Thursday, 9 July 2026

विकास की भीड़ में मनुष्यता का छोटा-सा द्वीप

 विकास की भीड़ में मनुष्यता का छोटा-सा द्वीप

दुनिया का अधिकांश इतिहास इस संघर्ष का इतिहास है कि मनुष्य अधिक भूमि, अधिक संसाधन और अधिक सुविधा कैसे प्राप्त करे। सभ्यताओं ने नदियों के किनारे नगर बसाए, जंगल काटे, पहाड़ चीर दिए और समुद्र तक को पीछे धकेलकर नई जमीन बना ली। आधुनिक विकास की पूरी अवधारणा भी मानो इसी विश्वास पर टिकी है कि जीवन जितना विस्तृत होगा, उतना बेहतर होगा। लेकिन इसी दुनिया में एक ऐसा छोटा-सा द्वीप भी है, जो इस धारणा पर मौन किंतु गहरा प्रश्नचिह्न लगाता है।

पिछले दिनों हमने यूट्यूबर और नोमेडिक टूर चैनल के वैश्विक घुमक्कड़ तोरवाशु के साथ एक अनोखे और पृथ्वी के सबसे छोटे और घने बसे द्वीप की मानस यात्रा की। कैरेबियाई सागर में कोलंबिया के तट के निकट स्थित सांता क्रूज़ डेल इस्लोटे दुनिया के सबसे घनी आबादी वाले द्वीपों में गिना जाता है। लगभग दो फुटबॉल मैदान जितने क्षेत्रफल में सैकड़ों लोग रहते हैं। पहली दृष्टि में यह स्थान किसी भी नगर नियोजक के लिए अव्यवस्था का उदाहरण लग सकता है, लेकिन थोड़ा ठहरकर देखें तो यही द्वीप आधुनिक सभ्यता की कई स्थापित धारणाओं को चुनौती देता दिखाई देता है। यह केवल भूगोल का आश्चर्य नहीं, बल्कि समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और मानवीय संबंधों की जीवित प्रयोगशाला है। इस वीडियो यात्रा ने हमे कई वैचारिक कोणों से चिंतन करने को प्रेरित किया।

कहा जाता है कि लगभग डेढ़ सौ वर्ष पहले कुछ मछुआरों ने इस स्थान को अपना ठिकाना बनाया। धीरे-धीरे उन्होंने मूंगे, पत्थरों और अन्य सामग्री से जमीन का विस्तार किया और आज का द्वीप आकार लेने लगा। अब यहां रंग-बिरंगे छोटे मकान एक-दूसरे से सटे हुए हैं। गलियां इतनी संकरी हैं कि दो लोग मुश्किल से साथ निकल पाते हैं। कोलंबिया के कैरेबियाई तट से कुछ दूरी पर स्थित सांता क्रूज़ डेल इस्लोटे  दुनिया के सबसे घनी आबादी वाले द्वीपों में गिना जाता है। लगभग 1.2 हेक्टेयर क्षेत्रफल वाले इस छोटे-से कृत्रिम द्वीप पर सैकड़ों लोग रहते हैं। जनसंख्या के बारे में अलग-अलग अनुमान हैं, लेकिन हाल के स्थानीय आँकड़े लगभग 800 के आसपास निवासियों की ओर संकेत करते हैं।हमने देखा कि यहां रहने वाले अधिकांश लोग अफ्रो-कोलंबियाई समुदाय से हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद लोगों के बीच सहयोग की भावना बहुत मजबूत है। अधिकांश परिवार एक-दूसरे को जानते हैं और विवाद प्रायः आपसी बातचीत से ही सुलझा लिए जाते हैं। द्वीप पर एक प्राथमिक विद्यालय, छोटा स्वास्थ्य केंद्र, कुछ दुकानें और एक सार्वजनिक चौक है। बच्चों का बचपन समुद्र से जुड़ा होता है। वे बहुत कम उम्र से तैरना और मछली पकड़ना सीख जाते हैं। 

आज महानगरों में रहने वाला व्यक्ति औसतन पहले से कहीं अधिक निजी स्थान का स्वामी है। घर बड़े हुए हैं, सड़कें चौड़ी हुई हैं, वाहन बढ़े हैं और सुविधाओं का विस्तार हुआ है। इसके बावजूद अकेलापन, अविश्वास और मानसिक तनाव भी लगातार बढ़ रहे हैं। दूसरी ओर, सांता क्रूज़ डेल इस्लोटे में रहने वाले लोग अत्यंत सीमित स्थान साझा करते हैं। वहां न कारों की आवाजाही है, न चौड़ी सड़कें और न ही निजी जीवन के लिए बहुत अधिक जगह। फिर भी वहां सामुदायिक जीवन की वह सहजता दिखाई देती है, जिसकी तलाश आधुनिक समाज लगातार करता रहता है।

यह विरोधाभास हमें सोचने पर मजबूर करता है कि किसी समाज की समृद्धि का वास्तविक पैमाना क्या होना चाहिए? क्या विकास का अर्थ केवल अधिक उपभोग और अधिक निजी संपत्ति है, या फिर ऐसा सामाजिक वातावरण भी विकास का हिस्सा है, जिसमें लोग एक-दूसरे को जानते हों, सुख-दुःख में साथ खड़े होते हों और जीवन प्रतिस्पर्धा की जगह सहयोग पर आधारित हो?

सांता क्रूज़ डेल इस्लोटे का सामाजिक जीवन इस प्रश्न का एक व्यावहारिक उत्तर प्रस्तुत करता है। अधिकांश निवासी एक-दूसरे से परिचित हैं। विवाद प्रायः बातचीत और सामाजिक सहमति से सुलझाए जाते हैं। बच्चों का पालन-पोषण भी केवल परिवार नहीं, पूरा समुदाय मिलकर करता है। समुद्र यहां केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि सामूहिक जीवन का केंद्र है। सुबह नावों का निकलना, शाम को मछुआरों का लौटना और पूरे समुदाय का एक-दूसरे के जीवन में सहभागी होना उस सामाजिक पूंजी का निर्माण करता है, जिसे आधुनिक अर्थशास्त्र अक्सर आँकड़ों में माप नहीं पाता।

यहां की अर्थव्यवस्था भी विचार करने योग्य है। मछली पकड़ना आज भी जीवन का मुख्य आधार है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में पर्यटन ने नई संभावनाएं पैदा की हैं। दुनिया भर से लोग इस छोटे-से द्वीप को देखने आते हैं। वे यहां समुद्र की सुंदरता से अधिक मनुष्य की अनुकूलन क्षमता को देखने आते हैं। यह पर्यटन स्थानीय लोगों के लिए आय का स्रोत भी है और चुनौती भी। यदि पर्यटन केवल व्यावसायिक गतिविधि बन जाए, तो वही समुदाय, जिसकी सादगी पर्यटकों को आकर्षित करती है, धीरे-धीरे अपनी मौलिक पहचान खो सकता है। इसलिए यहां आर्थिक विकास और सांस्कृतिक संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है।

लेकिन इस द्वीप की कहानी केवल प्रेरणा की कहानी नहीं है। यह चेतावनी की कहानी भी है। सीमित भूमि, पेयजल की कमी, स्वच्छता की चुनौतियां और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव यहां के लोगों के दैनिक जीवन का हिस्सा हैं। सबसे बड़ी चिंता जलवायु परिवर्तन है। समुद्र का बढ़ता जलस्तर भविष्य में ऐसे छोटे द्वीपों के अस्तित्व को ही संकट में डाल सकता है। विडंबना यह है कि जलवायु परिवर्तन के लिए सबसे कम जिम्मेदार समुदाय ही उसके सबसे बड़े शिकार बनते जा रहे हैं। इस अर्थ में सांता क्रूज़ डेल इस्लोटे केवल एक द्वीप नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के पर्यावरणीय अन्याय का प्रतीक भी है।

यह द्वीप शहरी नियोजन पर भी नए सिरे से विचार करने का अवसर देता है। आधुनिक शहरों में स्थान बढ़ता जा रहा है, लेकिन सामाजिक दूरी भी बढ़ रही है। ऊंची-ऊंची इमारतों में रहने वाले लोग वर्षों तक अपने पड़ोसियों के नाम तक नहीं जानते। इसके विपरीत इस छोटे-से द्वीप पर निजी स्थान सीमित है, लेकिन सामाजिक निकटता बहुत गहरी है। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि भीड़ आदर्श स्थिति है, बल्कि यह समझना चाहिए कि किसी समाज की गुणवत्ता केवल उसके भौतिक ढांचे से निर्धारित नहीं होती। उसके पीछे सामाजिक विश्वास, साझा जिम्मेदारी और सामुदायिक संस्कृति की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

भारत जैसे देश के लिए भी इस द्वीप का अनुभव प्रासंगिक है। हमारे गांवों और पुराने मोहल्लों में कभी इसी प्रकार की सामुदायिक संस्कृति दिखाई देती थी। लोग एक-दूसरे के घर बिना औपचारिकता के चले जाते थे, बच्चों की देखभाल पूरे मोहल्ले की जिम्मेदारी मानी जाती थी और संकट आने पर समाज सबसे पहले खड़ा होता था। शहरीकरण और उपभोक्तावाद ने इस संस्कृति को धीरे-धीरे कमजोर किया है। आज हमारे पास पहले से कहीं अधिक सुविधाएं हैं, लेकिन सामाजिक आत्मीयता का दायरा लगातार सिमटता जा रहा है।

सांता क्रूज़ डेल इस्लोटे हमें यह भी सिखाता है कि विकास का प्रश्न केवल आर्थिक नहीं, नैतिक भी है। यदि विकास मनुष्य को समाज से काट दे, प्रकृति से दूर कर दे और उसे केवल उपभोक्ता बनाकर छोड़ दे, तो उसकी चमक कितनी भी आकर्षक क्यों न हो, वह अधूरी ही रहेगी। दूसरी ओर, यदि सीमित संसाधनों में भी मनुष्य सहयोग, विश्वास और साझा उत्तरदायित्व के साथ जीवन जीना सीख ले, तो वही समाज अधिक टिकाऊ और अधिक मानवीय बन सकता है।

संभव है कि भविष्य में यह छोटा-सा द्वीप जलवायु परिवर्तन, पर्यटन और संसाधनों के दबाव के कारण अनेक कठिन चुनौतियों का सामना करे। फिर भी यह दुनिया के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश छोड़ता है। सभ्यता की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जाएगी कि हमने कितनी ऊंची इमारतें बनाई हैं या कितना बड़ा आर्थिक उत्पादन किया है। उसकी असली कसौटी यह होगी कि क्या हमने मनुष्यों के बीच विश्वास बचाए रखा, क्या हमने प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखा और क्या हमने सीमित संसाधनों वाली पृथ्वी पर साझा जीवन जीने की कला सीखी।

शायद इसी कारण कैरेबियाई सागर के बीच बसा यह छोटा-सा द्वीप दुनिया के सबसे बड़े महानगरों से भी बड़ा संदेश देता है। वह बताता है कि मनुष्य का भविष्य केवल अधिक जगह पाने में नहीं, बल्कि उपलब्ध जगह को अधिक मानवीय बनाने में छिपा है। यही संदेश आज की दुनिया को सबसे अधिक सुनने की आवश्यकता है।


ब्रजेश कानूनगो


Tuesday, 7 July 2026

नकली लक्जरी सामानों का बढ़ता कारोबार : सस्ते सौदे की असली कीमत

नकली लक्जरी सामानों का बढ़ता कारोबार : सस्ते सौदे की असली कीमत

हाल के महीनों में वियतनाम द्वारा नकली लक्जरी सामानों के विरुद्ध चलाया गया व्यापक अभियान केवल कानून-व्यवस्था की कार्रवाई नहीं है, बल्कि बदलते वैश्विक व्यापार की नई वास्तविकता का संकेत भी है। अमेरिका लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि वियतनाम नकली ब्रांडेड वस्तुओं, पायरेटेड सॉफ्टवेयर और चीनी उत्पादों के पुनः-निर्यात का प्रमुख केंद्र बनता जा रहा है। अमेरिकी दबाव और ऊँचे आयात शुल्क की आशंकाओं के बीच वियतनाम सरकार ने बड़े पैमाने पर छापेमारी शुरू की। हो ची मिन्ह सिटी सहित अनेक स्थानों पर हजारों नकली उत्पाद जब्त किए गए और ऑनलाइन बिक्री नेटवर्क पर भी शिकंजा कसा गया। वियतनाम अकेला नहीं है। हाल के वर्षों में अमेरिका, हांगकांग, थाईलैंड और कई अन्य देशों ने भी नकली लक्जरी वस्तुओं के विरुद्ध अभियान तेज किए हैं। यह इसलिए भी आवश्यक हो गया है क्योंकि नकली सामानों का कारोबार अब केवल कुछ फुटपाथी दुकानों तक सीमित नहीं रहा। यह संगठित अपराध, कर चोरी, मनी लॉन्ड्रिंग, ऑनलाइन धोखाधड़ी और बौद्धिक संपदा अधिकारों के उल्लंघन से जुड़ा बहु-अरब डॉलर का वैश्विक कारोबार बन चुका है।

आज किसी भी बड़े शहर के बाजार, पर्यटन स्थल या ई-कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म पर "फर्स्ट कॉपी", "मिरर कॉपी" और "एएए कॉपी" जैसे शब्द आम हो चुके हैं। महंगे ब्रांडों के जूते, बैग, घड़ियाँ, कपड़े, इत्र और चश्मे उनकी वास्तविक कीमत के छोटे से हिस्से में उपलब्ध मिल जाते हैं। दिलचस्प तथ्य यह है कि अधिकांश खरीदार जानते हैं कि वे नकली वस्तु खरीद रहे हैं, फिर भी उन्हें कोई अपराधबोध नहीं होता। उनके लिए यह कम कीमत में प्रतिष्ठा का अनुभव खरीदने जैसा सौदा है।

यही इस समस्या की सबसे बड़ी चुनौती है। नकली सामानों का बाजार केवल आर्थिक कारणों से नहीं, बल्कि सामाजिक मनोविज्ञान के कारण भी फल-फूल रहा है। लक्जरी ब्रांड आज उपयोगिता से अधिक सामाजिक पहचान का माध्यम बन चुके हैं। सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और तीव्र किया है। तस्वीरों और वीडियो की दुनिया में वस्तु की गुणवत्ता से अधिक उसका लोगो दिखाई देता है। ऐसे में यदि कम कीमत पर वही बाहरी स्वरूप मिल जाए तो अनेक उपभोक्ता उसे स्वीकार करने में संकोच नहीं करते।

नकली उत्पाद बनाने वालों के लिए भी यह अत्यंत लाभकारी कारोबार है। उन्हें न अनुसंधान पर खर्च करना पड़ता है, न डिज़ाइन, गुणवत्ता परीक्षण, विज्ञापन या ब्रांड निर्माण पर। वे केवल प्रसिद्ध ब्रांड की पहचान का अनुचित लाभ उठाकर कम लागत में भारी मुनाफा अर्जित करते हैं। यही कारण है कि यूरोप, अमेरिका, चीन, तुर्किये, दक्षिण-पूर्व एशिया और भारत सहित अनेक देशों में यह समानांतर बाजार लगातार विस्तार कर रहा है।

भारत भी इससे अछूता नहीं है। दिल्ली के पालिका बाजार से लेकर मुंबई, कोलकाता, अहमदाबाद, सूरत और जयपुर जैसे शहरों तक नकली ब्रांडों का कारोबार वर्षों से चलता आ रहा है। अब डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म ने इसे और व्यापक बना दिया है। सोशल मीडिया और छोटे ई-कॉमर्स माध्यमों के जरिए नकली उत्पाद सीधे ग्राहकों तक पहुँच रहे हैं। कई बार उपभोक्ता स्वयं भी यह पहचान नहीं पाता कि उसने असली वस्तु खरीदी है या उसकी नकल।

इसका दूसरा पक्ष भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। मूल ब्रांड बनाने वाली कंपनियाँ वर्षों तक अनुसंधान, डिज़ाइन, गुणवत्ता नियंत्रण और विपणन पर भारी निवेश करती हैं। नकली उत्पाद बिना किसी बौद्धिक या वित्तीय निवेश के उसी प्रतिष्ठा का लाभ उठा लेते हैं। इससे केवल उनकी बिक्री प्रभावित नहीं होती, बल्कि ब्रांड की विश्वसनीयता और विशिष्टता भी कमजोर पड़ती है। यदि कोई उपभोक्ता खराब गुणवत्ता वाले नकली उत्पाद को असली समझ ले, तो उसके मन में ब्रांड की छवि भी धूमिल हो सकती है। 

दीर्घकाल में यह नवाचार और अनुसंधान पर निवेश के उत्साह को भी प्रभावित करता है।

लेकिन इसका प्रभाव केवल कंपनियों तक सीमित नहीं रहता। नकली वस्तुओं के कारण सरकारों को कर राजस्व का नुकसान होता है, वैध उद्योगों में रोजगार प्रभावित होता है और संगठित अपराध को आर्थिक आधार मिलता है। इससे भी अधिक चिंताजनक तथ्य यह है कि दवाइयों, सौंदर्य प्रसाधनों, विद्युत उपकरणों और वाहन के पुर्जों जैसे क्षेत्रों में नकली उत्पाद सीधे उपभोक्ताओं की सुरक्षा के लिए खतरा बन सकते हैं।

हालाँकि इस बहस का एक दूसरा पक्ष भी है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। कई विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ लक्जरी ब्रांड अपनी वास्तविक उत्पादन लागत की तुलना में अत्यधिक ऊँचे मूल्य वसूलते हैं। उपभोक्ता का बड़ा भुगतान उत्पाद की उपयोगिता के बजाय उसकी ब्रांड छवि और विशिष्टता के लिए होता है। परिणामस्वरूप अनेक लोग यह महसूस करते हैं कि वे केवल नाम के लिए अत्यधिक कीमत चुका रहे हैं। यह धारणा भी नकली उत्पादों की मांग को बढ़ाती है। इसलिए समस्या केवल अवैध कारोबार की नहीं, बल्कि अत्यधिक महंगी उपभोक्ता संस्कृति की भी है।

स्पष्ट है कि इस चुनौती का समाधान केवल छापेमारी या दंडात्मक कार्रवाई नहीं हो सकता। बौद्धिक संपदा कानूनों का प्रभावी पालन, सीमा शुल्क एजेंसियों के बीच अंतरराष्ट्रीय सहयोग, ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर नकली उत्पादों की त्वरित पहचान और हटाने की व्यवस्था तथा आधुनिक डिजिटल प्रमाणीकरण तकनीकों का व्यापक उपयोग आवश्यक होगा। क्यूआर कोड, ब्लॉकचेन आधारित सत्यापन और डिजिटल प्रमाणपत्र जैसी तकनीकें इस दिशा में उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं।

इसके साथ ही ब्रांड कंपनियों को भी आत्ममंथन करना होगा। यदि वे बेहतर गुणवत्ता के साथ अपेक्षाकृत सुलभ मूल्य वाली उत्पाद श्रृंखलाएँ विकसित करें, तो नकली बाजार का आकर्षण स्वाभाविक रूप से घट सकता है। भारत जैसे देशों में स्थानीय गुणवत्ता आधारित ब्रांडों को प्रोत्साहन देकर उपभोक्ताओं को विश्वसनीय और किफायती विकल्प उपलब्ध कराना भी दीर्घकालिक समाधान का हिस्सा होना चाहिए।

दरअसल नकली लक्जरी वस्तुओं का कारोबार केवल सस्ती खरीदारी का प्रश्न नहीं है। यह उपभोक्ता मनोविज्ञान, सामाजिक प्रतिष्ठा, वैश्विक व्यापार, कानून, नवाचार और नैतिकता के जटिल अंतर्संबंधों का परिणाम है। जब तक कम कीमत में प्रतिष्ठा पाने की मानसिकता बनी रहेगी, तब तक नकली बाजार भी किसी न किसी रूप में जीवित रहेगा। इसलिए आवश्यक है कि सरकारें प्रभावी कानून लागू करें, कंपनियाँ मूल्य और उपलब्धता के बीच संतुलन स्थापित करें तथा उपभोक्ता भी मौलिकता और गुणवत्ता के महत्व को समझें। स्वस्थ और निष्पक्ष बाजार व्यवस्था की रक्षा का यही सबसे टिकाऊ मार्ग है।

