पेड़ों की कटाई में नया आयाम है सोलर पावर प्लांट योजनाएं
भारत में कई बड़ी विकास परियोजनाओं के लिए पेड़ों को बड़ी संख्या में काटा जाता रहा है। आधुनिक जीवन की सुविधाओं के लिए भी कई योजनाएं बनती रहीं हैं जिनके कारण पेड़ों की व्यापक रूप से कटाई की गई है। प्रमुख रूप से अनेक बांध और जलाशय परियोजनाओं का उल्लेख किया जा सकता है, कई बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाएं हैं जिनके लिए वनों की कटाई हुई है। चाहे वह सतलुज नदी पर स्थित, पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में फैली हुई भाखड़ा नांगल परियोजना हो, उड़ीसा में महानदी पर हीराकुंड बांध परियोजना हो, नर्मदा नदी पर स्थित, मध्य प्रदेश, गुजरात,महाराष्ट्र और राजस्थान में फैली हुई सरदार सरोवर परियोजना रही हो। इसके अलावा सड़कों और रेलवे लाइनों के निर्माण के लिए भी पेड़ों को काटा जाता रहा है। शहरों के विस्तार और विकास के कारण पेड़ों की संख्या घटती चली जाती है ताकि नए घर, सड़कें, और अन्य बुनियादी ढांचे बनाए जा सकें। उद्योगों की निर्माण परियोजनाओं तथा खनन और उत्खनन परियोजनाओं में खनिज संसाधनों की खोज और उनके उपयोग के लिए वनों को व्यापक रूप से समाप्त किया जाता रहा है।
इन परियोजनाओं के कारण वनों की कटाई और पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, इसलिए इन परियोजनाओं को लेकर पर्यावरण कार्यकर्ताओं, जागरूक नागरिकों, बुद्धिजीवियों सहित किसानों और उन क्षेत्रों के प्रभावित होने वाले ग्रामीणों द्वारा विरोध और प्रतिरोध में आवाजें उठाई जाती रही हैं। जिनके कारण विकास के नकारात्मक पक्ष को कम किए जाने में मदद भी मिली है।
बहुत लोगों को आज भी 1970 के दशक के पर्यावरण कार्यकर्ता सुंदरलाल बहुगुणा जी की प्रेरणा में हुए #चिपको #आंदोलन की स्मृति अवश्य होगी जिसमें उत्तराखंड में वनों की कटाई के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन हुआ था तथा महिलाओं ने पेड़ों को काटने से रोकने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इस आंदोलन के परिणामस्वरूप सरकार ने हिमालयी क्षेत्रों में 15 वर्षों के लिए वनों की कटाई पर रोक लगा दी थी।
हाल ही की बात करें तो महाराष्ट्र राज्य में आरे कॉलोनी में मेट्रो कार शेड परियोजना एक बहुचर्चित और विवादित मुद्दा है, जिसमें पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन बनाने की चुनौती खड़ी हुई। इस परियोजना के तहत मुंबई मेट्रो के लिए कार शेड बनाने के लिए आरे कॉलोनी में पेड़ों की कटाई की जा रही थी, जिसका व्यापक विरोध हुआ।
मुंबई मेट्रो की लाइन-3 के लिए कार शेड बनाने के लिए आरे कॉलोनी में जमीन का उपयोग करने की योजना थी। जिसका उद्देश्य मुंबई में सार्वजनिक परिवहन को बेहतर बनाना और यातायात की समस्या को कम करना था। आरे कॉलोनी में पेड़ों की कटाई के खिलाफ व्यापक विरोध हुआ, जिसमें पर्यावरणविद, सामाजिक कार्यकर्ता और बॉलीवुड हस्तियों ने भाग लिया। उनका तर्क था कि आरे कॉलोनी एक हरित क्षेत्र है और पेड़ों की कटाई से पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। दूसरी ओर, परियोजना के समर्थकों का तर्क था कि मेट्रो परियोजना से मुंबई के लोगों को बेहतर परिवहन सुविधा मिलेगी और शहर के विकास में मदद मिलेगी। इस मुद्दे पर उच्चतम न्यायालय में सुनवाई हुई, जिसमें न्यायालय ने मुंबई मेट्रो को आरे कॉलोनी में 84 पेड़ काटने की अनुमति दी। हालांकि, महाराष्ट्र सरकार ने बाद में इस परियोजना को कांजुरमार्ग में स्थानांतरित करने का निर्णय लिया। सरकार के इस निर्णय से परियोजना की लागत में वृद्धि होगी और परियोजना के पूरा होने में देरी हो सकती है। कहा जा रहा है कि इससे पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम करने में मदद मिलेगी।
