जलती यात्री बसें : व्यवस्था और संवेदनाओं को राख करती आग
रात का दूसरा पहर था। प्रदेश के दो बड़े नगरों के बीच चलने वाली बस राष्ट्रीय राजमार्ग पर तेज़ी से दौड़ी चली जा रही थी। खिड़कियों के बाहर अंधेरे खेत पीछे छूट रहे थे और भीतर पीली रोशनी में यात्रियों की अपनी-अपनी छोटी दुनियाएँ बसी थीं। कोई मोबाइल पर धीमे स्वर में बात कर रहा था, कोई ऊँघ रहा था, तो कोई सीट से सिर टिकाकर आने वाले कल के सपने देख रहा था।
बस की पिछली सीट पर चार वर्षीय नन्हा बालक अपनी माँ की गोद में सोया हुआ था। उसकी छोटी उंगलियाँ अब भी खिलौना कार को कसकर पकड़े थीं। माँ कभी उसके माथे को चूमती, कभी खिड़की से बाहर झाँकती। पिता सामने वाली सीट पर बैठे मुस्कुरा रहे थे—“ग्वालियर पहुँचकर इसे किला दिखाऊँगा,” उन्होंने धीरे से कहा था।
अचानक बस के अगले हिस्से से चिंगारियों की तेज़ आवाज़ आई—
“छटाक… छटाक…!” कुछ ही सेकंड में धुएँ की कड़वी गंध फैलने लगी। तभी इंजन के पास से लपटें उठीं और देखते-ही-देखते आग ने प्लास्टिक के सामान को पकड़ लिया। एक भयावह चीख बस में गूँज उठी— आग… आग लग गई!
नींद में डूबे लोग घबराकर उठे। धक्का-मुक्की शुरू हो गई। कोई खिड़की तोड़ने लगा, कोई बच्चों को उठाकर दरवाज़े की ओर भागा। जलते प्लास्टिक से उठता काला धुआँ साँसों को जला रहा था। बस के भीतर अफरा-तफरी का ऐसा दृश्य था मानो हर व्यक्ति मौत से आगे निकल जाना चाहता हो। बच्चे की माँ ने उसे कसकर पकड़ लिया। पिता पीछे की ओर भागे, लेकिन तभी किसी ने चीखकर कहा— पीछे से रास्ता बंद है! बस में आपातकालीन गेट था ही नहीं।
आग अब विकराल हो चुकी थी। प्लास्टिक के पैकेट पिघल-पिघलकर जलते तेल की तरह फर्श पर बह रहे थे। धुआँ इतना घना हो गया कि चेहरों की पहचान मिटने लगी।
किसी तरह पिता ने पत्नी को दरवाज़े तक पहुँचा दिया। बाहर खड़े लोग हाथ बढ़ाकर यात्रियों को खींच रहे थे। तभी माँ की गोद अचानक हल्की हो गई।
बालक… अंदर रह गया था।
“मेरा बच्चा…! मेरा बच्चा अंदर है…!”
उसकी चीख रात के सन्नाटे को चीरती चली गई।
उसकी आँखों के सामने बस धधक रही थी और भीतर उसका मासूम बेटा—जो कुछ देर पहले खिलौना कार पकड़े मुस्कुरा रहा था।
कुछ मिनटों बाद सब शांत हो गया।
बस अब सिर्फ जलता हुआ ढाँचा थी। सड़क पर धुआँ तैर रहा था। यात्रियों की सिसकियाँ हवा में घुली थीं। दूर कहीं उस बालक की छोटी खिलौना कार सड़क किनारे पड़ी थी—आधी जली हुई, आधी बची हुई। उस रात केवल एक बच्चा नहीं मरा था। मर गई थी व्यवस्था की लापरवाही। मर गई थी यात्रियों की सुरक्षा के प्रति संवेदनहीनता। और जल गई थी वह उम्मीद कि हर सफर सुरक्षित होकर घर तक पहुँचता है। सुबह अखबारों में खबर छपी—
शार्ट सर्किट से बस में आग, एक मासूम की मौत।
लेकिन उन चार-पाँच शब्दों के पीछे एक माँ की टूटी हुई दुनिया थी, एक पिता की असहाय आँखें थीं, और एक नन्हा सपना था… जो ग्वालियर का किला देखने से पहले ही राख बन गया।
आप इसे एक मार्मिक कहानी कह लें लेकिन यात्री बसों में लगने वाली आग के बाद लगभग ऐसा ही कुछ घटित होता है। फिर वही होता है जो हमेशा से होता रहा है। सरकारें मुआवजा देनें की घोषणाएं करती हैं। नियम कानूनों की उपेक्षा की जांच और दोषियों को सजा देने का वायदा किया जाता है। थोड़े दिनों बाद किसी और घटना का समाचार पढ़ने को मिल जाता है।