ब्रजेश कानूनगो


Monday, 6 July 2026

प्रतिमा में घोड़े के उठे हुए पैर और यौद्धा की मृत्यु का सच

प्रतिमा में घोड़े के उठे हुए पैर और यौद्धा की मृत्यु का सच

हमारे एक प्रिय यूट्यूबर ने जब वाशिंगटन में एक घुड़सवार योद्धा की मूर्ति चौराहे पर स्थापित देखी तो बताया कि मूर्ति में घोड़े के अगले पैरों को देखकर बताया जा सकता है कि योद्धा की मृत्यु किन परिस्थितियों में हुई थी। घोड़े के पैरों या टांगों को देखकर सवार योद्धा की मृत्यु के कारणों का पता हो जाना एक बहुत ही दिलचस्प और व्यापक रूप से फैला हुआ भ्रम (अर्बन लेजेंड) है। अक्सर सोशल मीडिया पर या गाइडों द्वारा भी यह बताया जाता है कि किसी घुड़सवार मूर्ति  में घोड़े की टांगों की स्थिति देखकर आप राजा या योद्धा की मौत का कारण जान सकते हैं।

आमतौर पर सोशल मीडिया पर जो कहानी चलती है, उसके अनुसार यदि घोड़े की ​दोनों आगे की टांगें हवा में हों तो योद्धा युद्ध में शहीद हुआ था। ​एक आगे की टांग हवा में हो तो योद्धा की मौत युद्ध में लगे घावों या बीमारी के कारण हुई थी और यदि घोड़े की ​चारों टांगें जमीन पर हों तो यह मान लिया जाता है कि योद्धा की मृत्यु प्राकृतिक कारणों (बुढ़ापे या सामान्य बीमारी) से हुई थी। 

दरअसल सच्चाई यह है कि इतिहास और मूर्तिकला (Sculpture) के विज्ञान में ऐसा कोई सार्वभौमिक (Universal) नियम नहीं है। यह केवल एक लोककथा है। यदि हम दुनिया भर के और भारत के महान राजाओं और योद्धाओं की मूर्तियों का अध्ययन करेंगे, तो यह 'नियम' पूरी तरह टूट जाता है। 

इसके पक्ष में कुछ प्रमुख उदाहरण दिए जा सकते हैं। भारतीय संदर्भ में कहें तो रानी लक्ष्मीबाई युद्ध के मैदान में वीरगति को प्राप्त हुई थीं। लेकिन देश भर में उनकी कई ऐसी मूर्तियां हैं जिनमें घोड़े की चारों टांगें जमीन पर हैं, कुछ में एक टांग हवा में है और कुछ में दो। मूर्तिकार ने इस नियम को नहीं, बल्कि कलात्मक दृश्य को प्राथमिकता दी। इसी तरह  शिवाजी महाराज की मृत्यु बीमारी के कारण रायगढ़ में हुई थी। लेकिन गेटवे ऑफ इंडिया (मुंबई) के पास लगी उनकी प्रसिद्ध मूर्ति में घोड़े की एक टांग हवा में उठाई गई है, जो इस कथित नियम से मेल खाती है, लेकिन कई अन्य जगहों पर उनकी मूर्तियों में घोड़े की दोनों टांगें हवा में दिखाई देती हैं। चेतक पर सवार महाराणा प्रताप की कई मूर्तियां हैं। चेतक ने हल्दीघाटी के युद्ध के बाद अपने प्राण त्यागे थे और महाराणा प्रताप की मृत्यु बाद में प्राकृतिक कारणों से हुई थी। लेकिन उनकी कई भव्य मूर्तियों में चेतक की दोनों टांगें हवा में दिखाई गई हैं ताकि उनका आक्रामक और वीर रूप प्रदर्शित किया जा सके।

वैश्विक संदर्भ में भी कई ऐसे उदाहरण उपलब्ध हैं जिनमें यह कहानी ठीक नहीं बैठती। नेपोलियन की मृत्यु सेंट हेलेना द्वीप पर बीमारी से हुई थी। लेकिन उनकी सबसे प्रसिद्ध पेंटिंग और मूर्तियों में उनका घोड़ा 'मारेन्गो' अपनी दोनों आगे की टांगें हवा में उठाए हुए बेहद आक्रामक मुद्रा में दिखता है। रोम के इस प्रसिद्ध सम्राट मार्कोस की मूर्ति में घोड़े का एक पैर हवा में है, लेकिन उनकी मृत्यु बीमारी से हुई थी।

अगर यह कोई नियम नहीं है, तो मूर्तिकार घोड़े के पैरों को अलग-अलग मुद्राओं में क्यों बनाते हैं? इसके पीछे मुख्य रूप से दो महत्वपूर्ण कारण होते हैं। पहला कारण शिल्प में ​कलात्मकता और गतिशीलता दर्शाना।  एक योद्धा को पराक्रमी और साहसी दिखाने के लिए घोड़े को दौड़ते हुए या उछलते हुए दिखाना ज्यादा प्रभावी होता है। चारों पैर जमीन पर होने से मूर्ति थोड़ी शांत या स्थिर लगती है, जबकि पैर हवा में होने से उसमें 'एक्शन' और ऊर्जा दिखाई देती है।दूसरा कारण है शिल्प की इंजीनियरिंग और संतुलन, कांसे (Bronze) या पत्थर की भारी मूर्ति बनाते समय संतुलन बनाना सबसे बड़ी चुनौती होती है। अगर घोड़े की दो टांगें हवा में होंगी, तो मूर्ति का पूरा वजन पीछे की दो टांगों और पूंछ पर आ जाता है। मूर्तिकार अपनी तकनीकी सुविधा और वजन के संतुलन के हिसाब से तय करते हैं कि कितनी टांगें जमीन पर रखनी हैं

​गाइडों द्वारा बताई और सोशल मीडिया पर प्रसारित  यह कहानी सुनने में बहुत रोमांचक लगती है और मूर्तियों को देखने का एक नया नजरिया देती है, लेकिन ऐतिहासिक रूप से यह पूरी तरह से एक मिथक  है कि घोड़े की टांगों के हवा में उठने की स्थिति से योद्धा की मृत्यु का अनुमान लगता हो। किसी भी मूर्तिकार या राजा ने इस नियम को अनिवार्य रूप से कभी स्वीकार नहीं किया। मूर्तियां इतिहास को दर्ज करने के साथ-साथ कला का एक बेहतरीन नमूना होती हैं, और उनमें दिखने वाली मुद्राएं इतिहास से ज्यादा मूर्तिकार की कल्पना और कला का हिस्सा होती हैं।


ब्रजेश कानूनगो 


Sunday, 5 July 2026

नायकों की मूर्तियाँ : इतिहास, राजनीति और सामूहिक स्मृति का सफ़र

नायकों की मूर्तियाँ : इतिहास, राजनीति और सामूहिक स्मृति का सफ़र

किसी भी शहर के प्रमुख चौराहे पर यदि किसी योद्धा, स्वतंत्रता सेनानी, राजा या महापुरुष की प्रतिमा दिखाई दे, तो वह केवल पत्थर या धातु की कलाकृति नहीं होती। वह उस समाज की सामूहिक स्मृति, राजनीतिक विचारधारा, सांस्कृतिक पहचान और इतिहास-बोध का सार्वजनिक घोषणापत्र भी होती है। इसलिए यह प्रश्न रोचक है कि आखिर चौराहों और सार्वजनिक स्थलों पर ऐतिहासिक नायकों की मूर्तियाँ स्थापित करने की परंपरा कब और कैसे शुरू हुई?

इस परंपरा की जड़ें हजारों वर्ष पुरानी हैं, लेकिन इसका आधुनिक स्वरूप मुख्यतः उन्नीसवीं शताब्दी में विकसित हुआ। प्राचीन सभ्यताओं—विशेषकर मिस्र, यूनान और रोम—में विशाल मूर्तियाँ बनाई जाती थीं। मिस्र के फ़राओ अपनी सत्ता के प्रदर्शन के लिए विशाल प्रतिमाएँ बनवाते थे। यूनान में विजयी खिलाड़ियों और वीरों की मूर्तियाँ मंदिरों और सार्वजनिक स्थानों पर स्थापित होती थीं। रोमन साम्राज्य ने इस परंपरा को और आगे बढ़ाया तथा सम्राटों और विजयी सेनानायकों की अश्वारोही प्रतिमाएँ साम्राज्य की शक्ति के प्रतीक के रूप में नगरों में स्थापित कीं। 

मध्यकाल में यूरोप में सार्वजनिक मूर्तियों का महत्व अपेक्षाकृत कम हो गया। धार्मिक मूर्तियाँ चर्चों तक सीमित रहीं। पुनर्जागरण  के बाद मानव-केंद्रित कला के पुनर्जन्म के साथ फिर से शासकों और महान व्यक्तियों की मूर्तियाँ बनने लगीं।

उन्नीसवीं शताब्दी में "स्टैच्यू मेनिया" का दौर आया।आज जिस प्रकार शहरों के चौराहों पर महापुरुषों की प्रतिमाएँ दिखाई देती हैं, उसकी वास्तविक शुरुआत उन्नीसवीं शताब्दी के यूरोप में हुई। इतिहासकार इसे "प्रतिमा-उन्माद" का युग भी कहते हैं। यह वह समय था जब आधुनिक राष्ट्र-राज्य बन रहे थे। सरकारें चाहती थीं कि नागरिक स्वयं को एक साझा इतिहास और साझा राष्ट्रीय पहचान से जोड़ें। इसलिए शहरों के चौक, पार्क और प्रमुख मार्ग राष्ट्रीय नायकों, सेनानायकों, साहित्यकारों और राजनेताओं की प्रतिमाओं से सजाए जाने लगे। इनका उद्देश्य केवल सम्मान देना नहीं, बल्कि नागरिकों में राष्ट्रवाद, गौरव और प्रेरणा का भाव जगाना भी था।

ब्रिटिश शासन ने इस परंपरा को भारत में बड़े पैमाने पर अपनाया। कलकत्ता, बम्बई, मद्रास और दिल्ली जैसे शहरों में महारानी विक्टोरिया, लॉर्ड कर्जन, लॉर्ड कॉर्नवालिस तथा अन्य अंग्रेज़ अधिकारियों की मूर्तियाँ स्थापित की गईं। यह केवल स्मारक नहीं थे, बल्कि औपनिवेशिक सत्ता की दृश्य उपस्थिति थे। उनका संदेश स्पष्ट था—साम्राज्य स्थायी है और उसकी शक्ति सर्वत्र विद्यमान है। 

स्वतंत्र भारत में 1947 के बाद सार्वजनिक स्थानों की प्रतीकात्मक भाषा बदल गई । अनेक ब्रिटिश अधिकारियों की मूर्तियाँ हटाकर संग्रहालयों या विशेष उद्यानों में स्थानांतरित कर दी गईं। उनकी जगह महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव आंबेडकर, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, छत्रपति शिवाजी महाराज, रानी लक्ष्मीबाई और क्षेत्रीय नायकों की प्रतिमाएँ स्थापित होने लगीं। इससे सार्वजनिक स्थान भारतीय इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृतियों के वाहक बन गए।

विश्व में भी कुछ रोचक उदाहरण मिल जाते हैं। हीरोस स्क्वेयर में हंगरी के राष्ट्रीय इतिहास के प्रमुख नायकों का विशाल स्मारक राष्ट्रीय पहचान का प्रतीक है।पार्लियामेंट स्क्वेयर  में ब्रिटेन के अनेक प्रधानमंत्रियों और विश्व नेताओं की प्रतिमाएँ लोकतांत्रिक परंपरा का प्रतीक हैं।  अमेरिका के न्यूयॉर्क में स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी  किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि स्वतंत्रता के आदर्श की प्रतिमा है। भारत के गुजरात में सरदार पटेल की प्रतिमा स्टेच्यू ऑफ यूनिटी के रूप में प्रसिद्ध हुई है।

मूर्तियाँ केवल इतिहास नहीं बतातीं, वे यह भी बताती हैं कि समाज किसे याद रखना चाहता है। इसलिए समय बदलने पर अनेक प्रतिमाएँ विवादों में आ जाती हैं।

हाल के वर्षों में यूरोप, अमेरिका और अफ्रीका में उपनिवेशवाद, दास-व्यापार और नस्लवाद से जुड़े व्यक्तियों की प्रतिमाएँ हटाने या संग्रहालयों में ले जाने की मांग उठी। इससे यह स्पष्ट हुआ कि सार्वजनिक स्मृति स्थिर नहीं होती; प्रत्येक पीढ़ी अपने नायकों का पुनर्मूल्यांकन करती है। 

आज भारत में केवल राष्ट्रीय नेताओं की ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय नायकों, जनजातीय वीरों, समाज सुधारकों और स्थानीय महापुरुषों की प्रतिमाएँ भी बड़ी संख्या में स्थापित की जा रही हैं। कई राज्यों में नई प्रतिमाएँ सांस्कृतिक अस्मिता और सामाजिक प्रतिनिधित्व का माध्यम बन रही हैं। साथ ही न्यायालयों ने यह भी कहा है कि सार्वजनिक मार्गों पर प्रतिमाएँ स्थापित करते समय नागरिकों की सुविधा और सुरक्षा का ध्यान रखा जाना चाहिए।

यद्यपि प्रारंभ में सार्वजनिक स्थानों पर प्रतिमाएँ मुख्यतः राजाओं और विजयी सेनानायकों की लगाई जाती थीं। किंतु उन्नीसवीं शताब्दी में मूर्तियों के चरित्रों में विस्तार हुआ। इतिहासकार इस दौर को स्टेच्यू मेनिया का युग कहते हैं। स्वतंत्रता के बाद भारत में भी अनेक औपनिवेशिक प्रतिमाएँ हटाकर राष्ट्रीय नेताओं की प्रतिमाएँ स्थापित की गईं।

आज प्रतिमाएँ केवल कला नहीं, बल्कि राजनीति, इतिहास, पर्यटन और स्थानीय पहचान का भी महत्वपूर्ण माध्यम बन चुकी हैं।दरअसल सार्वजनिक स्थलों पर स्थापित प्रतिमाएँ केवल अतीत का स्मरण नहीं करातीं; वे वर्तमान समाज के मूल्यों का भी दर्पण होती हैं। हर प्रतिमा एक प्रश्न पूछती है—हम किसे अपना नायक मानते हैं और आने वाली पीढ़ियों को किस इतिहास से परिचित कराना चाहते हैं? इसलिए ये मूर्तियाँ केवल पत्थर नहीं, बल्कि समाज की जीवित स्मृति, उसकी आकांक्षाओं और उसकी बदलती चेतना की अभिव्यक्ति हैं।

ब्रजेश कानूनगो


Friday, 3 July 2026

ई रिक्शा, मोबाइल ऐप और साइबर सुरक्षा : क्या यह किसी बड़े डिजिटल खतरे की चेतावनी है?

-रिक्शा, मोबाइल ऐप और साइबर सुरक्षा : क्या यह किसी बड़े डिजिटल खतरे की चेतावनी है?

देश के विभिन्न हिस्सों से हाल के दिनों में ई-रिक्शाओं के अचानक बंद हो जाने अथवा उनके संचालन में व्यवधान आने की शिकायतों ने एक नया प्रश्न खड़ा कर दिया है। आशंका व्यक्त की जा रही है कि कुछ मोबाइल एप्स या डिजिटल माध्यमों के जरिए इन वाहनों के संचालन को प्रभावित किया गया। सरकार द्वारा ऐसे कुछ संदिग्ध एप्स को हटाने या उनके विरुद्ध कार्रवाई के निर्देश दिए जाने की खबरों ने इस विषय को और गंभीर बना दिया है।

यद्यपि इन घटनाओं की जांच पूरी होने से पहले किसी निष्कर्ष पर पहुँचना उचित नहीं होगा, फिर भी यह घटनाक्रम एक बड़े प्रश्न की ओर अवश्य संकेत करता है—क्या भारत की तेजी से डिजिटल होती अर्थव्यवस्था और परिवहन व्यवस्था साइबर हमलों के प्रति पर्याप्त रूप से सुरक्षित है?

आज ई-रिक्शा केवल एक वाहन नहीं, बल्कि लाखों परिवारों की आजीविका का आधार है। इनमें से अनेक वाहन मोबाइल ऐप, क्लाउड सर्वर, जीपीएस, बैटरी प्रबंधन प्रणाली और दूरस्थ (रिमोट) सॉफ्टवेयर अपडेट जैसी तकनीकों पर निर्भर हैं। यदि इनमें किसी प्रकार की सुरक्षा कमजोरी हो, तो केवल एक वाहन ही नहीं, बल्कि हजारों वाहन एक साथ प्रभावित हो सकते हैं।

दुनिया में पहले भी ऐसे उदाहरण सामने आ चुके हैं, जब साइबर हमलों ने बिजली ग्रिड, तेल पाइपलाइन, अस्पताल, बंदरगाह, बैंकिंग सेवाओं और दूरसंचार नेटवर्क को प्रभावित किया। इससे स्पष्ट है कि आधुनिक युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि डिजिटल नेटवर्क के भीतर भी लड़े जा सकते हैं। ऐसे में यदि किसी देश के छोटे-छोटे डिजिटल तंत्रों की सुरक्षा कमजोर हो, तो वे बड़े हमलों के लिए आसान लक्ष्य बन सकते हैं।

हालांकि यह कहना कि ई-रिक्शाओं की घटनाएँ निश्चित रूप से किसी बड़े साइबर युद्ध की "रिहर्सल" हैं, अभी तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। लेकिन सुरक्षा विशेषज्ञ लंबे समय से यह चेतावनी देते रहे हैं कि हमलावर अक्सर पहले छोटे स्तर पर कमजोरियों की पहचान करते हैं, फिर बड़े और महत्वपूर्ण तंत्रों को निशाना बनाते हैं। इसलिए ऐसी हर घटना को गंभीरता से लेकर उसकी वैज्ञानिक और निष्पक्ष जांच आवश्यक है।

भारत में डिजिटल भुगतान, स्मार्ट मीटर, इंटरनेट से जुड़े वाहन, ड्रोन, स्मार्ट ट्रैफिक सिस्टम, रेलवे, मेट्रो, अस्पताल और सरकारी सेवाएँ तेजी से डिजिटल प्लेटफॉर्म पर निर्भर होती जा रही हैं। यह परिवर्तन सुविधाजनक और विकासोन्मुख है, लेकिन इसके साथ साइबर सुरक्षा की जिम्मेदारी भी कई गुना बढ़ जाती है। यदि किसी महत्वपूर्ण डिजिटल तंत्र में सेंध लगती है, तो उसका प्रभाव केवल तकनीकी नहीं बल्कि आर्थिक, सामाजिक और राष्ट्रीय सुरक्षा तक पहुँच सकता है।

इसलिए अब साइबर सुरक्षा को केवल आईटी विभाग का विषय मानना पर्याप्त नहीं है। वाहन निर्माता कंपनियों को अपने सॉफ्टवेयर का नियमित सुरक्षा परीक्षण करना चाहिए। रिमोट कंट्रोल और ऐप आधारित सुविधाओं में मजबूत एन्क्रिप्शन, बहु-स्तरीय प्रमाणीकरण और सुरक्षित अपडेट प्रणाली अनिवार्य होनी चाहिए। सरकार को भी इंटरनेट से जुड़े वाहनों और अन्य स्मार्ट उपकरणों के लिए स्पष्ट साइबर सुरक्षा मानक लागू करने चाहिए। साथ ही, संदिग्ध ऐप्स, विदेशी सर्वरों और आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) से जुड़े जोखिमों की सतत निगरानी आवश्यक है।

इसके अतिरिक्त, साइबर घटनाओं की त्वरित रिपोर्टिंग, डिजिटल फोरेंसिक जांच, स्वतंत्र सुरक्षा ऑडिट तथा नागरिकों और वाहन चालकों में साइबर जागरूकता बढ़ाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अक्सर छोटी-सी लापरवाही बड़े संकट का कारण बन जाती है।

डिजिटल भारत की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि हम सुविधाओं के साथ सुरक्षा को कितना महत्व देते हैं। तकनीक जितनी अधिक शक्तिशाली होगी, उसकी सुरक्षा उतनी ही मजबूत होनी चाहिए। ई-रिक्शाओं से जुड़ी हालिया घटनाएँ चाहे अंततः तकनीकी खराबी सिद्ध हों या साइबर हस्तक्षेप, उन्होंने एक महत्वपूर्ण चेतावनी अवश्य दी है—डिजिटल अवसंरचना की सुरक्षा अब राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता का अभिन्न अंग बन चुकी है।

