Friday, 15 May 2026

प्राकृतिक दुर्घटना नहीं होती स्कूल भवनों का ढहना

प्राकृतिक दुर्घटना नहीं होती स्कूल भवनों का ढहना

शिक्षण संस्थाओं में होने वाली दुर्घटनाएं एक गंभीर समस्या है, जिसमें कई बार जान-माल की क्षति भी हो जाती है। प्राकृतिक आपदाएं भी एक कारण होती हैं जिनसे हादसे हो जाते हैं। भारी बारिश या बाढ़ के कारण शिक्षण संस्थाओं को बंद करना पड़ता है, जिससे छात्रों और शिक्षकों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। जुलाई 2025 में हरियाणा में भारी बारिश के कारण जिला प्रशासन ने दो दिन के लिए शिक्षण संस्थाओं को बंद रखने का निर्देश दिया था। अन्य राज्यों में भी भारी बारिश या कड़ाके की ठंड के दौरान सावधानी के तौर पर स्कूलों की छुट्टियां घोषित की जाती रही हैं। भूकंप जैसी अन्य प्राकृतिक आपदाएं भी शिक्षण संस्थाओं के लिए खतरनाक हो सकती हैं। इन आपदाओं से निपटने के लिए उन क्षेत्रों के स्कूलों और कॉलेजों में सुरक्षा उपायों का होना तब बहुत आवश्यक हो जाता है।

इनसे हटकर भी विद्यार्थियों का जीवन कुछ कारणों से संकट में पड़ जाता है, मसलन स्कूल बसों या कॉलेज वाहनों से जुड़ी सड़क दुर्घटनाएं एक आम समस्या होती गई है। इन दुर्घटनाओं को रोकने के लिए वाहनों की नियमित जांच और ड्राइवरों के प्रशिक्षण की आवश्यकता  सुनिश्चित की जाने के उपाय आदि किए जाते हैं बावजूद इसके घटनाएं जारी रहती आई हैं। भवन में आग लगने, बिजली के झटके आदि या इस तरह की अन्य घटनाएं भी सुनने को मिलती रहती हैं। इन घटनाओं से निपटने के लिए स्कूलों और कॉलेजों में सुरक्षा उपकरणों और आपातकालीन योजनाओ की व्यवस्था करने की कोशिश कितनी की जाती है, यह भी देखा जाना जरूरी है।

ऐसी दुर्घटनाओं से बचाव के लिए प्राय: सीसीटीवी कैमरे लगाना, सुरक्षा गार्ड तैनात करना, और आपातकालीन निकास मार्गों की व्यवस्था की जाती है। छात्रों, शिक्षकों, और कर्मचारियों को सुरक्षा और आपातकालीन प्रक्रियाओं के बारे में जागरूक और प्रशिक्षण देना आवश्यक है। स्कूलों और कॉलेजों के भवनों और उपकरणों की नियमित जांच होती रहे तो दुर्घटनाओं को रोका या कम अवश्य किया जा सकता है। किन्तु हाल ही की कुछ खबरें हमे चौंकाती ही नहीं बल्कि व्यथित कर देती हैं। सबसे बढ़कर स्कूल भवनों के जर्जर हिस्सों के गिर जाने की घटनाएं बहुत दुखद और चिंताजनक हैं। 

स्कूल भवनों के जर्जर होते जाने के पीछे कई कारण नजर आते हैं। उनके रखरखाव और पुराने भवनों की उचित मरम्मत का अभाव भी दिखाई देता है। आवश्यक धन राशि का समय पर उपलब्ध नहीं होना या प्राप्त हो जाने पर उसका मरम्मत कार्य पर खर्च न होकर अन्य सुविधाओं में उपयोग कर लेना भी भवनों की मरम्मत में विलंब का कारण हो जाता है। इस राशि के खर्च में भ्रष्टाचार की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता, घटिया निर्माण भी दुर्घटना की एक परोक्ष वजह बन जाता है। अंततः इन सब अनियमितताओं और लापरवाही का नतीजा जन धन हानि के रूप में दिखाई देता है। बच्चों और शिक्षकों को अपनी जानें भी गंवानी पड़ जाती है या गंभीर रूप से वे घायल हो जाते हैं।

जुलाई 2025 में झालावाड़ के पीपलोदी गांव में एक सरकारी स्कूल की छत गिरने से 6 बच्चों की मौत हो गई और 30 से अधिक बच्चे घायल हुए। यद्यपि इस हादसे के बाद प्रशासन ने 5 शिक्षकों को निलंबित कर दिया और राज्य भर के सभी सरकारी स्कूलों की जर्जर इमारतों की जांच शुरू कर दी गई है। क्या इन सब से उन पालकों के हृदय पर उभरे दुख के पहाड़ का वजन कम हो जाएगा? उनकी आंखों के आंसू थम जाएंगे। जिन मां बाप ने अपने और बच्चों को लेकर सुखमय सपने देखे होंगे, उन पर तो जैसे वज्रपात ही हो गया होगा, उनका क्या होगा? 

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। जुलाई 2024 में दिल्ली के दरियागंज में एक निजी स्कूल की दीवार गिरने से कई वाहनों को नुकसान पहुंचा था। शुक्र है इस घटना में कोई हताहत नहीं हुआ, लेकिन यह घटना स्कूलों की सुरक्षा को लेकर चिंता तो बढ़ाती ही है।

उत्तराखंड में सितंबर 2022 में चम्पावत जिले के मौनकांडा स्कूल में शौचालय की छत गिरने से एक छात्र की मौत हो गई थी। इस घटना के बाद उत्तराखंड सरकार ने राज्य भर के जर्जर स्कूल भवनों को ध्वस्त करने के आदेश दिए थे।

राजस्थान  में झालावाड़ के सरकारी स्कूल की छत गिरने की घटना के तुरंत बाद एक सप्ताह के भीतर जैसलमेर के पूनमनगर गांव के स्कूल गेट का पीलर गिरने से एक सात वर्षीय छात्र की मौत और एक शिक्षक के घायल होने का समाचार पुनः स्तब्ध कर देता है। बताया जाता है नागौर और सिरोही में भी ऐसी ही घटनाएं प्रकाश में आईं हैं। एक सूचना के अनुसार राज्य में 2256 स्कूल और एक हजार से अधिक आंगनबाड़ी केंद्र जर्जर हालत में हैं ।

यह पढ़कर तब हमारी पीड़ा और बढ़ जाती है जब जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति बच्चों की मौत पर कहते हैं कि, स्कूल की मरम्मत कार्य एक सरकारी प्रोसेस होता है, इसमें टाइम लगता है। यह कोई घर का काम तो है नहीं कि जेब से पैसे निकालकर दे दें।

जिम्मेदारों के ऐसे असंवेदनशील बयानों से यही धारणा और आशंका  बलवती होती है कि छात्रों की शिक्षा, शिक्षण संस्थाओं की सुरक्षा को लेकर हम कितने गंभीर होकर सोच पाते हैं। विचार कीजिए! 


ब्रजेश कानूनगो

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