नायकों की मूर्तियाँ : इतिहास, राजनीति और सामूहिक स्मृति का सफ़र
किसी भी शहर के प्रमुख चौराहे पर यदि किसी योद्धा, स्वतंत्रता सेनानी, राजा या महापुरुष की प्रतिमा दिखाई दे, तो वह केवल पत्थर या धातु की कलाकृति नहीं होती। वह उस समाज की सामूहिक स्मृति, राजनीतिक विचारधारा, सांस्कृतिक पहचान और इतिहास-बोध का सार्वजनिक घोषणापत्र भी होती है। इसलिए यह प्रश्न रोचक है कि आखिर चौराहों और सार्वजनिक स्थलों पर ऐतिहासिक नायकों की मूर्तियाँ स्थापित करने की परंपरा कब और कैसे शुरू हुई?
इस परंपरा की जड़ें हजारों वर्ष पुरानी हैं, लेकिन इसका आधुनिक स्वरूप मुख्यतः उन्नीसवीं शताब्दी में विकसित हुआ। प्राचीन सभ्यताओं—विशेषकर मिस्र, यूनान और रोम—में विशाल मूर्तियाँ बनाई जाती थीं। मिस्र के फ़राओ अपनी सत्ता के प्रदर्शन के लिए विशाल प्रतिमाएँ बनवाते थे। यूनान में विजयी खिलाड़ियों और वीरों की मूर्तियाँ मंदिरों और सार्वजनिक स्थानों पर स्थापित होती थीं। रोमन साम्राज्य ने इस परंपरा को और आगे बढ़ाया तथा सम्राटों और विजयी सेनानायकों की अश्वारोही प्रतिमाएँ साम्राज्य की शक्ति के प्रतीक के रूप में नगरों में स्थापित कीं।
मध्यकाल में यूरोप में सार्वजनिक मूर्तियों का महत्व अपेक्षाकृत कम हो गया। धार्मिक मूर्तियाँ चर्चों तक सीमित रहीं। पुनर्जागरण के बाद मानव-केंद्रित कला के पुनर्जन्म के साथ फिर से शासकों और महान व्यक्तियों की मूर्तियाँ बनने लगीं।
उन्नीसवीं शताब्दी में "स्टैच्यू मेनिया" का दौर आया।आज जिस प्रकार शहरों के चौराहों पर महापुरुषों की प्रतिमाएँ दिखाई देती हैं, उसकी वास्तविक शुरुआत उन्नीसवीं शताब्दी के यूरोप में हुई। इतिहासकार इसे "प्रतिमा-उन्माद" का युग भी कहते हैं। यह वह समय था जब आधुनिक राष्ट्र-राज्य बन रहे थे। सरकारें चाहती थीं कि नागरिक स्वयं को एक साझा इतिहास और साझा राष्ट्रीय पहचान से जोड़ें। इसलिए शहरों के चौक, पार्क और प्रमुख मार्ग राष्ट्रीय नायकों, सेनानायकों, साहित्यकारों और राजनेताओं की प्रतिमाओं से सजाए जाने लगे। इनका उद्देश्य केवल सम्मान देना नहीं, बल्कि नागरिकों में राष्ट्रवाद, गौरव और प्रेरणा का भाव जगाना भी था।
ब्रिटिश शासन ने इस परंपरा को भारत में बड़े पैमाने पर अपनाया। कलकत्ता, बम्बई, मद्रास और दिल्ली जैसे शहरों में महारानी विक्टोरिया, लॉर्ड कर्जन, लॉर्ड कॉर्नवालिस तथा अन्य अंग्रेज़ अधिकारियों की मूर्तियाँ स्थापित की गईं। यह केवल स्मारक नहीं थे, बल्कि औपनिवेशिक सत्ता की दृश्य उपस्थिति थे। उनका संदेश स्पष्ट था—साम्राज्य स्थायी है और उसकी शक्ति सर्वत्र विद्यमान है।