घबराने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन सतर्क रहने की आवश्यकता अवश्य है। यही सतर्कता भविष्य के संभावित डिजिटल संकटों को टालने का सबसे प्रभावी उपाय सिद्ध हो सकती है।

ब्रजेश कानूनगो

Wednesday, 1 July 2026

अनोखे विरोध प्रदर्शन : जब प्रतीक बन जाते हैं सबसे प्रभावी भाषा

अनोखे विरोध प्रदर्शन : जब प्रतीक बन जाते हैं सबसे प्रभावी भाषा

छत्तीसगढ़ के जांजगीर में खराब सड़कों के विरोध का एक अनोखा दृश्य सामने आया। नागरिक सड़क के गड्ढों में भरे गंदे पानी में उतरकर नहाने लगे। उनका संदेश स्पष्ट था—यदि सड़कें तालाब बन चुकी हैं, तो प्रशासन को भी इस विडंबना का सामना करना चाहिए। यह प्रदर्शन न हिंसक था, न आक्रामक; फिर भी उसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया। यही प्रतीकात्मक विरोध की सबसे बड़ी शक्ति है।

लोकतंत्र में विरोध केवल नारे लगाने या ज्ञापन सौंपने तक सीमित नहीं रहता। जब लोगों को लगता है कि उनकी आवाज़ लगातार अनसुनी की जा रही है, तब वे ऐसे तरीके खोजते हैं जो व्यवस्था को झकझोर दें और समाज का ध्यान भी खींचें। ऐसे विरोध कभी व्यंग्य का सहारा लेते हैं, कभी कला का, कभी हास्य का और कभी किसी गहरे प्रतीक का।

भारत में प्रतीकात्मक विरोध की अनेक मिसालें मिलती हैं। कई शहरों में लोगों ने सड़क के गड्ढों में धान रोपकर यह बताया कि सड़कें खेत बन चुकी हैं। कहीं गड्ढों में मछली पकड़ने का नाटक किया गया, तो कहीं नाव चलाकर यह संदेश दिया गया कि बरसात में सड़क और तालाब का अंतर मिट गया है। किसानों ने कभी सड़कों पर दूध बहाकर, तो कभी सब्जियां मुफ्त बांटकर अपनी आर्थिक पीड़ा व्यक्त की। इन प्रदर्शनों का उद्देश्य नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि एक ऐसी तस्वीर बनाना था जिसे अनदेखा करना कठिन हो।

विश्व के अनेक देशों में भी ऐसे रचनात्मक विरोध लोकतांत्रिक संस्कृति का हिस्सा बन चुके हैं। दक्षिण कोरिया में लाखों नागरिक हाथों में मोमबत्तियां लेकर शांतिपूर्वक सड़कों पर उतरे। बिना हिंसा के हुए इन 'कैंडललाइट' प्रदर्शनों ने जनमत की शक्ति का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया, जिसने अंततः राजनीतिक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया।

ब्रिटेन में पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने सड़कों पर स्वयं को चिपकाकर, धीमी गति से मार्च निकालकर और सार्वजनिक स्थलों पर प्रदर्शन करके जलवायु संकट को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया। उनके तरीकों पर मतभेद रहे, लेकिन यह निर्विवाद है कि उन्होंने पर्यावरण पर चर्चा को नई ऊंचाई दी।

फ्रांस के किसानों ने ट्रैक्टरों के लंबे काफिलों से शहरों का रुख किया, सार्वजनिक भवनों के बाहर गोबर और मिट्टी डालकर अपनी नाराज़गी व्यक्त की। यह उनके लिए केवल विरोध नहीं था, बल्कि यह बताने का माध्यम था कि कृषि संकट को अब और अनदेखा नहीं किया जा सकता।

हांगकांग में लोकतंत्र समर्थक आंदोलन के दौरान साधारण छाता प्रतिरोध का वैश्विक प्रतीक बन गया। पुलिस की कार्रवाई से बचने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली छतरी देखते-देखते नागरिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रतीक बन गई।

चिली में महिलाओं ने सामूहिक गीत और नृत्य के माध्यम से महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के खिलाफ ऐसा सांस्कृतिक प्रतिरोध खड़ा किया, जिसकी गूंज दुनिया के अनेक देशों तक पहुंची। यह प्रदर्शन बताता है कि कला भी विरोध की प्रभावशाली भाषा हो सकती है।

हाल के वर्षों में सोशल मीडिया ने भी विरोध की प्रकृति बदल दी है। अब किसी प्रदर्शन की सफलता केवल उसमें शामिल लोगों की संख्या से नहीं, बल्कि उसके संदेश की प्रभावशीलता और दृश्यात्मकता से भी तय होने लगी है। एक अनोखी तस्वीर या छोटा-सा वीडियो कुछ ही घंटों में करोड़ों लोगों तक पहुंच सकता है। इसलिए आज विरोध प्रदर्शन अधिक प्रतीकात्मक, रचनात्मक और मीडिया-अनुकूल होते जा रहे हैं।

लेकिन इस प्रवृत्ति के साथ एक सावधानी भी जुड़ी है। केवल वायरल होना किसी आंदोलन की सफलता का प्रमाण नहीं हो सकता। यदि प्रदर्शन से आम नागरिकों को अनावश्यक कठिनाई हो, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचे या हिंसा फैलने लगे, तो उसका नैतिक आधार कमजोर पड़ जाता है। लोकतंत्र में सबसे प्रभावी विरोध वही है जो व्यवस्था पर प्रश्न उठाए, लेकिन समाज को नुकसान न पहुंचाए।

जांजगीर जैसे  विरोध प्रदर्शन इसी कारण उल्लेखनीय होते हैं। जो प्रशासन की लापरवाही को एक ऐसे दृश्य में बदल देते हैं जिसे शब्दों से कहीं अधिक प्रभावशाली ढंग से समझा जा सकता है। ऐसे प्रदर्शन हमें यह भी याद दिलाते हैं कि लोकतंत्र में नागरिक केवल मतदाता नहीं होते, बल्कि वे रचनात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से शासन को उसकी जिम्मेदारियों का स्मरण कराने वाले सक्रिय सहभागी भी होते हैं।

जब शिकायतें सुनाई नहीं देतीं, तब प्रतीक बोलने लगते हैं। और कई बार, इतिहास गवाह है कि ऐसे प्रतीक ही बड़े बदलावों की शुरुआत बन जाते हैं।

ब्रजेश कानूनगो


Wednesday, 24 June 2026

क्या युवाओं में लक्जरी जीवन का आकर्षण कम हो रहा है ?

क्या युवाओं में लक्जरी जीवन का आकर्षण कम हो रहा है ?

समाज में प्रत्येक पीढ़ी अपनी जीवन-शैली और प्राथमिकताओं के आधार पर पहचानी जाती है। एक समय था जब युवाओं के लिए सफलता का अर्थ महंगी कार, बड़ा घर, ब्रांडेड वस्त्र और भौतिक सुख-सुविधाओं का अधिकाधिक संग्रह माना जाता था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में भारतीय युवाओं के एक बड़े वर्ग में एक नया रुझान दिखाई दे रहा है। अब अनेक युवा महंगे सामान खरीदने की अपेक्षा यात्रा, घुमक्कड़ी, साहसिक गतिविधियों, नए अनुभवों और आत्मविकास पर अधिक खर्च करना पसंद कर रहे हैं। इससे यह प्रश्न उठता है कि क्या वास्तव में भारतीय युवाओं में लक्जरी जीवन और ऐशोआराम के प्रति मोह कम हो रहा है?

डिजिटल युग ने युवाओं के सामने पूरी दुनिया खोल दी है। सोशल मीडिया, यात्रा ब्लॉग, वीडियो प्लेटफॉर्म और वैश्विक संपर्कों ने उन्हें यह समझने का अवसर दिया है कि जीवन का आनंद केवल वस्तुओं के संग्रह में नहीं, बल्कि विविध अनुभवों में भी निहित है। यही कारण है कि अनेक युवा नई जगहों पर जाना, स्थानीय संस्कृतियों को समझना, ट्रेकिंग करना, वन्य जीवन देखना, स्वयंसेवी गतिविधियों में भाग लेना या नई कलाएँ सीखना अधिक पसंद कर रहे हैं।

उनके लिए अब किसी महंगे मोबाइल या कार से अधिक महत्व उस यात्रा का हो सकता है जो उन्हें नए लोगों और नए विचारों से परिचित कराए। इस सोच को अक्सर अनुभव आधारित अर्थव्यवस्था कहा जाता है।

ऐसे में पर्यटन और घुमक्कड़ी का आकर्षण भी बढ़ता गया है। भारत में घरेलू पर्यटन का तेजी से विस्तार हुआ है। सप्ताहांत यात्राएँ, बैकपैकिंग, बाइक ट्रिप, सोलो ट्रैवल और डिजिटल नोमैड जीवनशैली जैसी अवधारणाएँ युवाओं के बीच लोकप्रिय हुई हैं। अनेक युवा अपने वेतन का एक हिस्सा नियमित रूप से यात्रा के लिए बचाकर रखते हैं।

कोविड-19 महामारी के बाद भी लोगों में प्रकृति के निकट जाने, कम भीड़ वाले स्थानों को देखने और जीवन को अधिक अर्थपूर्ण बनाने की इच्छा बढ़ी है। पहाड़, जंगल, समुद्र तट और ऐतिहासिक स्थल युवाओं को केवल मनोरंजन ही नहीं, बल्कि मानसिक ताजगी और आत्मअनुभूति भी प्रदान करते हैं।

आज का युवा अपने माता-पिता की पीढ़ी से कुछ अलग आर्थिक परिस्थितियों में जी रहा है। महानगरों में बढ़ती संपत्ति कीमतें, नौकरी की अनिश्चितता और बदलती अर्थव्यवस्था ने युवाओं को यह सोचने पर मजबूर किया है कि केवल भौतिक संपत्ति जुटाना ही जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं हो सकता।

कई युवा न्यूनतम वस्तुओं के साथ संतुलित जीवन की अवधारणा को अपनाने लगे हैं। वे अनावश्यक वस्तुओं पर खर्च करने के बजाय स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल विकास और अनुभवों में निवेश को अधिक उपयोगी मानते हैं। तो क्या यह मान लिया जाए कि वास्तव में लक्जरी का आकर्षण समाप्त हो रहा है?

हालाँकि यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि युवाओं का लक्जरी जीवन के प्रति आकर्षण समाप्त हो गया है। वस्तुतः लक्जरी की परिभाषा बदल रही है। पहले जहाँ लक्जरी का अर्थ महंगे उत्पादों का स्वामित्व था, वहीं अब अनेक युवाओं के लिए लक्जरी का अर्थ समय की स्वतंत्रता, मानसिक शांति, यात्रा करने की क्षमता और मनपसंद कार्य करने का अवसर बन गया है।

इसके साथ ही सोशल मीडिया पर दिखने वाली भव्य जीवनशैली, ब्रांडेड उत्पादों और लग्जरी पर्यटन का आकर्षण भी बना हुआ है। उच्च आय वर्ग के युवाओं में महंगे गैजेट, प्रीमियम वाहन, फैशन और लक्जरी अनुभवों की मांग अभी भी मौजूद है। इसलिए यह परिवर्तन सभी युवाओं पर समान रूप से लागू नहीं होता। युवाओं का एक बहुत बड़ा वर्ग आज भी अपनी बुनियादी जरूरतों की जद्दोजहद में परेशानियों से घिरा हुआ है।

सोशल मीडिया ने इस बदलाव को युवा वर्ग को मोहित भी दिया है और चुनौती भी दी है। एक ओर यह युवाओं को नए स्थानों, संस्कृतियों और अनुभवों के बारे में प्रेरित करता है, वहीं दूसरी ओर दिखावे और तुलना की संस्कृति को भी बढ़ाता है। कई बार यात्रा भी अनुभव प्राप्त करने के बजाय सोशल मीडिया पर आकर्षक तस्वीरें साझा करने का माध्यम बन जाती है। इसलिए यह समझना आवश्यक है कि अनुभवों की खोज और दिखावे की प्रवृत्ति के बीच एक सूक्ष्म अंतर है।

यदि युवा अनुभव आधारित जीवनशैली की ओर बढ़ते हैं तो पर्यटन, आतिथ्य, स्थानीय हस्तशिल्प, साहसिक खेल और सांस्कृतिक उद्योगों को लाभ मिल सकता है। इससे छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर भी उत्पन्न हो सकते हैं।

भारतीय युवाओं में लक्जरी जीवन के प्रति आकर्षण पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है, लेकिन उनकी प्राथमिकताओं में निश्चित रूप से बदलाव दिखाई दे रहा है। भौतिक वस्तुओं के संग्रह की तुलना में अनुभव, यात्रा, आत्मविकास, मानसिक स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता को अधिक महत्व मिलने लगा है। यह परिवर्तन आधुनिक जीवन की नई समझ को दर्शाता है, जहाँ सफलता केवल संपत्ति के आकार से नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों की समृद्धि से भी मापी जा रही है।

फिर भी संतुलन आवश्यक है। न तो भौतिक उपलब्धियों को पूरी तरह नकारा जा सकता है और न ही केवल अनुभवों को जीवन का एकमात्र लक्ष्य माना जा सकता है। आदर्श स्थिति वही है जहाँ युवा आर्थिक जिम्मेदारियों का निर्वाह करते हुए नए अनुभवों, सीखने और जीवन के आनंद के लिए भी पर्याप्त स्थान बना सकें।


ब्रजेश कानूनगो 


Friday, 19 June 2026

पैदल चलने का अधिकार : क्या हमारे शहर कभी पैदल यात्रियों के भी होंगे?

पैदल चलने का अधिकार : क्या हमारे शहर कभी पैदल यात्रियों के भी होंगे?

किसी भी सभ्य समाज की पहचान केवल उसकी चौड़ी सड़कों, फ्लाईओवरों और तेज रफ्तार वाहनों से नहीं होती, बल्कि इस बात से भी होती है कि वहां एक सामान्य नागरिक कितनी सुरक्षित और सम्मानजनक ढंग से पैदल चल सकता है। भारत में वर्षों से विकास का अर्थ मोटर वाहनों के लिए अधिक से अधिक जगह बनाना माना गया है, जबकि पैदल चलने वाले नागरिकों को अक्सर योजना निर्माण के केंद्र से बाहर रखा गया है। ऐसे समय में सर्वोच्च न्यायालय का यह कहना कि पैदल चलना नागरिक का मौलिक अधिकार है और हर सड़क के साथ सुरक्षित फुटपाथ होना चाहिए, एक ऐतिहासिक और दूरगामी महत्व का निर्णय है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सुरक्षित फुटपाथ पर चलने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(1)(d) में निहित आवागमन की स्वतंत्रता तथा अनुच्छेद 21 में वर्णित जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से जुड़ा हुआ है। न्यायालय ने यह भी कहा कि पैदल यात्रियों का अधिकार मोटर वाहनों की सुविधा से कम महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि कई परिस्थितियों में उसे प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

यह दृष्टिकोण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में लाखों लोग प्रतिदिन पैदल चलकर विद्यालय, बाजार, कार्यालय, बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन तक पहुंचते हैं। गरीब, बुजुर्ग, दिव्यांग, महिलाएं और बच्चे सबसे अधिक पैदल यात्री होते हैं, लेकिन शहरी योजनाओं में उनकी आवश्यकताएं अक्सर उपेक्षित रह जाती हैं।

देश के अधिकांश शहरों में फुटपाथ या तो हैं ही नहीं, और यदि हैं तो वे अधूरे, टूटे-फूटे अथवा अतिक्रमण से घिरे हुए मिलते हैं। कहीं उन पर दुकानों का कब्जा है, कहीं वाहन पार्क किए जाते हैं, तो कहीं बिजली के ट्रांसफार्मर, पोल या अन्य निर्माण सामग्री रख दी जाती है। परिणामस्वरूप पैदल यात्रियों को सड़क पर उतरना पड़ता है और दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है। विभिन्न न्यायिक टिप्पणियों में भी कहा गया है कि फुटपाथों का अतिक्रमण हटाना तथा उन्हें आम नागरिक और  दिव्यांगजन-अनुकूल बनाना प्रशासन की जिम्मेदारी है।

वास्तव में भारत में सड़क दुर्घटनाओं में पैदल यात्रियों की हिस्सेदारी चिंताजनक है। अनेक नगरों में सड़कें वाहन-केंद्रित बनती गईं, जबकि पैदल चलने वालों के लिए सुरक्षित स्थान सिकुड़ता गया। सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों को बार-बार इस विषय में हस्तक्षेप करना पड़ा है।

दुनिया के अन्य देशों की बात करें तो नीदरलैंड में सड़क डिजाइन का मूल सिद्धांत है कि सबसे पहले पैदल यात्री, फिर साइकिल चालक और उसके बाद मोटर वाहन। शहरों में चौड़े, निरंतर और बाधारहित फुटपाथ अनिवार्य माने जाते हैं। स्कूलों और आवासीय क्षेत्रों में वाहनों की गति सीमित रखी जाती है। जापान में पैदल यात्रियों की सुरक्षा को अत्यधिक महत्व दिया जाता है। रेलवे स्टेशनों, बाजारों और आवासीय क्षेत्रों में पैदल मार्गों का सुव्यवस्थित नेटवर्क है। अतिक्रमण के प्रति प्रशासन लगभग शून्य सहनशीलता की नीति अपनाता है।

सिंगापुर ने "वॉकएबल सिटी" की अवधारणा विकसित की है। वहां फुटपाथ केवल सड़क के किनारे की पट्टी नहीं, बल्कि सार्वजनिक परिवहन से जुड़े एकीकृत नेटवर्क का हिस्सा हैं। बुजुर्गों और दिव्यांगजनों की सुविधा के लिए रैंप, टैक्टाइल पथ और सुरक्षित क्रॉसिंग अनिवार्य हैं। ब्रिटेन में स्थानीय निकायों पर यह कानूनी दायित्व है कि वे सार्वजनिक मार्गों को सुरक्षित और सुगम बनाए रखें। फुटपाथों पर अवैध पार्किंग और अवरोधों पर भारी जुर्माना लगाया जाता है। ऑस्ट्रेलिया और कनाडा में सड़क निर्माण परियोजनाओं के अनुमोदन से पहले पैदल यात्री प्रभाव मूल्यांकन (Pedestrian Impact Assessment) किया जाता है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि विकास कार्यों से पैदल चलने वालों की सुविधा प्रभावित न हो।

यदि इन देशों के उदाहरण से सबक लें तो भारत में भी कुछ कदम उठाए जा सकते हैं मसलन फुटपाथ अधिकार कानून बनाया जाए, जिसमें प्रत्येक सड़क पर न्यूनतम चौड़ाई के फुटपाथ का प्रावधान हो। अतिक्रमण और अवैध पार्किंग के विरुद्ध नियमित अभियान चलाए जाएं। दिव्यांगजन-अनुकूल डिजाइन को अनिवार्य बनाया जाए।नई सड़क परियोजनाओं में पैदल यात्री सुरक्षा ऑडिट आवश्यक हो। स्कूलों, अस्पतालों और बाजारों के आसपास पैदल प्राथमिकता क्षेत्र (Pedestrian Priority Zones) विकसित किए जाएं। नगर निगमों की जवाबदेही तय हो कि फुटपाथ टूटने, गायब होने या अतिक्रमित होने पर समयबद्ध कार्रवाई करें। शहरी परिवहन नीति में "कार-केंद्रित" सोच के स्थान पर "मानव-केंद्रित" दृष्टिकोण अपनाया जाए।

वस्तुतः पैदल चलना केवल एक गतिविधि नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक समानता का प्रतीक है। जो व्यक्ति कार नहीं खरीद सकता, वह भी उतना ही सम्मान और सुरक्षा का अधिकारी है जितना किसी महंगी गाड़ी में चलने वाला नागरिक। यदि फुटपाथ सुरक्षित, स्वच्छ और अवरोधमुक्त होंगे तो सड़क दुर्घटनाएं कम होंगी, प्रदूषण घटेगा, स्वास्थ्य सुधरेगा और शहर अधिक मानवीय बनेंगे। शहर केवल वाहनों के लिए नहीं बनाए जाते; वे मनुष्यों के लिए बनाए जाते हैं। जब तक भारत के शहरों में एक बच्चा, एक बुजुर्ग, एक महिला और एक दिव्यांग व्यक्ति निश्चिंत होकर पैदल नहीं चल सकता, तब तक हमारा शहरी विकास अधूरा माना जाएगा।

ब्रजेश कानूनगो


Tuesday, 16 June 2026

श्रम की मृत्यु और चेतना के पुनर्जन्म का नया समय दस्तक दे रहा है!

