पुरानी बस्तियाँ : विकास बनाम विरासत का प्रश्न
भारत के अनेक शहर अपनी पुरानी बस्तियों और संकरी गलियों के कारण विश्वभर में पहचाने जाते हैं। इन इलाकों में केवल भवन नहीं होते, बल्कि वहाँ की जीवनशैली, परम्पराएँ, स्थानीय बाजार, धार्मिक स्थल, खान-पान और सामाजिक संबंध भी बसे होते हैं।
पुरानी गलियाँ अक्सर उस समय की शहरी योजना का परिणाम थीं जब यातायात पैदल, बैलगाड़ियों या पशुओं पर आधारित था। इसलिए आज की दृष्टि से वे अव्यवस्थित प्रतीत हो सकती हैं, परंतु वे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। मध्यप्रदेश का इंदौर भी इसी तरह का शहर है जिसकी कुछ अपनी प्राचीन होलकर कालीन विरासत है, तो कुछ महानगरीय विकास के ठीक पहले कस्बे से शहर और फिर महानगर में बदलते समय का अपेक्षाकृत नया इतिहास भी बहुत हद तक शहर की पहचान और मानवीय स्मृतियों का सुखद अतीत है जो आज के इंदौर में जगह जगह बिखरा पड़ा है। इंदौर के छावनी क्षेत्र में हाल ही में मास्टर प्लान के तहत की गई तोड़फोड़ और सड़क चौड़ीकरण की कार्रवाई बेहद चर्चा और विमर्श का विषय बनी हुई है।
भारत तेजी से शहरीकरण की ओर बढ़ रहा है। बढ़ती आबादी, यातायात, प्रदूषण और आधुनिक सुविधाओं की मांग ने शहरों के पुनर्विकास को आवश्यक बना दिया है। इसी उद्देश्य से भारत सरकार ने 2015 में स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट की शुरुआत की थी। इस योजना का लक्ष्य शहरों को अधिक सुगम, तकनीकी रूप से सक्षम, सुरक्षित और आधुनिक बनाना रहा है।
लेकिन जब स्मार्ट बनने की प्रक्रिया पुराने शहरों, तंग गलियों, ऐतिहासिक बाजारों और सदियों पुरानी बस्तियों तक पहुँचती है, तब एक बड़ा प्रश्न खड़ा होता है—क्या विकास के नाम पर इन पुरानी संरचनाओं को तोड़ देना उचित है, या इन्हें सांस्कृतिक धरोहर मानकर संरक्षित किया जाना चाहिए? यह प्रश्न केवल निर्माण और सड़क चौड़ीकरण का नहीं, बल्कि इतिहास, पहचान, अर्थव्यवस्था और मानवीय स्मृतियों का भी है। पुरानी बस्तियाँ केवल मकान नहीं, जीवित इतिहास हैं।
स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत पुराने शहरों या 'पुरानी बस्तियों' का कायाकल्प एक बेहद संवेदनशील और जटिल मुद्दा है। संकरी गलियों को चौड़ा करने, बुनियादी ढांचा सुधारने और अतिक्रमण हटाने के लिए की जाने वाली तोड़फोड़ एक तरफ आधुनिक नागरिक सुविधाएं देती है, तो दूसरी तरफ शहरों की ऐतिहासिक आत्मा और सांस्कृतिक ताने-बाने को चोट पहुंचाती है।
क्या पुरानी बस्तियों को धरोहर की तरह संरक्षित किया जाना चाहिए? इस विचार के समर्थक मानते हैं कि पुरानी बस्तियाँ केवल ईंट-पत्थर के मकान नहीं, बल्कि जीवंत इतिहास हैं। इन्हें पूरी तरह तोड़ने के बजाय हेरिटेज-लेड अर्बन रिन्यूअल (धरोहर-आधारित शहरी पुनरुद्धार) नीति अपनानी चाहिए। पुराने शहरों की वास्तुकला जैसे अहमदाबाद की 'पोल', पुणे के 'वाड़े' या दिल्ली की हवेलियां आदि स्थानीय संस्कृति को दर्शाती हैं। इन्हें नष्ट करने से शहर अपनी विशिष्ट पहचान खोकर आधुनिक 'कंक्रीट के जंगलों' जैसे दिखने लगते हैं। यदि किसी शहर की पुरानी बस्ती समाप्त हो जाती है, तो उसकी आत्मा भी कमजोर हो जाती है। ये बस्तियाँ केवल व्यापारिक क्षेत्र नहीं, बल्कि सदियों पुराने सांस्कृतिक अनुभव होते हैं। इसी कारण दुनिया के अनेक देशों ने अपने पुराने शहरों को धरोहर के रूप में सुरक्षित रखा है। यूनेस्को (UNESCO) के अनुसार विश्व धरोहर स्थलों से जुड़े पर्यटन का वैश्विक आर्थिक योगदान अरबों डॉलर का है और इससे स्थानीय रोजगार भी बढ़ता है। संरक्षित बस्तियों से पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ मिलता है। पर्यटन मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार देश में आने वाले विदेशी पर्यटकों का बड़ा हिस्सा ऐतिहासिक शहरों और सांस्कृतिक स्थलों को देखने आता है।
