यात्रा डायरी
कनाडा से चिट्ठी : दो
9
करीब करीब...भीगे अल्फाज
मुझे लग रहा है कि कोई न कोई मित्र कह ही देगा कि 'जरा घर भी रह लिया करो यार!' लेकिन अच्छा ही हुआ यह सदवाक्य अभी तक सुनना नहीं पड़ा।
दरअसल, यहां सप्ताह का अधिकांश समय घर में ही गुजरात है हम दोनों का। और यही कारण है कि थोड़ा थोड़ा घूमने के बाद पर्यटन और घर के बाहर देखे नजारों और परिदृश्य पर चिंतन मनन और उसे अभिव्यक्त करने का पर्याप्त समय मिल जाता है।
तो थोड़ी हमारे उस वक्त की बात करते हैं जब सुबह बच्चों के स्कूल और दफ्तरों में चले जाने के बाद हम सार्थक रूप से गुजार रहे हैं।
पिछले कुछ वर्षों में भारत के खबरिया टीवी चैनलों में इतनी रुचि बढ़ गई थी कि बहुत देर से पता चल पाया कि हम अपना तन, मन और विवेक को खोते जा रहे हैं। विशेषकर आम चुनावों के दौरान जो गन्दगी फैलाई जाने लगी और मीडिया आतंक हावी होने लगा तब हमने टीवी देखना लगभग छोड़ ही दिया था। दूरदर्शन के पुराने धारावाहिक 'ये जो है जिंदगी', नुक्कड़,ऑफिस ऑफिस जैसे हास्य व्यंग्य के ख्यात धारावाहिक यू ट्यूब पर देखने लगे थे।
इसी बीच 23 मई को उधर चुनाव परिणाम आना शुरू हुए हम इंदौर से मुम्बई और फिर इधर 26 को कनाडा पहुंच गए। तो किसी प्रकार के राजनैतिक,वैचारिक तनाव से लगभग मुक्ति ही मिल गई।
फ़िल्म देखने सिनेमा हॉल गए तो कोई 20 वर्ष हो गए होंगे हमें। टीवी पर जरूर कुछ फिल्में देखी होंगी। कुछ बेहतरीन कला फिल्में अनुज मित्र बहादुर पटेल और कुछ बेटी एकता के सुझाव पर कम्प्यूटर पर यू ट्यूब से निकालकर अवश्य देखीं हैं। लेकिन बहुत सी चर्चित फिल्में अब यहां नेटफ्लिक्स, यू ट्यूब आदि पर देख रहे हैं दोपहर को।कुछ नए प्रतिभाशाली कलाकारों के चर्चे ही सुने थे। फिल्में देखकर पता चला कि न सिर्फ वे बेहद मेहनती हैं बल्कि यदि बेहतरीन निर्देशक मिलता है तो कुछ अर्थों में हमारे लीजेंड्स से भी आगे निकल जाने की क्षमता उनमें दिखाई देती है।
जोधा अकबर,स्वदेस, स्त्री,पद्मावत,हाई वे, बाजीराव मस्तानी,ठाकरे, गंगा जमुना, बरसात की रात,बरेली की बर्फी,गली बॉय,मानसून डेटिंग, सीक्रेट सुपर स्टार आदि जैसी कुछ देख भी चुके हैं और यहां रहते प्रति सप्ताह तीन,चार तो अवश्य ही देखेंगे। मजा आ रहा है।
न चाहते हुए भी बहुत से समाचार और गतिविधियां सोशल मीडिया पर मिल ही जाती हैं। भारत के समाचार पत्र यहां शाम को ई पेपर खोलकर देखने में आ जाते हैं। दिनचर्या लगभग वैसी ही है जो इंदौर में रहती थी। बस अहिल्या लायब्रेरी की गोष्ठियां नहीं है, तंग बस्ती के बच्चों के शिविर मिस हो रहे हैं।फिर भी अपने आपको भारत और अपने मित्रों से लगातार जोड़े रखने का रचनात्मक प्रयास कर रहा हूँ...देखते हैं कितना हासिल कर पाता हूँ और कितना रचनात्मक दे पाता हूँ....हाँ डायरी के नोट्स के बाद उन्हें संवारने का काम तो जारी रहना ही है। मित्रों की शुभेच्छाएँ और परामर्श सर्वोपरि है....
बहरहाल, आज बहू अभिरुचि ने दो फिल्में सुझाई हैं - 'करीब करीब सिंगल सिंगल' और 'कुछ भीगे अल्फाज'....