श्रम की मृत्यु और चेतना के पुनर्जन्म का नया समय दस्तक दे रहा है!

​यह मानव इतिहास का सबसे अनूठा विरोधाभास है—जिस 'श्रम' से मुक्ति पाने के लिए मनुष्य ने सदियों तक तकनीक का विकास किया, आज जब वह मुक्ति सामने खड़ी है, तो मनुष्य भयभीत है। जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), रोबोट और स्वचालित मशीनें हमारे सारे उत्पादक, प्रशासनिक और तार्किक काम संभाल लेंगे, तब यह सवाल उठना लाजिमी है कि यदि जीवन में कुछ 'करना' ही नहीं बचेगा, तो मनुष्य होने का अर्थ क्या रह जाएगा? क्या हम एक अंतहीन ऊब (Existential Boredom) के दलदल में धंस जाएंगे, या यह युग मानव चेतना के एक नए, अधिक समृद्ध अध्याय की शुरुआत करेगा? 

​औद्योगिक क्रांति के बाद से मनुष्य की पहचान उसके काम से जुड़ गई—"आप क्या करते हैं?" ही यह तय करता है कि "आप कौन हैं।" जब मशीनें इस काम को छीन लेंगी, तो शुरुआत में एक गहरा शून्य और असंतोष पैदा होगा, क्योंकि हमने 'सफलता' और 'संतोष' को केवल उत्पादकता (Productivity) से जोड़ना सीख लिया है।

भविष्य में संभावित इस ऊब से निपटने के लिए मनुष्य को अपनी परिभाषा बदलनी होगी। जब 'पेट भरने का संघर्ष' समाप्त हो जाएगा, तब काम 'मजबूरी' न रहकर 'आत्म-अभिव्यक्ति' (Self-expression) का माध्यम बनेगा। ऐसा लगता है तब हमारे जीवन में ​कला की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाएगी।फाइन आर्ट (चित्रकला, मूर्तिकला) जैसी प्रक्रियाएं मनुष्य को उत्पादकता के इस नए संकट से बचाएंगी। जब एक चित्रकार कैनवास पर रंग बिखेरता है, तो वह किसी बाजार के लिए नहीं, बल्कि अपने भीतर के कोलाहल को शांत करने के लिए करता है। कला मनुष्य को 'उपभोक्ता' से वापस 'स्रष्टा' (Creator) बनाएगी। हमारे पूर्वजों की चट्टानों, पहाड़ों, शिलाओं को तराश कर बनाए मंदिरों, मूर्तियों में उस शिल्प कला के बारे में विचार करिए, कितने लंबे समय तक तत्कालीन मनुष्य इन कलाओं में अपने एकांत को सुख से भर देने का सफल प्रयास करता रहा होगा।

​मशीनी युग में सबसे बड़ा खतरा शारीरिक और मानसिक जड़ता का होगा। जब उंगलियां केवल स्क्रीन छुएंगी और रोबोट सारा शारीरिक श्रम कर देंगे, तब मनुष्य अपने ही शरीर से कटने लगेगा। यहीं पर हमारी आदिम कलाएं—विशेषकर मार्शल आर्ट और परफॉर्मेंस आर्ट (नृत्य, थिएटर)—एक सुरक्षा कवच की तरह उभरेंगी। कलारीपयट्टू, कुंग-फू या कराटे जैसी विधाएं केवल आत्मरक्षा के साधन नहीं हैं; ये मन और शरीर के गहरे अनुशासन की यात्रा हैं। मशीनों के दौर में, जब पसीना बहाने की कोई व्यावहारिक जरूरत नहीं होगी, तब मार्शल आर्ट और योगाभ्यास  मनुष्य को उसकी शारीरिक सीमाओं, ताकत और आदिम प्रवृत्तियों से जोड़े रखेगा। यह उस 'अनचाही ऊब' को तोड़ने का सबसे प्रखर तरीका होगा।

डिजिटल और आभासी (Virtual) दुनिया के चरम पर होने के कारण लोग इंसानी स्पर्श और उपस्थिति के लिए तरसेंगे। थिएटर, लाइव म्यूजिक या नृत्य जैसी कलाएं 'उसी क्षण' (In the moment) जीने का अहसास कराती हैं। मशीनों के पास भूतकाल का डेटा है और भविष्य का प्रेडिक्शन, लेकिन 'वर्तमान क्षण' का जो उत्सव परफॉर्मेंस आर्ट में है, वह केवल मनुष्य ही महसूस और साझा कर सकता है।

​हो सकता है एआई  हर काम को परफेक्ट (त्रुटिहीन) तरीके से करने में सक्षम हो। वह एक आदर्श राग गा सकता है, बिना किसी व्याकरण की गलती के कहानी लिख सकता है और सटीक ज्यामितीय चित्र बना सकता है। लेकिन कला का सौंदर्य अक्सर उसकी 'कमियों' (Imperfections) में होता है। हाथ से बुने हुए कपड़े की असमान बुनावट में, या मिट्टी के घड़े पर कुम्हार की उंगलियों के टेढ़े-मेढ़े निशानों में जो मानवीय स्पर्श होता है, वह मशीन की गणितीय सटीकता में कभी नहीं मिल सकता।

भविष्य में, 'हैंडमेड' (Handmade) और 'ह्यूमन-मेड' (Human-made) दुनिया के सबसे महंगे लक्ज़री ब्रांड बन जाएंगे। लोग मशीन के बनाए परफेक्ट संगीत के बजाय किसी इंसान की कांपती हुई, लेकिन भावनाओं से भरी आवाज सुनना पसंद करेंगे। यह कमियों का उत्सव ही मनुष्य को संतोष देगा। इतिहास गवाह है कि जब-जब मनुष्य अत्यधिक खाली समय से घिरा है, समाज में अवसाद या अराजकता बढ़ी है। यदि एआई युग में आदिम कलाओं को संस्थागत रूप से नहीं अपनाया गया, तो शायद मनुष्य आत्मघाती ऊब का शिकार भी हो सकता है।

इन सब संभावनाओं, आशंकाओं के चलते हमें अभी से जीवन में कला को केवल 'शौक' नहीं, बल्कि 'जीवन पद्धति' (Lifestyle) बनाना होगा। पुराने समय में कबीलों के अपने नृत्य होते थे, त्योहार होते थे और मार्शल आर्ट के अखाड़े, योग केंद्र होते थे, जो समाज को आपस में जोड़ते थे।​भविष्य के समाज में ये आदिम प्रक्रियाएं नए 'अनुष्ठान' (Rituals) बनेंगी। लोग शाम को कम्युनिटी सेंटर्स में इकट्ठा होंगे—कोई मिट्टी को आकार दे रहा होगा, कोई तलवारबाजी सीख रहा होगा, तो कोई मंच पर कविता पाठ कर रहा होगा। यह साझा रचनात्मकता मनुष्यों को अकेलेपन और ऊब के अवसाद से बचाएगी।

​कृत्रिम बुद्धिमता और रोबोटिक्स का आना मानव श्रम का अंत जरूर है, लेकिन यह मानवीय संवेदनाओं का अंत नहीं है। बल्कि, यह पहली बार मनुष्य को इस योग्य बनाएगा कि वह 'मशीन की तरह काम करना' बंद करे और 'मनुष्य की तरह जीना' शुरू करे।

​जब पेट भरने और उत्तरजीविता (Survival) का संघर्ष मशीनें संभाल लेंगी, तब मनुष्य अपनी चेतना के उच्चतम शिखर की ओर बढ़ सकेगा। फाइन आर्ट, परफॉर्मेंस आर्ट और मार्शल आर्ट जैसी आदिम विधाएं मनोरंजन के साधन मात्र नहीं रहेंगी; वे उस युग में मनुष्य के 'मनुष्य बने रहने' की अनिवार्य शर्तें बन जाएंगी। तकनीक हमें सुविधा देगी, लेकिन संतोष और खुशी केवल हमारी आदिम रचनात्मकता ही दे पाएगी।


ब्रजेश कानूनगो

Friday, 12 June 2026

वर्दी की आड़ में डकैती: नकली पुलिस का बढ़ता खतरा

 वर्दी की आड़ में डकैती: नकली पुलिस का बढ़ता खतरा

इंदौर के पंढरीनाथ क्षेत्र में गत दिनों रात घिरने के पहले करीब साढ़े आठ बजे ही अपराधियों ने युवक के पास से 30 लाख रुपयों से भरा बैग पुलिस के भेष में सरेराह लूट लिया। इसके पहले भी कई बुजुर्ग महिलाओं को फुसलाकर गहने उतरवाने की घटनाएं भी यहां वहां होती ही रहती हैं।

​आज के दौर में अपराध के तौर-तरीके तेजी से बदल रहे हैं। अब अपराधी केवल हथियारों के बल पर ही नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक दबाव बनाकर भी लोगों को अपना शिकार बना रहे हैं। इनमें से सबसे चिंताजनक और हैरान करने वाला तरीका है—नकली पुलिस बनकर राहगीरों को लूटना। कानून के रखवाले और सुरक्षा के प्रतीक 'वर्दी' का इस्तेमाल जब अपराधी अपनी ढाल के रूप में करने लगें, तो यह न केवल आम जनता की सुरक्षा बल्कि पुलिस प्रशासन की साख पर भी एक बड़ा प्रहार है।

​नकली पुलिस बनकर लूटपाट करने वाले गिरोह आमतौर पर बेहद शातिर और सधे हुए होते हैं। वे अक्सर सुनसान सड़कों, हाईवे या सुबह-शाम टहलने वाले बुजुर्गों और महिलाओं को निशाना बनाते हैं। उनके काम करने का तरीका भी कुछ ऐसा होता है कि सामने वाला व्यक्ति भ्रम में पड़ जाता है। ​चेकिंग के बहाने अपराधी खाकी वर्दी या सादे कपड़ों में कई बार खुद को क्राइम ब्रांच या विशेष अधिकारी बताकर आते हैं और राहगीरों को रोकते हैं। दस्तावेजों की जांच के लिए वाहनों को रोककर लाइसेंस या कागजात मांगने के बहाने डराना और फिर चालान या गिरफ्तारी का खौफ दिखाकर पैसे ऐंठ लेते हैं।

कई बार ​भय का माहौल बनाने के लिए मनोवैज्ञानिक तरीका अपनाते हैं। पीड़ित से कहते हैं कि "आगे मर्डर हुआ है" या "आगे चेकिंग चल रही है, आपके गहने और नकदी सुरक्षित नहीं हैं।" कई उदाहरण हैं ऐसे प्रकरणों के जब  वे पीड़ित को अपने गहने या पैसे उतारकर एक रुमाल या लिफाफे में रखने को कहते हैं। मदद करने के बहाने वे खुद ही सामान पैक करते हैं और पलक झपकते ही उसे नकली सामान या पत्थरों से बदल देते हैं।

​इस तरह के अपराधों के लगातार बढ़ने के पीछे कई सामाजिक और प्रशासनिक कारण होते हैं। भारतीय समाज में पुलिस की वर्दी का एक रसूख है। आम नागरिक अक्सर पुलिस से बहस करने से बचते हैं और उनके आदेशों का बिना सवाल किए पालन करते हैं। अपराधी इसी मानसिक स्थिति का फायदा उठाते हैं। पुलिस की वर्दी, बेल्ट, कैप और यहां तक कि नकली आईडी कार्ड और वॉकी-टॉकी जैसी चीजें भी आसानी से तैयार कर ली जाती हैं। कुछ हूबहू नकली वस्तुएं बाजार में भी उपलब्ध हो जाती हैं। इसके लिए कोई सख्त वेरिफिकेशन सिस्टम न होना अपराधियों का काम आसान कर देता है। अधिकांश लोगों को यह नहीं पता होता कि असली पुलिस अधिकारी के पास क्या अधिकार हैं और वे चेकिंग के दौरान किस प्रक्रिया का पालन करने के लिए बाध्य हैं। अपराधी जानते हैं कि बुजुर्ग या अकेले चल रहे लोग आसानी से डर जाते हैं और शारीरिक रूप से विरोध नहीं कर पाते।

​लूटपाट की इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए समाज और प्रशासन दोनों को मिलकर प्रयास करने होंगे। प्रशासनिक स्तर पर ​वर्दी की बिक्री पर कड़ा नियंत्रण होना जरूरी होगा।पुलिस की वर्दी और लोगो (Logo) बेचने वाली दुकानों का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन होना चाहिए। बिना वैध आईडी कार्ड के किसी को भी वर्दी न बेची जाए। पुलिस गश्त (Patrolling) में तेजी के  लिए पुलिस को अपने-अपने क्षेत्रों में, विशेषकर सुबह और देर शाम के समय गश्त बढ़ानी चाहिए ताकि अपराधी सक्रिय न हो सकें। स्थानीय मुखबीर प्रणाली को बढ़ावा दिया जाना आवश्यक है। हेल्पलाइन नंबरों पर आने वाली ऐसी शिकायतों पर पुलिस को तुरंत एक्शन लेना चाहिए ताकि गिरोह को रंगे हाथों पकड़ा जा सके।

नागरिक को खुद भी अपने को सचेत और सावधान बनाना होगा। यदि रास्ते में कोई खुद को पुलिसकर्मी बताकर रोकता है, तो घबराने के बजाय उनसे पहले आईडी कार्ड (ID Card) की मांग की जाए। हर पुलिसकर्मी का यह कर्तव्य है कि वह मांगने पर अपनी पहचान दिखाए। अगर कोई खुद को 'क्राइम ब्रांच' का बताता है, तो तुरंत उसका आधिकारिक पहचान पत्र मांगें। गहने उतारने की बात पर तुरंत सतर्क हो जाएं  असली पुलिस कभी भी आपको सुरक्षा का हवाला देकर सड़क पर गहने उतारकर रुमाल में रखने को नहीं कहेगी। अगर कोई ऐसा कहता है, तो समझ जाएं कि वे ठग हैं। यदि कोई संदिग्ध व्यक्ति आपको सुनसान जगह पर रोकने का प्रयास करे, तो गाड़ी न रोकें। वाहन को किसी पेट्रोल पंप, मार्केट या भीड़भाड़ वाले इलाके में ले जाकर ही रोकें। संदिग्ध पुलिसकर्मियों की गाड़ी का नंबर, उनका हुलिया और बातचीत के लहजे पर ध्यान दें। असली पुलिसकर्मी आमतौर पर सरकारी या विशेष नंबर प्लेट वाले वाहनों का उपयोग करते हैं। अगर शक हो, तो तुरंत 112 (या स्थानीय पुलिस हेल्पलाइन) पर कॉल करके पूछें कि क्या उस इलाके में कोई आधिकारिक चेकिंग चल रही है। अपने मोबाइल को अपने नियंत्रण और सुरक्षा में मजबूती से रखें। इंदौर की घटना में अपराधियों ने सबसे पहले पीड़ित का मोबाइल फोन बंद कर दिया था।​

​नकली पुलिस बनकर लूटने की घटनाएं केवल एक आर्थिक अपराध नहीं हैं, बल्कि यह आम जनता के मन में कानून व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा करती हैं। सतर्कता ही इसका सबसे बड़ा बचाव है। जब नागरिक अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होंगे और बिना डरे सवाल पूछने की हिम्मत रखेंगे, तो ऐसे अपराधियों के हौसले पस्त होना निश्चित है। 'डरें नहीं, सतर्क रहें'—यही इस अपराध पर लगाम लगाने का सबसे अचूक मंत्र है।


ब्रजेश कानूनगो 


सोशल मीडिया पर बच्चे : बचपन को बचाने की वैश्विक छटपटाहट

सोशल मीडिया पर बच्चे : बचपन को बचाने की वैश्विक छटपटाहट

डिजिटल युग में सोशल मीडिया बच्चों और किशोरों के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। मनोरंजन, शिक्षा, मित्रता और अभिव्यक्ति के अवसर देने वाला यही माध्यम अब मानसिक स्वास्थ्य, साइबर बुलिंग, अश्लील सामग्री, फर्जी सूचनाओं और डिजिटल लत जैसी समस्याओं का कारण भी माना जा रहा है।

​एक दौर था जब बच्चों की सुबह खेल के मैदानों, तितलियों के पीछे भागने और दोस्तों के साथ शरारतों से शुरू होती थी। लेकिन आज की सुबह 'स्क्रॉलिंग', 'लाइक', 'शेयर' और 'रील्स' के अंतहीन चक्रव्यूह में सिमट कर रह गई है। सोशल मीडिया, जो कभी दूरियों को पाटने का माध्यम बनकर उभरा था, आज बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक विकास और मासूमियत के लिए एक गंभीर संकट बन चुका है। हाल ही में ब्रिटेन द्वारा 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूर्ण या आंशिक प्रतिबंध लगाने के विचार ने इस वैश्विक चिंता को एक नई दिशा दी है। यह केवल एक प्रशासनिक कदम नहीं है, बल्कि यह इस बात का स्वीकार है कि डिजिटल दुनिया के अनियंत्रित प्रसार से बच्चों को बचाना अब अनिवार्य हो चुका है।

​सिर्फ ब्रिटेन ही नहीं, बल्कि दुनिया के तमाम विकसित और विकासशील देश इस 'डिजिटल महामारी' से अपने नौनिहालों को बचाने के लिए कड़े कानून बना रहे हैं। वैश्विक स्तर पर उठाए गए कुछ सबसे कड़े कदमों पर एक नज़र डालना महत्वपूर्ण होगा। 

उपलब्ध जानकारी के अनुसार ​ऑस्ट्रेलिया इस मामले में सबसे आगे रहा है। उसने दिसंबर 2025 से 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए टिकटॉक, इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब जैसे प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पूर्ण प्रतिबंध  लागू कर दिया। इस कानून की खास बात यह है कि इसमें माता-पिता की सहमति की भी कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी गई है। नियमों का उल्लंघन करने वाली कंपनियों पर 4.95 करोड़ ऑस्ट्रेलियाई डॉलर (लगभग 33 मिलियन अमरीकी डॉलर) तक के भारी जुर्माने का प्रावधान है।

​​पश्चिमी देशों की राह पर चलते हुए एशियाई देशों ने भी इस दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाए हैं। मार्च 2026 से इंडोनेशिया ने यूट्यूब, फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे 'हाई रिस्क' प्लेटफॉर्म्स पर 16 साल से कम उम्र के बच्चों के अकाउंट्स को ब्लॉक/निष्क्रिय करना शुरू कर दिया है। मलेशिया ने जून 2026 से उन सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए प्रतिबंध लागू कर दिया है, जिनके पास 80 लाख से अधिक यूजर्स हैं।

यूरोपीय संघ (EU): यूरोपीय संसद ने सोशल मीडिया के लिए न्यूनतम आयु 16 वर्ष तय करने का प्रस्ताव पारित किया है, जिसमें 13 से 15 वर्ष के बच्चों को केवल माता-पिता की सहमति से ही सीमित पहुंच की अनुमति होगी। इसके अलावा 'इन्फिनिट स्क्रॉलिंग' (अनंत रील्स देखना) और ऑटो-प्ले पर भी रोक लगाने की तैयारी है।

फ्रांस में 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन का कानून प्रक्रिया में है। वहीं डेनमार्क ने 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए प्रतिबंध लागू किया है, हालांकि 13 वर्ष से ऊपर के बच्चों के लिए माता-पिता की विशेष अनुमति का प्रावधान है। ब्राजील ने 'डिजिटल ईसीए' कानून के तहत सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेम्स में बच्चों के लिए सख्त 'एज वेरिफिकेशन' (आयु सत्यापन) और फेशियल स्कैन अनिवार्य कर दिया है।

