसेंटिव नीतियों को पूरी तरह पारदर्शी बनाना चाहिए ताकि कर्मियों को अपनी मेहनत का स्पष्ट और सटीक आकलन मिल सके। साथ ही  ग्राहकों को जागरूक करने की आवश्यकता है कि डिलीवरी कर्मी केवल सेवा प्रदाता हैं, भोजन निर्माता नहीं। उनके प्रति सहानुभूति, शिष्ट व्यवहार और न्यायपूर्ण रेटिंग की संस्कृति विकसित होनी चाहिए।

सरकार को गिग इकोनॉमी के लिए स्पष्ट और सख्त कानून बनाने चाहिए, ताकि तकनीकी कंपनियों की मनमानी पर रोक लग सके और श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा हो सके।

​फूड डिलीवरी कर्मी आज के आधुनिक और गतिशील भारत के 'अदृश्य सारथी' हैं। वे हमारी व्यस्त जीवनशैली को सुगम और आरामदायक बनाते हैं, लेकिन खुद एक अनिश्चित और असुरक्षित धरातल पर खड़े हैं। तकनीकी प्रगति और आर्थिक विकास की चमक तब तक अधूरी है, जब तक कि उस विकास को सींचने वाले श्रम को उचित मूल्य, सुरक्षा और सम्मान न मिले। डिजिटल इंडिया की वास्तविक सफलता इसी में है कि वह अपनी सुविधा की रीढ़ बनने वाले इन हाथों को एक सुरक्षित, गरिमापूर्ण और उज्ज्वल भविष्य प्रदान करे।


ब्रजेश कानूनगो 



Wednesday, 10 June 2026

बहुराष्ट्रीय फूड चेन : स्थानीय बाजार पर असर चुनौतीपूर्ण या उत्प्रेरक ?

बहुराष्ट्रीय फूड चेन : स्थानीय बाजार पर असर चुनौतीपूर्ण या उत्प्रेरक ?

पिछले दो दशकों में भारत में बहुराष्ट्रीय फूड चेन का विस्तार अभूतपूर्व गति से हुआ है। महानगरों से शुरू हुई यह यात्रा अब छोटे शहरों और कस्बों तक पहुंच चुकी है। बहुत से लोगों का मानना है कि भारत में इनके आगमन से स्थानीय बाजार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है, छोटे व्यवसायियों का धंधा मंदा पड़ा है। जबकि कुछ इसे स्थानीय बाजार को प्रतिस्पर्धा में उतरने के लिए तैयार होने और गुणवत्तापूर्ण सेवाओं के लिए उत्प्रेरक मानते हैं।

वस्तुतःमैकडॉनल्ड,केएफसी, डोमिनोज, बर्गर किंग और स्टारबक्स (McDonald's, KFC, Domino's, Burger King, Starbucks ) जैसे वैश्विक ब्रांड केवल भोजन परोसने वाले प्रतिष्ठान नहीं रह गए हैं, बल्कि उन्होंने भारतीय उपभोक्ता संस्कृति, रोजगार के स्वरूप और व्यापारिक प्रतिस्पर्धा की प्रकृति को भी प्रभावित किया है। इसलिए इनके प्रभाव को केवल सकारात्मक या नकारात्मक कहना उचित नहीं होगा; यह सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का एक जटिल तथा बहुआयामी परिदृश्य है।

सबसे पहले यदि स्थानीय कारोबारियों पर प्रभाव की बात करें, तो बहुराष्ट्रीय फूड चेन ने पारंपरिक ढाबों, छोटे रेस्तरां और नाश्ते की दुकानों के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। इन कंपनियों के पास विशाल पूंजी, आक्रामक विपणन रणनीतियां, आधुनिक साज-सज्जा, मानकीकृत गुणवत्ता, डिजिटल भुगतान प्रणाली और तकनीक आधारित सेवाओं का मजबूत आधार होता है। स्वाभाविक रूप से युवा और मध्यम वर्ग का एक बड़ा हिस्सा इनकी ओर आकर्षित होता है। परिणामस्वरूप अनेक छोटे भोजनालय ग्राहकों की घटती संख्या और बढ़ती प्रतिस्पर्धा का सामना कर रहे हैं।