पुरानी बस्तियाँ हस्तशिल्प, पारंपरिक भोजन और स्थानीय बाजारों को जीवित रखती हैं। यदि इन्हें पूरी तरह आधुनिक कॉम्प्लेक्स में बदल दिया जाए, तो स्थानीय रोजगार प्रभावित हो सकता है। पर्यावरणीय दृष्टि से भी उपयोगी पुरानी बस्तियों की संकरी गलियाँ और घनी संरचना गर्म क्षेत्रों में तापमान नियंत्रित करने में सहायक होती थीं। मोटी दीवारें, आंगन और प्राकृतिक वेंटिलेशन ऊर्जा की बचत करते थे। आज जब “सस्टेनेबल अर्बन प्लानिंग” की बात हो रही है, तब पारंपरिक स्थापत्य से बहुत कुछ सीखा जा सकता है।पुराने मोहल्लों में लोगों के बीच सामुदायिक संबंध अधिक मजबूत होते हैं। साझा आंगन, चौपाल, छोटी दुकानों और पड़ोस की संस्कृति सामाजिक सहयोग को बढ़ाती है। पुनर्विकास के दौरान विस्थापन होने पर यह सामाजिक संरचना टूट जाती है।
विकास और व्यावहारिकता के समर्थक मानते हैं कि समय के साथ शहरों की बदलती जरूरतों के लिए पुरानी बस्तियों में बुनियादी सुधार और कुछ हद तक तोड़फोड़ अपरिहार्य होती है। इसके पीछे उनके कुछ तथ्य भी हैं। आज के शहरों पर आबादी का अत्यधिक बोझ है। संकरी गलियों में एम्बुलेंस, अग्नि शमन दमकल जैसी आपातकालीन गाड़ियां नहीं घुस पातीं, जो किसी आपदा के समय जान-माल के लिए गंभीर खतरा है। पुरानी बस्तियों में सीवरेज, ड्रेनेज, और बिजली के खुले तारों का जाल बेहद जर्जर हो चुका होता है। स्मार्ट सिटी के तहत इन्हें भूमिगत करने और पानी की पाइपलाइन बिछाने के लिए सड़कों को चौड़ा करना तकनीकी मजबूरी बन जाता है। पुरानी, जर्जर और असुरक्षित हो चुकी इमारतें अक्सर आर्थिक रूप से कम उत्पादक रह जाती हैं। जमीन के बेहतर उपयोग और व्यावसायिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए पुनर्विकास जरूरी माना जाता है। व्यापार, परिवहन और निवेश के लिए आधुनिक आधारभूत संरचना जरूरी है। यदि शहरों का विकास रुकता है, तो आर्थिक गतिविधियाँ भी प्रभावित हो सकती हैं। स्मार्ट सिटी परियोजनाओं का उद्देश्य डिजिटल सेवाएँ, बेहतर यातायात, स्वच्छता और सार्वजनिक सुविधाएँ उपलब्ध कराना है, जिन्हें लागू करने के लिए कभी-कभी संरचनात्मक बदलाव आवश्यक हो जाते हैं।
भारत में तेजी से बढ़ते शहरीकरण के कारण 2030 तक करोड़ों लोगों के शहरों में बसने का अनुमान व्यक्त किया गया है।
अनेक विशेषज्ञ मानते हैं कि “हेरिटेज आधारित अर्बन प्लानिंग” पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को दीर्घकालीन लाभ देती है।
संतुलित समाधान क्या हो सकता है? इस विवाद का समाधान “पूर्ण संरक्षण” या “पूर्ण तोड़फोड़” में नहीं, बल्कि संतुलित दृष्टिकोण में है। कुछ उपाय भी विशेषज्ञ बताते है मसलन संदर्भित बस्तियों को हेरिटेज ज़ोन घोषित किए जाएँ, जिन इलाकों का ऐतिहासिक महत्व है, वहाँ सीमित और संवेदनशील विकास किया जाए। भवनों का बाहरी ऐतिहासिक स्वरूप सुरक्षित रखते हुए अंदर आधुनिक सुविधाएँ विकसित की जा सकती हैं। पुरानी गलियों में बड़े वाहनों के बजाय छोटे सार्वजनिक परिवहन और पैदल संस्कृति को बढ़ावा दिया जाए। इसके अलावा विकास योजनाएँ केवल प्रशासनिक निर्णय न हों; स्थानीय निवासियों, प्रबुद्धों और इतिहासकारों की राय भी ली जाए तो निर्णय सर्वस्वीकार्य हो सकेगा। जर्जर और खतरनाक भवनों का वैज्ञानिक पुनर्विकास हो, लेकिन मूलभूत ऐतिहासिक चरित्र की छवि बनाए रखने का पूर्णतः प्रयास किया जाए।
किसी भी शहर की पहचान उसकी ऊँची इमारतों से नहीं, बल्कि उसकी स्मृतियों, गलियों और सांस्कृतिक विरासत से बनती है।
यदि स्मार्ट सिटी परियोजनाएँ केवल कंक्रीट और चौड़ी सड़कों तक सीमित रह जाएँगी, तो शहर आधुनिक तो दिखेंगे, पर उनकी आत्मा खो सकती है। दूसरी ओर, केवल अतीत से चिपककर आधुनिक आवश्यकताओं की अनदेखी भी संभव नहीं। इसलिए आवश्यकता ऐसी शहरी नीति की है जो विकास और विरासत—दोनों को साथ लेकर चले। वास्तविक “स्मार्ट सिटी” वही होगी जो तकनीक के साथ अपने इतिहास और मानवीय स्मृतियों को भी सम्मान दे सके। सबसे बड़ी बात तो यह है कि बस्तियों के विकास में नागरिक के मन पर मशीन चलाकर कितनी ही खूबसूरत सड़क या इमारत खड़ी कर दी जाए, उसका कैसे स्वागत होगा, रहवासी की भावनाओं, उनकी खुशी और संतोष को सर्वोच्च प्राथमिकता देने में शासन प्रशासन की मानवीय संवेदनशीलता दिखाई दे तभी तो स्मार्ट सिटी में स्मार्टनेस दिखाई दे सकेगी।
ब्रजेश कानूनगो