यात्री वाहनों और बसों में आग लगने की बढ़ती घटनाएं बेहद चिंताजनक हैं। हाल के महीनों में देश के अलग-अलग हिस्सों से ऐसी ही कई डरा देने वाली खबरें सामने आई हैं। सफर को सुरक्षित बनाने के लिए इन हादसों के मूल कारणों को समझना, प्रशासनिक कमियों को पहचानना और कड़े कदम उठाना बेहद जरूरी है।
हाल ही (मई 2026) में इंदौर से ग्वालियर जा रही एक इंटरसिटी बस में शार्ट सर्किट के कारण भीषण आग लग गई। अधिकांश यात्री तो समय रहते बाहर निकल आए, लेकिन आपातकालीन गेट न होने और बस में प्लास्टिक का व्यावसायिक सामान लोड होने के कारण आग इतनी तेजी से फैली कि एक 4 वर्षीय मासूम बच्चा अंदर ही फंस गया और उसकी जान चली गई। इसी प्रकार (मई 2026) में हैदराबाद से तिरुपति जा रही एक निजी ट्रैवल्स की बस का पिछला टायर जाम होने के कारण घर्षण (Friction) पैदा हुआ और टायर ब्लास्ट के साथ आग लग गई। गनीमत रही कि ड्राइवर की सूझबूझ से सभी 36 यात्रियों को सुरक्षित उतारा गया, लेकिन बस पूरी तरह जलकर राख हो गई। मार्च में इसी राज्य के मार्कापुरम में एक बस और ट्रक की टक्कर के बाद लगी आग में 14 लोगों की मौत हो गई थी। अप्रैल 2026 में इंदौर से सागर जा रही एक स्लीपर कोच बस के स्टेयरिंग के पास शॉर्ट सर्किट हुआ, जिसमें 50 यात्री बाल-बाल बचे। वहीं मैनपुरी में भी एक चलती रोडवेज बस में शॉर्ट सर्किट से आग भड़क उठी थी।
दरअसल, वाहनों में आग लगने के कई कारण सामने आते रहे हैं, जैसे आधुनिक बसों में मोबाइल चार्जिंग पॉइंट, एसी (AC), हैवी लाइट्स और म्यूजिक सिस्टम के लिए अतिरिक्त वायरिंग की जाती है। यह काम अक्सर अप्रशिक्षित मैकेनिकों से और घटिया क्वालिटी के तारों से करवा लिया जाता जाता है। अत्यधिक गर्मी में लोड बढ़ने पर तार आपस में चिपक जाते हैं और शॉर्ट सर्किट हो जाता है। कई बार गर्मियों में सड़क का तापमान बहुत ज्यादा होता है। यदि टायर पुराने हों, उनमें हवा का दबाव सही न हो, या ब्रेक शू (Break Shoe) जाम होने के कारण पहिया रगड़ खा रहा हो, तो भयंकर घर्षण से टायर आग पकड़ लेते हैं। इंजन का रखरखाव ठीक नहीं होने से भी दुर्घटना का खतरा बन जाता है, इंजन में ऑयल या फ्यूल लीक होना, कूलेंट का कम होना और समय पर सर्विसिंग न होने से इंजन ओवरहीट हो जाता है, जो आग का कारण बनता है। कई बस संचालक अतिरिक्त कमाई के चक्कर में यात्रियों की डिक्की या छत पर प्लास्टिक का सामान, केमिकल, या अन्य ज्वलनशील व्यावसायिक पार्सल लाद देते हैं, जो आग को तेजी से भड़काने का काम करते हैं।
यद्यपि आग लगने की घटनाओं से बचाव के यात्रियों और ऑपरेटरों के स्तर पर भी कई उपाय किए गए हैं किंतु प्रश्न यह है कि क्या इन पर पर्याप्त ध्यान दिया जाता है? हर बस में कम से कम दो चालू हालत वाले फायर एक्सटिंग्विशर होने अनिवार्य होने चाहिए—एक ड्राइवर के पास और दूसरा आपातकालीन गेट के पास। बसों की सीटों और अंदरूनी हिस्सों में ऐसे फोम और कपड़ों का इस्तेमाल हो जो आग न पकड़ें और जलने पर जहरीला धुआं पैदा न करें (अक्सर लोग आग से कम, जहरीले धुएं से दम घुटने के कारण मरते हैं)। इंजन कंपार्टमेंट में ऑटोमैटिक फायर डिटेक्शन एंड सप्रेशन सिस्टम (FDSS) लगाया जाना चाहिए, जो आग लगते ही खुद-ब-खुद उसे बुझा दे। आपातकालीन गेट के पास कोई सीट या सामान नहीं होना चाहिए ताकि वह आसानी से खुल सके। खिड़कियों के शीशे तोड़ने वाले विशेष हथौड़े (Emergency Hammers) हर दो-तीन सीट के बाद लगे होने चाहिए।
