Monday, 25 May 2026

पुरानी बस्तियाँ : विकास बनाम विरासत का प्रश्न

पुरानी बस्तियाँ : विकास बनाम विरासत का प्रश्न

भारत के अनेक शहर अपनी पुरानी बस्तियों और संकरी गलियों के कारण विश्वभर में पहचाने जाते हैं। इन इलाकों में केवल भवन नहीं होते, बल्कि वहाँ की जीवनशैली, परम्पराएँ, स्थानीय बाजार, धार्मिक स्थल, खान-पान और सामाजिक संबंध भी बसे होते हैं।

पुरानी गलियाँ अक्सर उस समय की शहरी योजना का परिणाम थीं जब यातायात पैदल, बैलगाड़ियों या पशुओं पर आधारित था। इसलिए आज की दृष्टि से वे अव्यवस्थित प्रतीत हो सकती हैं, परंतु वे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। मध्यप्रदेश का इंदौर भी इसी तरह का शहर है जिसकी कुछ अपनी प्राचीन होलकर कालीन विरासत है,  तो कुछ महानगरीय विकास के ठीक पहले कस्बे से शहर और फिर महानगर में बदलते समय का अपेक्षाकृत नया इतिहास भी बहुत हद तक शहर की पहचान और मानवीय स्मृतियों का सुखद अतीत है जो आज के इंदौर में जगह जगह बिखरा पड़ा है। इंदौर के छावनी क्षेत्र में हाल ही में मास्टर प्लान के तहत की गई तोड़फोड़ और सड़क चौड़ीकरण की कार्रवाई बेहद चर्चा और विमर्श का विषय बनी हुई है। 


भारत तेजी से शहरीकरण की ओर बढ़ रहा है। बढ़ती आबादी, यातायात, प्रदूषण और आधुनिक सुविधाओं की मांग ने शहरों के पुनर्विकास को आवश्यक बना दिया है। इसी उद्देश्य से भारत सरकार ने 2015 में स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट की शुरुआत की थी। इस योजना का लक्ष्य शहरों को अधिक सुगम, तकनीकी रूप से सक्षम, सुरक्षित और आधुनिक बनाना रहा है।

लेकिन जब स्मार्ट बनने की प्रक्रिया पुराने शहरों, तंग गलियों, ऐतिहासिक बाजारों और सदियों पुरानी बस्तियों तक पहुँचती है, तब एक बड़ा प्रश्न खड़ा होता है—क्या विकास के नाम पर इन पुरानी संरचनाओं को तोड़ देना उचित है, या इन्हें सांस्कृतिक धरोहर मानकर संरक्षित किया जाना चाहिए? यह प्रश्न केवल निर्माण और सड़क चौड़ीकरण का नहीं, बल्कि इतिहास, पहचान, अर्थव्यवस्था और मानवीय स्मृतियों का भी है। पुरानी बस्तियाँ केवल मकान नहीं, जीवित इतिहास हैं। 


स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत पुराने शहरों या 'पुरानी बस्तियों' का कायाकल्प एक बेहद संवेदनशील और जटिल मुद्दा है। संकरी गलियों को चौड़ा करने, बुनियादी ढांचा सुधारने और अतिक्रमण हटाने के लिए की जाने वाली तोड़फोड़ एक तरफ आधुनिक नागरिक सुविधाएं देती है, तो दूसरी तरफ शहरों की ऐतिहासिक आत्मा और सांस्कृतिक ताने-बाने को चोट पहुंचाती है।

​क्या पुरानी बस्तियों को धरोहर की तरह संरक्षित किया जाना चाहिए? इस विचार के समर्थक मानते हैं कि पुरानी बस्तियाँ केवल ईंट-पत्थर के मकान नहीं, बल्कि जीवंत इतिहास हैं। इन्हें पूरी तरह तोड़ने के बजाय हेरिटेज-लेड अर्बन रिन्यूअल (धरोहर-आधारित शहरी पुनरुद्धार) नीति अपनानी चाहिए। पुराने शहरों की वास्तुकला जैसे अहमदाबाद की 'पोल', पुणे के 'वाड़े' या दिल्ली की हवेलियां आदि स्थानीय संस्कृति को दर्शाती हैं। इन्हें नष्ट करने से शहर अपनी विशिष्ट पहचान खोकर आधुनिक 'कंक्रीट के जंगलों' जैसे दिखने लगते हैं।  यदि किसी शहर की पुरानी बस्ती समाप्त हो जाती है, तो उसकी आत्मा भी कमजोर हो जाती है। ये बस्तियाँ केवल व्यापारिक क्षेत्र नहीं, बल्कि सदियों पुराने सांस्कृतिक अनुभव होते हैं। इसी कारण दुनिया के अनेक देशों ने अपने पुराने शहरों को धरोहर के रूप में सुरक्षित रखा है। यूनेस्को (UNESCO) के अनुसार विश्व धरोहर स्थलों से जुड़े पर्यटन का वैश्विक आर्थिक योगदान अरबों डॉलर का है और इससे स्थानीय रोजगार भी बढ़ता है। संरक्षित बस्तियों से पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ मिलता है। पर्यटन मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार देश में आने वाले विदेशी पर्यटकों का बड़ा हिस्सा ऐतिहासिक शहरों और सांस्कृतिक स्थलों को देखने आता है।


पुरानी बस्तियाँ हस्तशिल्प, पारंपरिक भोजन और स्थानीय बाजारों को जीवित रखती हैं। यदि इन्हें पूरी तरह आधुनिक कॉम्प्लेक्स में बदल दिया जाए, तो स्थानीय रोजगार प्रभावित हो सकता है।  पर्यावरणीय दृष्टि से भी उपयोगी पुरानी बस्तियों की संकरी गलियाँ और घनी संरचना गर्म क्षेत्रों में तापमान नियंत्रित करने में सहायक होती थीं। मोटी दीवारें, आंगन और प्राकृतिक वेंटिलेशन ऊर्जा की बचत करते थे। आज जब “सस्टेनेबल अर्बन प्लानिंग” की बात हो रही है, तब पारंपरिक स्थापत्य से बहुत कुछ सीखा जा सकता है।पुराने मोहल्लों में लोगों के बीच सामुदायिक संबंध अधिक मजबूत होते हैं। साझा आंगन, चौपाल, छोटी दुकानों और पड़ोस की संस्कृति सामाजिक सहयोग को बढ़ाती है। पुनर्विकास के दौरान विस्थापन होने पर यह सामाजिक संरचना टूट जाती है।

विकास और व्यावहारिकता के  समर्थक मानते हैं कि समय के साथ शहरों की बदलती जरूरतों के लिए पुरानी बस्तियों में बुनियादी सुधार और कुछ हद तक तोड़फोड़ अपरिहार्य होती है। इसके पीछे उनके कुछ तथ्य भी हैं। आज के शहरों पर आबादी का अत्यधिक बोझ है। संकरी गलियों में एम्बुलेंस, अग्नि शमन दमकल जैसी आपातकालीन गाड़ियां नहीं घुस पातीं, जो किसी आपदा के समय जान-माल के लिए गंभीर खतरा है। पुरानी बस्तियों में सीवरेज, ड्रेनेज, और बिजली के खुले तारों का जाल बेहद जर्जर हो चुका होता है। स्मार्ट सिटी के तहत इन्हें भूमिगत करने और पानी की पाइपलाइन बिछाने के लिए सड़कों को चौड़ा करना तकनीकी मजबूरी बन जाता है। पुरानी, जर्जर और असुरक्षित हो चुकी इमारतें अक्सर आर्थिक रूप से कम उत्पादक रह जाती हैं। जमीन के बेहतर उपयोग और व्यावसायिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए पुनर्विकास जरूरी माना जाता है। व्यापार, परिवहन और निवेश के लिए आधुनिक आधारभूत संरचना जरूरी है। यदि शहरों का विकास रुकता है, तो आर्थिक गतिविधियाँ भी प्रभावित हो सकती हैं। स्मार्ट सिटी परियोजनाओं का उद्देश्य डिजिटल सेवाएँ, बेहतर यातायात, स्वच्छता और सार्वजनिक सुविधाएँ उपलब्ध कराना है, जिन्हें लागू करने के लिए कभी-कभी संरचनात्मक बदलाव आवश्यक हो जाते हैं।


भारत में तेजी से बढ़ते शहरीकरण के कारण 2030 तक करोड़ों लोगों के शहरों में बसने का अनुमान व्यक्त किया गया है।

अनेक विशेषज्ञ मानते हैं कि “हेरिटेज आधारित अर्बन प्लानिंग” पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को दीर्घकालीन लाभ देती है।

