भगदड़ की घटनाएँ : अफवाह के मनोविज्ञान पर चिंतन जरूरी
हाल ही में जुलाई माह की 27 तारीख को हरिद्वार के मनसा देवी मंदिर में एक भगदड़ में 8 लोगों की मौत हो गई और कई घायल हुए। इस भगदड़ का कारण बिजली के करंट की अफवाह थी यद्यपि प्रारंभिक तौर पर उत्तराखंड पावर कॉर्पोरेशन ने इसे खारिज कर दिया है। राज्य के मुख्यमंत्री ने घटना की न्यायिक जांच के आदेश दिए और मृतकों के परिजनों को आर्थिक सहायता देने की घोषणा की। संकट के समय पीड़ितों की मदद करना एक अच्छा कदम अवश्य होता है, लेकिन ऐसे हादसे शासन, प्रशासन के अलावा प्रबुद्ध विचारकों और जागरूक नागरिकों को भी चिंतन करने को बाध्य करते हैं।
ऐसा नहीं है कि धार्मिक आयोजनों में भगदड़ का हादसा पहली बार हुआ हो। 2008 में हिमाचल प्रदेश के नैना देवी मंदिर में भगदड़ में 146 लोगों की मौत हुई थी। 2010 में पश्चिम बंगाल के गंगासागर मेला में मकर संक्रांति के अवसर पर भगदड़ में कई लोगों की जान गई थी। 2013 में इलाहाबाद कुंभ मेले में भगदड़ में कई लोग घायल हुए थे। 2016 में पुत्तिंगल देवी मंदिर, केरल में आतिशबाजी के कारण हुए विस्फोट में 100 से अधिक लोगों की मौत हुई थी। 2024 में उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले में एक धार्मिक आयोजन के दौरान भगदड़ में 121 लोगों की मौत हुई थी। अभी हाल ही में महाकुंभ 2025 के दौरान प्रयागराज में भगदड़ की घटना 29 जनवरी 2025 को मौनी अमावस्या के अवसर पर हुई, जब श्रद्धालुओं की भारी भीड़ शाही स्नान के लिए उमड़ी। इस हादसे में कम से कम 38 लोगों की मृत्यु हो गई और कई अन्य घायल हो गए।
धार्मिक स्थलों पर भीड़ और श्रद्धालुओं का उमड़ना और हादसे हो जाना एक आम समस्या हो गई है, जिसमें अक्सर सुरक्षा के अभाव में लोगों की जान जोखिम में पड़ जाती है। इन हादसों में भगदड़ और अन्य दुर्घटनाएं शामिल हैं, किंतु सबसे पहले इनके पीछे किसी अफवाह का भीड़ में फैल जाना रहा है। ऐसा क्यों होता है?
यह अवश्य है कि अफवाहें एक प्रकार की सामाजिक और मनोवैज्ञानिक लक्षण हैं जो अक्सर गलत सूचनाओं के प्रसार के रूप में सामने आता रहा है। अगर गौर करें तो जब लोगों को किसी खास स्थिति के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं होती है, तो वे अफवाहों पर विश्वास करने लगते हैं। अनिश्चितता और भय के समय में अफवाहें और अधिक तेजी से फैलती हैं। दूसरी बात, लोग सामान्यतः अपने समूह या समुदाय में अन्यों से विशेष प्रभावित होते हैं। यदि एक समूह में कोई अफवाह फैलती है, तो लोग उसे सच मानने लगते हैं। अक्सर अफवाहें मौखिक संचार के माध्यम से फैलती हैं। जब लोग एक-दूसरे से बात करते हैं, तो वे अक्सर जानकारी को बढ़ा चढ़ाकर विकृत या अतिरंजित बनाकर आगे बढ़ाने लगते हैं और भीड़ में घबराहट बढ़ती जाती है।
ऐसा नहीं है कि ये अफवाहें वैसे ही फैलती जाती है, इसके पीछे कई अन्य घटक भी शामिल होते हैं। धार्मिक स्थलों पर भीड़ प्रबंधन की कमी एक प्रमुख कारण है ही, जिसमें आयोजकों और प्रशासन की लापरवाही के कारण भगदड़ जैसी घटनाएं हो जाती हैं। आयोजनों में अव्यवस्था और लापरवाही के कारण भी हादसे होते हैं, उचित निकास मार्ग न होना और सुरक्षा उपकरणों की पर्याप्त उपलब्धता नहीं होना भी दुर्घटना के भयंकर स्वरूप का कारक बन जाते हैं।
अफवाहों की तुरंत जांच करना और उन्हें सत्यापित करना भी बेहद महत्वपूर्ण कदम होता है। अन्य व्यवस्थाओं में उलझा प्रशासन विश्वसनीय स्रोतों से जानकारी प्राप्त करने और तथ्यों की पुष्टि करने में कभी कभी चूक जाता है या वह इस कार्य में तनिक देर से सक्रिय हो पाता है। तब तक अफवाह अपनी आग फैला चुकी होती है। ऐसे में स्पष्ट और पारदर्शी संचार और सूचना तंत्र अफवाहों को फैलने से रोकने में मदद कर सकता है। लोगों को सटीक जानकारी प्रदान करना और उन्हें अफवाहों के बारे में जागरूक करना भी महत्वपूर्ण है। प्रशासन के इन उपायों के बावजूद भी यदि घटनाएं होती जा रही हैं तो निश्चित ही यह मुद्दा बहुत महत्वपूर्ण और विचारणीय हो जाता है।
जरूरी है कि अब इस दिशा में गंभीरता और प्राथमिकता से ध्यान दिया जाना होगा। लोगों को अफवाहों के बारे में शिक्षित करना और उन्हें सिखाना कि कैसे अफवाहों की पहचान करें और उनसे निपटें शायद एक प्रभावी तरीका हो सकता है। अफवाहों के मनोविज्ञान को उच्चतम बौद्धिकता से समझकर और संपूर्ण देश में व्यापक कदम उठाकर नकारात्मक प्रभावों को कम करने की कोशिश होना चाहिए। शायद तभी हम एक अधिक सूचित और जागरूक समाज का निर्माण कर सकते हैं।
ब्रजेश कानूनगो
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