स्वतंत्र भारत में 1947 के बाद सार्वजनिक स्थानों की प्रतीकात्मक भाषा बदल गई । अनेक ब्रिटिश अधिकारियों की मूर्तियाँ हटाकर संग्रहालयों या विशेष उद्यानों में स्थानांतरित कर दी गईं। उनकी जगह महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव आंबेडकर, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, छत्रपति शिवाजी महाराज, रानी लक्ष्मीबाई और क्षेत्रीय नायकों की प्रतिमाएँ स्थापित होने लगीं। इससे सार्वजनिक स्थान भारतीय इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृतियों के वाहक बन गए।
विश्व में भी कुछ रोचक उदाहरण मिल जाते हैं। हीरोस स्क्वेयर में हंगरी के राष्ट्रीय इतिहास के प्रमुख नायकों का विशाल स्मारक राष्ट्रीय पहचान का प्रतीक है।पार्लियामेंट स्क्वेयर में ब्रिटेन के अनेक प्रधानमंत्रियों और विश्व नेताओं की प्रतिमाएँ लोकतांत्रिक परंपरा का प्रतीक हैं। अमेरिका के न्यूयॉर्क में स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि स्वतंत्रता के आदर्श की प्रतिमा है। भारत के गुजरात में सरदार पटेल की प्रतिमा स्टेच्यू ऑफ यूनिटी के रूप में प्रसिद्ध हुई है।
मूर्तियाँ केवल इतिहास नहीं बतातीं, वे यह भी बताती हैं कि समाज किसे याद रखना चाहता है। इसलिए समय बदलने पर अनेक प्रतिमाएँ विवादों में आ जाती हैं।
हाल के वर्षों में यूरोप, अमेरिका और अफ्रीका में उपनिवेशवाद, दास-व्यापार और नस्लवाद से जुड़े व्यक्तियों की प्रतिमाएँ हटाने या संग्रहालयों में ले जाने की मांग उठी। इससे यह स्पष्ट हुआ कि सार्वजनिक स्मृति स्थिर नहीं होती; प्रत्येक पीढ़ी अपने नायकों का पुनर्मूल्यांकन करती है।
आज भारत में केवल राष्ट्रीय नेताओं की ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय नायकों, जनजातीय वीरों, समाज सुधारकों और स्थानीय महापुरुषों की प्रतिमाएँ भी बड़ी संख्या में स्थापित की जा रही हैं। कई राज्यों में नई प्रतिमाएँ सांस्कृतिक अस्मिता और सामाजिक प्रतिनिधित्व का माध्यम बन रही हैं। साथ ही न्यायालयों ने यह भी कहा है कि सार्वजनिक मार्गों पर प्रतिमाएँ स्थापित करते समय नागरिकों की सुविधा और सुरक्षा का ध्यान रखा जाना चाहिए।
यद्यपि प्रारंभ में सार्वजनिक स्थानों पर प्रतिमाएँ मुख्यतः राजाओं और विजयी सेनानायकों की लगाई जाती थीं। किंतु उन्नीसवीं शताब्दी में मूर्तियों के चरित्रों में विस्तार हुआ। इतिहासकार इस दौर को स्टेच्यू मेनिया का युग कहते हैं। स्वतंत्रता के बाद भारत में भी अनेक औपनिवेशिक प्रतिमाएँ हटाकर राष्ट्रीय नेताओं की प्रतिमाएँ स्थापित की गईं।
आज प्रतिमाएँ केवल कला नहीं, बल्कि राजनीति, इतिहास, पर्यटन और स्थानीय पहचान का भी महत्वपूर्ण माध्यम बन चुकी हैं।दरअसल सार्वजनिक स्थलों पर स्थापित प्रतिमाएँ केवल अतीत का स्मरण नहीं करातीं; वे वर्तमान समाज के मूल्यों का भी दर्पण होती हैं। हर प्रतिमा एक प्रश्न पूछती है—हम किसे अपना नायक मानते हैं और आने वाली पीढ़ियों को किस इतिहास से परिचित कराना चाहते हैं? इसलिए ये मूर्तियाँ केवल पत्थर नहीं, बल्कि समाज की जीवित स्मृति, उसकी आकांक्षाओं और उसकी बदलती चेतना की अभिव्यक्ति हैं।
ब्रजेश कानूनगो
No comments:
Post a Comment