चीन ने सोशल मीडिया पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने के बजाय 'यूथ मोड' लागू किया है। इसके तहत 18 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए रात में स्क्रीन टाइम सीमित कर दिया गया है और वे एक निश्चित समय से अधिक सोशल मीडिया या गेमिंग ऐप्स का उपयोग नहीं कर सकते। साथ ही वहां की सरकार कड़े कंटेंट सेंसरशिप के जरिए बच्चों को नकारात्मक सामग्री से दूर रखती है।

​सोशल मीडिया के खिलाफ सरकारों का यह सख्त रवैया बेवजह नहीं है। इसके पीछे गहरे मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारण हैं। जैसे  अत्यधिक सोशल मीडिया के उपयोग से बच्चों में अवसाद , एंग्जायटी, और हीनभावना तेजी से बढ़ रही है। टेक कंपनियों के 'रील्स' और 'शॉर्ट्स' के एल्गोरिदम इस तरह डिजाइन किए गए हैं जो बच्चों के दिमाग में डोपामाइन रिलीज करते हैं, जिससे उन्हें स्क्रीन की लत  लग जाती है। कम उम्र के बच्चे ऑनलाइन प्रेडेटर्स (शिकारियों) और अनुचित या हिंसक सामग्री के प्रति बेहद संवेदनशील होते हैं। ब्रिटेन का हालिया रुख भी बच्चों को स्मार्टफोन के जरिए अश्लील या हानिकारक तस्वीरों के आदान-प्रदान से बचाने पर केंद्रित है।

​भले ही दुनिया भर की सरकारें कानून बना रही हैं, लेकिन इसके कार्यान्वयन में कई बड़ी चुनौतियां भी हैं। मसलन कुछ ​तकनीकी खामियों  के कारण बच्चे अक्सर वीपीएन या फर्जी जन्मतिथि का उपयोग करके इन प्रतिबंधों को बाईपास कर लेते हैं। आयु सत्यापन के लिए फेशियल स्कैन या सरकारी आईडी मांगना यूजर्स की प्राइवेसी पर सवाल खड़े करता है। कई बड़ी टेक कंपनियों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पैरोकारों को इन कानूनों को अदालत में चुनौती देने के लिए अधिकार उपलब्ध हैं।

​सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने की यह वैश्विक होड़ यह साबित करती है कि अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। डिजिटल स्पेस बच्चों के विकास के लिए एक 'जहरीला वातावरण' बनता जा रहा है। ​लेकिन यह भी उतना ही सच है कि  सिर्फ कानून बनाकर बच्चों को स्क्रीन से दूर नहीं किया जा सकता। राज्य सरकारों के कड़े नियमों के साथ-साथ 'डिजिटल पैरेंटिंग' की भी उतनी ही जरूरत है। जब तक माता-पिता स्वयं अपने स्क्रीन टाइम को कम नहीं करेंगे और बच्चों को मैदानी खेलों, कला, और किताबों की दुनिया में वापस नहीं लाएंगे, तब तक यह प्रतिबंध केवल कागजी बनकर रह जाएंगे।

​ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के कदम पूरी दुनिया के लिए एक चेतावनी है। भारत दुनिया के सबसे बड़े इंटरनेट उपयोगकर्ता देशों में से एक है और करोड़ों बच्चे स्मार्टफोन तक पहुँच रखते हैं। इसलिए यहां केवल कानूनी प्रतिबंध पर्याप्त नहीं होंगे। कुछ व्यावहारिक कदम अधिक प्रभावी हो सकते हैं। मसलन विद्यालयों में डिजिटल साक्षरता को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए।अभिभावकों को पैरेंटल कंट्रोल और ऑनलाइन सुरक्षा के बारे में प्रशिक्षित किया जाए। तकनीकी कंपनियों पर बच्चों के लिए सुरक्षित डिजाइन और मजबूत आयु सत्यापन की जिम्मेदारी तय हो। बच्चों के स्क्रीन समय के लिए परिवार में स्पष्ट नियम बनें। खेल, पुस्तकें, कला और सामाजिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाए ताकि डिजिटल निर्भरता कम हो। हमारे देश में जहां इंटरनेट की पहुंच बहुत सस्ती और व्यापक है, इस दिशा में गंभीरता से सोचने और एक संतुलित नीति बनाने का समय आ गया है ताकि देश का भविष्य आभासी दुनिया के अंधेरे में न खो जाए।

ब्रजेश कानूनगो





Thursday, 11 June 2026

भारत में फूड डिलीवरी बॉय: आधुनिक सुविधा की रीढ़ और अनसुने संघर्षों का चेहरा

भारत में फूड डिलीवरी बॉय: आधुनिक सुविधा की रीढ़ और अनसुने संघर्षों का चेहरा

​स्मार्टफोन और इंटरनेट क्रांति ने हमारे जीवन और विशेषकर भोजन मंगाने के तौर-तरीकों को पूरी तरह बदल दिया है। आज महानगरों से लेकर छोटे कस्बों तक, चंद क्लिक्स पर मनपसंद भोजन घर या कार्यालय पहुंच जाता है। इस सुगम डिजिटल व्यवस्था के पीछे लाखों फूड डिलीवरी कर्मियों की दिन-रात की कड़ी मेहनत छिपी है। ये कर्मी आधुनिक 'गिग इकोनॉमी' (Gig Economy) के वे मुख्य स्तंभ हैं जो ग्राहकों, रेस्टोरेंट्स और तकनीकी प्लेटफॉर्म्स के बीच एक अनिवार्य कड़ी का काम करते हैं। हालांकि, जिस गति और सुविधा का आनंद उपभोक्ता उठाते हैं, उसके पीछे इन कर्मियों का मानसिक-शारीरिक संघर्ष, आर्थिक असुरक्षा और दैनिक चुनौतियां अक्सर अदृश्य रह जाती हैं।

​पिछले कुछ वर्षों में भारत का ऑनलाइन फूड डिलीवरी उद्योग तेजी से फला-फूला है। ऐप-आधारित कंपनियों ने देश के कोने-कोने में युवाओं के लिए रोजगार के नए द्वार खोले हैं। विशेष रूप से कोविड-19 महामारी के दौर में—जब पूरी दुनिया घरों में कैद थी—इन कर्मियों ने 'फ्रंटलाइन वॉरियर्स' की तरह आवश्यक सेवाओं को बहाल रखा। कम शैक्षणिक योग्यता वाले युवाओं, छात्रों और अंशकालिक (Part-time) आय की तलाश करने वालों के लिए यह क्षेत्र जीविकोपार्जन का एक त्वरित और सुलभ माध्यम बनकर उभरा है।

लेकिन यह भी सच है कि डिलीवरी कर्मियों के सामने अनेक चुनौतियां हैं और उनके अपने अंतर्निहित दर्द भी कम नहीं हैं। अधिकांश डिलीवरी कर्मी किसी निश्चित मासिक वेतन पर काम नहीं करते; उनकी आय पूरी तरह प्रति डिलीवरी मिलने वाले भुगतान पर टिकी होती है। ऑर्डर कम होने पर उनकी कमाई सीधे प्रभावित होती है। इसके अलावा, कंपनियों द्वारा समय-समय पर बोनस और प्रोत्साहन नीतियों में किए जाने वाले बदलाव उनकी वित्तीय स्थिरता को डगमगा देते हैं।

इसके अलावा अत्यधिक कार्य समय का दबाव हमेशा बना रहता है। अधिक से अधिक कमाने की होड़ में इन युवाओं को प्रतिदिन 10 से 14 घंटे तक सड़कों पर बिताना पड़ता है। त्योहारों, सप्ताहांतों (Weekends) और खराब मौसम के दौरान जब लोग घरों में उत्सव मनाते हैं, तब इन कर्मियों पर काम का दबाव चरम पर होता है।

अपने काम के चलते सड़क दुर्घटनाओं का निरंतर जोखिम भी मंडराता रहता है। 'समय पर डिलीवरी' सुनिश्चित करने की आपाधापी और कंपनियों के एल्गोरिदम के दबाव में कई बार इन्हें यातायात नियमों को ताक पर रखकर तेज गति से वाहन चलाना पड़ता है। टूटी सड़कें, भारी ट्रैफिक और भारी बारिश या कोहरे जैसी प्रतिकूल परिस्थितियां हर वक्त सड़क दुर्घटनाओं के खतरे को बढ़ाए रखती हैं।

​चूंकि ये कर्मी औपचारिक कर्मचारी न होकर "गिग वर्कर" (स्वतंत्र ठेकेदार) माने जाते हैं, इसलिए ये पारंपरिक श्रम कानूनों के दायरे से बाहर रह जाते हैं। इन्हें भविष्य निधि (PF), पेंशन, सवैतनिक अवकाश (Paid Leaves) और पर्याप्त स्वास्थ्य बीमा जैसी बुनियादी सामाजिक सुरक्षा का लाभ नहीं मिल पाता।

मनुष्य होने के नाते जो व्यवहार मिलना चाहिए कभी कभी सामने वाले से प्रतिकूल व्यवहार के कारण इन्हें भारी मानसिक तनाव से गुजरना पड़ जाता है।भोजन की गुणवत्ता खराब होने या रेस्टोरेंट की देरी के कारण यदि डिलीवरी में विलंब होता है, तो अक्सर ग्राहकों के गुस्से का शिकार इन कर्मियों को होना पड़ता है। ऐप पर मिलने वाली एक भी 'नकारात्मक रेटिंग' (Negative Rating) उनके भविष्य के ऑर्डर्स और कमाई को सीधे प्रभावित कर सकती है, जो निरंतर मानसिक तनाव का कारण बनता है।

​अपने काम की तत्परता में झुलसा देने वाली गर्मी, मूसलाधार बारिश, कड़कड़ाती ठंड और शहरों के दमघोंटू प्रदूषण के बीच लगातार बाइक चलाने से इनके स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ता है। निसंदेह समय पर भोजन न मिलना और आराम की कमी इनके शारीरिक स्वास्थ्य को समय से पहले जर्जर बना देने में भूमिका निभाती है। 

इन तमाम विसंगतियों के बीच इस क्षेत्र के कुछ सकारात्मक पहलू भी हैं जिनसे थोड़ा संतोष मिलता है। इस व्यवसाय ने देश में बड़े पैमाने पर तत्काल रोजगार का सृजन किया है। ​कार्य के घंटों में लचीलापन (Flexibility) होने के कारण अनेक छात्र अपनी पढ़ाई के साथ-साथ कमाई कर पा रहे हैं। ​युवाओं में डिजिटल साक्षरता, नेविगेशन कौशल और ग्राहक सेवा (Customer Relations) के थोड़े व्यावहारिक अनुभव का विकास हो रहा है।

इस क्षेत्र में सुधार की दृष्टि से एक सुरक्षित भविष्य की रूपरेखा अवश्य ही बनाई जा सकती है। जिसमे गिग अर्थव्यवस्था को मानवीय और न्यायसंगत बनाने के लिए कुछ कदम उठाए जाने अनिवार्य किए जाएं।

डिलीवरी बॉयस को ​न्यूनतम आय की गारंटी मिले इसके लिए नीति निर्माताओं और कंपनियों को मिलकर एक ऐसा ढांचा तैयार करना चाहिए जो ईंधन की बढ़ती कीमतों को ध्यान में रखते हुए कर्मियों को एक सम्मानजनक न्यूनतम दैनिक आय सुनिश्चित करे। सभी पंजीकृत गिग वर्कर्स के लिए अनिवार्य स्वास्थ्य और दुर्घटना बीमा सुनिश्चित हो। सरकार को इनके लिए एक विशेष कल्याण कोष (Welfare Fund) का गठन करना चाहिए। '10-20 मिनट में डिलीवरी' के अवास्तविक और खतरनाक दावों पर लगाम लगनी चाहिए ताकि सड़क सुरक्षा से समझौता न हो। कंपनियों को अपनी पे-आउट और इंसेंटिव नीतियों को पूरी तरह पारदर्शी बनाना चाहिए ताकि कर्मियों को अपनी मेहनत का स्पष्ट और सटीक आकलन मिल सके। साथ ही  ग्राहकों को जागरूक करने की आवश्यकता है कि डिलीवरी कर्मी केवल सेवा प्रदाता हैं, भोजन निर्माता नहीं। उनके प्रति सहानुभूति, शिष्ट व्यवहार और न्यायपूर्ण रेटिंग की संस्कृति विकसित होनी चाहिए।

सरकार को गिग इकोनॉमी के लिए स्पष्ट और सख्त कानून बनाने चाहिए, ताकि तकनीकी कंपनियों की मनमानी पर रोक लग सके और श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा हो सके।

​फूड डिलीवरी कर्मी आज के आधुनिक और गतिशील भारत के 'अदृश्य सारथी' हैं। वे हमारी व्यस्त जीवनशैली को सुगम और आरामदायक बनाते हैं, लेकिन खुद एक अनिश्चित और असुरक्षित धरातल पर खड़े हैं। तकनीकी प्रगति और आर्थिक विकास की चमक तब तक अधूरी है, जब तक कि उस विकास को सींचने वाले श्रम को उचित मूल्य, सुरक्षा और सम्मान न मिले। डिजिटल इंडिया की वास्तविक सफलता इसी में है कि वह अपनी सुविधा की रीढ़ बनने वाले इन हाथों को एक सुरक्षित, गरिमापूर्ण और उज्ज्वल भविष्य प्रदान करे।


ब्रजेश कानूनगो 



Wednesday, 10 June 2026

बहुराष्ट्रीय फूड चेन : स्थानीय बाजार पर असर चुनौतीपूर्ण या उत्प्रेरक ?

बहुराष्ट्रीय फूड चेन : स्थानीय बाजार पर असर चुनौतीपूर्ण या उत्प्रेरक ?

पिछले दो दशकों में भारत में बहुराष्ट्रीय फूड चेन का विस्तार अभूतपूर्व गति से हुआ है। महानगरों से शुरू हुई यह यात्रा अब छोटे शहरों और कस्बों तक पहुंच चुकी है। बहुत से लोगों का मानना है कि भारत में इनके आगमन से स्थानीय बाजार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है, छोटे व्यवसायियों का धंधा मंदा पड़ा है। जबकि कुछ इसे स्थानीय बाजार को प्रतिस्पर्धा में उतरने के लिए तैयार होने और गुणवत्तापूर्ण सेवाओं के लिए उत्प्रेरक मानते हैं।

वस्तुतःमैकडॉनल्ड,केएफसी, डोमिनोज, बर्गर किंग और स्टारबक्स (McDonald's, KFC, Domino's, Burger King, Starbucks ) जैसे वैश्विक ब्रांड केवल भोजन परोसने वाले प्रतिष्ठान नहीं रह गए हैं, बल्कि उन्होंने भारतीय उपभोक्ता संस्कृति, रोजगार के स्वरूप और व्यापारिक प्रतिस्पर्धा की प्रकृति को भी प्रभावित किया है। इसलिए इनके प्रभाव को केवल सकारात्मक या नकारात्मक कहना उचित नहीं होगा; यह सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का एक जटिल तथा बहुआयामी परिदृश्य है।

सबसे पहले यदि स्थानीय कारोबारियों पर प्रभाव की बात करें, तो बहुराष्ट्रीय फूड चेन ने पारंपरिक ढाबों, छोटे रेस्तरां और नाश्ते की दुकानों के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। इन कंपनियों के पास विशाल पूंजी, आक्रामक विपणन रणनीतियां, आधुनिक साज-सज्जा, मानकीकृत गुणवत्ता, डिजिटल भुगतान प्रणाली और तकनीक आधारित सेवाओं का मजबूत आधार होता है। स्वाभाविक रूप से युवा और मध्यम वर्ग का एक बड़ा हिस्सा इनकी ओर आकर्षित होता है। परिणामस्वरूप अनेक छोटे भोजनालय ग्राहकों की घटती संख्या और बढ़ती प्रतिस्पर्धा का सामना कर रहे हैं।

इन फूड चेन ने बाजार में प्रतिस्पर्धा की परिभाषा भी बदल दी है। पहले मोहल्लों की चाय-नाश्ते की दुकानें अपने स्थानीय स्वाद, आत्मीयता और कम कीमत के कारण लोकप्रिय थीं, लेकिन अब उपभोक्ताओं के एक वर्ग के लिए ब्रांड वैल्यू, फूड एक्सपीरियंस और एम्बिएंस भी महत्वपूर्ण कारक बन गए हैं। इसका प्रभाव भारतीय खान-पान संस्कृति पर भी दिखाई देता है। पिज्जा, बर्गर और फ्राइड चिकन जैसे पश्चिमी व्यंजनों की बढ़ती लोकप्रियता ने कई स्थानों पर पारंपरिक भारतीय व्यंजनों की मांग को प्रभावित किया है। विशेष रूप से नई पीढ़ी के खान-पान की आदतों में उल्लेखनीय बदलाव देखा जा रहा है।

हालांकि इसका दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। बहुराष्ट्रीय फूड चेन ने भारतीय छोटे व्यापारियों को आधुनिक व्यावसायिक पद्धतियां अपनाने के लिए प्रेरित किया है। आज अनेक स्थानीय रेस्तरां स्वच्छता, आकर्षक पैकेजिंग, डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन ऑर्डर, होम डिलीवरी और ग्राहक सेवा की गुणवत्ता पर पहले की अपेक्षा अधिक ध्यान दे रहे हैं। कई भारतीय ब्रांडों ने इसी प्रतिस्पर्धा से प्रेरणा लेकर अपने व्यवसाय का सफल विस्तार किया है। इस दृष्टि से प्रतिस्पर्धा ने गुणवत्ता सुधार और नवाचार को भी बढ़ावा दिया है।

यदि बेरोजगार युवाओं के संदर्भ में देखा जाए, तो यह क्षेत्र रोजगार सृजन का एक महत्वपूर्ण माध्यम बनकर उभरा है। इन फूड चेन में बड़ी संख्या में युवाओं को वेटर, कैशियर, किचन स्टाफ, डिलीवरी कर्मी, सुपरवाइजर, मैनेजर तथा मार्केटिंग से जुड़े विभिन्न पदों पर काम मिला है। विशेषकर कॉलेज के विद्यार्थियों और कम अनुभव वाले युवाओं के लिए यह क्षेत्र शीघ्र रोजगार का अवसर प्रदान करता है। इससे अनेक युवाओं को आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में पहला कदम रखने का अवसर मिला है।

इसके अतिरिक्त इन संस्थानों में कार्य करने से युवाओं में समय प्रबंधन, टीमवर्क, ग्राहक सेवा, अनुशासन और पेशेवर कार्य संस्कृति जैसी व्यावहारिक दक्षताओं का विकास होता है। कई युवाओं ने यहां अनुभव प्राप्त करने के बाद अपने स्वयं के छोटे खाद्य व्यवसाय या स्टार्टअप भी शुरू किए हैं। ऑनलाइन फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्मों के विस्तार ने इस क्षेत्र में रोजगार के अवसरों को और अधिक बढ़ाया है।

फिर भी इस तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है। इन नौकरियों का बड़ा हिस्सा अस्थायी, कम वेतन वाला और सीमित सामाजिक सुरक्षा वाला होता है। कर्मचारियों को अक्सर लंबे कार्य घंटे, प्रदर्शन आधारित दबाव और सीमित कैरियर सुरक्षा जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति होगी कि बहुराष्ट्रीय फूड चेन ने भारत की बेरोजगारी समस्या का स्थायी समाधान प्रस्तुत कर दिया है। उन्होंने रोजगार के अवसर अवश्य बढ़ाए हैं, लेकिन उच्च गुणवत्ता वाले और दीर्घकालिक रोजगार की गारंटी बिल्कुल नहीं दी है।

अंततः कहा जा सकता है कि बहुराष्ट्रीय फूड चेन का भारत के स्थानीय बाजार पर प्रभाव दोधारी तलवार के समान है। एक ओर उन्होंने छोटे कारोबारियों के सामने कठिन प्रतिस्पर्धा उत्पन्न की और पारंपरिक खाद्य संस्कृति को चुनौती दी, तो दूसरी ओर आधुनिक व्यापार पद्धतियों, सेवा क्षेत्र के विस्तार और रोजगार सृजन में महत्वपूर्ण योगदान भी दिया। आवश्यकता इस बात की है कि सरकार, उद्योग और समाज मिलकर स्थानीय खाद्य व्यवसायों को तकनीकी, वित्तीय और विपणन संबंधी सहयोग प्रदान करें। "वोकल फॉर लोकल" की भावना को व्यवहारिक रूप से सशक्त बनाते हुए यदि स्थानीय उद्यमों को प्रतिस्पर्धी बनाया जाए, तो वैश्वीकरण और स्थानीय अर्थव्यवस्था के बीच संतुलित एवं समावेशी विकास का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है।