इन फूड चेन ने बाजार में प्रतिस्पर्धा की परिभाषा भी बदल दी है। पहले मोहल्लों की चाय-नाश्ते की दुकानें अपने स्थानीय स्वाद, आत्मीयता और कम कीमत के कारण लोकप्रिय थीं, लेकिन अब उपभोक्ताओं के एक वर्ग के लिए ब्रांड वैल्यू, फूड एक्सपीरियंस और एम्बिएंस भी महत्वपूर्ण कारक बन गए हैं। इसका प्रभाव भारतीय खान-पान संस्कृति पर भी दिखाई देता है। पिज्जा, बर्गर और फ्राइड चिकन जैसे पश्चिमी व्यंजनों की बढ़ती लोकप्रियता ने कई स्थानों पर पारंपरिक भारतीय व्यंजनों की मांग को प्रभावित किया है। विशेष रूप से नई पीढ़ी के खान-पान की आदतों में उल्लेखनीय बदलाव देखा जा रहा है।

हालांकि इसका दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। बहुराष्ट्रीय फूड चेन ने भारतीय छोटे व्यापारियों को आधुनिक व्यावसायिक पद्धतियां अपनाने के लिए प्रेरित किया है। आज अनेक स्थानीय रेस्तरां स्वच्छता, आकर्षक पैकेजिंग, डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन ऑर्डर, होम डिलीवरी और ग्राहक सेवा की गुणवत्ता पर पहले की अपेक्षा अधिक ध्यान दे रहे हैं। कई भारतीय ब्रांडों ने इसी प्रतिस्पर्धा से प्रेरणा लेकर अपने व्यवसाय का सफल विस्तार किया है। इस दृष्टि से प्रतिस्पर्धा ने गुणवत्ता सुधार और नवाचार को भी बढ़ावा दिया है।

यदि बेरोजगार युवाओं के संदर्भ में देखा जाए, तो यह क्षेत्र रोजगार सृजन का एक महत्वपूर्ण माध्यम बनकर उभरा है। इन फूड चेन में बड़ी संख्या में युवाओं को वेटर, कैशियर, किचन स्टाफ, डिलीवरी कर्मी, सुपरवाइजर, मैनेजर तथा मार्केटिंग से जुड़े विभिन्न पदों पर काम मिला है। विशेषकर कॉलेज के विद्यार्थियों और कम अनुभव वाले युवाओं के लिए यह क्षेत्र शीघ्र रोजगार का अवसर प्रदान करता है। इससे अनेक युवाओं को आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में पहला कदम रखने का अवसर मिला है।

इसके अतिरिक्त इन संस्थानों में कार्य करने से युवाओं में समय प्रबंधन, टीमवर्क, ग्राहक सेवा, अनुशासन और पेशेवर कार्य संस्कृति जैसी व्यावहारिक दक्षताओं का विकास होता है। कई युवाओं ने यहां अनुभव प्राप्त करने के बाद अपने स्वयं के छोटे खाद्य व्यवसाय या स्टार्टअप भी शुरू किए हैं। ऑनलाइन फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्मों के विस्तार ने इस क्षेत्र में रोजगार के अवसरों को और अधिक बढ़ाया है।

फिर भी इस तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है। इन नौकरियों का बड़ा हिस्सा अस्थायी, कम वेतन वाला और सीमित सामाजिक सुरक्षा वाला होता है। कर्मचारियों को अक्सर लंबे कार्य घंटे, प्रदर्शन आधारित दबाव और सीमित कैरियर सुरक्षा जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति होगी कि बहुराष्ट्रीय फूड चेन ने भारत की बेरोजगारी समस्या का स्थायी समाधान प्रस्तुत कर दिया है। उन्होंने रोजगार के अवसर अवश्य बढ़ाए हैं, लेकिन उच्च गुणवत्ता वाले और दीर्घकालिक रोजगार की गारंटी बिल्कुल नहीं दी है।