संतुलित समाधान क्या हो सकता है? इस विवाद का समाधान “पूर्ण संरक्षण” या “पूर्ण तोड़फोड़” में नहीं, बल्कि संतुलित दृष्टिकोण में है। कुछ उपाय भी विशेषज्ञ बताते है मसलन संदर्भित बस्तियों को हेरिटेज ज़ोन घोषित किए जाएँ, जिन इलाकों का ऐतिहासिक महत्व है, वहाँ सीमित और संवेदनशील विकास किया जाए। भवनों का बाहरी ऐतिहासिक स्वरूप सुरक्षित रखते हुए अंदर आधुनिक सुविधाएँ विकसित की जा सकती हैं। पुरानी गलियों में बड़े वाहनों के बजाय छोटे सार्वजनिक परिवहन और पैदल संस्कृति को बढ़ावा दिया जाए। इसके अलावा विकास योजनाएँ केवल प्रशासनिक निर्णय न हों; स्थानीय निवासियों, प्रबुद्धों और इतिहासकारों की राय भी ली जाए तो निर्णय सर्वस्वीकार्य हो सकेगा। जर्जर और खतरनाक भवनों का वैज्ञानिक पुनर्विकास हो, लेकिन मूलभूत ऐतिहासिक चरित्र की छवि बनाए रखने का पूर्णतः प्रयास किया जाए।


किसी भी शहर की पहचान उसकी ऊँची इमारतों से नहीं, बल्कि उसकी स्मृतियों, गलियों और सांस्कृतिक विरासत से बनती है।

यदि स्मार्ट सिटी परियोजनाएँ केवल कंक्रीट और चौड़ी सड़कों तक सीमित रह जाएँगी, तो शहर आधुनिक तो दिखेंगे, पर उनकी आत्मा खो सकती है। दूसरी ओर, केवल अतीत से चिपककर आधुनिक आवश्यकताओं की अनदेखी भी संभव नहीं। इसलिए आवश्यकता ऐसी शहरी नीति की है जो विकास और विरासत—दोनों को साथ लेकर चले। वास्तविक “स्मार्ट सिटी” वही होगी जो तकनीक के साथ अपने इतिहास और मानवीय स्मृतियों को भी सम्मान दे सके। सबसे बड़ी बात तो यह है कि बस्तियों के विकास में नागरिक के मन पर मशीन चलाकर कितनी ही खूबसूरत सड़क या इमारत खड़ी कर दी जाए, उसका कैसे स्वागत होगा, रहवासी की भावनाओं, उनकी खुशी और संतोष को सर्वोच्च प्राथमिकता देने में शासन प्रशासन की  मानवीय संवेदनशीलता दिखाई दे तभी तो स्मार्ट सिटी में स्मार्टनेस दिखाई दे सकेगी। 


ब्रजेश कानूनगो 


Friday, 22 May 2026

युवा आक्रोश का समाधान अनिवार्य सैन्य सेवा में है !

युवा आक्रोश का समाधान क्या अनिवार्य सैन्य सेवा में है ?

आक्रोशित युवाओं के एक बड़े प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा डंडे बरसाए जाने, वाटर कैनन के बाद बदहवास प्रदर्शनकारियों की भगदड़ को टीवी पर देखकर एक उत्तेजित मित्र ने कहा कि - इन सबको सीमा पर भेज देना चाहिए ताकि इन्हें देश सेवा का मौका मिले और काम भी। इसी प्रकार शांतिप्रिय नागरिकों के भाईचारे और सद्भाव में जब कभी उत्पाती लोग खलल डालने की कोशिश करते हैं तब भी बहुत से लोगों का सुझाव आता है कि उत्पातियों को सीमा पर जाकर अपनी देशभक्ति दिखाना चाहिए। प्रश्न यह है कि क्या युवाओं के मुद्दों और उनके आक्रोश और नागरिकों की कठिनाइयों का समाधान का रास्ता केवल सीमा पर तैनाती से निकाला जा सकता है? यह कोई नई बात नहीं है।  भारत में युवाओं की भारी आबादी (डेमोग्राफिक डिविडेंड) को देखते हुए बेरोजगारी और युवाओं में बढ़ती अशांति एक गंभीर चुनौती है। इस समस्या के समाधान के रूप में अनिवार्य सैन्य सेवा (Conscription) का विचार समय-समय पर चर्चा में आता रहा है।

वैश्विक परिदृश्य में राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता और नागरिक कर्तव्यों की परिभाषा हर देश में अलग है। जहां भारत और अमेरिका जैसे बड़े लोकतंत्र पूरी तरह से स्वैच्छिक (Voluntary) सेना पर निर्भर हैं, वहीं दुनिया के कई ऐसे देश भी हैं जहां एक निश्चित आयु के युवाओं के लिए सेना में अपनी सेवाएं देना कानूनी रूप से अनिवार्य है। इस व्यवस्था को 'कॉन्स्क्रिप्शन' (Conscription) या 'अनिवार्य सैन्य सेवा' कहा जाता है। ​

यद्यपि रूस,चीन,यूक्रेन,इजराइल,कोरिया, फिनलैंड, नार्वे, स्विट्जरलैंड, तुर्की,ईरान, ग्रीस आदि सहित दुनिया भर के लगभग 60 से अधिक देशों में किसी न किसी रूप में अनिवार्य सैन्य सेवा का प्रावधान है किंतु क्या यह पहल भारत के लिए व्यावहारिक है? इसके समर्थन और विरोध में कई महत्वपूर्ण सामाजिक, आर्थिक और सैन्य तर्क दिए जाते रहे हैं। 

​समर्थकों का मानना है कि अनिवार्य सैन्य सेवा युवाओं को सही दिशा देने और देश की प्रगति में भागीदार बनाने का एक कारगर जरिया बन सकती है।  सेना युवाओं को न केवल शारीरिक रूप से मजबूत बनाती है, बल्कि उनमें समयबद्धता, नेतृत्व क्षमता और तकनीकी/व्यावहारिक कौशल (जैसे- इंजीनियरिंग, लॉजिस्टिक्स, मेडिकल) का विकास करती है। यह सेवा के बाद उनके लिए नागरिक रोजगार के रास्ते खोलता है। खाली दिमाग और दिशाहीनता युवाओं को अपराध, नशे या उग्रवाद की ओर धकेल सकती है। सैन्य सेवा उन्हें एक सकारात्मक उद्देश्य देती है, जिससे सामाजिक अशांति में कमी आ सकती है। भारत जैसे विविध देश में, जब विभिन्न राज्यों, जातियों और पृष्ठभूमि के युवा एक साथ रहकर देश की सेवा करेंगे, तो उनमें सामाजिक समरसता और मजबूत राष्ट्रीय भावना पैदा होगी। बड़े पैमाने पर प्रशिक्षित युवाओं की यह फौज बाढ़, भूकंप या महामारी जैसी राष्ट्रीय आपदाओं के समय त्वरित राहत और बचाव कार्यों में देश के बहुत काम आ सकती है।

​इससे अलग धारणा रखने वाले विशेषज्ञों और आलोचकों का मानना है कि भारत जैसी विशाल जनसंख्या वाले देश में इसे लागू करना फायदे से ज्यादा नुकसानदेह साबित हो सकता है।  भारत में हर साल करोड़ों युवा सैन्य सेवा की उम्र में प्रवेश करते हैं। इतने बड़े पैमाने पर युवाओं को भोजन, वर्दी, आवास, हथियार, प्रशिक्षण और भत्ता देना देश के बजट पर अत्यधिक बोझ डालेगा। यह पैसा शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) से डायवर्शन होगा।  आधुनिक युद्ध कौशल अब उच्च तकनीक, खुफिया जानकारी और अत्याधुनिक हथियारों पर निर्भर है, न कि केवल सैनिकों की संख्या पर। जबरन भर्ती किए गए युवाओं में वह प्रेरणा और समर्पण नहीं हो सकता जो एक स्वेच्छा से आए सैनिक में होता है। इससे सेना की युद्धक क्षमता प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि सैन्य सेवा आमतौर पर कुछ वर्षों  के लिए होगी। इसके बाद जब ये युवा वापस नागरिक जीवन में लौटेंगे, तो यदि बाजार में नौकरियां नहीं होंगी, तो वे फिर से बेरोजगार हो जाएंगे। समाज के हर युवा को हथियार और युद्ध का प्रशिक्षण देने से, भविष्य में सामाजिक संघर्षों या व्यक्तिगत विवादों में हिंसा का स्तर बढ़ने का खतरा भी संभावित हो सकता है।

​बहुत से विचारकों का यह भी मत रहा है कि अनिवार्य सैन्य सेवा को पूरी तरह थोपने के बजाय, सरकार और समाज मिलकर कुछ मध्यम मार्ग और व्यावहारिक उपाय अपना सकते हैं। पहले से उपलब्ध  एनसीसी और एनएसएस ​ के बड़े पैमाने पर विस्तार द्वारा स्कूलों और कॉलेजों में राष्ट्रीय कैडेट कोर और राष्ट्रीय सेवा योजना  को अनिवार्य या अत्यधिक प्रोत्साहित किया जाए। इससे भारी खर्च के बिना युवाओं में अनुशासन और नागरिक चेतना विकसित होगी। हाल ही में शुरू की गई 'अग्निपथ योजना' एक तरह से स्वैच्छिक सैन्य सेवा का ही रूप है। इसमें 4 साल बाद बाहर निकलने वाले 'अग्निवीरों' के लिए कड़े कौशल प्रमाणन और नागरिक नौकरियों (जैसे पुलिस, अर्धसैनिक बल, कॉर्पोरेट) में निश्चित आरक्षण को अधिक विश्वसनीय, कारगर और पुख्ता किया जाए। शिक्षा व्यवस्था को थ्योरी से हटाकर सीधे रोजगारपरक  बनाया जाए। डेटा साइंस, एआई, रिन्यूएबल एनर्जी और लॉजिस्टिक्स जैसे उभरते क्षेत्रों में युवाओं को मुफ्त या कम दर पर प्रशिक्षित किया जाए। ​राष्ट्रीय युवा विकास कोर जैसा नवाचारी विचार भी सामने आया है जिसके तहत सेना के तर्ज पर एक नागरिक संगठन बनाया जा सकता है, जहां युवाओं को अनिवार्य रूप से 1-2 साल के लिए ग्रामीण विकास, साक्षरता अभियान, पर्यावरण संरक्षण और इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण जैसे कार्यों में लगाया जाए और उन्हें मानदेय  दिया जाए। इन सब उपायों को निश्चित ही दलगत राजनीति के प्रलोभनों से सुरक्षित रखना नितांत जरूरी होगा। 