करीब करीब...भीगे अल्फाज
मुझे लग रहा है कि कोई न कोई मित्र कह ही देगा कि 'जरा घर भी रह लिया करो यार!' लेकिन अच्छा ही हुआ यह सदवाक्य अभी तक सुनना नहीं पड़ा।
दरअसल, यहां सप्ताह का अधिकांश समय घर में ही गुजरात है हम दोनों का। और यही कारण है कि थोड़ा थोड़ा घूमने के बाद पर्यटन और घर के बाहर देखे नजारों और परिदृश्य पर चिंतन मनन और उसे अभिव्यक्त करने का पर्याप्त समय मिल जाता है।
तो थोड़ी हमारे उस वक्त की बात करते हैं जब सुबह बच्चों के स्कूल और दफ्तरों में चले जाने के बाद हम सार्थक रूप से गुजार रहे हैं।
पिछले कुछ वर्षों में भारत के खबरिया टीवी चैनलों में इतनी रुचि बढ़ गई थी कि बहुत देर से पता चल पाया कि हम अपना तन, मन और विवेक को खोते जा रहे हैं। विशेषकर आम चुनावों के दौरान जो गन्दगी फैलाई जाने लगी और मीडिया आतंक हावी होने लगा तब हमने टीवी देखना लगभग छोड़ ही दिया था। दूरदर्शन के पुराने धारावाहिक 'ये जो है जिंदगी', नुक्कड़,ऑफिस ऑफिस जैसे हास्य व्यंग्य के ख्यात धारावाहिक यू ट्यूब पर देखने लगे थे।
इसी बीच 23 मई को उधर चुनाव परिणाम आना शुरू हुए हम इंदौर से मुम्बई और फिर इधर 26 को कनाडा पहुंच गए। तो किसी प्रकार के राजनैतिक,वैचारिक तनाव से लगभग मुक्ति ही मिल गई।
फ़िल्म देखने सिनेमा हॉल गए तो कोई 20 वर्ष हो गए होंगे हमें। टीवी पर जरूर कुछ फिल्में देखी होंगी। कुछ बेहतरीन कला फिल्में अनुज मित्र बहादुर पटेल और कुछ बेटी एकता के सुझाव पर कम्प्यूटर पर यू ट्यूब से निकालकर अवश्य देखीं हैं। लेकिन बहुत सी चर्चित फिल्में अब यहां नेटफ्लिक्स, यू ट्यूब आदि पर देख रहे हैं दोपहर को।कुछ नए प्रतिभाशाली कलाकारों के चर्चे ही सुने थे। फिल्में देखकर पता चला कि न सिर्फ वे बेहद मेहनती हैं बल्कि यदि बेहतरीन निर्देशक मिलता है तो कुछ अर्थों में हमारे लीजेंड्स से भी आगे निकल जाने की क्षमता उनमें दिखाई देती है।
जोधा अकबर,स्वदेस, स्त्री,पद्मावत,हाई वे, बाजीराव मस्तानी,ठाकरे, गंगा जमुना, बरसात की रात,बरेली की बर्फी,गली बॉय,मानसून डेटिंग, सीक्रेट सुपर स्टार आदि जैसी कुछ देख भी चुके हैं और यहां रहते प्रति सप्ताह तीन,चार तो अवश्य ही देखेंगे। मजा आ रहा है।
न चाहते हुए भी बहुत से समाचार और गतिविधियां सोशल मीडिया पर मिल ही जाती हैं। भारत के समाचार पत्र यहां शाम को ई पेपर खोलकर देखने में आ जाते हैं। दिनचर्या लगभग वैसी ही है जो इंदौर में रहती थी। बस अहिल्या लायब्रेरी की गोष्ठियां नहीं है, तंग बस्ती के बच्चों के शिविर मिस हो रहे हैं।फिर भी अपने आपको भारत और अपने मित्रों से लगातार जोड़े रखने का रचनात्मक प्रयास कर रहा हूँ...देखते हैं कितना हासिल कर पाता हूँ और कितना रचनात्मक दे पाता हूँ....हाँ डायरी के नोट्स के बाद उन्हें संवारने का काम तो जारी रहना ही है। मित्रों की शुभेच्छाएँ और परामर्श सर्वोपरि है....
बहरहाल, आज बहू अभिरुचि ने दो फिल्में सुझाई हैं - 'करीब करीब सिंगल सिंगल' और 'कुछ भीगे अल्फाज'....
10
बेट्टी
का साथ,जिप्सी
की याद
इधर के ज्यादातर घरों में एक न एक पालतू पशु अवश्य देखने को मिलता है। पशु से मेरा तातपर्य कुत्ता,बिल्ली जैसे पेट्स से है।
गायें,भैसें आदि जैसे अन्य दुधारू पशु अलग से बड़े और व्यावसायिक स्तर पर रखे जाते हैं। मुर्गियाँ, पिग्स आदि भी। घोड़ों के कई अस्तबल और प्रशिक्षण केंद्र भी बहुतायत से नजर आ जाते हैं।
सामान्य परिवारों में बिल्लियों, पिल्लों को भी बहुत लाड़ प्यार से घर के किसी सदस्य की तरह ही रखा जाता है। उनका पालन पोषण और देखभाल भी बहुत वैज्ञानिक और पशुपालन के निर्देशों के अनुसार की जाती है। कुछ घरों में तो दो या तीन कुत्ते या बिल्लियाँ तक दिख जाती हैं।
सुबह शाम कई लोग अपने पेट्स का पट्टा थामें विचरण करते नजर आते हैं।हमारे यहां भी बच्चों ने एक डॉगी को यही स्थान दिया हुआ है। जब ये लोग भारत आते हैं उसे केनेल (डॉग बोर्डिंग) में छोड़कर आते हैं। इस बार भी ऐसा ही हुआ था।
लेकिन इसबार लौटने पर 'बेट्टी' को दादा ,दादी भी मिल गए हैं। एकाध दिन हमें सूँघ कर,बदन पर चढ़ चढ़ाकर उसने हमसे अपना रिश्ता बना ही लिया। शुरू शुरू में थोड़ी बहुत परेशानी हुई, लेकिन उसने भी जब हमारे प्रेम की सीमा जान ली तो फिर बच्चों के घर आने पर ही शैतानी करती है। बाकी समय किसी समझदार बच्चे की तरह हमारे आसपास भ्रमण करती है। हमारे आराम करने के समय वह भी नींद निकाल लेती है।थोड़ी देर बेक यार्ड में घूम आती है।
