Friday, 12 June 2026

सोशल मीडिया पर बच्चे : बचपन को बचाने की वैश्विक छटपटाहट

सोशल मीडिया पर बच्चे : बचपन को बचाने की वैश्विक छटपटाहट

डिजिटल युग में सोशल मीडिया बच्चों और किशोरों के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। मनोरंजन, शिक्षा, मित्रता और अभिव्यक्ति के अवसर देने वाला यही माध्यम अब मानसिक स्वास्थ्य, साइबर बुलिंग, अश्लील सामग्री, फर्जी सूचनाओं और डिजिटल लत जैसी समस्याओं का कारण भी माना जा रहा है।

​एक दौर था जब बच्चों की सुबह खेल के मैदानों, तितलियों के पीछे भागने और दोस्तों के साथ शरारतों से शुरू होती थी। लेकिन आज की सुबह 'स्क्रॉलिंग', 'लाइक', 'शेयर' और 'रील्स' के अंतहीन चक्रव्यूह में सिमट कर रह गई है। सोशल मीडिया, जो कभी दूरियों को पाटने का माध्यम बनकर उभरा था, आज बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक विकास और मासूमियत के लिए एक गंभीर संकट बन चुका है। हाल ही में ब्रिटेन द्वारा 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूर्ण या आंशिक प्रतिबंध लगाने के विचार ने इस वैश्विक चिंता को एक नई दिशा दी है। यह केवल एक प्रशासनिक कदम नहीं है, बल्कि यह इस बात का स्वीकार है कि डिजिटल दुनिया के अनियंत्रित प्रसार से बच्चों को बचाना अब अनिवार्य हो चुका है।

​सिर्फ ब्रिटेन ही नहीं, बल्कि दुनिया के तमाम विकसित और विकासशील देश इस 'डिजिटल महामारी' से अपने नौनिहालों को बचाने के लिए कड़े कानून बना रहे हैं। वैश्विक स्तर पर उठाए गए कुछ सबसे कड़े कदमों पर एक नज़र डालना महत्वपूर्ण होगा। 

उपलब्ध जानकारी के अनुसार ​ऑस्ट्रेलिया इस मामले में सबसे आगे रहा है। उसने दिसंबर 2025 से 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए टिकटॉक, इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब जैसे प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पूर्ण प्रतिबंध  लागू कर दिया। इस कानून की खास बात यह है कि इसमें माता-पिता की सहमति की भी कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी गई है। नियमों का उल्लंघन करने वाली कंपनियों पर 4.95 करोड़ ऑस्ट्रेलियाई डॉलर (लगभग 33 मिलियन अमरीकी डॉलर) तक के भारी जुर्माने का प्रावधान है।

​​पश्चिमी देशों की राह पर चलते हुए एशियाई देशों ने भी इस दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाए हैं। मार्च 2026 से इंडोनेशिया ने यूट्यूब, फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे 'हाई रिस्क' प्लेटफॉर्म्स पर 16 साल से कम उम्र के बच्चों के अकाउंट्स को ब्लॉक/निष्क्रिय करना शुरू कर दिया है। मलेशिया ने जून 2026 से उन सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए प्रतिबंध लागू कर दिया है, जिनके पास 80 लाख से अधिक यूजर्स हैं।

यूरोपीय संघ (EU): यूरोपीय संसद ने सोशल मीडिया के लिए न्यूनतम आयु 16 वर्ष तय करने का प्रस्ताव पारित किया है, जिसमें 13 से 15 वर्ष के बच्चों को केवल माता-पिता की सहमति से ही सीमित पहुंच की अनुमति होगी। इसके अलावा 'इन्फिनिट स्क्रॉलिंग' (अनंत रील्स देखना) और ऑटो-प्ले पर भी रोक लगाने की तैयारी है।

फ्रांस में 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन का कानून प्रक्रिया में है। वहीं डेनमार्क ने 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए प्रतिबंध लागू किया है, हालांकि 13 वर्ष से ऊपर के बच्चों के लिए माता-पिता की विशेष अनुमति का प्रावधान है। ब्राजील ने 'डिजिटल ईसीए' कानून के तहत सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेम्स में बच्चों के लिए सख्त 'एज वेरिफिकेशन' (आयु सत्यापन) और फेशियल स्कैन अनिवार्य कर दिया है।