अनिवार्य सैन्य सेवा केवल हथियार चलाने का प्रशिक्षण नहीं, बल्कि राष्ट्र और नागरिक के संबंध का एक विशेष मॉडल है। जिन देशों को सुरक्षा चुनौतियां अधिक हैं, वहां यह व्यवस्था राष्ट्रीय अस्तित्व का आधार बन जाती है। वहीं लोकतांत्रिक और उदार समाजों में यह बहस लगातार जारी है कि राष्ट्रभक्ति का अर्थ बाध्य सैन्य सेवा होना चाहिए या स्वैच्छिक सहभागिता।

भविष्य में संभव है कि पारंपरिक सैन्य सेवा की जगह “राष्ट्रीय नागरिक सेवा” जैसी अवधारणाएं अधिक लोकप्रिय हों, जहां युवा सेना के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण, स्वास्थ्य सेवा, आपदा राहत और तकनीकी सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में भी देशसेवा कर सकें।

सच तो यह है कि भारत जैसी विशाल आबादी के लिए 'अनिवार्य' सैन्य सेवा ' आर्थिक, सामाजिक और व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। युवाओं की अशांति और बेरोजगारी को दूर करने का सही रास्ता सेना में बाध्यकारी भर्ती नहीं, बल्कि आर्थिक नीतियों में सुधार, गुणवत्तापूर्ण कौशल विकास और रोजगार के नए अवसरों का सृजन करना जरूरी होगा।

ब्रजेश कानूनगो 


Wednesday, 20 May 2026

मीठी चॉकलेट की कड़वी दास्तान

मीठी चॉकलेट की कड़वी दास्तान

इन दिनों चॉकलेट चर्चा में है। हाल ही का एक वाकया गत दिनों काफी चर्चा में रहा। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने इटली प्रवास के अवसर पर वहां की पीएम को मेलोडी नामक चॉकलेट्स का पैकेट भेंट किया। इस खास कूटनीतिक अंदाज के इस दिलचस्प मुलाकात का वीडियो खुद इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर शेयर किया। वीडियो में मेलोनी बेहद खुश नजर आ रही हैं और कैमरे के सामने टॉफी का पैकेट दिखाते हुए मुस्कुराकर कह रही हैं-'पीएम मोदी हमारे लिए गिफ्ट लाए हैं!" 

बहरहाल, दो देशों के बीच की कूटनीति और स्नेह, सद्भाव के मधुर और दिलकश प्रसंग से अलग मन को उद्वेलित करने वाला एक प्रकरण अवश्य यहां रेखांकित किये जाने योग्य होगा। दरअसल, एक यूट्यूबर और विश्वयात्री ने जब पश्चिम अफ्रीका के आईवरी कोस्ट (Ivory Coast ) में कोको के बाग का भ्रमण करते हुए वहां काम करते  मजदूर किसानों से पूछा कि क्या उन्होंने कोको से बनने वाली चॉकलेट का जायका लिया है तो उत्तर पाकर अचम्भा हुआ। सचमुच यह दिल को छू लेने वाली और हैरान करने वाली हकीकत है कि एक ऐसा देश भी है जो कोको का उत्पादन तो करता है लेकिन जहां के उत्पादक मजदूरों ने चाकलेट का स्वाद तक नहीं लिया। 

चॉकलेट आज दुनिया की सबसे लोकप्रिय खाद्य वस्तुओं में से एक है, इसकी यात्रा हजारों वर्ष पुरानी सभ्यताओं से शुरू होकर आधुनिक उद्योग तक पहुँची है। इसका इतिहास केवल स्वाद का नहीं, बल्कि संस्कृति, व्यापार, विज्ञान और मानव सभ्यता के विकास का भी इतिहास है।पश्चिमी अफ्रीका का यह आईवरी कोस्ट  (Ivory Coast) छोटा सा देश दुनिया के कुल कोको (Cocoa) का लगभग 40% से अधिक हिस्सा अकेले पैदा करता है। ट्रेवलर यूट्यूबरों के पहले भी कुछ डच पत्रकारों ने यहाँ के एक सुदूर गाँव के किसानों का एक वीडियो बनाया था, जिसने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया। दशकों से कोको उगा रहे उन मजदूरों को यह तक नहीं मालूम था कि उनके इन कड़वे बीजों से अंततः बनता क्या है। जब उन्हें पहली बार चॉकलेट की एक बार (Bar) खिलाई गई, तो उनका रिएक्शन था— यह तो बहुत स्वादिष्ट है, हमें लगा था कि गोरे लोग हमारे बीजों से शराब या कोई दवा बनाते हैं। गरीबी और वैश्विक व्यापार की विसंगति के कारण, जो चॉकलेट पश्चिमी देशों के सुपरमार्केट में कुछ रुपयों या डॉलर्स में मिल जाती है, वह उन मजदूरों की कई दिनों की कमाई के बराबर होती है।

​चॉकलेट का सफर आज से लगभग 3,500 से 4,000 साल पहले मध्य अमेरिका (मेसोअमरीका) में शुरू हुआ था। माया  और एज़्टेक  सभ्यताओं ने सबसे पहले कोको के पौधों को खोजा था। इसे ​देवताओं के भोजन की मान्यता थी, माया सभ्यता में कोको को पवित्र माना जाता था। वे इसे 'एक्सोकोलॉटल' कहते थे, जिसका अर्थ था 'कड़वा पानी'। वे आज की तरह मीठी चॉकलेट नहीं खाते थे, बल्कि कोको के बीजों को पीसकर उसमें पानी, सूखी मिर्च, वैनिला और मक्के का आटा मिलाकर एक झागदार, कड़वा और तीखा पेय बनाते थे। एज़्टेक साम्राज्य में कोको के बीज इतने कीमती थे कि उनका इस्तेमाल पैसों की तरह होता था। उदाहरण के लिए, उस दौर में 10 बीजों में एक खरगोश और 100 बीजों में एक अच्छा गुलाम खरीदा जा सकता था।

सोलहवीं शताब्दी में जब स्पेनिश खोजकर्ता हर्नान कोर्टेस ने मेसोअमरीका पर फतह हासिल की, तो उसने इस शाही पेय का स्वाद चखा। वह कोको के बीजों को अपने साथ स्पेन ले गया। ​यूरोपियनों को इसका कड़वा स्वाद पसंद नहीं आया, इसलिए उन्होंने इसमें से मिर्च को हटाकर चीनी, शहद और दालचीनी मिला दी। ​देखते ही देखते यह नया मीठा पेय यूरोप के राजा-महाराजाओं और रईसों का स्टेटस सिंबल बन गया। यह इतना गुप्त और कीमती था कि स्पेन ने करीब 100 साल तक इस रेसिपी को पूरी दुनिया से छिपाकर रखा।

उन्नीसवीं शताब्दी की औद्योगिक क्रांति ने चॉकलेट को पीने वाले पेय से खाने वाली ठोस चॉकलेट (सॉलिड बार) में बदल दिया। इस बदलाव के पीछे बड़ी खोजें थीं।  चॉकलेट बनाने की मशीन (कोचिंग मशीन )(Conching machine) का आविष्कार 'रोडोल्फ लिंड्ट' (Rodolphe Lindt) ने किया था। यह मशीन चॉकलेट को कई दिनों तक लगातार मथती है, जिससे उसकी कड़वाहट दूर होती है और वह मखमली रेशम जैसी चिकनी बनती है।

चॉकलेट की कहानी प्राचीन जंगलों से आधुनिक फैक्ट्रियों तक की अद्भुत यात्रा है। कभी देवताओं का पेय मानी जाने वाली यह वस्तु आज बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी की पसंद बन चुकी है। स्वाद, विज्ञान, इतिहास और संस्कृति — इन सबका अनोखा संगम ही चॉकलेट को इतना विशेष बनाता है। चॉकलेट आज दुनिया भर में खुशियों, त्योहारों और प्यार का प्रतीक है। हर साल इसका वैश्विक बाजार अरबों डॉलर का कारोबार करता है। लेकिन इसके पीछे आइवरी कोस्ट और घाना जैसे देशों के लाखों गरीब किसान और बाल मजदूर हैं, जिन्हें आज भी ग्लोबल ट्रेड की विसंगतियों के कारण इस 'देवताओं के भोजन' का स्वाद नसीब नहीं होता। यही इस मीठी चॉकलेट की सबसे कड़वी दास्तान है।