बहरहाल, उसकी उपस्थिति से घर में रौनक रहती है। पोते अक्ष और बेट्टी का आपस में खेलना, लड़ना झगड़ना रोज की बात है। कभी गुस्सा भी आता है लेकिन लाड़ भी कुछ कम नही उमड़ता।
उसके साथ रहकर हमें देवास की अपनी 'जिप्सी' याद आती है। अग्रज (बेटे) और बेटी दादा जी ने प्रोमिस किया था कि जब वे अपने घर में रहने जाएंगे तब कुत्ता पालने की अनुमति देंगे। और जब 'बसंत बसेरा' हमारा(पापा) का मकान किरायेदार के कब्जे से 40 साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद मुक्त हुआ तब बेटे को दो माह की 'जिप्सी' मिल गई थी। तरह साल बाद जिप्सी के न रहने पर मैने एक कविता लिखी थी,जिसे अग्रज को टोरंटों में फोन पर सुनाते हुए मेरा गला भर आया था। अग्रज भी कुछ जवाब नहीं दे सका।
इधर कनाडा में फिर दो साल पहले 10 जून को 'बेट्टी' आई।जो बहुत कुछ 'जिप्सी' की तरह ही दिखती है। मेरे मुंह से उसके लिए बेट्टी की बजाय संबोधन ' जिप्सी' ही निकलता है।
अभी उसके बाल बहुत बढ़ गए हैं पिछले तीन चार महीनों में। डॉग ग्रूमर (पेट्स पार्लर) में अपॉइंट ले लिया है एक सप्ताह बाद हेयर ड्रेसर उसके बदन के बाल हल्के करके संवार देगा।
पेट्स से प्रेम बहुत आनन्द देता है लेकिन उनसे बिछोह भी बहुत रुलाता है। पशुप्रेमी इस वेदना को बहुत अच्छी तरह जानते हैं।
भारत लौटने पर याद तो 'बेट्टी' की भी बहुत आएगी।
11
घर में जलपरियां
कल मैंने पेट्स की बातें की थीं। आज घर में ही मन मुग्ध करने वाली खूबसूरत जलपरियों के बहाने थोड़ा बाजार भी हो आते हैं।
पढ़ा था कि घर में लाफिंग बुद्धा की प्रतिमा या सफेद कबूतरों की जोड़ी का शो पीस सजाने से अथवा घर मे छोटा सा मछली घर रखने से सुख समृद्धि के रास्ते खुल जाते हैं।
कनाडा के हमारे घर के ड्राइंग रूम में एक छोटा सा खूबसूरत फिश एक्वेरियम सजा है, सुख समृद्धि का वह कितना साधन बना होगा यह तो पता नहीं लेकिन अग्रज को बचपन से ही मछलियों से लगाव रहा है। भारत में जब वह था तब भी दिल्ली और चैनई में भी हमेशा फिश पॉट सजे रहते थे। यहां थोड़ा बड़ा और चौकोर एक्वेरियम है। जिनमें कुछ छोटी बड़ी रंगबिरंगी मछलियां विचरती रहती हैं।
बच्चों के लगभग एक माह भारत प्रवास के बाद लौटने पर एक्वेरियम का पानी थोड़ा कम हो गया था। मछलियां भी उदास और कुछ निढाल सी नजर आईं। पहली फुरसत में बेटे अग्रज ने एक्वेरियम की साफ सफाई आदि की। दाना पानी और एयर प्रेशर आदि संयोजित किया।
एक शाम मछलियों के कुछ और साथियों को लाने के लिए हम सबलोग मार्केट के लिए निकले। इस बहाने हमें बहुत व्यवस्थित और बड़ा एक्वेरियम माल और सुंदर मछलियों के स्टोर का आनन्द लेने का अवसर मिला। यहां मछलीघर में प्रयुक्त होने वाली सभी सामग्री मिलती थी।
कोई 500 से ऊपर विभिन्न प्रजातियों की खूबसूरत मछलियां इतने ही छोटे छोटे एक्वेरियम्स में सजीव पेंटिंग्स की तरह कम रोशनी के हॉल में अद्भुत आभा बिखर रही थीं। दाम और प्रति मछली या मछलियों के समूह की कीमत भी चस्पा थीं।इन्ही में देखकर ग्राहक मनपसंद मछली चुनकर दी गई शीट पर पर नोट करते जा रहे थे।
अक्ष और अग्रज ने पूरे एक घंटे में घर ले जाने के लिए आखिरकार कुछ मछलियां चुन ही लीं। इस बीच हमे यह देखकर बड़ा ही अचम्भा हुआ कि यहां केवल फिश ही नहीं विभिन्न नस्लों के सुंदर सांप,छिपकलियां, केकड़े,मगरमच्छ और अब तक अनदेखे कुछ ऐसे प्राणी भी संग्रहित थे जिनको देखने में ही हमें डर लगता है,सिहरन दौड़ जाती है उन्हें कुछ लोग घर ले जाकर एक्वेरियम में सजा लेते हैं।
बहरहाल, कुछ रंगीन छोटी नई मछलियां थोड़े से जतन के बाद हमारे ड्राइंगरूम के एक्वेरियम का हिस्सा बन गईं। एकाध दिन नए पानी और नए साथियों के साथ सामंजस्य बनाने में थोड़ी दिक्कत आई लेकिन आज वे भी छोटे से संसार में अठखेलियाँ करती हमारा मन मोह रहीं हैं।
सच तो एक्वेरियम की इन खूबसूरत रंगीन मछलियों में से अधिकांश प्रजातियां साउथ एशिया से आयात होकर इधर आती हैं। क्या पता इनमें से कोई उधर उदयपुर या भोपाल की किसी झील के पानी को छोड़कर यहां आई हों....!