ब्रजेश कानूनगो

Tuesday, 2 June 2026

ऑनलाइन शिक्षक और मीडिया विवाद : बहस के विभिन्न आया

ऑनलाइन शिक्षक और मीडिया विवाद : बहस के विभिन्न आया

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के एक एंकर के बयान ने ऑनलाइन पढ़ाने वाले शिक्षकों को उद्वेलित किया है। इस नए विवाद से शिक्षकों, कोचिंग संस्थानों,मीडिया के रवैए और भाषा को लेकर नई बहस खड़ी हो गई है। 

दरअसल यह विषय केवल एक टीवी एंकर के बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा, मीडिया, कोचिंग उद्योग, डिजिटल अर्थव्यवस्था और सार्वजनिक विमर्श की भाषा से जुड़े व्यापक प्रश्नों को सामने लाता है। इस विवाद ने यह सोचने का अवसर दिया है कि समाज में शिक्षकों की भूमिका, ऑनलाइन शिक्षा की उपयोगिता तथा मीडिया की जिम्मेदारी को किस दृष्टि से देखा जाना चाहिए।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया एंकर की टिप्पणी ने ऑनलाइन पढ़ाने वाले शिक्षकों और कोचिंग जगत में तीखी प्रतिक्रिया पैदा कर दी। सोशल मीडिया पर समर्थन और विरोध के स्वर तेज हुए, जिससे शिक्षा और मीडिया के संबंधों पर एक नई बहस शुरू हो गई। यह विवाद केवल किसी एक व्यक्ति के कथन का मामला नहीं है, बल्कि उस बदलते सामाजिक परिदृश्य का प्रतिबिंब है जिसमें डिजिटल शिक्षा, कोचिंग उद्योग और मीडिया तीनों महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

ऑनलाइन शिक्षकों का मानना है कि उन्होंने शिक्षा को लोकतांत्रिक बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इंटरनेट और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से लाखों विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कम लागत पर उपलब्ध हुई है। दूर-दराज के क्षेत्रों में रहने वाले छात्रों के लिए ऑनलाइन शिक्षण कई बार एकमात्र व्यवहारिक विकल्प बनकर उभरा है।

ऐसे में यदि किसी टिप्पणी में पूरे ऑनलाइन शिक्षण समुदाय को संदेह या उपहास की दृष्टि से प्रस्तुत किया जाता है, तो स्वाभाविक रूप से शिक्षक इसे अपने पेशे और सम्मान पर आघात के रूप में देखते हैं। उनका तर्क है कि कुछ अपवादों के आधार पर पूरे समुदाय का मूल्यांकन करना उचित नहीं है।

दूसरी ओर, कुछ लोग मानते हैं कि ऑनलाइन शिक्षा के क्षेत्र में व्यावसायीकरण तेजी से बढ़ा है। अनेक प्लेटफॉर्म और कोचिंग संस्थान आक्रामक विज्ञापन, अवास्तविक सफलता के दावे तथा विद्यार्थियों की भावनाओं के व्यावसायिक उपयोग के आरोपों का सामना करते रहे हैं।

आलोचकों का कहना है कि यदि मीडिया इन प्रवृत्तियों पर सवाल उठाता है तो इसे पूरी तरह गलत नहीं कहा जा सकता। शिक्षा के क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही भी उतनी ही आवश्यक है जितनी कि शिक्षक सम्मान की भावना।

यह विवाद कोचिंग संस्कृति पर भी ध्यान आकर्षित करता है। भारत में प्रतियोगी परीक्षाओं की बढ़ती संख्या और रोजगार की सीमित संभावनाओं ने कोचिंग उद्योग को विशाल आकार दिया है। कई संस्थानों ने उत्कृष्ट परिणाम देकर विद्यार्थियों का मार्गदर्शन किया है, लेकिन कुछ स्थानों पर अत्यधिक शुल्क, सफलता का दबाव और आक्रामक मार्केटिंग जैसे प्रश्न भी उठते रहे हैं।

इसलिए बहस का एक पक्ष यह भी है कि शिक्षा सेवा है या व्यवसाय? संभवतः वास्तविकता इन दोनों के बीच कहीं स्थित है, जहाँ गुणवत्ता और आर्थिक स्थिरता दोनों का संतुलन आवश्यक है।

लोकतंत्र में मीडिया का दायित्व प्रश्न पूछना और सार्वजनिक हित के मुद्दों को उठाना है। यदि शिक्षा क्षेत्र में कोई समस्या है तो उसकी जांच-पड़ताल और आलोचना मीडिया का अधिकार ही नहीं, कर्तव्य भी है।

किन्तु दूसरी ओर मीडिया से यह अपेक्षा भी की जाती है कि वह आलोचना करते समय तथ्यों, संतुलन और मर्यादा का पालन करे। किसी पूरे वर्ग को एक ही तराजू में तौलना या उत्तेजक भाषा का प्रयोग करना संवाद के बजाय टकराव को जन्म देता है। समाचार माध्यमों की विश्वसनीयता इसी बात पर निर्भर करती है कि वे आलोचना और सम्मान के बीच संतुलन बनाए रखें।

इस विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष भाषा का है। सार्वजनिक जीवन में शब्द केवल विचार व्यक्त नहीं करते, बल्कि सामाजिक वातावरण भी निर्मित करते हैं। मीडिया, शिक्षक, राजनेता या अन्य प्रभावशाली व्यक्तियों के वक्तव्य लाखों लोगों तक पहुंचते हैं।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र का आधार है, लेकिन उसके साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। कठोर आलोचना संभव है, परंतु व्यक्तिगत आक्षेप, अपमानजनक शब्दावली या किसी पेशे के सामूहिक अवमूल्यन से बचना चाहिए। स्वस्थ लोकतांत्रिक बहस तथ्यों और तर्कों पर आधारित होती है, न कि कटुता और सनसनी पर।

इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण पक्ष विद्यार्थी हैं। उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सही मार्गदर्शन और विश्वसनीय जानकारी चाहिए। उनके लिए यह अधिक महत्वपूर्ण है कि शिक्षक, कोचिंग संस्थान और मीडिया—तीनों अपनी-अपनी जिम्मेदारियां ईमानदारी से निभाएं।

विद्यार्थी न तो अंधभक्ति चाहते हैं और न ही निराधार आरोपों की राजनीति। वे ऐसे वातावरण की अपेक्षा करते हैं जिसमें शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान और क्षमता निर्माण हो, न कि केवल विवाद और प्रचार।

ऑनलाइन शिक्षकों और मीडिया के बीच उपजा यह विवाद किसी एक बयान से कहीं बड़ा है। ऐसे विवादों से कई उपेक्षित संदर्भ और मुद्दे चर्चा में आते हैं। इस विवाद ने भी शिक्षा के व्यवसायीकरण, डिजिटल शिक्षण की उपयोगिता, मीडिया की जवाबदेही और सार्वजनिक संवाद की भाषा जैसे महत्वपूर्ण प्रश्नों को सामने ला दिया है। जो कि एक लोकतांत्रिक देश और उसके नागरिकों के लिए सुखद ही कहा जाएगा।

एक संतुलित दृष्टिकोण यही कहता है कि न तो सभी ऑनलाइन शिक्षकों को संदेह की दृष्टि से देखा जाना चाहिए और न ही शिक्षा क्षेत्र से जुड़े वैध प्रश्नों को उठाने पर रोक लगनी चाहिए। आवश्यकता इस बात की है कि आलोचना तथ्यपरक हो, भाषा संयमित हो और संवाद सम्मानजनक हो। लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन उनका समाधान परस्पर सम्मान और विवेकपूर्ण चर्चा से ही संभव है।

ब्रजेश कानूनगो 


Monday, 1 June 2026

इम्पैक्ट फीचर : क्या सिर्फ प्रशंसा तक सीमित है पत्रकारिता का यह मंच?

इम्पैक्ट फीचर : क्या सिर्फ प्रशंसा तक सीमित है पत्रकारिता का यह मंच?

समाचार पत्रों में प्रकाशित होने वाले "इम्पैक्ट फीचर" (Impact Feature) पिछले कुछ वर्षों में मीडिया जगत की एक सामान्य प्रवृत्ति बन गए हैं। ये ऐसे प्रायोजित पृष्ठ होते हैं जो देखने में समाचार या विश्लेषणात्मक लेख जैसे लगते हैं, लेकिन वास्तव में किसी संस्था, कंपनी, उद्योग समूह अथवा सरकार द्वारा भुगतान कर प्रकाशित कराए जाते हैं। इनका उद्देश्य केवल विज्ञापन देना नहीं होता, बल्कि किसी विचार, उपलब्धि, योजना या छवि को पाठकों तक अधिक विश्वसनीय ढंग से पहुंचाना भी होता है।

आज स्थिति यह है कि केंद्र और राज्य सरकारें भी अपनी योजनाओं, उपलब्धियों और जनकल्याणकारी कार्यक्रमों के प्रचार के लिए बड़े पैमाने पर इम्पैक्ट फीचर प्रकाशित करा रही हैं। अखबारों के पूरे-पूरे पृष्ठ सरकारी विज्ञापनों और उपलब्धियों के बखान से भर जाते हैं। प्रश्न यह है कि क्या यही मंच विपक्षी दलों, नीतिगत खामियों, प्रशासनिक विफलताओं या जनसरोकारों से जुड़े असहज प्रश्नों के लिए भी उपलब्ध हो सकता है?

सैद्धांतिक रूप से देखा जाए तो लोकतंत्र में किसी भी वैध राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन, नागरिक मंच या जनहित समूह को अपने विचार रखने का अधिकार है। यदि कोई सरकार अपनी उपलब्धियों का प्रचार करने के लिए भुगतान कर सकती है, तो विपक्ष या नागरिक संगठन भी तथ्यों और तर्कों के आधार पर सरकारी नीतियों की आलोचना या उनके दुष्परिणामों को उजागर करने के लिए ऐसा कर सकते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का यही तकाजा है।

लेकिन व्यवहारिक धरातल पर स्थिति इतनी सरल नहीं है। अधिकांश समाचार पत्रों की आर्थिक संरचना विज्ञापन आय पर निर्भर हो चुकी है। सरकारें देश की सबसे बड़ी विज्ञापनदाताओं में शामिल हैं। ऐसे में अनेक मीडिया संस्थान सत्ता से टकराव की स्थिति से बचना चाहते हैं। उन्हें आशंका रहती है कि यदि वे सरकार की आलोचना करने वाले प्रायोजित फीचर प्रकाशित करेंगे तो सरकारी विज्ञापन प्रभावित हो सकते हैं। यही कारण है कि सरकार समर्थक इम्पैक्ट फीचर तो सहजता से दिखाई देते हैं, लेकिन सरकार की नीतियों की आलोचना करने वाले भुगतान आधारित फीचर बहुत कम दिखाई देते हैं।


यहां एक महत्वपूर्ण नैतिक प्रश्न भी खड़ा होता है। क्या अखबारों का दायित्व केवल भुगतान लेने वाले पक्ष का संदेश पहुंचाना है, या उन्हें लोकतांत्रिक विमर्श के लिए समान अवसर भी उपलब्ध कराने चाहिए? यदि इम्पैक्ट फीचर केवल सत्ता की उपलब्धियों का मंच बन जाएं और आलोचनात्मक दृष्टिकोण के लिए दरवाजे बंद कर दिए जाएं, तो यह लोकतांत्रिक संतुलन को कमजोर कर सकता है। लोकतंत्र केवल सरकार की बात सुनने का नाम नहीं है; यह सरकार से प्रश्न पूछने और वैकल्पिक दृष्टिकोणों को सामने लाने की व्यवस्था भी है।

हालांकि यह भी सच है कि विपक्ष द्वारा प्रायोजित फीचर और स्वतंत्र पत्रकारिता में अंतर बनाए रखना आवश्यक है। किसी भी आलोचनात्मक सामग्री को तथ्यों, आंकड़ों और प्रमाणों पर आधारित होना चाहिए। यदि इम्पैक्ट फीचर केवल राजनीतिक प्रचार या दुष्प्रचार का माध्यम बन जाएं तो वे भी लोकतांत्रिक विमर्श को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसलिए पारदर्शिता अनिवार्य है कि पाठक को स्पष्ट बताया जाए कि सामग्री प्रायोजित है।

अब प्रश्न है—क्या भारतीय हिंदी अखबार ऐसा करने की हिम्मत दिखा सकते हैं?

उत्तर एक शब्द में "हाँ" या "नहीं" नहीं है। कुछ अखबार और पत्रिकाएं आज भी सत्ता से असहज प्रश्न पूछने का साहस रखती हैं। वे खोजी रिपोर्टें प्रकाशित करते हैं और जनहित के मुद्दों को उठाते हैं। लेकिन व्यापक परिदृश्य में आर्थिक दबाव, राजनीतिक ध्रुवीकरण, कॉर्पोरेट स्वामित्व और विज्ञापन निर्भरता ने मीडिया की स्वतंत्रता को चुनौतीपूर्ण बना दिया है। ऐसे माहौल में सरकार की आलोचना करने वाले प्रायोजित इम्पैक्ट फीचर प्रकाशित करना कई संस्थानों के लिए जोखिम भरा निर्णय हो सकता है।

फिर भी लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि मीडिया सत्ता और विपक्ष दोनों से समान दूरी बनाए रखे। यदि अखबार सरकार की उपलब्धियों के लिए इम्पैक्ट फीचर प्रकाशित करते हैं, तो उन्हें वैधानिक, तथ्यपरक और जिम्मेदार आलोचनात्मक दृष्टिकोणों के लिए भी स्थान देने का साहस दिखाना चाहिए। आखिर लोकतंत्र में सबसे बड़ा इम्पैक्ट किसी विज्ञापन का नहीं, बल्कि निर्भीक और संतुलित अभिव्यक्ति का होता है।

निष्कर्षतः, इम्पैक्ट फीचर केवल प्रशस्ति-पत्र नहीं बनने चाहिए। वे लोकतांत्रिक बहस का मंच भी बन सकते हैं, बशर्ते मीडिया संस्थान आर्थिक हितों से ऊपर उठकर अभिव्यक्ति की बहुलता और जनहित के सिद्धांत को महत्व दें। प्रश्न यह नहीं है कि विपक्ष ऐसा फीचर प्रकाशित करा सकता है या नहीं; वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या मीडिया लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में सभी पक्षों को समान अवसर देने का साहस दिखा पाएगा।


ब्रजेश कानूनगो 


****


Monday, 25 May 2026

पुरानी बस्तियाँ : विकास बनाम विरासत का प्रश्न

पुरानी बस्तियाँ : विकास बनाम विरासत का प्रश्न

भारत के अनेक शहर अपनी पुरानी बस्तियों और संकरी गलियों के कारण विश्वभर में पहचाने जाते हैं। इन इलाकों में केवल भवन नहीं होते, बल्कि वहाँ की जीवनशैली, परम्पराएँ, स्थानीय बाजार, धार्मिक स्थल, खान-पान और सामाजिक संबंध भी बसे होते हैं।

पुरानी गलियाँ अक्सर उस समय की शहरी योजना का परिणाम थीं जब यातायात पैदल, बैलगाड़ियों या पशुओं पर आधारित था। इसलिए आज की दृष्टि से वे अव्यवस्थित प्रतीत हो सकती हैं, परंतु वे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। मध्यप्रदेश का इंदौर भी इसी तरह का शहर है जिसकी कुछ अपनी प्राचीन होलकर कालीन विरासत है,  तो कुछ महानगरीय विकास के ठीक पहले कस्बे से शहर और फिर महानगर में बदलते समय का अपेक्षाकृत नया इतिहास भी बहुत हद तक शहर की पहचान और मानवीय स्मृतियों का सुखद अतीत है जो आज के इंदौर में जगह जगह बिखरा पड़ा है। इंदौर के छावनी क्षेत्र में हाल ही में मास्टर प्लान के तहत की गई तोड़फोड़ और सड़क चौड़ीकरण की कार्रवाई बेहद चर्चा और विमर्श का विषय बनी हुई है। 


भारत तेजी से शहरीकरण की ओर बढ़ रहा है। बढ़ती आबादी, यातायात, प्रदूषण और आधुनिक सुविधाओं की मांग ने शहरों के पुनर्विकास को आवश्यक बना दिया है। इसी उद्देश्य से भारत सरकार ने 2015 में स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट की शुरुआत की थी। इस योजना का लक्ष्य शहरों को अधिक सुगम, तकनीकी रूप से सक्षम, सुरक्षित और आधुनिक बनाना रहा है।

लेकिन जब स्मार्ट बनने की प्रक्रिया पुराने शहरों, तंग गलियों, ऐतिहासिक बाजारों और सदियों पुरानी बस्तियों तक पहुँचती है, तब एक बड़ा प्रश्न खड़ा होता है—क्या विकास के नाम पर इन पुरानी संरचनाओं को तोड़ देना उचित है, या इन्हें सांस्कृतिक धरोहर मानकर संरक्षित किया जाना चाहिए? यह प्रश्न केवल निर्माण और सड़क चौड़ीकरण का नहीं, बल्कि इतिहास, पहचान, अर्थव्यवस्था और मानवीय स्मृतियों का भी है। पुरानी बस्तियाँ केवल मकान नहीं, जीवित इतिहास हैं। 


स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत पुराने शहरों या 'पुरानी बस्तियों' का कायाकल्प एक बेहद संवेदनशील और जटिल मुद्दा है। संकरी गलियों को चौड़ा करने, बुनियादी ढांचा सुधारने और अतिक्रमण हटाने के लिए की जाने वाली तोड़फोड़ एक तरफ आधुनिक नागरिक सुविधाएं देती है, तो दूसरी तरफ शहरों की ऐतिहासिक आत्मा और सांस्कृतिक ताने-बाने को चोट पहुंचाती है।

​क्या पुरानी बस्तियों को धरोहर की तरह संरक्षित किया जाना चाहिए? इस विचार के समर्थक मानते हैं कि पुरानी बस्तियाँ केवल ईंट-पत्थर के मकान नहीं, बल्कि जीवंत इतिहास हैं। इन्हें पूरी तरह तोड़ने के बजाय हेरिटेज-लेड अर्बन रिन्यूअल (धरोहर-आधारित शहरी पुनरुद्धार) नीति अपनानी चाहिए। पुराने शहरों की वास्तुकला जैसे अहमदाबाद की 'पोल', पुणे के 'वाड़े' या दिल्ली की हवेलियां आदि स्थानीय संस्कृति को दर्शाती हैं। इन्हें नष्ट करने से शहर अपनी विशिष्ट पहचान खोकर आधुनिक 'कंक्रीट के जंगलों' जैसे दिखने लगते हैं।  यदि किसी शहर की पुरानी बस्ती समाप्त हो जाती है, तो उसकी आत्मा भी कमजोर हो जाती है। ये बस्तियाँ केवल व्यापारिक क्षेत्र नहीं, बल्कि सदियों पुराने सांस्कृतिक अनुभव होते हैं। इसी कारण दुनिया के अनेक देशों ने अपने पुराने शहरों को धरोहर के रूप में सुरक्षित रखा है। यूनेस्को (UNESCO) के अनुसार विश्व धरोहर स्थलों से जुड़े पर्यटन का वैश्विक आर्थिक योगदान अरबों डॉलर का है और इससे स्थानीय रोजगार भी बढ़ता है। संरक्षित बस्तियों से पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ मिलता है। पर्यटन मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार देश में आने वाले विदेशी पर्यटकों का बड़ा हिस्सा ऐतिहासिक शहरों और सांस्कृतिक स्थलों को देखने आता है।


पुरानी बस्तियाँ हस्तशिल्प, पारंपरिक भोजन और स्थानीय बाजारों को जीवित रखती हैं। यदि इन्हें पूरी तरह आधुनिक कॉम्प्लेक्स में बदल दिया जाए, तो स्थानीय रोजगार प्रभावित हो सकता है।  पर्यावरणीय दृष्टि से भी उपयोगी पुरानी बस्तियों की संकरी गलियाँ और घनी संरचना गर्म क्षेत्रों में तापमान नियंत्रित करने में सहायक होती थीं। मोटी दीवारें, आंगन और प्राकृतिक वेंटिलेशन ऊर्जा की बचत करते थे। आज जब “सस्टेनेबल अर्बन प्लानिंग” की बात हो रही है, तब पारंपरिक स्थापत्य से बहुत कुछ सीखा जा सकता है।पुराने मोहल्लों में लोगों के बीच सामुदायिक संबंध अधिक मजबूत होते हैं। साझा आंगन, चौपाल, छोटी दुकानों और पड़ोस की संस्कृति सामाजिक सहयोग को बढ़ाती है। पुनर्विकास के दौरान विस्थापन होने पर यह सामाजिक संरचना टूट जाती है।