ब्रजेश कानूनगो


Saturday, 16 May 2026

जलती यात्री बसें : व्यवस्था और संवेदनाओं को राख करती आग

जलती यात्री बसें : व्यवस्था और संवेदनाओं को राख करती आग 

रात का दूसरा पहर था। प्रदेश के दो बड़े नगरों के बीच चलने वाली  बस राष्ट्रीय राजमार्ग पर तेज़ी से दौड़ी चली जा रही थी। खिड़कियों के बाहर अंधेरे खेत पीछे छूट रहे थे और भीतर पीली रोशनी में यात्रियों की अपनी-अपनी छोटी दुनियाएँ बसी थीं। कोई मोबाइल पर धीमे स्वर में बात कर रहा था, कोई ऊँघ रहा था, तो कोई सीट से सिर टिकाकर आने वाले कल के सपने देख रहा था।

बस की पिछली सीट पर चार वर्षीय नन्हा बालक अपनी माँ की गोद में सोया हुआ था। उसकी छोटी उंगलियाँ अब भी खिलौना कार को कसकर पकड़े थीं। माँ कभी उसके माथे को चूमती, कभी खिड़की से बाहर झाँकती। पिता सामने वाली सीट पर बैठे मुस्कुरा रहे थे—“ग्वालियर पहुँचकर इसे किला दिखाऊँगा,” उन्होंने धीरे से कहा था।

अचानक बस के अगले हिस्से से चिंगारियों की तेज़ आवाज़ आई—

“छटाक… छटाक…!” कुछ ही सेकंड में धुएँ की कड़वी गंध फैलने लगी। तभी इंजन के पास से लपटें उठीं और देखते-ही-देखते आग ने प्लास्टिक के सामान को पकड़ लिया। एक भयावह चीख बस में गूँज उठी— आग… आग लग गई!

नींद में डूबे लोग घबराकर उठे। धक्का-मुक्की शुरू हो गई। कोई खिड़की तोड़ने लगा, कोई बच्चों को उठाकर दरवाज़े की ओर भागा। जलते प्लास्टिक से उठता काला धुआँ साँसों को जला रहा था। बस के भीतर अफरा-तफरी का ऐसा दृश्य था मानो हर व्यक्ति मौत से आगे निकल जाना चाहता हो। बच्चे की माँ ने उसे कसकर पकड़ लिया। पिता पीछे की ओर भागे, लेकिन तभी किसी ने चीखकर कहा— पीछे से रास्ता बंद है! बस में आपातकालीन गेट था ही नहीं।

आग अब विकराल हो चुकी थी। प्लास्टिक के पैकेट पिघल-पिघलकर जलते तेल की तरह फर्श पर बह रहे थे। धुआँ इतना घना हो गया कि चेहरों की पहचान मिटने लगी।

किसी तरह पिता ने पत्नी को दरवाज़े तक पहुँचा दिया। बाहर खड़े लोग हाथ बढ़ाकर यात्रियों को खींच रहे थे। तभी माँ की गोद अचानक हल्की हो गई।

बालक… अंदर रह गया था।

“मेरा बच्चा…! मेरा बच्चा अंदर है…!”

उसकी चीख रात के सन्नाटे को चीरती चली गई।

उसकी आँखों के सामने बस धधक रही थी और भीतर उसका मासूम बेटा—जो कुछ देर पहले खिलौना कार पकड़े मुस्कुरा रहा था।

कुछ मिनटों बाद सब शांत हो गया।

बस अब सिर्फ जलता हुआ ढाँचा थी। सड़क पर धुआँ तैर रहा था। यात्रियों की सिसकियाँ हवा में घुली थीं। दूर कहीं उस बालक की छोटी खिलौना कार सड़क किनारे पड़ी थी—आधी जली हुई, आधी बची हुई। उस रात केवल एक बच्चा नहीं मरा था। मर गई थी व्यवस्था की लापरवाही। मर गई थी यात्रियों की सुरक्षा के प्रति संवेदनहीनता। और जल गई थी वह उम्मीद कि हर सफर सुरक्षित होकर घर तक पहुँचता है। सुबह अखबारों में खबर छपी—

शार्ट सर्किट से बस में आग, एक मासूम की मौत।

लेकिन उन चार-पाँच शब्दों के पीछे एक माँ की टूटी हुई दुनिया थी, एक पिता की असहाय आँखें थीं, और एक नन्हा सपना था… जो ग्वालियर का किला देखने से पहले ही राख बन गया।

आप इसे एक मार्मिक कहानी कह लें लेकिन यात्री बसों में लगने वाली आग के बाद लगभग ऐसा ही कुछ घटित होता है। फिर वही होता है जो हमेशा से होता रहा है। सरकारें मुआवजा देनें की घोषणाएं करती हैं। नियम कानूनों की उपेक्षा की जांच और दोषियों को सजा देने का वायदा किया जाता है। थोड़े दिनों बाद किसी और घटना का समाचार पढ़ने को मिल जाता है। 

यात्री वाहनों और बसों में आग लगने की बढ़ती घटनाएं बेहद चिंताजनक हैं। हाल के महीनों में देश के अलग-अलग हिस्सों से ऐसी ही कई डरा देने वाली खबरें सामने आई हैं। सफर को सुरक्षित बनाने के लिए इन हादसों के मूल कारणों को समझना, प्रशासनिक कमियों को पहचानना और कड़े कदम उठाना बेहद जरूरी है।

हाल ही  (मई 2026) में इंदौर से ग्वालियर जा रही एक इंटरसिटी बस में शार्ट सर्किट के कारण भीषण आग लग गई। अधिकांश यात्री तो समय रहते बाहर निकल आए, लेकिन आपातकालीन गेट न होने और बस में प्लास्टिक का व्यावसायिक सामान लोड होने के कारण आग इतनी तेजी से फैली कि एक 4 वर्षीय मासूम बच्चा अंदर ही फंस गया और उसकी जान चली गई। इसी प्रकार (मई 2026) में हैदराबाद से तिरुपति जा रही एक निजी ट्रैवल्स की बस का पिछला टायर जाम होने के कारण घर्षण (Friction) पैदा हुआ और टायर ब्लास्ट के साथ आग लग गई। गनीमत रही कि ड्राइवर की सूझबूझ से सभी 36 यात्रियों को सुरक्षित उतारा गया, लेकिन बस पूरी तरह जलकर राख हो गई। मार्च में इसी राज्य के मार्कापुरम में एक बस और ट्रक की टक्कर के बाद लगी आग में 14 लोगों की मौत हो गई थी। अप्रैल 2026 में इंदौर से सागर जा रही एक स्लीपर कोच बस के स्टेयरिंग के पास शॉर्ट सर्किट हुआ, जिसमें 50 यात्री बाल-बाल बचे। वहीं मैनपुरी में भी एक चलती रोडवेज बस में शॉर्ट सर्किट से आग भड़क उठी थी।

दरअसल, वाहनों में आग लगने के कई कारण सामने आते रहे हैं, जैसे आधुनिक बसों में मोबाइल चार्जिंग पॉइंट, एसी (AC), हैवी लाइट्स और म्यूजिक सिस्टम के लिए अतिरिक्त वायरिंग की जाती है। यह काम अक्सर अप्रशिक्षित मैकेनिकों से और घटिया क्वालिटी के तारों से करवा लिया जाता  जाता है। अत्यधिक गर्मी में लोड बढ़ने पर तार आपस में चिपक जाते हैं और शॉर्ट सर्किट हो जाता है। कई बार गर्मियों में सड़क का तापमान बहुत ज्यादा होता है। यदि टायर पुराने हों, उनमें हवा का दबाव सही न हो, या ब्रेक शू (Break Shoe) जाम होने के कारण पहिया रगड़ खा रहा हो, तो भयंकर घर्षण से टायर आग पकड़ लेते हैं। इंजन का रखरखाव ठीक नहीं होने से भी दुर्घटना का खतरा बन जाता है,  इंजन में ऑयल या फ्यूल लीक होना, कूलेंट का कम होना और समय पर सर्विसिंग न होने से इंजन ओवरहीट हो जाता है, जो आग का कारण बनता है। कई बस संचालक अतिरिक्त कमाई के चक्कर में यात्रियों की डिक्की या छत पर प्लास्टिक का सामान, केमिकल, या अन्य ज्वलनशील व्यावसायिक पार्सल लाद देते हैं, जो आग को तेजी से भड़काने का काम करते हैं।

यद्यपि आग लगने की घटनाओं से  बचाव के यात्रियों और ऑपरेटरों के स्तर पर भी कई उपाय किए गए हैं किंतु प्रश्न यह है कि क्या इन पर पर्याप्त ध्यान दिया जाता है? हर बस में कम से कम दो चालू हालत वाले फायर एक्सटिंग्विशर होने अनिवार्य होने चाहिए—एक ड्राइवर के पास और दूसरा आपातकालीन गेट के पास। बसों की सीटों और अंदरूनी हिस्सों में ऐसे फोम और कपड़ों का इस्तेमाल हो जो आग न पकड़ें और जलने पर जहरीला धुआं पैदा न करें (अक्सर लोग आग से कम, जहरीले धुएं से दम घुटने के कारण मरते हैं)। इंजन कंपार्टमेंट में ऑटोमैटिक फायर डिटेक्शन एंड सप्रेशन सिस्टम (FDSS) लगाया जाना चाहिए, जो आग लगते ही खुद-ब-खुद उसे बुझा दे। आपातकालीन गेट के पास कोई सीट या सामान नहीं होना चाहिए ताकि वह आसानी से खुल सके। खिड़कियों के शीशे तोड़ने वाले विशेष हथौड़े (Emergency Hammers) हर दो-तीन सीट के बाद लगे होने चाहिए।

