युवा आक्रोश का समाधान क्या अनिवार्य सैन्य सेवा में है ?
आक्रोशित युवाओं के एक बड़े प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा डंडे बरसाए जाने, वाटर कैनन के बाद बदहवास प्रदर्शनकारियों की भगदड़ को टीवी पर देखकर एक उत्तेजित मित्र ने कहा कि - इन सबको सीमा पर भेज देना चाहिए ताकि इन्हें देश सेवा का मौका मिले और काम भी। इसी प्रकार शांतिप्रिय नागरिकों के भाईचारे और सद्भाव में जब कभी उत्पाती लोग खलल डालने की कोशिश करते हैं तब भी बहुत से लोगों का सुझाव आता है कि उत्पातियों को सीमा पर जाकर अपनी देशभक्ति दिखाना चाहिए। प्रश्न यह है कि क्या युवाओं के मुद्दों और उनके आक्रोश और नागरिकों की कठिनाइयों का समाधान का रास्ता केवल सीमा पर तैनाती से निकाला जा सकता है? यह कोई नई बात नहीं है। भारत में युवाओं की भारी आबादी (डेमोग्राफिक डिविडेंड) को देखते हुए बेरोजगारी और युवाओं में बढ़ती अशांति एक गंभीर चुनौती है। इस समस्या के समाधान के रूप में अनिवार्य सैन्य सेवा (Conscription) का विचार समय-समय पर चर्चा में आता रहा है।
वैश्विक परिदृश्य में राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता और नागरिक कर्तव्यों की परिभाषा हर देश में अलग है। जहां भारत और अमेरिका जैसे बड़े लोकतंत्र पूरी तरह से स्वैच्छिक (Voluntary) सेना पर निर्भर हैं, वहीं दुनिया के कई ऐसे देश भी हैं जहां एक निश्चित आयु के युवाओं के लिए सेना में अपनी सेवाएं देना कानूनी रूप से अनिवार्य है। इस व्यवस्था को 'कॉन्स्क्रिप्शन' (Conscription) या 'अनिवार्य सैन्य सेवा' कहा जाता है।
यद्यपि रूस,चीन,यूक्रेन,इजराइल,कोरिया, फिनलैंड, नार्वे, स्विट्जरलैंड, तुर्की,ईरान, ग्रीस आदि सहित दुनिया भर के लगभग 60 से अधिक देशों में किसी न किसी रूप में अनिवार्य सैन्य सेवा का प्रावधान है किंतु क्या यह पहल भारत के लिए व्यावहारिक है? इसके समर्थन और विरोध में कई महत्वपूर्ण सामाजिक, आर्थिक और सैन्य तर्क दिए जाते रहे हैं।
समर्थकों का मानना है कि अनिवार्य सैन्य सेवा युवाओं को सही दिशा देने और देश की प्रगति में भागीदार बनाने का एक कारगर जरिया बन सकती है। सेना युवाओं को न केवल शारीरिक रूप से मजबूत बनाती है, बल्कि उनमें समयबद्धता, नेतृत्व क्षमता और तकनीकी/व्यावहारिक कौशल (जैसे- इंजीनियरिंग, लॉजिस्टिक्स, मेडिकल) का विकास करती है। यह सेवा के बाद उनके लिए नागरिक रोजगार के रास्ते खोलता है। खाली दिमाग और दिशाहीनता युवाओं को अपराध, नशे या उग्रवाद की ओर धकेल सकती है। सैन्य सेवा उन्हें एक सकारात्मक उद्देश्य देती है, जिससे सामाजिक अशांति में कमी आ सकती है। भारत जैसे विविध देश में, जब विभिन्न राज्यों, जातियों और पृष्ठभूमि के युवा एक साथ रहकर देश की सेवा करेंगे, तो उनमें सामाजिक समरसता और मजबूत राष्ट्रीय भावना पैदा होगी। बड़े पैमाने पर प्रशिक्षित युवाओं की यह फौज बाढ़, भूकंप या महामारी जैसी राष्ट्रीय आपदाओं के समय त्वरित राहत और बचाव कार्यों में देश के बहुत काम आ सकती है।