शासन और प्रशासन की भी ऐसे मामलों में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निश्चित की गई है , फिर भी कहीं तो चूक हो ही रही होगी, घटनाएं और उनकी जांच रिपोर्टें तो यही इंगित करती रही हैं। कई बार आरटीओ (RTO) विभाग द्वारा वाहनों की फिटनेस जांच अक्सर केवल कागजों पर या सतही तौर पर होने की आशंका होती है। बसों के भीतर की वायरिंग, इमरजेंसी गेट के काम करने की स्थिति और टायर की गुणवत्ता की बारीकी से शायद जांच में कोई कसर रह जाती है। जब कोई बड़ा हादसा हो जाता है, तो प्रशासन दो-चार दिन चेकिंग अभियान चलाकर जुर्माने काटता है और फिर स्थिति वैसी ही हो जाती है। निरंतर कड़ाई का अभाव बस ऑपरेटरों के हौसले बुलंद रखता है। स्लीपर बसों में क्षमता से अधिक केबिन बना दिए जाते हैं, जिससे गैलरी इतनी संकरी हो जाती है कि भगदड़ मचने पर दो लोग एक साथ निकल भी नहीं सकते। कई बार प्रशासन इन अवैध बदलावों को देखकर भी अनदेखा कर देता है।
वाहनों के रखरखाव और यात्री बसों के सुरक्षित संचालन के लिए हमारे यहां पर्याप्त नियम और कानून हैं बस उनका ईमानदारी से पालन करने में ही कहीं न कहीं हमसे चूक हो जाती है। बसों की फिटनेस चेकिंग के लिए रैंडम और औचक निरीक्षण (Surprise Inspection) होने चाहिए। इसमें सीसीटीवी या डिजिटल ट्रैकिंग का इस्तेमाल हो ताकि भ्रष्टाचार की गुंजाइश न रहे। नियमों का उल्लंघन करने वाले, आपातकालीन गेट न रखने वाले या बस में अवैध कमर्शियल माल ढोने वाले ऑपरेटरों के परमिट तुरंत और स्थायी रूप से रद्द किए जाने चाहिए। सरकार को अनिवार्य नियम बनाना चाहिए कि हर कमर्शियल ड्राइवर और कंडक्टर को 'फायर सेफ्टी और इवेक्यूएशन' (आग लगने पर यात्रियों को निकालने) की बाकायदा ट्रेनिंग मिले और इसका सर्टिफिकेट होने पर ही उन्हें गाड़ी चलाने की अनुमति दी जाए।
और हां! हम यात्रीगण क्या सावधानी रखेंगे ? जब भी हम लंबी दूरी या स्लीपर बस से सफर करें, तो सुरक्षा की दृष्टि से हमेशा आपातकालीन खिड़की और हथौड़ी की स्थिति की जांच पहले ही कर लें। यात्रा के दौरान धूम्रपान न करें और किसी भी ज्वलनशील सामग्री को साथ ले जाने से बचें। जहां तक हो सके अपनी यात्रा के लिए हमेशा मूल कंपनी द्वारा निर्मित या प्रमाणित प्रीमियम बसों (जैसे राज्य परिवहन) को प्राथमिकता दें। बाकी तो शायद हमारे बस में है भी नहीं।
सच तो यह है कि बस संचालकों, शासन, प्रशासन को यात्री सुरक्षा में किसी भी कमी के लिए किसी भी स्तर पर समझौता नहीं करने की प्रवृत्ति का विकास अपने भीतर करना होगा, तभी बसों में आग लगने की हृदय विदर्क घटनाओं से बचा जा सकेगा।
ब्रजेश कानूनगो
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