शासन और प्रशासन की भी ऐसे मामलों में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निश्चित की गई है , फिर भी कहीं तो चूक हो ही रही होगी, घटनाएं और उनकी जांच रिपोर्टें तो यही इंगित करती रही हैं।  कई बार आरटीओ (RTO) विभाग द्वारा वाहनों की फिटनेस जांच अक्सर केवल कागजों पर या सतही तौर पर होने की आशंका होती है। बसों के भीतर की वायरिंग, इमरजेंसी गेट के काम करने की स्थिति और टायर की गुणवत्ता की बारीकी से शायद जांच में कोई कसर रह जाती है। जब कोई बड़ा हादसा हो जाता है, तो प्रशासन दो-चार दिन चेकिंग अभियान चलाकर  जुर्माने काटता है और फिर स्थिति वैसी ही हो जाती है। निरंतर कड़ाई का अभाव बस ऑपरेटरों के हौसले बुलंद रखता है। स्लीपर बसों में क्षमता से अधिक केबिन बना दिए जाते हैं, जिससे गैलरी  इतनी संकरी हो जाती है कि भगदड़ मचने पर दो लोग एक साथ निकल भी नहीं सकते। कई बार प्रशासन इन अवैध बदलावों को देखकर भी अनदेखा कर देता है। 

वाहनों के रखरखाव और यात्री बसों के सुरक्षित संचालन के लिए हमारे यहां पर्याप्त नियम और कानून हैं बस उनका ईमानदारी से पालन करने में ही कहीं न कहीं हमसे चूक हो जाती है।  बसों की फिटनेस चेकिंग के लिए रैंडम और औचक निरीक्षण (Surprise Inspection) होने चाहिए। इसमें सीसीटीवी या डिजिटल ट्रैकिंग का इस्तेमाल हो ताकि भ्रष्टाचार की गुंजाइश न रहे। नियमों का उल्लंघन करने वाले, आपातकालीन गेट न रखने वाले या बस में अवैध कमर्शियल माल ढोने वाले ऑपरेटरों के परमिट तुरंत और स्थायी रूप से रद्द किए जाने चाहिए। सरकार को अनिवार्य नियम बनाना चाहिए कि हर कमर्शियल ड्राइवर और कंडक्टर को 'फायर सेफ्टी और इवेक्यूएशन' (आग लगने पर यात्रियों को निकालने) की बाकायदा ट्रेनिंग मिले और इसका सर्टिफिकेट होने पर ही उन्हें गाड़ी चलाने की अनुमति दी जाए।

और हां! हम यात्रीगण क्या सावधानी रखेंगे ? जब भी हम लंबी दूरी या स्लीपर बस से सफर करें, तो सुरक्षा की दृष्टि से हमेशा आपातकालीन खिड़की  और हथौड़ी की स्थिति की जांच पहले ही कर लें। यात्रा के दौरान धूम्रपान न करें और किसी भी ज्वलनशील सामग्री को साथ ले जाने से बचें। जहां तक हो सके अपनी यात्रा के लिए हमेशा मूल कंपनी द्वारा निर्मित या प्रमाणित प्रीमियम बसों (जैसे राज्य परिवहन) को प्राथमिकता दें। बाकी तो शायद हमारे बस में है भी नहीं। 

सच तो यह है कि बस संचालकों, शासन, प्रशासन को यात्री सुरक्षा में किसी भी कमी के लिए किसी भी स्तर पर समझौता नहीं करने की प्रवृत्ति का विकास अपने भीतर करना होगा, तभी बसों में आग लगने की हृदय विदर्क घटनाओं से बचा जा सकेगा। 


ब्रजेश कानूनगो 


Friday, 15 May 2026

भगदड़ की घटनाएँ : अफवाह के मनोविज्ञान पर चिंतन जरूरी

भगदड़ की घटनाएँ : अफवाह के मनोविज्ञान पर चिंतन जरूरी

हाल ही में जुलाई माह की 27 तारीख को हरिद्वार के मनसा देवी मंदिर में एक भगदड़ में 8 लोगों की मौत हो गई और कई घायल हुए। इस भगदड़ का कारण बिजली के करंट की अफवाह थी यद्यपि प्रारंभिक तौर पर  उत्तराखंड पावर कॉर्पोरेशन ने इसे खारिज कर दिया है। राज्य के मुख्यमंत्री ने घटना की न्यायिक जांच के आदेश दिए और मृतकों के परिजनों को आर्थिक सहायता देने की घोषणा की। संकट के समय पीड़ितों की मदद करना एक अच्छा कदम अवश्य होता है, लेकिन ऐसे हादसे शासन, प्रशासन के अलावा प्रबुद्ध विचारकों और जागरूक नागरिकों  को भी चिंतन करने को बाध्य करते हैं।

ऐसा नहीं है कि धार्मिक आयोजनों में भगदड़ का हादसा पहली बार हुआ हो। 2008 में हिमाचल प्रदेश के नैना देवी मंदिर में भगदड़ में 146 लोगों की मौत हुई थी। 2010 में पश्चिम बंगाल के गंगासागर मेला में मकर संक्रांति के अवसर पर भगदड़ में कई लोगों की जान गई थी। 2013 में इलाहाबाद कुंभ मेले में भगदड़ में कई लोग घायल हुए थे। 2016 में पुत्तिंगल देवी मंदिर, केरल में आतिशबाजी के कारण हुए विस्फोट में 100 से अधिक लोगों की मौत हुई थी। 2024 में उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले में एक धार्मिक आयोजन के दौरान भगदड़ में 121 लोगों की मौत हुई थी। अभी हाल ही में महाकुंभ 2025 के दौरान  प्रयागराज में भगदड़ की घटना 29 जनवरी 2025 को मौनी अमावस्या के अवसर पर हुई, जब श्रद्धालुओं की भारी भीड़ शाही स्नान के लिए उमड़ी। इस हादसे में कम से कम 38 लोगों की मृत्यु हो गई और कई अन्य घायल हो गए।

धार्मिक स्थलों पर भीड़ और श्रद्धालुओं का उमड़ना और हादसे हो जाना एक आम समस्या हो गई है, जिसमें अक्सर सुरक्षा के अभाव में लोगों की जान जोखिम में पड़ जाती है। इन हादसों में भगदड़ और अन्य दुर्घटनाएं शामिल हैं, किंतु सबसे पहले इनके पीछे किसी अफवाह का भीड़ में फैल जाना रहा है। ऐसा क्यों होता है?

यह अवश्य है कि अफवाहें एक प्रकार की सामाजिक और मनोवैज्ञानिक लक्षण हैं जो अक्सर गलत सूचनाओं के प्रसार के रूप में सामने आता रहा है। अगर गौर करें तो जब लोगों को किसी खास स्थिति के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं होती है, तो वे अफवाहों पर विश्वास करने लगते हैं। अनिश्चितता और भय के समय में अफवाहें और अधिक तेजी से फैलती हैं। दूसरी बात, लोग सामान्यतः अपने समूह या समुदाय में अन्यों से विशेष प्रभावित होते हैं। यदि एक समूह में कोई अफवाह फैलती है, तो लोग उसे सच मानने लगते हैं। अक्सर अफवाहें मौखिक संचार के माध्यम से फैलती हैं। जब लोग एक-दूसरे से बात करते हैं, तो वे अक्सर जानकारी को बढ़ा चढ़ाकर विकृत या अतिरंजित बनाकर आगे बढ़ाने लगते हैं और भीड़ में घबराहट बढ़ती जाती है।

ऐसा नहीं है कि ये अफवाहें वैसे ही फैलती जाती है, इसके पीछे कई अन्य घटक भी शामिल होते हैं। धार्मिक स्थलों पर भीड़ प्रबंधन की कमी एक प्रमुख कारण है ही, जिसमें आयोजकों और प्रशासन की लापरवाही के कारण भगदड़ जैसी घटनाएं हो जाती हैं। आयोजनों में अव्यवस्था और लापरवाही के कारण भी हादसे होते हैं, उचित निकास मार्ग न होना और सुरक्षा उपकरणों की पर्याप्त उपलब्धता नहीं होना भी दुर्घटना के भयंकर स्वरूप का कारक बन जाते हैं।

अफवाहों की तुरंत जांच करना और उन्हें सत्यापित करना भी बेहद महत्वपूर्ण कदम होता है। अन्य व्यवस्थाओं में उलझा प्रशासन विश्वसनीय स्रोतों से जानकारी प्राप्त करने और तथ्यों की पुष्टि करने में कभी कभी चूक जाता है या वह इस कार्य में तनिक देर से सक्रिय हो पाता है। तब तक अफवाह अपनी आग फैला चुकी होती है। ऐसे में स्पष्ट और पारदर्शी संचार और सूचना तंत्र अफवाहों को फैलने से रोकने में मदद कर सकता है। लोगों को सटीक जानकारी प्रदान करना और उन्हें अफवाहों के बारे में जागरूक करना भी महत्वपूर्ण है। प्रशासन के इन उपायों के बावजूद भी यदि घटनाएं होती जा रही हैं तो निश्चित ही यह मुद्दा बहुत महत्वपूर्ण और विचारणीय हो जाता है।