विकास और व्यावहारिकता के  समर्थक मानते हैं कि समय के साथ शहरों की बदलती जरूरतों के लिए पुरानी बस्तियों में बुनियादी सुधार और कुछ हद तक तोड़फोड़ अपरिहार्य होती है। इसके पीछे उनके कुछ तथ्य भी हैं। आज के शहरों पर आबादी का अत्यधिक बोझ है। संकरी गलियों में एम्बुलेंस, अग्नि शमन दमकल जैसी आपातकालीन गाड़ियां नहीं घुस पातीं, जो किसी आपदा के समय जान-माल के लिए गंभीर खतरा है। पुरानी बस्तियों में सीवरेज, ड्रेनेज, और बिजली के खुले तारों का जाल बेहद जर्जर हो चुका होता है। स्मार्ट सिटी के तहत इन्हें भूमिगत करने और पानी की पाइपलाइन बिछाने के लिए सड़कों को चौड़ा करना तकनीकी मजबूरी बन जाता है। पुरानी, जर्जर और असुरक्षित हो चुकी इमारतें अक्सर आर्थिक रूप से कम उत्पादक रह जाती हैं। जमीन के बेहतर उपयोग और व्यावसायिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए पुनर्विकास जरूरी माना जाता है। व्यापार, परिवहन और निवेश के लिए आधुनिक आधारभूत संरचना जरूरी है। यदि शहरों का विकास रुकता है, तो आर्थिक गतिविधियाँ भी प्रभावित हो सकती हैं। स्मार्ट सिटी परियोजनाओं का उद्देश्य डिजिटल सेवाएँ, बेहतर यातायात, स्वच्छता और सार्वजनिक सुविधाएँ उपलब्ध कराना है, जिन्हें लागू करने के लिए कभी-कभी संरचनात्मक बदलाव आवश्यक हो जाते हैं।


भारत में तेजी से बढ़ते शहरीकरण के कारण 2030 तक करोड़ों लोगों के शहरों में बसने का अनुमान व्यक्त किया गया है।

अनेक विशेषज्ञ मानते हैं कि “हेरिटेज आधारित अर्बन प्लानिंग” पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को दीर्घकालीन लाभ देती है।

संतुलित समाधान क्या हो सकता है? इस विवाद का समाधान “पूर्ण संरक्षण” या “पूर्ण तोड़फोड़” में नहीं, बल्कि संतुलित दृष्टिकोण में है। कुछ उपाय भी विशेषज्ञ बताते है मसलन संदर्भित बस्तियों को हेरिटेज ज़ोन घोषित किए जाएँ, जिन इलाकों का ऐतिहासिक महत्व है, वहाँ सीमित और संवेदनशील विकास किया जाए। भवनों का बाहरी ऐतिहासिक स्वरूप सुरक्षित रखते हुए अंदर आधुनिक सुविधाएँ विकसित की जा सकती हैं। पुरानी गलियों में बड़े वाहनों के बजाय छोटे सार्वजनिक परिवहन और पैदल संस्कृति को बढ़ावा दिया जाए। इसके अलावा विकास योजनाएँ केवल प्रशासनिक निर्णय न हों; स्थानीय निवासियों, प्रबुद्धों और इतिहासकारों की राय भी ली जाए तो निर्णय सर्वस्वीकार्य हो सकेगा। जर्जर और खतरनाक भवनों का वैज्ञानिक पुनर्विकास हो, लेकिन मूलभूत ऐतिहासिक चरित्र की छवि बनाए रखने का पूर्णतः प्रयास किया जाए।


किसी भी शहर की पहचान उसकी ऊँची इमारतों से नहीं, बल्कि उसकी स्मृतियों, गलियों और सांस्कृतिक विरासत से बनती है।

यदि स्मार्ट सिटी परियोजनाएँ केवल कंक्रीट और चौड़ी सड़कों तक सीमित रह जाएँगी, तो शहर आधुनिक तो दिखेंगे, पर उनकी आत्मा खो सकती है। दूसरी ओर, केवल अतीत से चिपककर आधुनिक आवश्यकताओं की अनदेखी भी संभव नहीं। इसलिए आवश्यकता ऐसी शहरी नीति की है जो विकास और विरासत—दोनों को साथ लेकर चले। वास्तविक “स्मार्ट सिटी” वही होगी जो तकनीक के साथ अपने इतिहास और मानवीय स्मृतियों को भी सम्मान दे सके। सबसे बड़ी बात तो यह है कि बस्तियों के विकास में नागरिक के मन पर मशीन चलाकर कितनी ही खूबसूरत सड़क या इमारत खड़ी कर दी जाए, उसका कैसे स्वागत होगा, रहवासी की भावनाओं, उनकी खुशी और संतोष को सर्वोच्च प्राथमिकता देने में शासन प्रशासन की  मानवीय संवेदनशीलता दिखाई दे तभी तो स्मार्ट सिटी में स्मार्टनेस दिखाई दे सकेगी। 


ब्रजेश कानूनगो 


Friday, 22 May 2026

युवा आक्रोश का समाधान अनिवार्य सैन्य सेवा में है !

युवा आक्रोश का समाधान क्या अनिवार्य सैन्य सेवा में है ?

आक्रोशित युवाओं के एक बड़े प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा डंडे बरसाए जाने, वाटर कैनन के बाद बदहवास प्रदर्शनकारियों की भगदड़ को टीवी पर देखकर एक उत्तेजित मित्र ने कहा कि - इन सबको सीमा पर भेज देना चाहिए ताकि इन्हें देश सेवा का मौका मिले और काम भी। इसी प्रकार शांतिप्रिय नागरिकों के भाईचारे और सद्भाव में जब कभी उत्पाती लोग खलल डालने की कोशिश करते हैं तब भी बहुत से लोगों का सुझाव आता है कि उत्पातियों को सीमा पर जाकर अपनी देशभक्ति दिखाना चाहिए। प्रश्न यह है कि क्या युवाओं के मुद्दों और उनके आक्रोश और नागरिकों की कठिनाइयों का समाधान का रास्ता केवल सीमा पर तैनाती से निकाला जा सकता है? यह कोई नई बात नहीं है।  भारत में युवाओं की भारी आबादी (डेमोग्राफिक डिविडेंड) को देखते हुए बेरोजगारी और युवाओं में बढ़ती अशांति एक गंभीर चुनौती है। इस समस्या के समाधान के रूप में अनिवार्य सैन्य सेवा (Conscription) का विचार समय-समय पर चर्चा में आता रहा है।

वैश्विक परिदृश्य में राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता और नागरिक कर्तव्यों की परिभाषा हर देश में अलग है। जहां भारत और अमेरिका जैसे बड़े लोकतंत्र पूरी तरह से स्वैच्छिक (Voluntary) सेना पर निर्भर हैं, वहीं दुनिया के कई ऐसे देश भी हैं जहां एक निश्चित आयु के युवाओं के लिए सेना में अपनी सेवाएं देना कानूनी रूप से अनिवार्य है। इस व्यवस्था को 'कॉन्स्क्रिप्शन' (Conscription) या 'अनिवार्य सैन्य सेवा' कहा जाता है। ​

यद्यपि रूस,चीन,यूक्रेन,इजराइल,कोरिया, फिनलैंड, नार्वे, स्विट्जरलैंड, तुर्की,ईरान, ग्रीस आदि सहित दुनिया भर के लगभग 60 से अधिक देशों में किसी न किसी रूप में अनिवार्य सैन्य सेवा का प्रावधान है किंतु क्या यह पहल भारत के लिए व्यावहारिक है? इसके समर्थन और विरोध में कई महत्वपूर्ण सामाजिक, आर्थिक और सैन्य तर्क दिए जाते रहे हैं। 

​समर्थकों का मानना है कि अनिवार्य सैन्य सेवा युवाओं को सही दिशा देने और देश की प्रगति में भागीदार बनाने का एक कारगर जरिया बन सकती है।  सेना युवाओं को न केवल शारीरिक रूप से मजबूत बनाती है, बल्कि उनमें समयबद्धता, नेतृत्व क्षमता और तकनीकी/व्यावहारिक कौशल (जैसे- इंजीनियरिंग, लॉजिस्टिक्स, मेडिकल) का विकास करती है। यह सेवा के बाद उनके लिए नागरिक रोजगार के रास्ते खोलता है। खाली दिमाग और दिशाहीनता युवाओं को अपराध, नशे या उग्रवाद की ओर धकेल सकती है। सैन्य सेवा उन्हें एक सकारात्मक उद्देश्य देती है, जिससे सामाजिक अशांति में कमी आ सकती है। भारत जैसे विविध देश में, जब विभिन्न राज्यों, जातियों और पृष्ठभूमि के युवा एक साथ रहकर देश की सेवा करेंगे, तो उनमें सामाजिक समरसता और मजबूत राष्ट्रीय भावना पैदा होगी। बड़े पैमाने पर प्रशिक्षित युवाओं की यह फौज बाढ़, भूकंप या महामारी जैसी राष्ट्रीय आपदाओं के समय त्वरित राहत और बचाव कार्यों में देश के बहुत काम आ सकती है।

​इससे अलग धारणा रखने वाले विशेषज्ञों और आलोचकों का मानना है कि भारत जैसी विशाल जनसंख्या वाले देश में इसे लागू करना फायदे से ज्यादा नुकसानदेह साबित हो सकता है।  भारत में हर साल करोड़ों युवा सैन्य सेवा की उम्र में प्रवेश करते हैं। इतने बड़े पैमाने पर युवाओं को भोजन, वर्दी, आवास, हथियार, प्रशिक्षण और भत्ता देना देश के बजट पर अत्यधिक बोझ डालेगा। यह पैसा शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) से डायवर्शन होगा।  आधुनिक युद्ध कौशल अब उच्च तकनीक, खुफिया जानकारी और अत्याधुनिक हथियारों पर निर्भर है, न कि केवल सैनिकों की संख्या पर। जबरन भर्ती किए गए युवाओं में वह प्रेरणा और समर्पण नहीं हो सकता जो एक स्वेच्छा से आए सैनिक में होता है। इससे सेना की युद्धक क्षमता प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि सैन्य सेवा आमतौर पर कुछ वर्षों  के लिए होगी। इसके बाद जब ये युवा वापस नागरिक जीवन में लौटेंगे, तो यदि बाजार में नौकरियां नहीं होंगी, तो वे फिर से बेरोजगार हो जाएंगे। समाज के हर युवा को हथियार और युद्ध का प्रशिक्षण देने से, भविष्य में सामाजिक संघर्षों या व्यक्तिगत विवादों में हिंसा का स्तर बढ़ने का खतरा भी संभावित हो सकता है।

​बहुत से विचारकों का यह भी मत रहा है कि अनिवार्य सैन्य सेवा को पूरी तरह थोपने के बजाय, सरकार और समाज मिलकर कुछ मध्यम मार्ग और व्यावहारिक उपाय अपना सकते हैं। पहले से उपलब्ध  एनसीसी और एनएसएस ​ के बड़े पैमाने पर विस्तार द्वारा स्कूलों और कॉलेजों में राष्ट्रीय कैडेट कोर और राष्ट्रीय सेवा योजना  को अनिवार्य या अत्यधिक प्रोत्साहित किया जाए। इससे भारी खर्च के बिना युवाओं में अनुशासन और नागरिक चेतना विकसित होगी। हाल ही में शुरू की गई 'अग्निपथ योजना' एक तरह से स्वैच्छिक सैन्य सेवा का ही रूप है। इसमें 4 साल बाद बाहर निकलने वाले 'अग्निवीरों' के लिए कड़े कौशल प्रमाणन और नागरिक नौकरियों (जैसे पुलिस, अर्धसैनिक बल, कॉर्पोरेट) में निश्चित आरक्षण को अधिक विश्वसनीय, कारगर और पुख्ता किया जाए। शिक्षा व्यवस्था को थ्योरी से हटाकर सीधे रोजगारपरक  बनाया जाए। डेटा साइंस, एआई, रिन्यूएबल एनर्जी और लॉजिस्टिक्स जैसे उभरते क्षेत्रों में युवाओं को मुफ्त या कम दर पर प्रशिक्षित किया जाए। ​राष्ट्रीय युवा विकास कोर जैसा नवाचारी विचार भी सामने आया है जिसके तहत सेना के तर्ज पर एक नागरिक संगठन बनाया जा सकता है, जहां युवाओं को अनिवार्य रूप से 1-2 साल के लिए ग्रामीण विकास, साक्षरता अभियान, पर्यावरण संरक्षण और इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण जैसे कार्यों में लगाया जाए और उन्हें मानदेय  दिया जाए। इन सब उपायों को निश्चित ही दलगत राजनीति के प्रलोभनों से सुरक्षित रखना नितांत जरूरी होगा। 

अनिवार्य सैन्य सेवा केवल हथियार चलाने का प्रशिक्षण नहीं, बल्कि राष्ट्र और नागरिक के संबंध का एक विशेष मॉडल है। जिन देशों को सुरक्षा चुनौतियां अधिक हैं, वहां यह व्यवस्था राष्ट्रीय अस्तित्व का आधार बन जाती है। वहीं लोकतांत्रिक और उदार समाजों में यह बहस लगातार जारी है कि राष्ट्रभक्ति का अर्थ बाध्य सैन्य सेवा होना चाहिए या स्वैच्छिक सहभागिता।

भविष्य में संभव है कि पारंपरिक सैन्य सेवा की जगह “राष्ट्रीय नागरिक सेवा” जैसी अवधारणाएं अधिक लोकप्रिय हों, जहां युवा सेना के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण, स्वास्थ्य सेवा, आपदा राहत और तकनीकी सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में भी देशसेवा कर सकें।

सच तो यह है कि भारत जैसी विशाल आबादी के लिए 'अनिवार्य' सैन्य सेवा ' आर्थिक, सामाजिक और व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। युवाओं की अशांति और बेरोजगारी को दूर करने का सही रास्ता सेना में बाध्यकारी भर्ती नहीं, बल्कि आर्थिक नीतियों में सुधार, गुणवत्तापूर्ण कौशल विकास और रोजगार के नए अवसरों का सृजन करना जरूरी होगा।

ब्रजेश कानूनगो 


Wednesday, 20 May 2026

मीठी चॉकलेट की कड़वी दास्तान

मीठी चॉकलेट की कड़वी दास्तान

इन दिनों चॉकलेट चर्चा में है। हाल ही का एक वाकया गत दिनों काफी चर्चा में रहा। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने इटली प्रवास के अवसर पर वहां की पीएम को मेलोडी नामक चॉकलेट्स का पैकेट भेंट किया। इस खास कूटनीतिक अंदाज के इस दिलचस्प मुलाकात का वीडियो खुद इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर शेयर किया। वीडियो में मेलोनी बेहद खुश नजर आ रही हैं और कैमरे के सामने टॉफी का पैकेट दिखाते हुए मुस्कुराकर कह रही हैं-'पीएम मोदी हमारे लिए गिफ्ट लाए हैं!" 

बहरहाल, दो देशों के बीच की कूटनीति और स्नेह, सद्भाव के मधुर और दिलकश प्रसंग से अलग मन को उद्वेलित करने वाला एक प्रकरण अवश्य यहां रेखांकित किये जाने योग्य होगा। दरअसल, एक यूट्यूबर और विश्वयात्री ने जब पश्चिम अफ्रीका के आईवरी कोस्ट (Ivory Coast ) में कोको के बाग का भ्रमण करते हुए वहां काम करते  मजदूर किसानों से पूछा कि क्या उन्होंने कोको से बनने वाली चॉकलेट का जायका लिया है तो उत्तर पाकर अचम्भा हुआ। सचमुच यह दिल को छू लेने वाली और हैरान करने वाली हकीकत है कि एक ऐसा देश भी है जो कोको का उत्पादन तो करता है लेकिन जहां के उत्पादक मजदूरों ने चाकलेट का स्वाद तक नहीं लिया। 

चॉकलेट आज दुनिया की सबसे लोकप्रिय खाद्य वस्तुओं में से एक है, इसकी यात्रा हजारों वर्ष पुरानी सभ्यताओं से शुरू होकर आधुनिक उद्योग तक पहुँची है। इसका इतिहास केवल स्वाद का नहीं, बल्कि संस्कृति, व्यापार, विज्ञान और मानव सभ्यता के विकास का भी इतिहास है।पश्चिमी अफ्रीका का यह आईवरी कोस्ट  (Ivory Coast) छोटा सा देश दुनिया के कुल कोको (Cocoa) का लगभग 40% से अधिक हिस्सा अकेले पैदा करता है। ट्रेवलर यूट्यूबरों के पहले भी कुछ डच पत्रकारों ने यहाँ के एक सुदूर गाँव के किसानों का एक वीडियो बनाया था, जिसने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया। दशकों से कोको उगा रहे उन मजदूरों को यह तक नहीं मालूम था कि उनके इन कड़वे बीजों से अंततः बनता क्या है। जब उन्हें पहली बार चॉकलेट की एक बार (Bar) खिलाई गई, तो उनका रिएक्शन था— यह तो बहुत स्वादिष्ट है, हमें लगा था कि गोरे लोग हमारे बीजों से शराब या कोई दवा बनाते हैं। गरीबी और वैश्विक व्यापार की विसंगति के कारण, जो चॉकलेट पश्चिमी देशों के सुपरमार्केट में कुछ रुपयों या डॉलर्स में मिल जाती है, वह उन मजदूरों की कई दिनों की कमाई के बराबर होती है।

​चॉकलेट का सफर आज से लगभग 3,500 से 4,000 साल पहले मध्य अमेरिका (मेसोअमरीका) में शुरू हुआ था। माया  और एज़्टेक  सभ्यताओं ने सबसे पहले कोको के पौधों को खोजा था। इसे ​देवताओं के भोजन की मान्यता थी, माया सभ्यता में कोको को पवित्र माना जाता था। वे इसे 'एक्सोकोलॉटल' कहते थे, जिसका अर्थ था 'कड़वा पानी'। वे आज की तरह मीठी चॉकलेट नहीं खाते थे, बल्कि कोको के बीजों को पीसकर उसमें पानी, सूखी मिर्च, वैनिला और मक्के का आटा मिलाकर एक झागदार, कड़वा और तीखा पेय बनाते थे। एज़्टेक साम्राज्य में कोको के बीज इतने कीमती थे कि उनका इस्तेमाल पैसों की तरह होता था। उदाहरण के लिए, उस दौर में 10 बीजों में एक खरगोश और 100 बीजों में एक अच्छा गुलाम खरीदा जा सकता था।

सोलहवीं शताब्दी में जब स्पेनिश खोजकर्ता हर्नान कोर्टेस ने मेसोअमरीका पर फतह हासिल की, तो उसने इस शाही पेय का स्वाद चखा। वह कोको के बीजों को अपने साथ स्पेन ले गया। ​यूरोपियनों को इसका कड़वा स्वाद पसंद नहीं आया, इसलिए उन्होंने इसमें से मिर्च को हटाकर चीनी, शहद और दालचीनी मिला दी। ​देखते ही देखते यह नया मीठा पेय यूरोप के राजा-महाराजाओं और रईसों का स्टेटस सिंबल बन गया। यह इतना गुप्त और कीमती था कि स्पेन ने करीब 100 साल तक इस रेसिपी को पूरी दुनिया से छिपाकर रखा।

उन्नीसवीं शताब्दी की औद्योगिक क्रांति ने चॉकलेट को पीने वाले पेय से खाने वाली ठोस चॉकलेट (सॉलिड बार) में बदल दिया। इस बदलाव के पीछे बड़ी खोजें थीं।  चॉकलेट बनाने की मशीन (कोचिंग मशीन )(Conching machine) का आविष्कार 'रोडोल्फ लिंड्ट' (Rodolphe Lindt) ने किया था। यह मशीन चॉकलेट को कई दिनों तक लगातार मथती है, जिससे उसकी कड़वाहट दूर होती है और वह मखमली रेशम जैसी चिकनी बनती है।

चॉकलेट की कहानी प्राचीन जंगलों से आधुनिक फैक्ट्रियों तक की अद्भुत यात्रा है। कभी देवताओं का पेय मानी जाने वाली यह वस्तु आज बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी की पसंद बन चुकी है। स्वाद, विज्ञान, इतिहास और संस्कृति — इन सबका अनोखा संगम ही चॉकलेट को इतना विशेष बनाता है। चॉकलेट आज दुनिया भर में खुशियों, त्योहारों और प्यार का प्रतीक है। हर साल इसका वैश्विक बाजार अरबों डॉलर का कारोबार करता है। लेकिन इसके पीछे आइवरी कोस्ट और घाना जैसे देशों के लाखों गरीब किसान और बाल मजदूर हैं, जिन्हें आज भी ग्लोबल ट्रेड की विसंगतियों के कारण इस 'देवताओं के भोजन' का स्वाद नसीब नहीं होता। यही इस मीठी चॉकलेट की सबसे कड़वी दास्तान है।

ब्रजेश कानूनगो


Saturday, 16 May 2026

जलती यात्री बसें : व्यवस्था और संवेदनाओं को राख करती आग

जलती यात्री बसें : व्यवस्था और संवेदनाओं को राख करती आग 

रात का दूसरा पहर था। प्रदेश के दो बड़े नगरों के बीच चलने वाली  बस राष्ट्रीय राजमार्ग पर तेज़ी से दौड़ी चली जा रही थी। खिड़कियों के बाहर अंधेरे खेत पीछे छूट रहे थे और भीतर पीली रोशनी में यात्रियों की अपनी-अपनी छोटी दुनियाएँ बसी थीं। कोई मोबाइल पर धीमे स्वर में बात कर रहा था, कोई ऊँघ रहा था, तो कोई सीट से सिर टिकाकर आने वाले कल के सपने देख रहा था।

बस की पिछली सीट पर चार वर्षीय नन्हा बालक अपनी माँ की गोद में सोया हुआ था। उसकी छोटी उंगलियाँ अब भी खिलौना कार को कसकर पकड़े थीं। माँ कभी उसके माथे को चूमती, कभी खिड़की से बाहर झाँकती। पिता सामने वाली सीट पर बैठे मुस्कुरा रहे थे—“ग्वालियर पहुँचकर इसे किला दिखाऊँगा,” उन्होंने धीरे से कहा था।

अचानक बस के अगले हिस्से से चिंगारियों की तेज़ आवाज़ आई—

“छटाक… छटाक…!” कुछ ही सेकंड में धुएँ की कड़वी गंध फैलने लगी। तभी इंजन के पास से लपटें उठीं और देखते-ही-देखते आग ने प्लास्टिक के सामान को पकड़ लिया। एक भयावह चीख बस में गूँज उठी— आग… आग लग गई!

