Thursday, 11 June 2026

भारत में फूड डिलीवरी बॉय: आधुनिक सुविधा की रीढ़ और अनसुने संघर्षों का चेहरा

भारत में फूड डिलीवरी बॉय: आधुनिक सुविधा की रीढ़ और अनसुने संघर्षों का चेहरा

​स्मार्टफोन और इंटरनेट क्रांति ने हमारे जीवन और विशेषकर भोजन मंगाने के तौर-तरीकों को पूरी तरह बदल दिया है। आज महानगरों से लेकर छोटे कस्बों तक, चंद क्लिक्स पर मनपसंद भोजन घर या कार्यालय पहुंच जाता है। इस सुगम डिजिटल व्यवस्था के पीछे लाखों फूड डिलीवरी कर्मियों की दिन-रात की कड़ी मेहनत छिपी है। ये कर्मी आधुनिक 'गिग इकोनॉमी' (Gig Economy) के वे मुख्य स्तंभ हैं जो ग्राहकों, रेस्टोरेंट्स और तकनीकी प्लेटफॉर्म्स के बीच एक अनिवार्य कड़ी का काम करते हैं। हालांकि, जिस गति और सुविधा का आनंद उपभोक्ता उठाते हैं, उसके पीछे इन कर्मियों का मानसिक-शारीरिक संघर्ष, आर्थिक असुरक्षा और दैनिक चुनौतियां अक्सर अदृश्य रह जाती हैं।

​पिछले कुछ वर्षों में भारत का ऑनलाइन फूड डिलीवरी उद्योग तेजी से फला-फूला है। ऐप-आधारित कंपनियों ने देश के कोने-कोने में युवाओं के लिए रोजगार के नए द्वार खोले हैं। विशेष रूप से कोविड-19 महामारी के दौर में—जब पूरी दुनिया घरों में कैद थी—इन कर्मियों ने 'फ्रंटलाइन वॉरियर्स' की तरह आवश्यक सेवाओं को बहाल रखा। कम शैक्षणिक योग्यता वाले युवाओं, छात्रों और अंशकालिक (Part-time) आय की तलाश करने वालों के लिए यह क्षेत्र जीविकोपार्जन का एक त्वरित और सुलभ माध्यम बनकर उभरा है।

लेकिन यह भी सच है कि डिलीवरी कर्मियों के सामने अनेक चुनौतियां हैं और उनके अपने अंतर्निहित दर्द भी कम नहीं हैं। अधिकांश डिलीवरी कर्मी किसी निश्चित मासिक वेतन पर काम नहीं करते; उनकी आय पूरी तरह प्रति डिलीवरी मिलने वाले भुगतान पर टिकी होती है। ऑर्डर कम होने पर उनकी कमाई सीधे प्रभावित होती है। इसके अलावा, कंपनियों द्वारा समय-समय पर बोनस और प्रोत्साहन नीतियों में किए जाने वाले बदलाव उनकी वित्तीय स्थिरता को डगमगा देते हैं।

इसके अलावा अत्यधिक कार्य समय का दबाव हमेशा बना रहता है। अधिक से अधिक कमाने की होड़ में इन युवाओं को प्रतिदिन 10 से 14 घंटे तक सड़कों पर बिताना पड़ता है। त्योहारों, सप्ताहांतों (Weekends) और खराब मौसम के दौरान जब लोग घरों में उत्सव मनाते हैं, तब इन कर्मियों पर काम का दबाव चरम पर होता है।

अपने काम के चलते सड़क दुर्घटनाओं का निरंतर जोखिम भी मंडराता रहता है। 'समय पर डिलीवरी' सुनिश्चित करने की आपाधापी और कंपनियों के एल्गोरिदम के दबाव में कई बार इन्हें यातायात नियमों को ताक पर रखकर तेज गति से वाहन चलाना पड़ता है। टूटी सड़कें, भारी ट्रैफिक और भारी बारिश या कोहरे जैसी प्रतिकूल परिस्थितियां हर वक्त सड़क दुर्घटनाओं के खतरे को बढ़ाए रखती हैं।

​चूंकि ये कर्मी औपचारिक कर्मचारी न होकर "गिग वर्कर" (स्वतंत्र ठेकेदार) माने जाते हैं, इसलिए ये पारंपरिक श्रम कानूनों के दायरे से बाहर रह जाते हैं। इन्हें भविष्य निधि (PF), पेंशन, सवैतनिक अवकाश (Paid Leaves) और पर्याप्त स्वास्थ्य बीमा जैसी बुनियादी सामाजिक सुरक्षा का लाभ नहीं मिल पाता।