जरूरी है कि अब इस दिशा में गंभीरता और प्राथमिकता से ध्यान दिया जाना होगा। लोगों को अफवाहों के बारे में शिक्षित करना और उन्हें सिखाना कि कैसे अफवाहों की पहचान करें और उनसे निपटें शायद एक प्रभावी तरीका हो सकता है। अफवाहों के मनोविज्ञान को उच्चतम बौद्धिकता से समझकर और संपूर्ण देश में व्यापक कदम उठाकर नकारात्मक प्रभावों को कम करने की कोशिश होना चाहिए। शायद तभी हम एक अधिक सूचित और जागरूक समाज का निर्माण कर सकते हैं।

ब्रजेश कानूनगो

पेड़ों की कटाई में नया आयाम है सोलर पावर प्लांट योजनाएं

पेड़ों की कटाई में नया आयाम है सोलर पावर प्लांट योजनाएं

भारत में कई बड़ी विकास परियोजनाओं के लिए पेड़ों को बड़ी संख्या में काटा जाता रहा है। आधुनिक जीवन की सुविधाओं के लिए भी कई योजनाएं बनती रहीं हैं जिनके कारण पेड़ों की व्यापक रूप से कटाई की गई है।  प्रमुख रूप से अनेक बांध और जलाशय परियोजनाओं का उल्लेख किया जा सकता है,  कई बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाएं हैं जिनके लिए वनों की कटाई हुई है। चाहे वह सतलुज नदी पर स्थित, पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में फैली हुई भाखड़ा नांगल परियोजना हो, उड़ीसा में महानदी पर हीराकुंड बांध परियोजना हो, नर्मदा नदी पर स्थित, मध्य प्रदेश, गुजरात,महाराष्ट्र और राजस्थान में फैली हुई सरदार सरोवर परियोजना रही हो। इसके अलावा  सड़कों और रेलवे लाइनों के निर्माण के लिए भी पेड़ों को काटा जाता रहा है। शहरों के विस्तार और विकास के कारण  पेड़ों की संख्या घटती चली जाती है ताकि नए घर, सड़कें, और अन्य बुनियादी ढांचे बनाए जा सकें। उद्योगों की निर्माण परियोजनाओं  तथा खनन और उत्खनन परियोजनाओं में खनिज संसाधनों की खोज और उनके उपयोग के लिए वनों को व्यापक रूप से समाप्त किया जाता रहा है।

इन परियोजनाओं के कारण वनों की कटाई और पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, इसलिए इन परियोजनाओं को लेकर पर्यावरण कार्यकर्ताओं, जागरूक नागरिकों, बुद्धिजीवियों सहित किसानों और उन क्षेत्रों के प्रभावित होने वाले ग्रामीणों द्वारा विरोध और प्रतिरोध में आवाजें उठाई जाती रही हैं। जिनके कारण विकास के नकारात्मक पक्ष को कम किए जाने में मदद भी मिली है। 

बहुत लोगों को आज भी 1970 के दशक के पर्यावरण कार्यकर्ता सुंदरलाल बहुगुणा जी की प्रेरणा में हुए #चिपको #आंदोलन की स्मृति अवश्य होगी जिसमें उत्तराखंड में वनों की कटाई के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन हुआ था तथा महिलाओं ने पेड़ों को काटने से रोकने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इस आंदोलन के परिणामस्वरूप सरकार ने हिमालयी क्षेत्रों में 15 वर्षों के लिए वनों की कटाई पर रोक लगा दी थी। 

हाल ही की बात करें तो महाराष्ट्र राज्य में आरे कॉलोनी में मेट्रो कार शेड परियोजना एक बहुचर्चित और  विवादित मुद्दा है, जिसमें पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन बनाने की चुनौती खड़ी हुई। इस परियोजना के तहत मुंबई मेट्रो के लिए कार शेड बनाने के लिए आरे कॉलोनी में पेड़ों की कटाई की जा रही थी, जिसका व्यापक विरोध हुआ।

मुंबई मेट्रो की लाइन-3 के लिए कार शेड बनाने के लिए आरे कॉलोनी में जमीन का उपयोग करने की योजना थी। जिसका उद्देश्य मुंबई में सार्वजनिक परिवहन को बेहतर बनाना और यातायात की समस्या को कम करना था। आरे कॉलोनी में पेड़ों की कटाई के खिलाफ व्यापक विरोध हुआ, जिसमें पर्यावरणविद, सामाजिक कार्यकर्ता और बॉलीवुड हस्तियों ने भाग लिया। उनका तर्क था कि आरे कॉलोनी एक हरित क्षेत्र है और पेड़ों की कटाई से पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। दूसरी ओर, परियोजना के समर्थकों का तर्क था कि मेट्रो परियोजना से मुंबई के लोगों को बेहतर परिवहन सुविधा मिलेगी और शहर के विकास में मदद मिलेगी। इस मुद्दे पर उच्चतम न्यायालय में सुनवाई हुई, जिसमें न्यायालय ने मुंबई मेट्रो को आरे कॉलोनी में 84 पेड़ काटने की अनुमति दी। हालांकि, महाराष्ट्र सरकार ने बाद में इस परियोजना को कांजुरमार्ग में स्थानांतरित करने का निर्णय लिया। सरकार के इस निर्णय से परियोजना की लागत में वृद्धि होगी और परियोजना के पूरा होने में देरी हो सकती है।  कहा जा रहा है कि इससे पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम करने में मदद मिलेगी। 

हाल ही में इन सबसे हटकर #राजस्थान में सोलर पावर प्लांट और सौर्य ऊर्जा के विकास को लेकर एक नया मुद्दा गर्म होता गया है।  

दरअसल राजस्थान में सोलर पावर प्लांट पार्क स्थापित करने के लिए पेड़ों की कटाई की घटनाएं सामने आई हैं। जोधपुर जिले के फलोदी तहसील में सोलर प्लांट लगाने के लिए लगभग 10,000 खेजड़ी के पेड़ काट दिए गए थे, जिस पर बिश्नोई समाज ने कड़ा विरोध जताया और आंदोलन किया। खेजड़ी राजस्थान का राज्य वृक्ष है, और इसकी कटाई पर लोगों ने ऐतराज जताया और आंदोलन की चेतावनी दी ।

राजस्थान में सौर ऊर्जा संयंत्र योजनाओं के अंतर्गत पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना के तहत राजस्थान में 5 लाख घरों की छतों पर सोलर पैनल लगाने का लक्ष्य है। जानकारी के अनुसार योजना में आवेदन शुल्क, अमानत राशि और मीटर चार्ज नहीं लिया जाएगा, और 3 किलोवाट तक के सोलर पैनल पर 78,000 रुपये की सब्सिडी दी जाएगी। इसी तरह सौर कृषि आजीविका योजना में किसानों को अपनी बंजर भूमि पर सोलर प्लांट लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। योजना में 30% की सब्सिडी सरकार द्वारा प्रदान की जाएगी। कुसुम सोलर योजना के अंतर्गत किसानों को सोलर पंप सेट्स और सोलर प्लांट्स की स्थापना के लिए सब्सिडी और वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। योजना में 7.5 HP या उससे कम की क्षमता वाले सोलर पंप सेट्स पर 60% तक की सब्सिडी दी जाती है। इन योजनाओं का उद्देश्य राजस्थान में सौर ऊर्जा को बढ़ावा देना और ऊर्जा आत्मनिर्भरता को बढ़ाना है। 

विशेषज्ञों का मानना है कि सोलर प्लांट्स के कारण कई पर्यावरणीय संकट संभावित हैं जिनसे इको सिस्टम प्रभावित होता है। सोलर प्लांट्स के लिए बड़े क्षेत्रों में भूमि की आवश्यकता होती है, जिससे वनों की कटाई और भूमि उपयोग में परिवर्तन होता है।

सोलर प्लांट्स के निर्माण और संचालन से जैव विविधता को नुकसान पहुंच सकता है, खासकर यदि प्लांट्स संवेदनशील या संरक्षित क्षेत्रों में स्थित हों। सोलर प्लांट्स के निर्माण और संचालन में जल की आवश्यकता होती है, जिससे जल संसाधनों पर दबाव पड़ सकता है। सोलर प्लांट्स के निर्माण से मिट्टी का क्षरण हो सकता है, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता और उर्वरता प्रभावित होती है। सोलर प्लांट्स के पैनल्स और अन्य संरचनाओं से पक्षियों और अन्य जीवों की मृत्यु हो सकती है, खासकर यदि प्लांट्स पक्षियों के प्रवास मार्ग में स्थित हों।

देश के एक प्रमुख अखबार की हाल ही की रिपोर्ट से पता चलता है कि सोलर प्लांट के जुनून से राजस्थान में इको सिस्टम के तबाह होने की आशंका बलवती हुई है।  अखबार के अनुसार बीकानेर से बाड़मेर तक के चार जिलों में अब तक 26 लाख पेड़ काटे जा चुके हैं और 38 लाख और काटे जाएंगे।  लोगों का कहना है कि केवल बंजर जमीनों पर ही प्लांट स्थापित किए जाएं जबकि शासन प्रशासन की ओर से आश्वासन दिया जा रहा है कि कम से कम वृक्ष काटे जाएंगे और वृक्षों को अन्य स्थानों पर शिफ्ट करने का भी कार्य होगा। राज्य वृक्ष खेजड़ी को काटने पर बड़ा जुर्माना वसूला जाएगा। 

आगे देखने की बात यह होगी कि किन उपायों को अपनाकर सोलर प्लांट्स के वृहद अभियान के तहत पर्यावरणीय दुष्प्रभावों को कम किया जाएगा और इको सिस्टम की रक्षा की जा सकगी। प्रतीक्षा करें!