अंततः कहा जा सकता है कि बहुराष्ट्रीय फूड चेन का भारत के स्थानीय बाजार पर प्रभाव दोधारी तलवार के समान है। एक ओर उन्होंने छोटे कारोबारियों के सामने कठिन प्रतिस्पर्धा उत्पन्न की और पारंपरिक खाद्य संस्कृति को चुनौती दी, तो दूसरी ओर आधुनिक व्यापार पद्धतियों, सेवा क्षेत्र के विस्तार और रोजगार सृजन में महत्वपूर्ण योगदान भी दिया। आवश्यकता इस बात की है कि सरकार, उद्योग और समाज मिलकर स्थानीय खाद्य व्यवसायों को तकनीकी, वित्तीय और विपणन संबंधी सहयोग प्रदान करें। "वोकल फॉर लोकल" की भावना को व्यवहारिक रूप से सशक्त बनाते हुए यदि स्थानीय उद्यमों को प्रतिस्पर्धी बनाया जाए, तो वैश्वीकरण और स्थानीय अर्थव्यवस्था के बीच संतुलित एवं समावेशी विकास का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है।

ब्रजेश कानूनगो

Tuesday, 2 June 2026

ऑनलाइन शिक्षक और मीडिया विवाद : बहस के विभिन्न आया

ऑनलाइन शिक्षक और मीडिया विवाद : बहस के विभिन्न आया

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के एक एंकर के बयान ने ऑनलाइन पढ़ाने वाले शिक्षकों को उद्वेलित किया है। इस नए विवाद से शिक्षकों, कोचिंग संस्थानों,मीडिया के रवैए और भाषा को लेकर नई बहस खड़ी हो गई है। 

दरअसल यह विषय केवल एक टीवी एंकर के बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा, मीडिया, कोचिंग उद्योग, डिजिटल अर्थव्यवस्था और सार्वजनिक विमर्श की भाषा से जुड़े व्यापक प्रश्नों को सामने लाता है। इस विवाद ने यह सोचने का अवसर दिया है कि समाज में शिक्षकों की भूमिका, ऑनलाइन शिक्षा की उपयोगिता तथा मीडिया की जिम्मेदारी को किस दृष्टि से देखा जाना चाहिए।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया एंकर की टिप्पणी ने ऑनलाइन पढ़ाने वाले शिक्षकों और कोचिंग जगत में तीखी प्रतिक्रिया पैदा कर दी। सोशल मीडिया पर समर्थन और विरोध के स्वर तेज हुए, जिससे शिक्षा और मीडिया के संबंधों पर एक नई बहस शुरू हो गई। यह विवाद केवल किसी एक व्यक्ति के कथन का मामला नहीं है, बल्कि उस बदलते सामाजिक परिदृश्य का प्रतिबिंब है जिसमें डिजिटल शिक्षा, कोचिंग उद्योग और मीडिया तीनों महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

ऑनलाइन शिक्षकों का मानना है कि उन्होंने शिक्षा को लोकतांत्रिक बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इंटरनेट और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से लाखों विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कम लागत पर उपलब्ध हुई है। दूर-दराज के क्षेत्रों में रहने वाले छात्रों के लिए ऑनलाइन शिक्षण कई बार एकमात्र व्यवहारिक विकल्प बनकर उभरा है।

ऐसे में यदि किसी टिप्पणी में पूरे ऑनलाइन शिक्षण समुदाय को संदेह या उपहास की दृष्टि से प्रस्तुत किया जाता है, तो स्वाभाविक रूप से शिक्षक इसे अपने पेशे और सम्मान पर आघात के रूप में देखते हैं। उनका तर्क है कि कुछ अपवादों के आधार पर पूरे समुदाय का मूल्यांकन करना उचित नहीं है।

