Friday, 19 June 2026

पैदल चलने का अधिकार : क्या हमारे शहर कभी पैदल यात्रियों के भी होंगे?

पैदल चलने का अधिकार : क्या हमारे शहर कभी पैदल यात्रियों के भी होंगे?

किसी भी सभ्य समाज की पहचान केवल उसकी चौड़ी सड़कों, फ्लाईओवरों और तेज रफ्तार वाहनों से नहीं होती, बल्कि इस बात से भी होती है कि वहां एक सामान्य नागरिक कितनी सुरक्षित और सम्मानजनक ढंग से पैदल चल सकता है। भारत में वर्षों से विकास का अर्थ मोटर वाहनों के लिए अधिक से अधिक जगह बनाना माना गया है, जबकि पैदल चलने वाले नागरिकों को अक्सर योजना निर्माण के केंद्र से बाहर रखा गया है। ऐसे समय में सर्वोच्च न्यायालय का यह कहना कि पैदल चलना नागरिक का मौलिक अधिकार है और हर सड़क के साथ सुरक्षित फुटपाथ होना चाहिए, एक ऐतिहासिक और दूरगामी महत्व का निर्णय है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सुरक्षित फुटपाथ पर चलने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(1)(d) में निहित आवागमन की स्वतंत्रता तथा अनुच्छेद 21 में वर्णित जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से जुड़ा हुआ है। न्यायालय ने यह भी कहा कि पैदल यात्रियों का अधिकार मोटर वाहनों की सुविधा से कम महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि कई परिस्थितियों में उसे प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

यह दृष्टिकोण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में लाखों लोग प्रतिदिन पैदल चलकर विद्यालय, बाजार, कार्यालय, बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन तक पहुंचते हैं। गरीब, बुजुर्ग, दिव्यांग, महिलाएं और बच्चे सबसे अधिक पैदल यात्री होते हैं, लेकिन शहरी योजनाओं में उनकी आवश्यकताएं अक्सर उपेक्षित रह जाती हैं।

देश के अधिकांश शहरों में फुटपाथ या तो हैं ही नहीं, और यदि हैं तो वे अधूरे, टूटे-फूटे अथवा अतिक्रमण से घिरे हुए मिलते हैं। कहीं उन पर दुकानों का कब्जा है, कहीं वाहन पार्क किए जाते हैं, तो कहीं बिजली के ट्रांसफार्मर, पोल या अन्य निर्माण सामग्री रख दी जाती है। परिणामस्वरूप पैदल यात्रियों को सड़क पर उतरना पड़ता है और दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है। विभिन्न न्यायिक टिप्पणियों में भी कहा गया है कि फुटपाथों का अतिक्रमण हटाना तथा उन्हें आम नागरिक और  दिव्यांगजन-अनुकूल बनाना प्रशासन की जिम्मेदारी है।

वास्तव में भारत में सड़क दुर्घटनाओं में पैदल यात्रियों की हिस्सेदारी चिंताजनक है। अनेक नगरों में सड़कें वाहन-केंद्रित बनती गईं, जबकि पैदल चलने वालों के लिए सुरक्षित स्थान सिकुड़ता गया। सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों को बार-बार इस विषय में हस्तक्षेप करना पड़ा है।

दुनिया के अन्य देशों की बात करें तो नीदरलैंड में सड़क डिजाइन का मूल सिद्धांत है कि सबसे पहले पैदल यात्री, फिर साइकिल चालक और उसके बाद मोटर वाहन। शहरों में चौड़े, निरंतर और बाधारहित फुटपाथ अनिवार्य माने जाते हैं। स्कूलों और आवासीय क्षेत्रों में वाहनों की गति सीमित रखी जाती है। जापान में पैदल यात्रियों की सुरक्षा को अत्यधिक महत्व दिया जाता है। रेलवे स्टेशनों, बाजारों और आवासीय क्षेत्रों में पैदल मार्गों का सुव्यवस्थित नेटवर्क है। अतिक्रमण के प्रति प्रशासन लगभग शून्य सहनशीलता की नीति अपनाता है।

सिंगापुर ने "वॉकएबल सिटी" की अवधारणा विकसित की है। वहां फुटपाथ केवल सड़क के किनारे की पट्टी नहीं, बल्कि सार्वजनिक परिवहन से जुड़े एकीकृत नेटवर्क का हिस्सा हैं। बुजुर्गों और दिव्यांगजनों की सुविधा के लिए रैंप, टैक्टाइल पथ और सुरक्षित क्रॉसिंग अनिवार्य हैं। ब्रिटेन में स्थानीय निकायों पर यह कानूनी दायित्व है कि वे सार्वजनिक मार्गों को सुरक्षित और सुगम बनाए रखें। फुटपाथों पर अवैध पार्किंग और अवरोधों पर भारी जुर्माना लगाया जाता है। ऑस्ट्रेलिया और कनाडा में सड़क निर्माण परियोजनाओं के अनुमोदन से पहले पैदल यात्री प्रभाव मूल्यांकन (Pedestrian Impact Assessment) किया जाता है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि विकास कार्यों से पैदल चलने वालों की सुविधा प्रभावित न हो।

यदि इन देशों के उदाहरण से सबक लें तो भारत में भी कुछ कदम उठाए जा सकते हैं मसलन फुटपाथ अधिकार कानून बनाया जाए, जिसमें प्रत्येक सड़क पर न्यूनतम चौड़ाई के फुटपाथ का प्रावधान हो। अतिक्रमण और अवैध पार्किंग के विरुद्ध नियमित अभियान चलाए जाएं। दिव्यांगजन-अनुकूल डिजाइन को अनिवार्य बनाया जाए।नई सड़क परियोजनाओं में पैदल यात्री सुरक्षा ऑडिट आवश्यक हो। स्कूलों, अस्पतालों और बाजारों के आसपास पैदल प्राथमिकता क्षेत्र (Pedestrian Priority Zones) विकसित किए जाएं। नगर निगमों की जवाबदेही तय हो कि फुटपाथ टूटने, गायब होने या अतिक्रमित होने पर समयबद्ध कार्रवाई करें। शहरी परिवहन नीति में "कार-केंद्रित" सोच के स्थान पर "मानव-केंद्रित" दृष्टिकोण अपनाया जाए।

वस्तुतः पैदल चलना केवल एक गतिविधि नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक समानता का प्रतीक है। जो व्यक्ति कार नहीं खरीद सकता, वह भी उतना ही सम्मान और सुरक्षा का अधिकारी है जितना किसी महंगी गाड़ी में चलने वाला नागरिक। यदि फुटपाथ सुरक्षित, स्वच्छ और अवरोधमुक्त होंगे तो सड़क दुर्घटनाएं कम होंगी, प्रदूषण घटेगा, स्वास्थ्य सुधरेगा और शहर अधिक मानवीय बनेंगे। शहर केवल वाहनों के लिए नहीं बनाए जाते; वे मनुष्यों के लिए बनाए जाते हैं। जब तक भारत के शहरों में एक बच्चा, एक बुजुर्ग, एक महिला और एक दिव्यांग व्यक्ति निश्चिंत होकर पैदल नहीं चल सकता, तब तक हमारा शहरी विकास अधूरा माना जाएगा।

ब्रजेश कानूनगो


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