इधर के ज्यादातर घरों में एक न एक पालतू पशु अवश्य देखने को मिलता है। पशु से मेरा तातपर्य कुत्ता,बिल्ली जैसे पेट्स से है।
गायें,भैसें आदि जैसे अन्य दुधारू पशु अलग से बड़े और व्यावसायिक स्तर पर रखे जाते हैं। मुर्गियाँ, पिग्स आदि भी। घोड़ों के कई अस्तबल और प्रशिक्षण केंद्र भी बहुतायत से नजर आ जाते हैं।
सामान्य परिवारों में बिल्लियों, पिल्लों को भी बहुत लाड़ प्यार से घर के किसी सदस्य की तरह ही रखा जाता है। उनका पालन पोषण और देखभाल भी बहुत वैज्ञानिक और पशुपालन के निर्देशों के अनुसार की जाती है। कुछ घरों में तो दो या तीन कुत्ते या बिल्लियाँ तक दिख जाती हैं।
सुबह शाम कई लोग अपने पेट्स का पट्टा थामें विचरण करते नजर आते हैं।हमारे यहां भी बच्चों ने एक डॉगी को यही स्थान दिया हुआ है। जब ये लोग भारत आते हैं उसे केनेल (डॉग बोर्डिंग) में छोड़कर आते हैं। इस बार भी ऐसा ही हुआ था।
लेकिन इसबार लौटने पर 'बेट्टी' को दादा ,दादी भी मिल गए हैं। एकाध दिन हमें सूँघ कर,बदन पर चढ़ चढ़ाकर उसने हमसे अपना रिश्ता बना ही लिया। शुरू शुरू में थोड़ी बहुत परेशानी हुई, लेकिन उसने भी जब हमारे प्रेम की सीमा जान ली तो फिर बच्चों के घर आने पर ही शैतानी करती है। बाकी समय किसी समझदार बच्चे की तरह हमारे आसपास भ्रमण करती है। हमारे आराम करने के समय वह भी नींद निकाल लेती है।थोड़ी देर बेक यार्ड में घूम आती है।
बहरहाल, उसकी उपस्थिति से घर में रौनक रहती है। पोते अक्ष और बेट्टी का आपस में खेलना, लड़ना झगड़ना रोज की बात है। कभी गुस्सा भी आता है लेकिन लाड़ भी कुछ कम नही उमड़ता।
उसके साथ रहकर हमें देवास की अपनी 'जिप्सी' याद आती है। अग्रज (बेटे) और बेटी दादा जी ने प्रोमिस किया था कि जब वे अपने घर में रहने जाएंगे तब कुत्ता पालने की अनुमति देंगे। और जब 'बसंत बसेरा' हमारा(पापा) का मकान किरायेदार के कब्जे से 40 साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद मुक्त हुआ तब बेटे को दो माह की 'जिप्सी' मिल गई थी। तरह साल बाद जिप्सी के न रहने पर मैने एक कविता लिखी थी,जिसे अग्रज को टोरंटों में फोन पर सुनाते हुए मेरा गला भर आया था। अग्रज भी कुछ जवाब नहीं दे सका।
इधर कनाडा में फिर दो साल पहले 10 जून को 'बेट्टी' आई।जो बहुत कुछ 'जिप्सी' की तरह ही दिखती है। मेरे मुंह से उसके लिए बेट्टी की बजाय संबोधन ' जिप्सी' ही निकलता है।
अभी उसके बाल बहुत बढ़ गए हैं पिछले तीन चार महीनों में। डॉग ग्रूमर (पेट्स पार्लर) में अपॉइंट ले लिया है एक सप्ताह बाद हेयर ड्रेसर उसके बदन के बाल हल्के करके संवार देगा।
पेट्स से प्रेम बहुत आनन्द देता है लेकिन उनसे बिछोह भी बहुत रुलाता है। पशुप्रेमी इस वेदना को बहुत अच्छी तरह जानते हैं।
भारत लौटने पर याद तो 'बेट्टी' की भी बहुत आएगी।
11
घर में जलपरियां
कल मैंने पेट्स की बातें की थीं। आज घर में ही मन मुग्ध करने वाली खूबसूरत जलपरियों के बहाने थोड़ा बाजार भी हो आते हैं।
पढ़ा था कि घर में लाफिंग बुद्धा की प्रतिमा या सफेद कबूतरों की जोड़ी का शो पीस सजाने से अथवा घर मे छोटा सा मछली घर रखने से सुख समृद्धि के रास्ते खुल जाते हैं।
कनाडा के हमारे घर के ड्राइंग रूम में एक छोटा सा खूबसूरत फिश एक्वेरियम सजा है, सुख समृद्धि का वह कितना साधन बना होगा यह तो पता नहीं लेकिन अग्रज को बचपन से ही मछलियों से लगाव रहा है। भारत में जब वह था तब भी दिल्ली और चैनई में भी हमेशा फिश पॉट सजे रहते थे। यहां थोड़ा बड़ा और चौकोर एक्वेरियम है। जिनमें कुछ छोटी बड़ी रंगबिरंगी मछलियां विचरती रहती हैं।
बच्चों के लगभग एक माह भारत प्रवास के बाद लौटने पर एक्वेरियम का पानी थोड़ा कम हो गया था। मछलियां भी उदास और कुछ निढाल सी नजर आईं। पहली फुरसत में बेटे अग्रज ने एक्वेरियम की साफ सफाई आदि की। दाना पानी और एयर प्रेशर आदि संयोजित किया।
एक शाम मछलियों के कुछ और साथियों को लाने के लिए हम सबलोग मार्केट के लिए निकले। इस बहाने हमें बहुत व्यवस्थित और बड़ा एक्वेरियम माल और सुंदर मछलियों के स्टोर का आनन्द लेने का अवसर मिला। यहां मछलीघर में प्रयुक्त होने वाली सभी सामग्री मिलती थी।
कोई 500 से ऊपर विभिन्न प्रजातियों की खूबसूरत मछलियां इतने ही छोटे छोटे एक्वेरियम्स में सजीव पेंटिंग्स की तरह कम रोशनी के हॉल में अद्भुत आभा बिखर रही थीं। दाम और प्रति मछली या मछलियों के समूह की कीमत भी चस्पा थीं।इन्ही में देखकर ग्राहक मनपसंद मछली चुनकर दी गई शीट पर पर नोट करते जा रहे थे।
अक्ष और अग्रज ने पूरे एक घंटे में घर ले जाने के लिए आखिरकार कुछ मछलियां चुन ही लीं। इस बीच हमे यह देखकर बड़ा ही अचम्भा हुआ कि यहां केवल फिश ही नहीं विभिन्न नस्लों के सुंदर सांप,छिपकलियां, केकड़े,मगरमच्छ और अब तक अनदेखे कुछ ऐसे प्राणी भी संग्रहित थे जिनको देखने में ही हमें डर लगता है,सिहरन दौड़ जाती है उन्हें कुछ लोग घर ले जाकर एक्वेरियम में सजा लेते हैं।
बहरहाल, कुछ रंगीन छोटी नई मछलियां थोड़े से जतन के बाद हमारे ड्राइंगरूम के एक्वेरियम का हिस्सा बन गईं। एकाध दिन नए पानी और नए साथियों के साथ सामंजस्य बनाने में थोड़ी दिक्कत आई लेकिन आज वे भी छोटे से संसार में अठखेलियाँ करती हमारा मन मोह रहीं हैं।
सच तो एक्वेरियम की इन खूबसूरत रंगीन मछलियों में से अधिकांश प्रजातियां साउथ एशिया से आयात होकर इधर आती हैं। क्या पता इनमें से कोई उधर उदयपुर या भोपाल की किसी झील के पानी को छोड़कर यहां आई हों....!