दूसरी ओर, कुछ लोग मानते हैं कि ऑनलाइन शिक्षा के क्षेत्र में व्यावसायीकरण तेजी से बढ़ा है। अनेक प्लेटफॉर्म और कोचिंग संस्थान आक्रामक विज्ञापन, अवास्तविक सफलता के दावे तथा विद्यार्थियों की भावनाओं के व्यावसायिक उपयोग के आरोपों का सामना करते रहे हैं।

आलोचकों का कहना है कि यदि मीडिया इन प्रवृत्तियों पर सवाल उठाता है तो इसे पूरी तरह गलत नहीं कहा जा सकता। शिक्षा के क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही भी उतनी ही आवश्यक है जितनी कि शिक्षक सम्मान की भावना।

यह विवाद कोचिंग संस्कृति पर भी ध्यान आकर्षित करता है। भारत में प्रतियोगी परीक्षाओं की बढ़ती संख्या और रोजगार की सीमित संभावनाओं ने कोचिंग उद्योग को विशाल आकार दिया है। कई संस्थानों ने उत्कृष्ट परिणाम देकर विद्यार्थियों का मार्गदर्शन किया है, लेकिन कुछ स्थानों पर अत्यधिक शुल्क, सफलता का दबाव और आक्रामक मार्केटिंग जैसे प्रश्न भी उठते रहे हैं।

इसलिए बहस का एक पक्ष यह भी है कि शिक्षा सेवा है या व्यवसाय? संभवतः वास्तविकता इन दोनों के बीच कहीं स्थित है, जहाँ गुणवत्ता और आर्थिक स्थिरता दोनों का संतुलन आवश्यक है।

लोकतंत्र में मीडिया का दायित्व प्रश्न पूछना और सार्वजनिक हित के मुद्दों को उठाना है। यदि शिक्षा क्षेत्र में कोई समस्या है तो उसकी जांच-पड़ताल और आलोचना मीडिया का अधिकार ही नहीं, कर्तव्य भी है।

किन्तु दूसरी ओर मीडिया से यह अपेक्षा भी की जाती है कि वह आलोचना करते समय तथ्यों, संतुलन और मर्यादा का पालन करे। किसी पूरे वर्ग को एक ही तराजू में तौलना या उत्तेजक भाषा का प्रयोग करना संवाद के बजाय टकराव को जन्म देता है। समाचार माध्यमों की विश्वसनीयता इसी बात पर निर्भर करती है कि वे आलोचना और सम्मान के बीच संतुलन बनाए रखें।

इस विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष भाषा का है। सार्वजनिक जीवन में शब्द केवल विचार व्यक्त नहीं करते, बल्कि सामाजिक वातावरण भी निर्मित करते हैं। मीडिया, शिक्षक, राजनेता या अन्य प्रभावशाली व्यक्तियों के वक्तव्य लाखों लोगों तक पहुंचते हैं।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र का आधार है, लेकिन उसके साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। कठोर आलोचना संभव है, परंतु व्यक्तिगत आक्षेप, अपमानजनक शब्दावली या किसी पेशे के सामूहिक अवमूल्यन से बचना चाहिए। स्वस्थ लोकतांत्रिक बहस तथ्यों और तर्कों पर आधारित होती है, न कि कटुता और सनसनी पर।

इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण पक्ष विद्यार्थी हैं। उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सही मार्गदर्शन और विश्वसनीय जानकारी चाहिए। उनके लिए यह अधिक महत्वपूर्ण है कि शिक्षक, कोचिंग संस्थान और मीडिया—तीनों अपनी-अपनी जिम्मेदारियां ईमानदारी से निभाएं।

विद्यार्थी न तो अंधभक्ति चाहते हैं और न ही निराधार आरोपों की राजनीति। वे ऐसे वातावरण की अपेक्षा करते हैं जिसमें शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान और क्षमता निर्माण हो, न कि केवल विवाद और प्रचार।