नींद में डूबे लोग घबराकर उठे। धक्का-मुक्की शुरू हो गई। कोई खिड़की तोड़ने लगा, कोई बच्चों को उठाकर दरवाज़े की ओर भागा। जलते प्लास्टिक से उठता काला धुआँ साँसों को जला रहा था। बस के भीतर अफरा-तफरी का ऐसा दृश्य था मानो हर व्यक्ति मौत से आगे निकल जाना चाहता हो। बच्चे की माँ ने उसे कसकर पकड़ लिया। पिता पीछे की ओर भागे, लेकिन तभी किसी ने चीखकर कहा— पीछे से रास्ता बंद है! बस में आपातकालीन गेट था ही नहीं।

आग अब विकराल हो चुकी थी। प्लास्टिक के पैकेट पिघल-पिघलकर जलते तेल की तरह फर्श पर बह रहे थे। धुआँ इतना घना हो गया कि चेहरों की पहचान मिटने लगी।

किसी तरह पिता ने पत्नी को दरवाज़े तक पहुँचा दिया। बाहर खड़े लोग हाथ बढ़ाकर यात्रियों को खींच रहे थे। तभी माँ की गोद अचानक हल्की हो गई।

बालक… अंदर रह गया था।

“मेरा बच्चा…! मेरा बच्चा अंदर है…!”

उसकी चीख रात के सन्नाटे को चीरती चली गई।

उसकी आँखों के सामने बस धधक रही थी और भीतर उसका मासूम बेटा—जो कुछ देर पहले खिलौना कार पकड़े मुस्कुरा रहा था।

कुछ मिनटों बाद सब शांत हो गया।

बस अब सिर्फ जलता हुआ ढाँचा थी। सड़क पर धुआँ तैर रहा था। यात्रियों की सिसकियाँ हवा में घुली थीं। दूर कहीं उस बालक की छोटी खिलौना कार सड़क किनारे पड़ी थी—आधी जली हुई, आधी बची हुई। उस रात केवल एक बच्चा नहीं मरा था। मर गई थी व्यवस्था की लापरवाही। मर गई थी यात्रियों की सुरक्षा के प्रति संवेदनहीनता। और जल गई थी वह उम्मीद कि हर सफर सुरक्षित होकर घर तक पहुँचता है। सुबह अखबारों में खबर छपी—

शार्ट सर्किट से बस में आग, एक मासूम की मौत।

लेकिन उन चार-पाँच शब्दों के पीछे एक माँ की टूटी हुई दुनिया थी, एक पिता की असहाय आँखें थीं, और एक नन्हा सपना था… जो ग्वालियर का किला देखने से पहले ही राख बन गया।

आप इसे एक मार्मिक कहानी कह लें लेकिन यात्री बसों में लगने वाली आग के बाद लगभग ऐसा ही कुछ घटित होता है। फिर वही होता है जो हमेशा से होता रहा है। सरकारें मुआवजा देनें की घोषणाएं करती हैं। नियम कानूनों की उपेक्षा की जांच और दोषियों को सजा देने का वायदा किया जाता है। थोड़े दिनों बाद किसी और घटना का समाचार पढ़ने को मिल जाता है। 

यात्री वाहनों और बसों में आग लगने की बढ़ती घटनाएं बेहद चिंताजनक हैं। हाल के महीनों में देश के अलग-अलग हिस्सों से ऐसी ही कई डरा देने वाली खबरें सामने आई हैं। सफर को सुरक्षित बनाने के लिए इन हादसों के मूल कारणों को समझना, प्रशासनिक कमियों को पहचानना और कड़े कदम उठाना बेहद जरूरी है।

हाल ही  (मई 2026) में इंदौर से ग्वालियर जा रही एक इंटरसिटी बस में शार्ट सर्किट के कारण भीषण आग लग गई। अधिकांश यात्री तो समय रहते बाहर निकल आए, लेकिन आपातकालीन गेट न होने और बस में प्लास्टिक का व्यावसायिक सामान लोड होने के कारण आग इतनी तेजी से फैली कि एक 4 वर्षीय मासूम बच्चा अंदर ही फंस गया और उसकी जान चली गई। इसी प्रकार (मई 2026) में हैदराबाद से तिरुपति जा रही एक निजी ट्रैवल्स की बस का पिछला टायर जाम होने के कारण घर्षण (Friction) पैदा हुआ और टायर ब्लास्ट के साथ आग लग गई। गनीमत रही कि ड्राइवर की सूझबूझ से सभी 36 यात्रियों को सुरक्षित उतारा गया, लेकिन बस पूरी तरह जलकर राख हो गई। मार्च में इसी राज्य के मार्कापुरम में एक बस और ट्रक की टक्कर के बाद लगी आग में 14 लोगों की मौत हो गई थी। अप्रैल 2026 में इंदौर से सागर जा रही एक स्लीपर कोच बस के स्टेयरिंग के पास शॉर्ट सर्किट हुआ, जिसमें 50 यात्री बाल-बाल बचे। वहीं मैनपुरी में भी एक चलती रोडवेज बस में शॉर्ट सर्किट से आग भड़क उठी थी।

दरअसल, वाहनों में आग लगने के कई कारण सामने आते रहे हैं, जैसे आधुनिक बसों में मोबाइल चार्जिंग पॉइंट, एसी (AC), हैवी लाइट्स और म्यूजिक सिस्टम के लिए अतिरिक्त वायरिंग की जाती है। यह काम अक्सर अप्रशिक्षित मैकेनिकों से और घटिया क्वालिटी के तारों से करवा लिया जाता  जाता है। अत्यधिक गर्मी में लोड बढ़ने पर तार आपस में चिपक जाते हैं और शॉर्ट सर्किट हो जाता है। कई बार गर्मियों में सड़क का तापमान बहुत ज्यादा होता है। यदि टायर पुराने हों, उनमें हवा का दबाव सही न हो, या ब्रेक शू (Break Shoe) जाम होने के कारण पहिया रगड़ खा रहा हो, तो भयंकर घर्षण से टायर आग पकड़ लेते हैं। इंजन का रखरखाव ठीक नहीं होने से भी दुर्घटना का खतरा बन जाता है,  इंजन में ऑयल या फ्यूल लीक होना, कूलेंट का कम होना और समय पर सर्विसिंग न होने से इंजन ओवरहीट हो जाता है, जो आग का कारण बनता है। कई बस संचालक अतिरिक्त कमाई के चक्कर में यात्रियों की डिक्की या छत पर प्लास्टिक का सामान, केमिकल, या अन्य ज्वलनशील व्यावसायिक पार्सल लाद देते हैं, जो आग को तेजी से भड़काने का काम करते हैं।

यद्यपि आग लगने की घटनाओं से  बचाव के यात्रियों और ऑपरेटरों के स्तर पर भी कई उपाय किए गए हैं किंतु प्रश्न यह है कि क्या इन पर पर्याप्त ध्यान दिया जाता है? हर बस में कम से कम दो चालू हालत वाले फायर एक्सटिंग्विशर होने अनिवार्य होने चाहिए—एक ड्राइवर के पास और दूसरा आपातकालीन गेट के पास। बसों की सीटों और अंदरूनी हिस्सों में ऐसे फोम और कपड़ों का इस्तेमाल हो जो आग न पकड़ें और जलने पर जहरीला धुआं पैदा न करें (अक्सर लोग आग से कम, जहरीले धुएं से दम घुटने के कारण मरते हैं)। इंजन कंपार्टमेंट में ऑटोमैटिक फायर डिटेक्शन एंड सप्रेशन सिस्टम (FDSS) लगाया जाना चाहिए, जो आग लगते ही खुद-ब-खुद उसे बुझा दे। आपातकालीन गेट के पास कोई सीट या सामान नहीं होना चाहिए ताकि वह आसानी से खुल सके। खिड़कियों के शीशे तोड़ने वाले विशेष हथौड़े (Emergency Hammers) हर दो-तीन सीट के बाद लगे होने चाहिए।

शासन और प्रशासन की भी ऐसे मामलों में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निश्चित की गई है , फिर भी कहीं तो चूक हो ही रही होगी, घटनाएं और उनकी जांच रिपोर्टें तो यही इंगित करती रही हैं।  कई बार आरटीओ (RTO) विभाग द्वारा वाहनों की फिटनेस जांच अक्सर केवल कागजों पर या सतही तौर पर होने की आशंका होती है। बसों के भीतर की वायरिंग, इमरजेंसी गेट के काम करने की स्थिति और टायर की गुणवत्ता की बारीकी से शायद जांच में कोई कसर रह जाती है। जब कोई बड़ा हादसा हो जाता है, तो प्रशासन दो-चार दिन चेकिंग अभियान चलाकर  जुर्माने काटता है और फिर स्थिति वैसी ही हो जाती है। निरंतर कड़ाई का अभाव बस ऑपरेटरों के हौसले बुलंद रखता है। स्लीपर बसों में क्षमता से अधिक केबिन बना दिए जाते हैं, जिससे गैलरी  इतनी संकरी हो जाती है कि भगदड़ मचने पर दो लोग एक साथ निकल भी नहीं सकते। कई बार प्रशासन इन अवैध बदलावों को देखकर भी अनदेखा कर देता है। 

वाहनों के रखरखाव और यात्री बसों के सुरक्षित संचालन के लिए हमारे यहां पर्याप्त नियम और कानून हैं बस उनका ईमानदारी से पालन करने में ही कहीं न कहीं हमसे चूक हो जाती है।  बसों की फिटनेस चेकिंग के लिए रैंडम और औचक निरीक्षण (Surprise Inspection) होने चाहिए। इसमें सीसीटीवी या डिजिटल ट्रैकिंग का इस्तेमाल हो ताकि भ्रष्टाचार की गुंजाइश न रहे। नियमों का उल्लंघन करने वाले, आपातकालीन गेट न रखने वाले या बस में अवैध कमर्शियल माल ढोने वाले ऑपरेटरों के परमिट तुरंत और स्थायी रूप से रद्द किए जाने चाहिए। सरकार को अनिवार्य नियम बनाना चाहिए कि हर कमर्शियल ड्राइवर और कंडक्टर को 'फायर सेफ्टी और इवेक्यूएशन' (आग लगने पर यात्रियों को निकालने) की बाकायदा ट्रेनिंग मिले और इसका सर्टिफिकेट होने पर ही उन्हें गाड़ी चलाने की अनुमति दी जाए।

और हां! हम यात्रीगण क्या सावधानी रखेंगे ? जब भी हम लंबी दूरी या स्लीपर बस से सफर करें, तो सुरक्षा की दृष्टि से हमेशा आपातकालीन खिड़की  और हथौड़ी की स्थिति की जांच पहले ही कर लें। यात्रा के दौरान धूम्रपान न करें और किसी भी ज्वलनशील सामग्री को साथ ले जाने से बचें। जहां तक हो सके अपनी यात्रा के लिए हमेशा मूल कंपनी द्वारा निर्मित या प्रमाणित प्रीमियम बसों (जैसे राज्य परिवहन) को प्राथमिकता दें। बाकी तो शायद हमारे बस में है भी नहीं। 

सच तो यह है कि बस संचालकों, शासन, प्रशासन को यात्री सुरक्षा में किसी भी कमी के लिए किसी भी स्तर पर समझौता नहीं करने की प्रवृत्ति का विकास अपने भीतर करना होगा, तभी बसों में आग लगने की हृदय विदर्क घटनाओं से बचा जा सकेगा। 


ब्रजेश कानूनगो 


Friday, 15 May 2026

भगदड़ की घटनाएँ : अफवाह के मनोविज्ञान पर चिंतन जरूरी

भगदड़ की घटनाएँ : अफवाह के मनोविज्ञान पर चिंतन जरूरी

हाल ही में जुलाई माह की 27 तारीख को हरिद्वार के मनसा देवी मंदिर में एक भगदड़ में 8 लोगों की मौत हो गई और कई घायल हुए। इस भगदड़ का कारण बिजली के करंट की अफवाह थी यद्यपि प्रारंभिक तौर पर  उत्तराखंड पावर कॉर्पोरेशन ने इसे खारिज कर दिया है। राज्य के मुख्यमंत्री ने घटना की न्यायिक जांच के आदेश दिए और मृतकों के परिजनों को आर्थिक सहायता देने की घोषणा की। संकट के समय पीड़ितों की मदद करना एक अच्छा कदम अवश्य होता है, लेकिन ऐसे हादसे शासन, प्रशासन के अलावा प्रबुद्ध विचारकों और जागरूक नागरिकों  को भी चिंतन करने को बाध्य करते हैं।

ऐसा नहीं है कि धार्मिक आयोजनों में भगदड़ का हादसा पहली बार हुआ हो। 2008 में हिमाचल प्रदेश के नैना देवी मंदिर में भगदड़ में 146 लोगों की मौत हुई थी। 2010 में पश्चिम बंगाल के गंगासागर मेला में मकर संक्रांति के अवसर पर भगदड़ में कई लोगों की जान गई थी। 2013 में इलाहाबाद कुंभ मेले में भगदड़ में कई लोग घायल हुए थे। 2016 में पुत्तिंगल देवी मंदिर, केरल में आतिशबाजी के कारण हुए विस्फोट में 100 से अधिक लोगों की मौत हुई थी। 2024 में उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले में एक धार्मिक आयोजन के दौरान भगदड़ में 121 लोगों की मौत हुई थी। अभी हाल ही में महाकुंभ 2025 के दौरान  प्रयागराज में भगदड़ की घटना 29 जनवरी 2025 को मौनी अमावस्या के अवसर पर हुई, जब श्रद्धालुओं की भारी भीड़ शाही स्नान के लिए उमड़ी। इस हादसे में कम से कम 38 लोगों की मृत्यु हो गई और कई अन्य घायल हो गए।

धार्मिक स्थलों पर भीड़ और श्रद्धालुओं का उमड़ना और हादसे हो जाना एक आम समस्या हो गई है, जिसमें अक्सर सुरक्षा के अभाव में लोगों की जान जोखिम में पड़ जाती है। इन हादसों में भगदड़ और अन्य दुर्घटनाएं शामिल हैं, किंतु सबसे पहले इनके पीछे किसी अफवाह का भीड़ में फैल जाना रहा है। ऐसा क्यों होता है?

यह अवश्य है कि अफवाहें एक प्रकार की सामाजिक और मनोवैज्ञानिक लक्षण हैं जो अक्सर गलत सूचनाओं के प्रसार के रूप में सामने आता रहा है। अगर गौर करें तो जब लोगों को किसी खास स्थिति के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं होती है, तो वे अफवाहों पर विश्वास करने लगते हैं। अनिश्चितता और भय के समय में अफवाहें और अधिक तेजी से फैलती हैं। दूसरी बात, लोग सामान्यतः अपने समूह या समुदाय में अन्यों से विशेष प्रभावित होते हैं। यदि एक समूह में कोई अफवाह फैलती है, तो लोग उसे सच मानने लगते हैं। अक्सर अफवाहें मौखिक संचार के माध्यम से फैलती हैं। जब लोग एक-दूसरे से बात करते हैं, तो वे अक्सर जानकारी को बढ़ा चढ़ाकर विकृत या अतिरंजित बनाकर आगे बढ़ाने लगते हैं और भीड़ में घबराहट बढ़ती जाती है।

ऐसा नहीं है कि ये अफवाहें वैसे ही फैलती जाती है, इसके पीछे कई अन्य घटक भी शामिल होते हैं। धार्मिक स्थलों पर भीड़ प्रबंधन की कमी एक प्रमुख कारण है ही, जिसमें आयोजकों और प्रशासन की लापरवाही के कारण भगदड़ जैसी घटनाएं हो जाती हैं। आयोजनों में अव्यवस्था और लापरवाही के कारण भी हादसे होते हैं, उचित निकास मार्ग न होना और सुरक्षा उपकरणों की पर्याप्त उपलब्धता नहीं होना भी दुर्घटना के भयंकर स्वरूप का कारक बन जाते हैं।

अफवाहों की तुरंत जांच करना और उन्हें सत्यापित करना भी बेहद महत्वपूर्ण कदम होता है। अन्य व्यवस्थाओं में उलझा प्रशासन विश्वसनीय स्रोतों से जानकारी प्राप्त करने और तथ्यों की पुष्टि करने में कभी कभी चूक जाता है या वह इस कार्य में तनिक देर से सक्रिय हो पाता है। तब तक अफवाह अपनी आग फैला चुकी होती है। ऐसे में स्पष्ट और पारदर्शी संचार और सूचना तंत्र अफवाहों को फैलने से रोकने में मदद कर सकता है। लोगों को सटीक जानकारी प्रदान करना और उन्हें अफवाहों के बारे में जागरूक करना भी महत्वपूर्ण है। प्रशासन के इन उपायों के बावजूद भी यदि घटनाएं होती जा रही हैं तो निश्चित ही यह मुद्दा बहुत महत्वपूर्ण और विचारणीय हो जाता है।

जरूरी है कि अब इस दिशा में गंभीरता और प्राथमिकता से ध्यान दिया जाना होगा। लोगों को अफवाहों के बारे में शिक्षित करना और उन्हें सिखाना कि कैसे अफवाहों की पहचान करें और उनसे निपटें शायद एक प्रभावी तरीका हो सकता है। अफवाहों के मनोविज्ञान को उच्चतम बौद्धिकता से समझकर और संपूर्ण देश में व्यापक कदम उठाकर नकारात्मक प्रभावों को कम करने की कोशिश होना चाहिए। शायद तभी हम एक अधिक सूचित और जागरूक समाज का निर्माण कर सकते हैं।

ब्रजेश कानूनगो