मनुष्य होने के नाते जो व्यवहार मिलना चाहिए कभी कभी सामने वाले से प्रतिकूल व्यवहार के कारण इन्हें भारी मानसिक तनाव से गुजरना पड़ जाता है।भोजन की गुणवत्ता खराब होने या रेस्टोरेंट की देरी के कारण यदि डिलीवरी में विलंब होता है, तो अक्सर ग्राहकों के गुस्से का शिकार इन कर्मियों को होना पड़ता है। ऐप पर मिलने वाली एक भी 'नकारात्मक रेटिंग' (Negative Rating) उनके भविष्य के ऑर्डर्स और कमाई को सीधे प्रभावित कर सकती है, जो निरंतर मानसिक तनाव का कारण बनता है।

​अपने काम की तत्परता में झुलसा देने वाली गर्मी, मूसलाधार बारिश, कड़कड़ाती ठंड और शहरों के दमघोंटू प्रदूषण के बीच लगातार बाइक चलाने से इनके स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ता है। निसंदेह समय पर भोजन न मिलना और आराम की कमी इनके शारीरिक स्वास्थ्य को समय से पहले जर्जर बना देने में भूमिका निभाती है। 

इन तमाम विसंगतियों के बीच इस क्षेत्र के कुछ सकारात्मक पहलू भी हैं जिनसे थोड़ा संतोष मिलता है। इस व्यवसाय ने देश में बड़े पैमाने पर तत्काल रोजगार का सृजन किया है। ​कार्य के घंटों में लचीलापन (Flexibility) होने के कारण अनेक छात्र अपनी पढ़ाई के साथ-साथ कमाई कर पा रहे हैं। ​युवाओं में डिजिटल साक्षरता, नेविगेशन कौशल और ग्राहक सेवा (Customer Relations) के थोड़े व्यावहारिक अनुभव का विकास हो रहा है।

इस क्षेत्र में सुधार की दृष्टि से एक सुरक्षित भविष्य की रूपरेखा अवश्य ही बनाई जा सकती है। जिसमे गिग अर्थव्यवस्था को मानवीय और न्यायसंगत बनाने के लिए कुछ कदम उठाए जाने अनिवार्य किए जाएं।

डिलीवरी बॉयस को ​न्यूनतम आय की गारंटी मिले इसके लिए नीति निर्माताओं और कंपनियों को मिलकर एक ऐसा ढांचा तैयार करना चाहिए जो ईंधन की बढ़ती कीमतों को ध्यान में रखते हुए कर्मियों को एक सम्मानजनक न्यूनतम दैनिक आय सुनिश्चित करे। सभी पंजीकृत गिग वर्कर्स के लिए अनिवार्य स्वास्थ्य और दुर्घटना बीमा सुनिश्चित हो। सरकार को इनके लिए एक विशेष कल्याण कोष (Welfare Fund) का गठन करना चाहिए। '10-20 मिनट में डिलीवरी' के अवास्तविक और खतरनाक दावों पर लगाम लगनी चाहिए ताकि सड़क सुरक्षा से समझौता न हो। कंपनियों को अपनी पे-आउट और इंसेंटिव नीतियों को पूरी तरह पारदर्शी बनाना चाहिए ताकि कर्मियों को अपनी मेहनत का स्पष्ट और सटीक आकलन मिल सके। साथ ही  ग्राहकों को जागरूक करने की आवश्यकता है कि डिलीवरी कर्मी केवल सेवा प्रदाता हैं, भोजन निर्माता नहीं। उनके प्रति सहानुभूति, शिष्ट व्यवहार और न्यायपूर्ण रेटिंग की संस्कृति विकसित होनी चाहिए।

सरकार को गिग इकोनॉमी के लिए स्पष्ट और सख्त कानून बनाने चाहिए, ताकि तकनीकी कंपनियों की मनमानी पर रोक लग सके और श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा हो सके।

​फूड डिलीवरी कर्मी आज के आधुनिक और गतिशील भारत के 'अदृश्य सारथी' हैं। वे हमारी व्यस्त जीवनशैली को सुगम और आरामदायक बनाते हैं, लेकिन खुद एक अनिश्चित और असुरक्षित धरातल पर खड़े हैं। तकनीकी प्रगति और आर्थिक विकास की चमक तब तक अधूरी है, जब तक कि उस विकास को सींचने वाले श्रम को उचित मूल्य, सुरक्षा और सम्मान न मिले। डिजिटल इंडिया की वास्तविक सफलता इसी में है कि वह अपनी सुविधा की रीढ़ बनने वाले इन हाथों को एक सुरक्षित, गरिमापूर्ण और उज्ज्वल भविष्य प्रदान करे।


ब्रजेश कानूनगो 



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