Friday, 12 June 2026

वर्दी की आड़ में डकैती: नकली पुलिस का बढ़ता खतरा

 वर्दी की आड़ में डकैती: नकली पुलिस का बढ़ता खतरा

इंदौर के पंढरीनाथ क्षेत्र में गत दिनों रात घिरने के पहले करीब साढ़े आठ बजे ही अपराधियों ने युवक के पास से 30 लाख रुपयों से भरा बैग पुलिस के भेष में सरेराह लूट लिया। इसके पहले भी कई बुजुर्ग महिलाओं को फुसलाकर गहने उतरवाने की घटनाएं भी यहां वहां होती ही रहती हैं।

​आज के दौर में अपराध के तौर-तरीके तेजी से बदल रहे हैं। अब अपराधी केवल हथियारों के बल पर ही नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक दबाव बनाकर भी लोगों को अपना शिकार बना रहे हैं। इनमें से सबसे चिंताजनक और हैरान करने वाला तरीका है—नकली पुलिस बनकर राहगीरों को लूटना। कानून के रखवाले और सुरक्षा के प्रतीक 'वर्दी' का इस्तेमाल जब अपराधी अपनी ढाल के रूप में करने लगें, तो यह न केवल आम जनता की सुरक्षा बल्कि पुलिस प्रशासन की साख पर भी एक बड़ा प्रहार है।

​नकली पुलिस बनकर लूटपाट करने वाले गिरोह आमतौर पर बेहद शातिर और सधे हुए होते हैं। वे अक्सर सुनसान सड़कों, हाईवे या सुबह-शाम टहलने वाले बुजुर्गों और महिलाओं को निशाना बनाते हैं। उनके काम करने का तरीका भी कुछ ऐसा होता है कि सामने वाला व्यक्ति भ्रम में पड़ जाता है। ​चेकिंग के बहाने अपराधी खाकी वर्दी या सादे कपड़ों में कई बार खुद को क्राइम ब्रांच या विशेष अधिकारी बताकर आते हैं और राहगीरों को रोकते हैं। दस्तावेजों की जांच के लिए वाहनों को रोककर लाइसेंस या कागजात मांगने के बहाने डराना और फिर चालान या गिरफ्तारी का खौफ दिखाकर पैसे ऐंठ लेते हैं।

कई बार ​भय का माहौल बनाने के लिए मनोवैज्ञानिक तरीका अपनाते हैं। पीड़ित से कहते हैं कि "आगे मर्डर हुआ है" या "आगे चेकिंग चल रही है, आपके गहने और नकदी सुरक्षित नहीं हैं।" कई उदाहरण हैं ऐसे प्रकरणों के जब  वे पीड़ित को अपने गहने या पैसे उतारकर एक रुमाल या लिफाफे में रखने को कहते हैं। मदद करने के बहाने वे खुद ही सामान पैक करते हैं और पलक झपकते ही उसे नकली सामान या पत्थरों से बदल देते हैं।

​इस तरह के अपराधों के लगातार बढ़ने के पीछे कई सामाजिक और प्रशासनिक कारण होते हैं। भारतीय समाज में पुलिस की वर्दी का एक रसूख है। आम नागरिक अक्सर पुलिस से बहस करने से बचते हैं और उनके आदेशों का बिना सवाल किए पालन करते हैं। अपराधी इसी मानसिक स्थिति का फायदा उठाते हैं। पुलिस की वर्दी, बेल्ट, कैप और यहां तक कि नकली आईडी कार्ड और वॉकी-टॉकी जैसी चीजें भी आसानी से तैयार कर ली जाती हैं। कुछ हूबहू नकली वस्तुएं बाजार में भी उपलब्ध हो जाती हैं। इसके लिए कोई सख्त वेरिफिकेशन सिस्टम न होना अपराधियों का काम आसान कर देता है। अधिकांश लोगों को यह नहीं पता होता कि असली पुलिस अधिकारी के पास क्या अधिकार हैं और वे चेकिंग के दौरान किस प्रक्रिया का पालन करने के लिए बाध्य हैं। अपराधी जानते हैं कि बुजुर्ग या अकेले चल रहे लोग आसानी से डर जाते हैं और शारीरिक रूप से विरोध नहीं कर पाते।