12
कनाडा
की पब्लिक लायब्रेरी में विष्णु नागर
कनाडा के न्यूमार्केट शहर की सरकारी पब्लिक लायब्रेरी में कल प्रिय कवि ,व्यंग्यकार और पत्रकार श्री विष्णु नागर जी से मुलाकात हो जाना मन को बहुत प्रफुल्लित कर गया।
कनाडा के न्यूमार्केट शहर की सरकारी पब्लिक लायब्रेरी में कल प्रिय कवि ,व्यंग्यकार और पत्रकार श्री विष्णु नागर जी से मुलाकात हो जाना मन को बहुत प्रफुल्लित कर गया।
दरअसल, पोते अक्ष को लायब्रेरी से ईमेल
संदेश आया कि उसके द्वारा चाही गई पुस्तकें वहां आ चुकी हैं। ईशू करवा लें। अक्ष
और उसके पेरेंट्स के निशुल्क रजिस्ट्रेशन वहां किये हुए हैं। अग्रज को भी अपने
कार्ड का नवीनीकरण करवाना था।
न्यूमार्केट के पुरानी
खूबसूरत ' हेरिटेज
स्ट्रीट' से होते हुए कोई पन्द्रह मिनट की ड्राइव के बाद हम
सब इस सरकारी पब्लिक लायब्रेरी में पहुंच गए। बहुत विशाल पुस्तकालय है यह। बहुत
व्यवस्थित और कम्प्यूटराइज्ड। विविध विषयों मसलन बागवानी,इतिहास
से लेकर ज्ञान विज्ञान,कौशल,साहित्य
आदि सभी पर विभिन्न भाषाओं में लाखों पुस्तकें तीन मंजिलों में फैली इस लायब्रेरी
में संग्रहित हैं। एक पूरा फ्लोर तो मात्र किड्स और टीन्स के लिए ही बना है। जहां
हमे अनेक बच्चे पढ़ते, कम्प्यूटरों पर रचनात्मक कार्य करते,पुस्तकें छांटते, ईशू कराते नजर आए। स्वयं ही ईशू
कराई पुस्तकों को मशीन पर सकेन करके दर्ज करना होता है। अपने कार्ड से लॉगिन और
चेक आउट करके पूरी प्रक्रिया सम्पन्न हो जाती है।
अक्ष ने दो बड़े झोलों भर पुस्तकें कोई आधा,पौन घण्टों में चयन की। कुछ की पहले से ऑनलाइन डिमांड की हुईं थीं। इस बीच अग्रज ने भी अपने कार्ड का नवीनीकरण कराया। मुझसे पूछा भी कि मुझे कुछ लेना हो तो ईशू करा लेते हैं। मगर मैं इन दिनों अधिक पढनें में नही व्यस्त होना चाहता। बस खूब देखना,समझना और एन्जॉय के मूड में हूँ। इसलिए मैंने लायब्रेरी से पुस्तकें अभी ईशू नहीं करवाईं। अगले चक्कर में शायद कुछ ले भी लूँ।
विविध भाषाओं के लिए बने हिस्से में मुझे भारतीय भाषाओं की पुस्तकें देखने का बड़ा मन था। बेटे ने वहां लगे कम्प्यूटर भी सर्च किया।
आखिर हम लोग विभिन्न भाषाओं वाले एडल्ट खण्ड में भी पहुंच गए। बच्चों के खंड को पहले देख चुके थे। बच्चों के लिए अनेक पुस्तकें वहां उपलब्ध थीं। ज्यादातर कॉमिक्स और कुछ कहानियों वाली।
बड़ों के लिए यहां गुजराती सहित अन्य भारतीय भाषाओं की पुस्तकें दिखाई दीं। हिंदी खण्ड में भी अनेक जाने पहचाने नाम और कितस्बें सजी थीं। कुछ को उलट पुलट कर देखा।
इसी शेल्फ पर आदरणीय विष्णु नागर जी की गद्य संग्रह की पुस्तक दिख गई नाम इस वक्त जुबान पर आ नहीं रहा। शायद किताबघर या राधाकृष्ण प्रकाशन की रही होगी। उन्ही के पास हमारे इंदौर के स्व सनत कुमार जी की पुस्तक दिख गई। वह शायद ज्ञानपीठ से आई थी। प्रकाशन यही तीन याद रहे। लेकिन विष्णु जी और सनत जी को वहां पाकर मन अतिरिक्त खुशी से भर उठा।
हमने भी वहाँ अपनी पुस्तिकाएं 'चिड़िया का सितार' और ' फूल शुभकामनाओं के ' प्रबंधक को भेंट कीं।
यह संयोग है कि आज आदरणीय विष्णु नागर जी का जन्म दिन भी है। उनकी पुस्तकों को पढ़ते हुए एक कविता हमने लिखी थी जो ज्ञानोदय में प्रकाशित हुई थी,आज पुनः पढ़ लीजिये....