हाल ही में इन सबसे हटकर #राजस्थान में सोलर पावर प्लांट और सौर्य ऊर्जा के विकास को लेकर एक नया मुद्दा गर्म होता गया है।
दरअसल राजस्थान में सोलर पावर प्लांट पार्क स्थापित करने के लिए पेड़ों की कटाई की घटनाएं सामने आई हैं। जोधपुर जिले के फलोदी तहसील में सोलर प्लांट लगाने के लिए लगभग 10,000 खेजड़ी के पेड़ काट दिए गए थे, जिस पर बिश्नोई समाज ने कड़ा विरोध जताया और आंदोलन किया। खेजड़ी राजस्थान का राज्य वृक्ष है, और इसकी कटाई पर लोगों ने ऐतराज जताया और आंदोलन की चेतावनी दी ।
राजस्थान में सौर ऊर्जा संयंत्र योजनाओं के अंतर्गत पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना के तहत राजस्थान में 5 लाख घरों की छतों पर सोलर पैनल लगाने का लक्ष्य है। जानकारी के अनुसार योजना में आवेदन शुल्क, अमानत राशि और मीटर चार्ज नहीं लिया जाएगा, और 3 किलोवाट तक के सोलर पैनल पर 78,000 रुपये की सब्सिडी दी जाएगी। इसी तरह सौर कृषि आजीविका योजना में किसानों को अपनी बंजर भूमि पर सोलर प्लांट लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। योजना में 30% की सब्सिडी सरकार द्वारा प्रदान की जाएगी। कुसुम सोलर योजना के अंतर्गत किसानों को सोलर पंप सेट्स और सोलर प्लांट्स की स्थापना के लिए सब्सिडी और वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। योजना में 7.5 HP या उससे कम की क्षमता वाले सोलर पंप सेट्स पर 60% तक की सब्सिडी दी जाती है। इन योजनाओं का उद्देश्य राजस्थान में सौर ऊर्जा को बढ़ावा देना और ऊर्जा आत्मनिर्भरता को बढ़ाना है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सोलर प्लांट्स के कारण कई पर्यावरणीय संकट संभावित हैं जिनसे इको सिस्टम प्रभावित होता है। सोलर प्लांट्स के लिए बड़े क्षेत्रों में भूमि की आवश्यकता होती है, जिससे वनों की कटाई और भूमि उपयोग में परिवर्तन होता है।
सोलर प्लांट्स के निर्माण और संचालन से जैव विविधता को नुकसान पहुंच सकता है, खासकर यदि प्लांट्स संवेदनशील या संरक्षित क्षेत्रों में स्थित हों। सोलर प्लांट्स के निर्माण और संचालन में जल की आवश्यकता होती है, जिससे जल संसाधनों पर दबाव पड़ सकता है। सोलर प्लांट्स के निर्माण से मिट्टी का क्षरण हो सकता है, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता और उर्वरता प्रभावित होती है। सोलर प्लांट्स के पैनल्स और अन्य संरचनाओं से पक्षियों और अन्य जीवों की मृत्यु हो सकती है, खासकर यदि प्लांट्स पक्षियों के प्रवास मार्ग में स्थित हों।
देश के एक प्रमुख अखबार की हाल ही की रिपोर्ट से पता चलता है कि सोलर प्लांट के जुनून से राजस्थान में इको सिस्टम के तबाह होने की आशंका बलवती हुई है। अखबार के अनुसार बीकानेर से बाड़मेर तक के चार जिलों में अब तक 26 लाख पेड़ काटे जा चुके हैं और 38 लाख और काटे जाएंगे। लोगों का कहना है कि केवल बंजर जमीनों पर ही प्लांट स्थापित किए जाएं जबकि शासन प्रशासन की ओर से आश्वासन दिया जा रहा है कि कम से कम वृक्ष काटे जाएंगे और वृक्षों को अन्य स्थानों पर शिफ्ट करने का भी कार्य होगा। राज्य वृक्ष खेजड़ी को काटने पर बड़ा जुर्माना वसूला जाएगा।
आगे देखने की बात यह होगी कि किन उपायों को अपनाकर सोलर प्लांट्स के वृहद अभियान के तहत पर्यावरणीय दुष्प्रभावों को कम किया जाएगा और इको सिस्टम की रक्षा की जा सकगी। प्रतीक्षा करें!
ब्रजेश कानूनगो
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