ऑनलाइन शिक्षकों और मीडिया के बीच उपजा यह विवाद किसी एक बयान से कहीं बड़ा है। ऐसे विवादों से कई उपेक्षित संदर्भ और मुद्दे चर्चा में आते हैं। इस विवाद ने भी शिक्षा के व्यवसायीकरण, डिजिटल शिक्षण की उपयोगिता, मीडिया की जवाबदेही और सार्वजनिक संवाद की भाषा जैसे महत्वपूर्ण प्रश्नों को सामने ला दिया है। जो कि एक लोकतांत्रिक देश और उसके नागरिकों के लिए सुखद ही कहा जाएगा।

एक संतुलित दृष्टिकोण यही कहता है कि न तो सभी ऑनलाइन शिक्षकों को संदेह की दृष्टि से देखा जाना चाहिए और न ही शिक्षा क्षेत्र से जुड़े वैध प्रश्नों को उठाने पर रोक लगनी चाहिए। आवश्यकता इस बात की है कि आलोचना तथ्यपरक हो, भाषा संयमित हो और संवाद सम्मानजनक हो। लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन उनका समाधान परस्पर सम्मान और विवेकपूर्ण चर्चा से ही संभव है।

ब्रजेश कानूनगो 


Monday, 1 June 2026

इम्पैक्ट फीचर : क्या सिर्फ प्रशंसा तक सीमित है पत्रकारिता का यह मंच?

इम्पैक्ट फीचर : क्या सिर्फ प्रशंसा तक सीमित है पत्रकारिता का यह मंच?

समाचार पत्रों में प्रकाशित होने वाले "इम्पैक्ट फीचर" (Impact Feature) पिछले कुछ वर्षों में मीडिया जगत की एक सामान्य प्रवृत्ति बन गए हैं। ये ऐसे प्रायोजित पृष्ठ होते हैं जो देखने में समाचार या विश्लेषणात्मक लेख जैसे लगते हैं, लेकिन वास्तव में किसी संस्था, कंपनी, उद्योग समूह अथवा सरकार द्वारा भुगतान कर प्रकाशित कराए जाते हैं। इनका उद्देश्य केवल विज्ञापन देना नहीं होता, बल्कि किसी विचार, उपलब्धि, योजना या छवि को पाठकों तक अधिक विश्वसनीय ढंग से पहुंचाना भी होता है।

आज स्थिति यह है कि केंद्र और राज्य सरकारें भी अपनी योजनाओं, उपलब्धियों और जनकल्याणकारी कार्यक्रमों के प्रचार के लिए बड़े पैमाने पर इम्पैक्ट फीचर प्रकाशित करा रही हैं। अखबारों के पूरे-पूरे पृष्ठ सरकारी विज्ञापनों और उपलब्धियों के बखान से भर जाते हैं। प्रश्न यह है कि क्या यही मंच विपक्षी दलों, नीतिगत खामियों, प्रशासनिक विफलताओं या जनसरोकारों से जुड़े असहज प्रश्नों के लिए भी उपलब्ध हो सकता है?

सैद्धांतिक रूप से देखा जाए तो लोकतंत्र में किसी भी वैध राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन, नागरिक मंच या जनहित समूह को अपने विचार रखने का अधिकार है। यदि कोई सरकार अपनी उपलब्धियों का प्रचार करने के लिए भुगतान कर सकती है, तो विपक्ष या नागरिक संगठन भी तथ्यों और तर्कों के आधार पर सरकारी नीतियों की आलोचना या उनके दुष्परिणामों को उजागर करने के लिए ऐसा कर सकते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का यही तकाजा है।

लेकिन व्यवहारिक धरातल पर स्थिति इतनी सरल नहीं है। अधिकांश समाचार पत्रों की आर्थिक संरचना विज्ञापन आय पर निर्भर हो चुकी है। सरकारें देश की सबसे बड़ी विज्ञापनदाताओं में शामिल हैं। ऐसे में अनेक मीडिया संस्थान सत्ता से टकराव की स्थिति से बचना चाहते हैं। उन्हें आशंका रहती है कि यदि वे सरकार की आलोचना करने वाले प्रायोजित फीचर प्रकाशित करेंगे तो सरकारी विज्ञापन प्रभावित हो सकते हैं। यही कारण है कि सरकार समर्थक इम्पैक्ट फीचर तो सहजता से दिखाई देते हैं, लेकिन सरकार की नीतियों की आलोचना करने वाले भुगतान आधारित फीचर बहुत कम दिखाई देते हैं।