कविता
किताब की आखिरी पंक्ति तक
ब्रजेश कानूनगो
पुस्तक मेले मे
दिख गए गौरीनाथ के पास बैठे विष्णु नागर
साथ आने को कहा तो स्टाल से उतर कर
तुरंत चले आए मेरे साथ
गौरीनाथ घिरे रहे
पुस्तक प्रेमियों की भीड़ से
साथ आने का कहने में संकोच नहीं हुआ मुझे
रोक नहीं रही थी कोई दिव्यता
बल्कि लगता था कह रहे हों-ले चलो मुझे बाहर
मालवा की हवा में सांस लेना चाहता हूँ थोड़ी देर
वे मेरे साथ हो लिए
बहुत सरल और इतने सहज कि
जब मैंने बताया कल लीलाधर मंडलोई भी आए थे मेरे साथ
तो वे खुश हुए
यह जानकर तो और भी कि
चंद्रकांत देवताले, असगर वजाहत और मंगलेश डबराल के आने के पहले
निराला और मुक्तिबोध भी पिताजी के साथ इसी तरह आ चुके हैं
उनके चश्में से स्नेह और संतोष बरसता नजर आया
मेरे कंधे पर प्रेम से हाथ रख दिया विष्णु नागर ने
शायद स्वभाव नहीं था उनका
फिर भी बताते रहे कि किस तरह जीवन भी कविता हो जाता है
घर पहुँच कर सुनाने लगे घर के बाहर का हाल
बहुत दुखी थे अपने रिश्तेदारों के बारे में बताते हुए
मुम्बई के बम विस्फोट का क़िस्सा सुनाते हुए भीग गईं उनकी आँखें
आश्चर्य तो तब हुआ जब हिटलर के नाम पर उन्हें गुस्सा आया
पर आँगन में लगे पेड़ पर चिड़िया को देखकर खिल पड़े विष्णु नागर
बाल-बच्चों की खबर लेने-देने का हुआ जरूरी काम
साथ बैठकर खाए हमने दाल बाफले, चौराहे तक गए पान चबाने
प्रेम के बारे में टुकड़ों–टुकड़ों में करते रहे बात
इस तरह बने रहे विष्णु नागर मेरे साथ किताब की आखिरी पंक्ति तक
अक्ष ने दो बड़े झोलों भर पुस्तकें कोई आधा,पौन घण्टों में चयन की। कुछ की पहले से ऑनलाइन डिमांड की हुईं थीं। इस बीच अग्रज ने भी अपने कार्ड का नवीनीकरण कराया। मुझसे पूछा भी कि मुझे कुछ लेना हो तो ईशू करा लेते हैं। मगर मैं इन दिनों अधिक पढनें में नही व्यस्त होना चाहता। बस खूब देखना,समझना और एन्जॉय के मूड में हूँ। इसलिए मैंने लायब्रेरी से पुस्तकें अभी ईशू नहीं करवाईं। अगले चक्कर में शायद कुछ ले भी लूँ।
विविध भाषाओं के लिए बने हिस्से में मुझे भारतीय भाषाओं की पुस्तकें देखने का बड़ा मन था। बेटे ने वहां लगे कम्प्यूटर भी सर्च किया।
आखिर हम लोग विभिन्न भाषाओं वाले एडल्ट खण्ड में भी पहुंच गए। बच्चों के खंड को पहले देख चुके थे। बच्चों के लिए अनेक पुस्तकें वहां उपलब्ध थीं। ज्यादातर कॉमिक्स और कुछ कहानियों वाली।
बड़ों के लिए यहां गुजराती सहित अन्य भारतीय भाषाओं की पुस्तकें दिखाई दीं। हिंदी खण्ड में भी अनेक जाने पहचाने नाम और कितस्बें सजी थीं। कुछ को उलट पुलट कर देखा।
इसी शेल्फ पर आदरणीय विष्णु नागर जी की गद्य संग्रह की पुस्तक दिख गई नाम इस वक्त जुबान पर आ नहीं रहा। शायद किताबघर या राधाकृष्ण प्रकाशन की रही होगी। उन्ही के पास हमारे इंदौर के स्व सनत कुमार जी की पुस्तक दिख गई। वह शायद ज्ञानपीठ से आई थी। प्रकाशन यही तीन याद रहे। लेकिन विष्णु जी और सनत जी को वहां पाकर मन अतिरिक्त खुशी से भर उठा।
हमने भी वहाँ अपनी पुस्तिकाएं 'चिड़िया का सितार' और ' फूल शुभकामनाओं के ' प्रबंधक को भेंट कीं।
यह संयोग है कि आज आदरणीय विष्णु नागर जी का जन्म दिन भी है। उनकी पुस्तकों को पढ़ते हुए एक कविता हमने लिखी थी जो ज्ञानोदय में प्रकाशित हुई थी,आज पुनः पढ़ लीजिये....