इससे अलग धारणा रखने वाले विशेषज्ञों और आलोचकों का मानना है कि भारत जैसी विशाल जनसंख्या वाले देश में इसे लागू करना फायदे से ज्यादा नुकसानदेह साबित हो सकता है। भारत में हर साल करोड़ों युवा सैन्य सेवा की उम्र में प्रवेश करते हैं। इतने बड़े पैमाने पर युवाओं को भोजन, वर्दी, आवास, हथियार, प्रशिक्षण और भत्ता देना देश के बजट पर अत्यधिक बोझ डालेगा। यह पैसा शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) से डायवर्शन होगा। आधुनिक युद्ध कौशल अब उच्च तकनीक, खुफिया जानकारी और अत्याधुनिक हथियारों पर निर्भर है, न कि केवल सैनिकों की संख्या पर। जबरन भर्ती किए गए युवाओं में वह प्रेरणा और समर्पण नहीं हो सकता जो एक स्वेच्छा से आए सैनिक में होता है। इससे सेना की युद्धक क्षमता प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि सैन्य सेवा आमतौर पर कुछ वर्षों के लिए होगी। इसके बाद जब ये युवा वापस नागरिक जीवन में लौटेंगे, तो यदि बाजार में नौकरियां नहीं होंगी, तो वे फिर से बेरोजगार हो जाएंगे। समाज के हर युवा को हथियार और युद्ध का प्रशिक्षण देने से, भविष्य में सामाजिक संघर्षों या व्यक्तिगत विवादों में हिंसा का स्तर बढ़ने का खतरा भी संभावित हो सकता है।
बहुत से विचारकों का यह भी मत रहा है कि अनिवार्य सैन्य सेवा को पूरी तरह थोपने के बजाय, सरकार और समाज मिलकर कुछ मध्यम मार्ग और व्यावहारिक उपाय अपना सकते हैं। पहले से उपलब्ध एनसीसी और एनएसएस के बड़े पैमाने पर विस्तार द्वारा स्कूलों और कॉलेजों में राष्ट्रीय कैडेट कोर और राष्ट्रीय सेवा योजना को अनिवार्य या अत्यधिक प्रोत्साहित किया जाए। इससे भारी खर्च के बिना युवाओं में अनुशासन और नागरिक चेतना विकसित होगी। हाल ही में शुरू की गई 'अग्निपथ योजना' एक तरह से स्वैच्छिक सैन्य सेवा का ही रूप है। इसमें 4 साल बाद बाहर निकलने वाले 'अग्निवीरों' के लिए कड़े कौशल प्रमाणन और नागरिक नौकरियों (जैसे पुलिस, अर्धसैनिक बल, कॉर्पोरेट) में निश्चित आरक्षण को अधिक विश्वसनीय, कारगर और पुख्ता किया जाए। शिक्षा व्यवस्था को थ्योरी से हटाकर सीधे रोजगारपरक बनाया जाए। डेटा साइंस, एआई, रिन्यूएबल एनर्जी और लॉजिस्टिक्स जैसे उभरते क्षेत्रों में युवाओं को मुफ्त या कम दर पर प्रशिक्षित किया जाए। राष्ट्रीय युवा विकास कोर जैसा नवाचारी विचार भी सामने आया है जिसके तहत सेना के तर्ज पर एक नागरिक संगठन बनाया जा सकता है, जहां युवाओं को अनिवार्य रूप से 1-2 साल के लिए ग्रामीण विकास, साक्षरता अभियान, पर्यावरण संरक्षण और इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण जैसे कार्यों में लगाया जाए और उन्हें मानदेय दिया जाए। इन सब उपायों को निश्चित ही दलगत राजनीति के प्रलोभनों से सुरक्षित रखना नितांत जरूरी होगा।
अनिवार्य सैन्य सेवा केवल हथियार चलाने का प्रशिक्षण नहीं, बल्कि राष्ट्र और नागरिक के संबंध का एक विशेष मॉडल है। जिन देशों को सुरक्षा चुनौतियां अधिक हैं, वहां यह व्यवस्था राष्ट्रीय अस्तित्व का आधार बन जाती है। वहीं लोकतांत्रिक और उदार समाजों में यह बहस लगातार जारी है कि राष्ट्रभक्ति का अर्थ बाध्य सैन्य सेवा होना चाहिए या स्वैच्छिक सहभागिता।
भविष्य में संभव है कि पारंपरिक सैन्य सेवा की जगह “राष्ट्रीय नागरिक सेवा” जैसी अवधारणाएं अधिक लोकप्रिय हों, जहां युवा सेना के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण, स्वास्थ्य सेवा, आपदा राहत और तकनीकी सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में भी देशसेवा कर सकें।
सच तो यह है कि भारत जैसी विशाल आबादी के लिए 'अनिवार्य' सैन्य सेवा ' आर्थिक, सामाजिक और व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। युवाओं की अशांति और बेरोजगारी को दूर करने का सही रास्ता सेना में बाध्यकारी भर्ती नहीं, बल्कि आर्थिक नीतियों में सुधार, गुणवत्तापूर्ण कौशल विकास और रोजगार के नए अवसरों का सृजन करना जरूरी होगा।
ब्रजेश कानूनगो
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