​लूटपाट की इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए समाज और प्रशासन दोनों को मिलकर प्रयास करने होंगे। प्रशासनिक स्तर पर ​वर्दी की बिक्री पर कड़ा नियंत्रण होना जरूरी होगा।पुलिस की वर्दी और लोगो (Logo) बेचने वाली दुकानों का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन होना चाहिए। बिना वैध आईडी कार्ड के किसी को भी वर्दी न बेची जाए। पुलिस गश्त (Patrolling) में तेजी के  लिए पुलिस को अपने-अपने क्षेत्रों में, विशेषकर सुबह और देर शाम के समय गश्त बढ़ानी चाहिए ताकि अपराधी सक्रिय न हो सकें। स्थानीय मुखबीर प्रणाली को बढ़ावा दिया जाना आवश्यक है। हेल्पलाइन नंबरों पर आने वाली ऐसी शिकायतों पर पुलिस को तुरंत एक्शन लेना चाहिए ताकि गिरोह को रंगे हाथों पकड़ा जा सके।

नागरिक को खुद भी अपने को सचेत और सावधान बनाना होगा। यदि रास्ते में कोई खुद को पुलिसकर्मी बताकर रोकता है, तो घबराने के बजाय उनसे पहले आईडी कार्ड (ID Card) की मांग की जाए। हर पुलिसकर्मी का यह कर्तव्य है कि वह मांगने पर अपनी पहचान दिखाए। अगर कोई खुद को 'क्राइम ब्रांच' का बताता है, तो तुरंत उसका आधिकारिक पहचान पत्र मांगें। गहने उतारने की बात पर तुरंत सतर्क हो जाएं  असली पुलिस कभी भी आपको सुरक्षा का हवाला देकर सड़क पर गहने उतारकर रुमाल में रखने को नहीं कहेगी। अगर कोई ऐसा कहता है, तो समझ जाएं कि वे ठग हैं। यदि कोई संदिग्ध व्यक्ति आपको सुनसान जगह पर रोकने का प्रयास करे, तो गाड़ी न रोकें। वाहन को किसी पेट्रोल पंप, मार्केट या भीड़भाड़ वाले इलाके में ले जाकर ही रोकें। संदिग्ध पुलिसकर्मियों की गाड़ी का नंबर, उनका हुलिया और बातचीत के लहजे पर ध्यान दें। असली पुलिसकर्मी आमतौर पर सरकारी या विशेष नंबर प्लेट वाले वाहनों का उपयोग करते हैं। अगर शक हो, तो तुरंत 112 (या स्थानीय पुलिस हेल्पलाइन) पर कॉल करके पूछें कि क्या उस इलाके में कोई आधिकारिक चेकिंग चल रही है। अपने मोबाइल को अपने नियंत्रण और सुरक्षा में मजबूती से रखें। इंदौर की घटना में अपराधियों ने सबसे पहले पीड़ित का मोबाइल फोन बंद कर दिया था।​

​नकली पुलिस बनकर लूटने की घटनाएं केवल एक आर्थिक अपराध नहीं हैं, बल्कि यह आम जनता के मन में कानून व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा करती हैं। सतर्कता ही इसका सबसे बड़ा बचाव है। जब नागरिक अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होंगे और बिना डरे सवाल पूछने की हिम्मत रखेंगे, तो ऐसे अपराधियों के हौसले पस्त होना निश्चित है। 'डरें नहीं, सतर्क रहें'—यही इस अपराध पर लगाम लगाने का सबसे अचूक मंत्र है।


ब्रजेश कानूनगो 


No comments:

Post a Comment