चीन ने सोशल मीडिया पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने के बजाय 'यूथ मोड' लागू किया है। इसके तहत 18 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए रात में स्क्रीन टाइम सीमित कर दिया गया है और वे एक निश्चित समय से अधिक सोशल मीडिया या गेमिंग ऐप्स का उपयोग नहीं कर सकते। साथ ही वहां की सरकार कड़े कंटेंट सेंसरशिप के जरिए बच्चों को नकारात्मक सामग्री से दूर रखती है।

​सोशल मीडिया के खिलाफ सरकारों का यह सख्त रवैया बेवजह नहीं है। इसके पीछे गहरे मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारण हैं। जैसे  अत्यधिक सोशल मीडिया के उपयोग से बच्चों में अवसाद , एंग्जायटी, और हीनभावना तेजी से बढ़ रही है। टेक कंपनियों के 'रील्स' और 'शॉर्ट्स' के एल्गोरिदम इस तरह डिजाइन किए गए हैं जो बच्चों के दिमाग में डोपामाइन रिलीज करते हैं, जिससे उन्हें स्क्रीन की लत  लग जाती है। कम उम्र के बच्चे ऑनलाइन प्रेडेटर्स (शिकारियों) और अनुचित या हिंसक सामग्री के प्रति बेहद संवेदनशील होते हैं। ब्रिटेन का हालिया रुख भी बच्चों को स्मार्टफोन के जरिए अश्लील या हानिकारक तस्वीरों के आदान-प्रदान से बचाने पर केंद्रित है।

​भले ही दुनिया भर की सरकारें कानून बना रही हैं, लेकिन इसके कार्यान्वयन में कई बड़ी चुनौतियां भी हैं। मसलन कुछ ​तकनीकी खामियों  के कारण बच्चे अक्सर वीपीएन या फर्जी जन्मतिथि का उपयोग करके इन प्रतिबंधों को बाईपास कर लेते हैं। आयु सत्यापन के लिए फेशियल स्कैन या सरकारी आईडी मांगना यूजर्स की प्राइवेसी पर सवाल खड़े करता है। कई बड़ी टेक कंपनियों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पैरोकारों को इन कानूनों को अदालत में चुनौती देने के लिए अधिकार उपलब्ध हैं।

​सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने की यह वैश्विक होड़ यह साबित करती है कि अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। डिजिटल स्पेस बच्चों के विकास के लिए एक 'जहरीला वातावरण' बनता जा रहा है। ​लेकिन यह भी उतना ही सच है कि  सिर्फ कानून बनाकर बच्चों को स्क्रीन से दूर नहीं किया जा सकता। राज्य सरकारों के कड़े नियमों के साथ-साथ 'डिजिटल पैरेंटिंग' की भी उतनी ही जरूरत है। जब तक माता-पिता स्वयं अपने स्क्रीन टाइम को कम नहीं करेंगे और बच्चों को मैदानी खेलों, कला, और किताबों की दुनिया में वापस नहीं लाएंगे, तब तक यह प्रतिबंध केवल कागजी बनकर रह जाएंगे।

​ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के कदम पूरी दुनिया के लिए एक चेतावनी है। भारत दुनिया के सबसे बड़े इंटरनेट उपयोगकर्ता देशों में से एक है और करोड़ों बच्चे स्मार्टफोन तक पहुँच रखते हैं। इसलिए यहां केवल कानूनी प्रतिबंध पर्याप्त नहीं होंगे। कुछ व्यावहारिक कदम अधिक प्रभावी हो सकते हैं। मसलन विद्यालयों में डिजिटल साक्षरता को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए।अभिभावकों को पैरेंटल कंट्रोल और ऑनलाइन सुरक्षा के बारे में प्रशिक्षित किया जाए। तकनीकी कंपनियों पर बच्चों के लिए सुरक्षित डिजाइन और मजबूत आयु सत्यापन की जिम्मेदारी तय हो। बच्चों के स्क्रीन समय के लिए परिवार में स्पष्ट नियम बनें। खेल, पुस्तकें, कला और सामाजिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाए ताकि डिजिटल निर्भरता कम हो। हमारे देश में जहां इंटरनेट की पहुंच बहुत सस्ती और व्यापक है, इस दिशा में गंभीरता से सोचने और एक संतुलित नीति बनाने का समय आ गया है ताकि देश का भविष्य आभासी दुनिया के अंधेरे में न खो जाए।

ब्रजेश कानूनगो





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