Monday, 1 June 2026

इम्पैक्ट फीचर : क्या सिर्फ प्रशंसा तक सीमित है पत्रकारिता का यह मंच?

इम्पैक्ट फीचर : क्या सिर्फ प्रशंसा तक सीमित है पत्रकारिता का यह मंच?

समाचार पत्रों में प्रकाशित होने वाले "इम्पैक्ट फीचर" (Impact Feature) पिछले कुछ वर्षों में मीडिया जगत की एक सामान्य प्रवृत्ति बन गए हैं। ये ऐसे प्रायोजित पृष्ठ होते हैं जो देखने में समाचार या विश्लेषणात्मक लेख जैसे लगते हैं, लेकिन वास्तव में किसी संस्था, कंपनी, उद्योग समूह अथवा सरकार द्वारा भुगतान कर प्रकाशित कराए जाते हैं। इनका उद्देश्य केवल विज्ञापन देना नहीं होता, बल्कि किसी विचार, उपलब्धि, योजना या छवि को पाठकों तक अधिक विश्वसनीय ढंग से पहुंचाना भी होता है।

आज स्थिति यह है कि केंद्र और राज्य सरकारें भी अपनी योजनाओं, उपलब्धियों और जनकल्याणकारी कार्यक्रमों के प्रचार के लिए बड़े पैमाने पर इम्पैक्ट फीचर प्रकाशित करा रही हैं। अखबारों के पूरे-पूरे पृष्ठ सरकारी विज्ञापनों और उपलब्धियों के बखान से भर जाते हैं। प्रश्न यह है कि क्या यही मंच विपक्षी दलों, नीतिगत खामियों, प्रशासनिक विफलताओं या जनसरोकारों से जुड़े असहज प्रश्नों के लिए भी उपलब्ध हो सकता है?

सैद्धांतिक रूप से देखा जाए तो लोकतंत्र में किसी भी वैध राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन, नागरिक मंच या जनहित समूह को अपने विचार रखने का अधिकार है। यदि कोई सरकार अपनी उपलब्धियों का प्रचार करने के लिए भुगतान कर सकती है, तो विपक्ष या नागरिक संगठन भी तथ्यों और तर्कों के आधार पर सरकारी नीतियों की आलोचना या उनके दुष्परिणामों को उजागर करने के लिए ऐसा कर सकते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का यही तकाजा है।

लेकिन व्यवहारिक धरातल पर स्थिति इतनी सरल नहीं है। अधिकांश समाचार पत्रों की आर्थिक संरचना विज्ञापन आय पर निर्भर हो चुकी है। सरकारें देश की सबसे बड़ी विज्ञापनदाताओं में शामिल हैं। ऐसे में अनेक मीडिया संस्थान सत्ता से टकराव की स्थिति से बचना चाहते हैं। उन्हें आशंका रहती है कि यदि वे सरकार की आलोचना करने वाले प्रायोजित फीचर प्रकाशित करेंगे तो सरकारी विज्ञापन प्रभावित हो सकते हैं। यही कारण है कि सरकार समर्थक इम्पैक्ट फीचर तो सहजता से दिखाई देते हैं, लेकिन सरकार की नीतियों की आलोचना करने वाले भुगतान आधारित फीचर बहुत कम दिखाई देते हैं।


यहां एक महत्वपूर्ण नैतिक प्रश्न भी खड़ा होता है। क्या अखबारों का दायित्व केवल भुगतान लेने वाले पक्ष का संदेश पहुंचाना है, या उन्हें लोकतांत्रिक विमर्श के लिए समान अवसर भी उपलब्ध कराने चाहिए? यदि इम्पैक्ट फीचर केवल सत्ता की उपलब्धियों का मंच बन जाएं और आलोचनात्मक दृष्टिकोण के लिए दरवाजे बंद कर दिए जाएं, तो यह लोकतांत्रिक संतुलन को कमजोर कर सकता है। लोकतंत्र केवल सरकार की बात सुनने का नाम नहीं है; यह सरकार से प्रश्न पूछने और वैकल्पिक दृष्टिकोणों को सामने लाने की व्यवस्था भी है।

हालांकि यह भी सच है कि विपक्ष द्वारा प्रायोजित फीचर और स्वतंत्र पत्रकारिता में अंतर बनाए रखना आवश्यक है। किसी भी आलोचनात्मक सामग्री को तथ्यों, आंकड़ों और प्रमाणों पर आधारित होना चाहिए। यदि इम्पैक्ट फीचर केवल राजनीतिक प्रचार या दुष्प्रचार का माध्यम बन जाएं तो वे भी लोकतांत्रिक विमर्श को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसलिए पारदर्शिता अनिवार्य है कि पाठक को स्पष्ट बताया जाए कि सामग्री प्रायोजित है।

अब प्रश्न है—क्या भारतीय हिंदी अखबार ऐसा करने की हिम्मत दिखा सकते हैं?

उत्तर एक शब्द में "हाँ" या "नहीं" नहीं है। कुछ अखबार और पत्रिकाएं आज भी सत्ता से असहज प्रश्न पूछने का साहस रखती हैं। वे खोजी रिपोर्टें प्रकाशित करते हैं और जनहित के मुद्दों को उठाते हैं। लेकिन व्यापक परिदृश्य में आर्थिक दबाव, राजनीतिक ध्रुवीकरण, कॉर्पोरेट स्वामित्व और विज्ञापन निर्भरता ने मीडिया की स्वतंत्रता को चुनौतीपूर्ण बना दिया है। ऐसे माहौल में सरकार की आलोचना करने वाले प्रायोजित इम्पैक्ट फीचर प्रकाशित करना कई संस्थानों के लिए जोखिम भरा निर्णय हो सकता है।

फिर भी लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि मीडिया सत्ता और विपक्ष दोनों से समान दूरी बनाए रखे। यदि अखबार सरकार की उपलब्धियों के लिए इम्पैक्ट फीचर प्रकाशित करते हैं, तो उन्हें वैधानिक, तथ्यपरक और जिम्मेदार आलोचनात्मक दृष्टिकोणों के लिए भी स्थान देने का साहस दिखाना चाहिए। आखिर लोकतंत्र में सबसे बड़ा इम्पैक्ट किसी विज्ञापन का नहीं, बल्कि निर्भीक और संतुलित अभिव्यक्ति का होता है।

निष्कर्षतः, इम्पैक्ट फीचर केवल प्रशस्ति-पत्र नहीं बनने चाहिए। वे लोकतांत्रिक बहस का मंच भी बन सकते हैं, बशर्ते मीडिया संस्थान आर्थिक हितों से ऊपर उठकर अभिव्यक्ति की बहुलता और जनहित के सिद्धांत को महत्व दें। प्रश्न यह नहीं है कि विपक्ष ऐसा फीचर प्रकाशित करा सकता है या नहीं; वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या मीडिया लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में सभी पक्षों को समान अवसर देने का साहस दिखा पाएगा।


ब्रजेश कानूनगो 


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