ब्रजेश कानूनगो

प्राकृतिक दुर्घटना नहीं होती स्कूल भवनों का ढहना

प्राकृतिक दुर्घटना नहीं होती स्कूल भवनों का ढहना

शिक्षण संस्थाओं में होने वाली दुर्घटनाएं एक गंभीर समस्या है, जिसमें कई बार जान-माल की क्षति भी हो जाती है। प्राकृतिक आपदाएं भी एक कारण होती हैं जिनसे हादसे हो जाते हैं। भारी बारिश या बाढ़ के कारण शिक्षण संस्थाओं को बंद करना पड़ता है, जिससे छात्रों और शिक्षकों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। जुलाई 2025 में हरियाणा में भारी बारिश के कारण जिला प्रशासन ने दो दिन के लिए शिक्षण संस्थाओं को बंद रखने का निर्देश दिया था। अन्य राज्यों में भी भारी बारिश या कड़ाके की ठंड के दौरान सावधानी के तौर पर स्कूलों की छुट्टियां घोषित की जाती रही हैं। भूकंप जैसी अन्य प्राकृतिक आपदाएं भी शिक्षण संस्थाओं के लिए खतरनाक हो सकती हैं। इन आपदाओं से निपटने के लिए उन क्षेत्रों के स्कूलों और कॉलेजों में सुरक्षा उपायों का होना तब बहुत आवश्यक हो जाता है।

इनसे हटकर भी विद्यार्थियों का जीवन कुछ कारणों से संकट में पड़ जाता है, मसलन स्कूल बसों या कॉलेज वाहनों से जुड़ी सड़क दुर्घटनाएं एक आम समस्या होती गई है। इन दुर्घटनाओं को रोकने के लिए वाहनों की नियमित जांच और ड्राइवरों के प्रशिक्षण की आवश्यकता  सुनिश्चित की जाने के उपाय आदि किए जाते हैं बावजूद इसके घटनाएं जारी रहती आई हैं। भवन में आग लगने, बिजली के झटके आदि या इस तरह की अन्य घटनाएं भी सुनने को मिलती रहती हैं। इन घटनाओं से निपटने के लिए स्कूलों और कॉलेजों में सुरक्षा उपकरणों और आपातकालीन योजनाओ की व्यवस्था करने की कोशिश कितनी की जाती है, यह भी देखा जाना जरूरी है।

ऐसी दुर्घटनाओं से बचाव के लिए प्राय: सीसीटीवी कैमरे लगाना, सुरक्षा गार्ड तैनात करना, और आपातकालीन निकास मार्गों की व्यवस्था की जाती है। छात्रों, शिक्षकों, और कर्मचारियों को सुरक्षा और आपातकालीन प्रक्रियाओं के बारे में जागरूक और प्रशिक्षण देना आवश्यक है। स्कूलों और कॉलेजों के भवनों और उपकरणों की नियमित जांच होती रहे तो दुर्घटनाओं को रोका या कम अवश्य किया जा सकता है। किन्तु हाल ही की कुछ खबरें हमे चौंकाती ही नहीं बल्कि व्यथित कर देती हैं। सबसे बढ़कर स्कूल भवनों के जर्जर हिस्सों के गिर जाने की घटनाएं बहुत दुखद और चिंताजनक हैं। 

स्कूल भवनों के जर्जर होते जाने के पीछे कई कारण नजर आते हैं। उनके रखरखाव और पुराने भवनों की उचित मरम्मत का अभाव भी दिखाई देता है। आवश्यक धन राशि का समय पर उपलब्ध नहीं होना या प्राप्त हो जाने पर उसका मरम्मत कार्य पर खर्च न होकर अन्य सुविधाओं में उपयोग कर लेना भी भवनों की मरम्मत में विलंब का कारण हो जाता है। इस राशि के खर्च में भ्रष्टाचार की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता, घटिया निर्माण भी दुर्घटना की एक परोक्ष वजह बन जाता है। अंततः इन सब अनियमितताओं और लापरवाही का नतीजा जन धन हानि के रूप में दिखाई देता है। बच्चों और शिक्षकों को अपनी जानें भी गंवानी पड़ जाती है या गंभीर रूप से वे घायल हो जाते हैं।

जुलाई 2025 में झालावाड़ के पीपलोदी गांव में एक सरकारी स्कूल की छत गिरने से 6 बच्चों की मौत हो गई और 30 से अधिक बच्चे घायल हुए। यद्यपि इस हादसे के बाद प्रशासन ने 5 शिक्षकों को निलंबित कर दिया और राज्य भर के सभी सरकारी स्कूलों की जर्जर इमारतों की जांच शुरू कर दी गई है। क्या इन सब से उन पालकों के हृदय पर उभरे दुख के पहाड़ का वजन कम हो जाएगा? उनकी आंखों के आंसू थम जाएंगे। जिन मां बाप ने अपने और बच्चों को लेकर सुखमय सपने देखे होंगे, उन पर तो जैसे वज्रपात ही हो गया होगा, उनका क्या होगा? 

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। जुलाई 2024 में दिल्ली के दरियागंज में एक निजी स्कूल की दीवार गिरने से कई वाहनों को नुकसान पहुंचा था। शुक्र है इस घटना में कोई हताहत नहीं हुआ, लेकिन यह घटना स्कूलों की सुरक्षा को लेकर चिंता तो बढ़ाती ही है।

उत्तराखंड में सितंबर 2022 में चम्पावत जिले के मौनकांडा स्कूल में शौचालय की छत गिरने से एक छात्र की मौत हो गई थी। इस घटना के बाद उत्तराखंड सरकार ने राज्य भर के जर्जर स्कूल भवनों को ध्वस्त करने के आदेश दिए थे।

राजस्थान  में झालावाड़ के सरकारी स्कूल की छत गिरने की घटना के तुरंत बाद एक सप्ताह के भीतर जैसलमेर के पूनमनगर गांव के स्कूल गेट का पीलर गिरने से एक सात वर्षीय छात्र की मौत और एक शिक्षक के घायल होने का समाचार पुनः स्तब्ध कर देता है। बताया जाता है नागौर और सिरोही में भी ऐसी ही घटनाएं प्रकाश में आईं हैं। एक सूचना के अनुसार राज्य में 2256 स्कूल और एक हजार से अधिक आंगनबाड़ी केंद्र जर्जर हालत में हैं ।

यह पढ़कर तब हमारी पीड़ा और बढ़ जाती है जब जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति बच्चों की मौत पर कहते हैं कि, स्कूल की मरम्मत कार्य एक सरकारी प्रोसेस होता है, इसमें टाइम लगता है। यह कोई घर का काम तो है नहीं कि जेब से पैसे निकालकर दे दें।

जिम्मेदारों के ऐसे असंवेदनशील बयानों से यही धारणा और आशंका  बलवती होती है कि छात्रों की शिक्षा, शिक्षण संस्थाओं की सुरक्षा को लेकर हम कितने गंभीर होकर सोच पाते हैं। विचार कीजिए! 


ब्रजेश कानूनगो

पेपर लीक : क्या व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के लिए बारहवीं की परीक्षा आधार बनें !

पेपर लीक : 

क्या व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के लिए बारहवीं की परीक्षा आधार बनें !