कविता
किताब की आखिरी पंक्ति तक
ब्रजेश कानूनगो
पुस्तक मेले मे
दिख गए गौरीनाथ के पास बैठे विष्णु नागर
साथ आने को कहा तो स्टाल से उतर कर
तुरंत चले आए मेरे साथ
गौरीनाथ घिरे रहे
पुस्तक प्रेमियों की भीड़ से
साथ आने का कहने में संकोच नहीं हुआ मुझे
रोक नहीं रही थी कोई दिव्यता
बल्कि लगता था कह रहे हों-ले चलो मुझे बाहर
मालवा की हवा में सांस लेना चाहता हूँ थोड़ी देर
वे मेरे साथ हो लिए
बहुत सरल और इतने सहज कि
जब मैंने बताया कल लीलाधर मंडलोई भी आए थे मेरे साथ
तो वे खुश हुए
यह जानकर तो और भी कि
चंद्रकांत देवताले, असगर वजाहत और मंगलेश डबराल के आने के पहले
निराला और मुक्तिबोध भी पिताजी के साथ इसी तरह आ चुके हैं
उनके चश्में से स्नेह और संतोष बरसता नजर आया
मेरे कंधे पर प्रेम से हाथ रख दिया विष्णु नागर ने
शायद स्वभाव नहीं था उनका
फिर भी बताते रहे कि किस तरह जीवन भी कविता हो जाता है
घर पहुँच कर सुनाने लगे घर के बाहर का हाल
बहुत दुखी थे अपने रिश्तेदारों के बारे में बताते हुए
मुम्बई के बम विस्फोट का क़िस्सा सुनाते हुए भीग गईं उनकी आँखें
आश्चर्य तो तब हुआ जब हिटलर के नाम पर उन्हें गुस्सा आया
पर आँगन में लगे पेड़ पर चिड़िया को देखकर खिल पड़े विष्णु नागर
बाल-बच्चों की खबर लेने-देने का हुआ जरूरी काम
साथ बैठकर खाए हमने दाल बाफले, चौराहे तक गए पान चबाने
प्रेम के बारे में टुकड़ों–टुकड़ों में करते रहे बात
इस तरह बने रहे विष्णु नागर मेरे साथ किताब की आखिरी पंक्ति तक
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बाजार में जायका
आबादी की तुलना में उपलब्ध
जमीन का अनुपात कनाडा में अधिक दिखाई देता है। यही कारण है कि यहां के बाजार
बहुमंजिला होने के बजाय भूतल पर ही फैले दिखाई दिए। एक एक स्टोर की लंबाई चौड़ाई
इतनी अधिक कि उनमें हमारी चालीस पैतालीस रो हाउसेस वाली कॉलोनी निकल आये।
लगभग हर सप्ताह ही दूध,दही,ब्रेड,अंडा,सब्जियां आदि के लिए न्यूमार्केट शहर के बड़े
बड़े स्टोरों में जाने का मौका मिलता रहा। वालमार्ट,नोफ्रिल,
कॉस्टको आदि जैसे बड़े शॉपिंग मॉल्स बड़े भूतल पर फैले दिखाई दिए।
विविध सामग्री के लिए कई पंक्तियों में खुले शोकेस इस तरह सजे हुए कि पहली पंक्ति
से आखिरी तक जाते हुए बिना सामान लिए भी 30 मिनट से कम समय न
लगे।
पेट्स और मछलियों आदि तथा
उनसे संबंधित सामग्री के लिए भी स्टोर्स भी लगभग हमारे परिवार की जरूरतों के उपयोग
की वस्तुओं की तरह ही जरूरी होते हैं यहां। आखिर पेट्स भी तो यहां के परिवारों का
एक सदस्य होता है।
जितने भूखण्ड में बाजार बने
हैं उससे कोई दो तीन गुना तक विशाल गाड़ियों
के लिए व्यवस्थित पार्किंग उपलब्ध है।
सप्ताह भर की खरीद के लिए
हमें एक डेढ़ घण्टे से कम का समय कभी नहीं लगा। दूध एक साथ खरीदकर बिना गर्म किये
थैलियां फ्रीज में रखना थोड़ा अटपटा जरूर लगा। लेकिन कभी खराब होने,फट जाने या गुलाबी हो जाने की शिकायत
नही हुई। हमेशा ताजा। रेडी टू ईट सामग्री अब भारत में भी चलन में आ गई है लेकिन
वहां भोजन बनाने के लिए घर पर सेविकाएं आसानी से मिल जाती
हैं। फ्रोजन फ़ूड का चलन इधर कुछ अधिक दिखा। उधर टीवी
पर 'मिराज पराठे' का विज्ञापन देखकर
हंसी आती थी कि कुछ लोग बासी क्यों खाते हैं। लेकिन यहां के सादे,मैथी,प्याज,चीज के फ्रोजन
पराठों का जायका लिया तो सचमुच मजा आया। तवे पर रखो और गर्म करके तुरन्त तैयार। उन
लोगों को जिनका अधिकतम समय नौकरी में गुजरता हो और आने जाने में हुई भारी
थकान के बाद एक दो पराठें बड़ी राहत दे देते हैं। इसके अलावा चटनियाँ,इडली का बेटर और वे सभी खाद्य सामग्री यहां मिल जाती हैं जो हम अब भारत
में भी डिब्बाबन्द के रूप में अपना चुके हैं। बहुत सी सामग्री भारत,पाकिस्तान, चीन,बांग्लादेश
साउथ एशियन देशों से ही आती हैं लेकिन गुणवत्ता में हमने उन्हें भारत में उपलब्ध