यहां एक महत्वपूर्ण नैतिक प्रश्न भी खड़ा होता है। क्या अखबारों का दायित्व केवल भुगतान लेने वाले पक्ष का संदेश पहुंचाना है, या उन्हें लोकतांत्रिक विमर्श के लिए समान अवसर भी उपलब्ध कराने चाहिए? यदि इम्पैक्ट फीचर केवल सत्ता की उपलब्धियों का मंच बन जाएं और आलोचनात्मक दृष्टिकोण के लिए दरवाजे बंद कर दिए जाएं, तो यह लोकतांत्रिक संतुलन को कमजोर कर सकता है। लोकतंत्र केवल सरकार की बात सुनने का नाम नहीं है; यह सरकार से प्रश्न पूछने और वैकल्पिक दृष्टिकोणों को सामने लाने की व्यवस्था भी है।

हालांकि यह भी सच है कि विपक्ष द्वारा प्रायोजित फीचर और स्वतंत्र पत्रकारिता में अंतर बनाए रखना आवश्यक है। किसी भी आलोचनात्मक सामग्री को तथ्यों, आंकड़ों और प्रमाणों पर आधारित होना चाहिए। यदि इम्पैक्ट फीचर केवल राजनीतिक प्रचार या दुष्प्रचार का माध्यम बन जाएं तो वे भी लोकतांत्रिक विमर्श को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसलिए पारदर्शिता अनिवार्य है कि पाठक को स्पष्ट बताया जाए कि सामग्री प्रायोजित है।

अब प्रश्न है—क्या भारतीय हिंदी अखबार ऐसा करने की हिम्मत दिखा सकते हैं?

उत्तर एक शब्द में "हाँ" या "नहीं" नहीं है। कुछ अखबार और पत्रिकाएं आज भी सत्ता से असहज प्रश्न पूछने का साहस रखती हैं। वे खोजी रिपोर्टें प्रकाशित करते हैं और जनहित के मुद्दों को उठाते हैं। लेकिन व्यापक परिदृश्य में आर्थिक दबाव, राजनीतिक ध्रुवीकरण, कॉर्पोरेट स्वामित्व और विज्ञापन निर्भरता ने मीडिया की स्वतंत्रता को चुनौतीपूर्ण बना दिया है। ऐसे माहौल में सरकार की आलोचना करने वाले प्रायोजित इम्पैक्ट फीचर प्रकाशित करना कई संस्थानों के लिए जोखिम भरा निर्णय हो सकता है।

फिर भी लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि मीडिया सत्ता और विपक्ष दोनों से समान दूरी बनाए रखे। यदि अखबार सरकार की उपलब्धियों के लिए इम्पैक्ट फीचर प्रकाशित करते हैं, तो उन्हें वैधानिक, तथ्यपरक और जिम्मेदार आलोचनात्मक दृष्टिकोणों के लिए भी स्थान देने का साहस दिखाना चाहिए। आखिर लोकतंत्र में सबसे बड़ा इम्पैक्ट किसी विज्ञापन का नहीं, बल्कि निर्भीक और संतुलित अभिव्यक्ति का होता है।

निष्कर्षतः, इम्पैक्ट फीचर केवल प्रशस्ति-पत्र नहीं बनने चाहिए। वे लोकतांत्रिक बहस का मंच भी बन सकते हैं, बशर्ते मीडिया संस्थान आर्थिक हितों से ऊपर उठकर अभिव्यक्ति की बहुलता और जनहित के सिद्धांत को महत्व दें। प्रश्न यह नहीं है कि विपक्ष ऐसा फीचर प्रकाशित करा सकता है या नहीं; वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या मीडिया लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में सभी पक्षों को समान अवसर देने का साहस दिखा पाएगा।


ब्रजेश कानूनगो 


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