भारत में मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं (जैसे  नीट यूजी 2026) में पेपर लीक होना एक गंभीर मुद्दा है, जो न केवल लाखों छात्रों की मेहनत पर पानी फेर देता है।  जब पेपर लीक होता है, तो अयोग्य छात्र पैसे के दम पर सीट हासिल कर लेते हैं। इससे उन मेहनती और योग्य छात्रों का भविष्य बर्बाद हो जाता है जिन्होंने वर्षों तक दिन-रात मेहनत की होती है। बार-बार परीक्षाओं का रद्द होना या धांधली की खबरें आना छात्रों में डिप्रेशन, चिंता और सिस्टम के प्रति अविश्वास पैदा करता है। एक औसत भारतीय परिवार अपने बच्चे को डॉक्टर बनाने के लिए जीवन भर की कमाई लगा देता है। परीक्षा रद्द होने पर कोचिंग, फॉर्म और यात्रा का अतिरिक्त आर्थिक बोझ माता-पिता पर पड़ता है। यदि पेपर लीक की सुविधा से बिना योग्यता वाले लोग डॉक्टर बनेंगे, तो भविष्य में देश की स्वास्थ्य सेवाओं का स्तर गिरेगा, जो सीधे तौर पर जन-स्वास्थ्य के लिए खतरा है।

केवल मेडिकल परीक्षाओं में ही नहीं हमारे यहां अन्य व्यावसायिक प्रवेश परीक्षाओं में भी ऐसी पेपर लीक हो जाने की घटनाएं होती रहीं हैं। इंजीनियरिंग, शिक्षक भर्ती, पुलिस भर्ती, बैंकिंग और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार सामने आए पेपर लीक मामलों ने युवाओं में निराशा और आक्रोश पैदा किया है।

नीट 2024 के प्रश्नपत्र लीक होने और अनियमितताओं के आरोपों ने पूरे देश में विवाद खड़ा कर दिया। कई राज्यों में गिरफ्तारी हुई और परीक्षा प्रक्रिया की पारदर्शिता पर प्रश्न उठे। यूजीसी नेट (UGC-NET 2024) परीक्षा को सरकार ने रद्द कर दिया क्योंकि इसके प्रश्नपत्र डार्क वेब और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर प्रसारित होने की आशंका जताई गई। Staff Selection Commission तथा रेलवे भर्ती परीक्षाओं में कई बार तकनीकी गड़बड़ियों और पेपर लीक के आरोप लगे। 2018 में व्यापक छात्र आंदोलन भी हुए। व्यापमं घोटाला भारत के सबसे चर्चित परीक्षा घोटालों में से एक रहा। इसमें मेडिकल प्रवेश, भर्ती परीक्षाओं और फर्जी अभ्यर्थियों के बड़े नेटवर्क का खुलासा हुआ। पुलिस भर्ती, पटवारी परीक्षा, शिक्षक भर्ती आदि में भी कई राज्यों में प्रश्नपत्र लीक की घटनाएँ सामने आईं। इससे लाखों परीक्षार्थियों को पुनः परीक्षा देनी पड़ी।

दरअसल, पेपर लीक अब छोटे स्तर की घटना नहीं रह गई है। इसमें कई बार कोचिंग माफिया, साइबर अपराधी, प्रिंटिंग प्रेस कर्मचारी, दलाल और कुछ भ्रष्ट अधिकारी शामिल पाए जाते हैं। संगठित अपराध और भ्रष्टाचार के कारण हमारी परीक्षा प्रणाली कमजोर और असुरक्षित हो गई है। कई बार प्रश्नपत्रों की छपाई, परिवहन और वितरण के दौरान पर्याप्त डिजिटल एवं भौतिक सुरक्षा नहीं होने से गोपनीयता भंग हो जाती है। बेरोजगारी और अत्यधिक प्रतिस्पर्धा के चलते तथा सीमित नौकरियों और सीटों के कारण परीक्षा पास करने का दबाव बहुत अधिक है। कुछ अभ्यर्थी गलत रास्ता अपनाने को लालायित हो जाते हैं। सोशल मीडिया के टेलीग्राम, व्हाट्सऐप, ब्लूटूथ डिवाइस, डार्क वेब और हैकिंग तकनीकों का उपयोग कर प्रश्नपत्र तेजी से विस्तारित होने लगते हैं। अपराधियों को पकड़ लिए जाने के बावजूद लंबी कानूनी प्रक्रिया और दोषसिद्धि दर कम होने के कारण अपराधियों में दंड का डर कम दिखाई देता है।

घटनाओं के हो जाने के बाद एक बना बनाया रवैया अपना लिया जाता है। मामलों की जांच सीबीआई याने केंद्रीय जांच ब्यूरो को सौंप दी जाती है। इस जांच के परिणाम और दोषियों के खिलाफ कार्यवाही इतनी देर से हो पाती है कि छात्रों की प्रवेश की उम्र ही निकल जाती है। 

खबरों के अनुसार हाल ही की 3 मई 2026 को आयोजित नीट यूजी (NEET-UG 2026) परीक्षा पेपर लीक प्रकरण में जांच बहुत तेज हो गई है और इसमें महत्वपूर्ण प्रगति हुई है, बताया जाता है कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने इस मामले में मास्टरमाइंड्स सहित 5 लोगों को गिरफ्तार किया है, जिन्हें दिल्ली की एक अदालत ने 7 दिनों की CBI हिरासत में भेज दिया है। प्रारंभिक जांच में यह भी खुलासा हुआ है कि पेपर बाहर से नहीं बल्कि सिस्टम के अंदर से ही लीक किया गया , जिसमें नेशनल टेस्टिंग एजेंसी के किसी करीबी या अंदरूनी व्यक्ति की भूमिका भी हो सकती है।

अब होगा यह कि आरोपियों के खिलाफ वित्तीय जांच  शुरू कर दी जाएगी, संदिग्धों के संपत्तियों का पता लगाया जाएगा। सीबीआई द्वारा कई जगहों पर छापेमारी की जाएगी और आरोपियों के पास से आपत्तिजनक दस्तावेज, जाली स्टैम्प और हार्ड डिस्क आदि को अपने कब्जे में लिया जाएगा या यह सब अब तक किया भी जा चुका हो। समाचार है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने परीक्षा फिर से कराने  की याचिका को खारिज कर दिया है, लेकिन गड़बड़ी करने वालों के खिलाफ कार्रवाई जारी रखने की बात कही है। 

लेकिन ध्यान देने वाली बात तो यह है कि पूर्व में ऐसे मामलों में ऐसी ही कार्यवाहियां होती रही हैं फिर भी बार बार पेपर लीक की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं क्यों हो जाती है? इनका स्थाई निदान करने में सफलता क्यों नहीं मिल पा रही?

यद्यपि सिस्टम को पारदर्शी और सुरक्षित बनाने के लिए विशेषज्ञ अनेक  सुझाव देते रहे हैं। तकनीकी, प्रशासनिक और कानूनी सुधार के साथ माफिया की पहचान और उन पर प्रभावी लगाम सख्ती से लगाने की बातें भी खूब कही गईं हैं। पूरी तरह डिजिटल परीक्षा, डिजिटल रूप से प्रश्न पत्रों कुछ मिनट पूर्व परीक्षा केंद्रों पर पहुंचाना जो केवल पास वर्ड की मदद से ही खुल सकें, एआई तथा बायो मीट्रिक तकनीक  सत्यापन से डमी कैंडिडेट को रोका जाना साथ ही पकड़े जाने पर 10 साल की जेल और एक करोड़ रुपयों के जुर्माने के सुझाव और नियम कानूनों के उपरांत भी घटनाओं का होना बड़ा प्रश्न चिन्ह लगाता है।  संदेह जताया जाता है कि ​अक्सर पेपर लीक के तार बड़े कोचिंग संस्थानों या संगठित अपराधियों से जुड़े होते हैं। यह सोचा जाना चाहिए कि सरकार द्वारा कोचिंग सेंटरों के लिए सख्त पंजीकरण और निगरानी प्रणाली विकसित करने में देरी क्यों हो जाती है।

मेडिकल और कई व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की पढ़ाई के लिए दुनिया भर में प्रवेश की प्रक्रियाएं अलग-अलग हैं। कई देशों में कठिन प्रवेश परीक्षाएं होती हैं, जबकि कुछ देश ऐसे भी हैं जो केवल स्कूल के अंकों (12वीं या हायर सेकेंडरी) के आधार पर प्रवेश देते हैं।जिन देशों में  मेडिकल की पढ़ाई के लिए अलग से कोई प्रवेश परीक्षा नहीं होती (या अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए प्रक्रिया सरल है)। यहाँ मुख्य रूप से 12 वीं कक्षा में भौतिकी , रसायन विज्ञान और जीव विज्ञान के अंकों के आधार पर प्रवेश मिल जाता है उनमें रूस, चीन, किर्गिस्तान, कजाकिस्तान, रोमानिया, जॉर्जिया देश शामिल हैं। क्या हम व्यावसायिक प्रवेश परीक्षाओं की बजाए इसी तरह हायर सेकेंडरी परीक्षा में प्राप्त अंकों के आधार पर व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में प्रवेश देने के बारे में एक बार विचार कर सकते हैं? ऐसा होने से हमारी स्कूली शिक्षा का स्तर भी उल्लेखनीय रूप से गुणवत्तापूर्ण हो सकेगा। 

​बच्चों का भविष्य बचाने के लिए केवल तकनीक काफी नहीं है, बल्कि एक 'नैतिक संस्कृति'  विकसित करने की जरूरत है। जब तक परीक्षा कराने वाली एजेंसियां, प्रिंटिंग प्रेस और केंद्र अधीक्षक पूरी ईमानदारी से काम नहीं करेंगे, तब तक पूर्ण सुरक्षा कठिन है। पेपर लीक केवल परीक्षा से जुड़ी तकनीकी समस्या नहीं है, बल्कि यह युवाओं के विश्वास, सामाजिक न्याय और राष्ट्र की प्रतिभा व्यवस्था से जुड़ा गंभीर प्रश्न है। यदि योग्य और मेहनती विद्यार्थियों को न्याय नहीं मिलेगा, तो देश की शिक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था कमजोर होगी। इसलिए सरकार, परीक्षा एजेंसियों, तकनीकी विशेषज्ञों और समाज को मिलकर ऐसी प्रणाली विकसित करनी होगी जिसमें पारदर्शिता, सुरक्षा और जवाबदेही सर्वोच्च प्राथमिकता हो।


ब्रजेश कानूनगो