उसी ब्रांड की सामग्री से बेहतर पाया। हल्दीराम, मदर्स डेरी
सहित और भी जाने पहचाने ब्रांड्स देखने को मिले।यूएसए की 'दीप'
ब्रांड के खाद्य पदार्थ भी यहां बहुत पसंद किए जाते हैं। स्थानीय
गुणवत्तापूर्ण और बढ़िया ड्राय फ्रूट्स और फल और सब्जियां पूरी दुनिया से आयात होकर
यहां मिल जाते हैं।
इससे भी ज्यादा भारतीय
सामग्री की दरकार हो तो 'इंडियन
बाजार' उन कई स्थलों पर मौजूद हैं जहां साउथ एशियन मूल या
अप्रवासी भारतीयों की बसाहट है। ऐसे ही टोरंटों के एक स्टोर से हमने रोटी बेलने का
नया चकला, झंडू बाम,दालें मसाले,अचार, पापड़ और रतलामी नमकीन
और बीकानेरी भुजिया के अलावा भुनी हुई मूंगफलियां,सेवइयां,चिक्की आदि खरीदीं।
इसी इंडिया बाजार से लगे
हुए स्टोर में कव्वालियां बज रहीं थीं। होम्योपैथ की दुकान भी नजर आई।
भोजन का समय हुआ तो 'ब्रार रेस्टोरेंट' का रुख किया। पंजाबी छोले भटूरे से लेकर उत्तर भारतीय थाली और साउथ इंडियन
व्यंजन सभी कुछ उपलब्ध। मिठाइयां भी। हिंदी,पंजाबी,उर्दू भाषी लोगों का जमावड़ा। लोग परिवार सहित भारतीय भोजन का आनन्द उठा
रहे थे। कुछ यूरोपीय और कैनेडियन भी लुत्फ उठाते दिखे। कुछ पैक कराकर ले गए।
मैंने और बेटे ने छोले
भटूरे और कचोरी खाई। पत्नी ने डोसा, बहू ने भारतीय थाली सबसे शेयर की। बढ़िया था खाना। चोटीवाला या अप्सरा से
कुछ ज्यादा कम नहीं लगा। हाँ, उन्नीस जरूर था। मगर परदेस में
देसी का जायका उसे इक्कीस बना गया। मिल्ककेक हमने पैक करवा ली थी।
भोजन के लिए हम लोग एक दिन 'कोरास ब्रेकफास्ट एन्ड लंच' में भी पाश्चात्य जायके के मोह में गए। दरअसल शाकाहारियों के लिए इस तरह
के रेस्टोरेंट में बहुत कम विकल्प होते हैं। कठिनाइयों के बावजूद हमारा पूरा
परिवार अभी तक अंडे तक सीमित शाकाहारी ही बना हुआ है। कोरास रेस्टोरेंट इस क्षेत्र
का बहुत लोकप्रिय पाश्चात्य रेस्टोरेंट है। खासबात यह है कि ब्रेकफास्ट और लंच का
मेनू एक ही रहता है कार्ड में। सुबह खाओ तो ब्रेकफास्ट दोपहर को लंच। डिनर मिलता
ही नहीं। शाम को 4 बजे रेस्टोरेंट बन्द हो जाता है।
रविवार का दिन होने से हमें
15 मिनट का वेटिंग मिला। इंदौर में भी
'चोटीवाला' के यहां भी अक्सर इंतजार होता रहा
है। बस यहां इंतजार में बैठने को कुर्सियां या सोफा नहीं लगा था। सब कतार में लगे
थे।
यहां हमने 'बनाना मेंगो दही शेक' पिया। खाने में डबल ऑमलेट जिसमें पालक,चीज और अन्य
सब्जियां पड़ी हुईं थीं। ब्रेड,बटर साथ में आलू की फ्रेंच
फ्राइस, खरबूजे और पाइनेपल की फांक और एक स्ट्रॉ बैरी।
यह भोजन भी पर्याप्त और
स्वादिष्ट था। परिवार के साथ बैठने
खाने से स्वाद भी बढ़ गया भोजन का। जरूरी केलोरीज़ का शानदार तालमेल
बैठ गया।
भोजन की बात चली है तो एक
जायके की बात और कर लेते हैं। पोता अक्ष स्वीमिंग के 9 वें स्तर में सफल हुआ तो उसकी दादी
ने पार्टी का प्रस्ताव रख दिया। तय हुआ कि दक्षिण भारतीय दंपत्ति द्वारा यहां चलाये जा रहे रेस्टोरेंट 'गोल्डन
टेस्ट ऑफ साउथ एशिया' में लंच किया जाए।
न्यूमार्केट से कोई 30 km दूर जब हम वहां पहुंचे तो एक
भारतीय परिवार वहां पहले से ही लंच कर रहा था।
रेस्टोरेंट को संचालित कर
रहे पति पत्नी ने बहुत आत्मीयता से हमारा स्वागत किया। बहू बेटे पहले ही वहां के
भोजन का आनन्द उठा चुके थे।
दरअसल रेस्टोरेंट में कोई
अन्य कर्मचारी नहीं था। पति पत्नी ही सब कार्य देखते थे। आर्डर लेना,बनाना,खिलाना,बिल देना,पेमेंट लेना आदि सब कुछ।
जब हमने पूछा की यहां तो
सिर्फ साउथ एशियन या भारतीय लोग ही आते होंगे । तब संचालिका ने बताया कि नहीं
यूरोप और कनाडा,यूएसए के भी
बहुत सारे उनके ग्राहक हैं जो थोड़ा चटपटा पसंद करते हैं। परिवार सहित आते हैं,खाते हैं और पैक कराकर ले जाते हैं। ग्राहकों की कोई समस्या नहीं है।
हमने यहां थाली ऑर्डर की।
बेटे ने उत्तपम और पोते ने चीज सेन्डविच। गोभी,बैगन,दाल, चांवल,रसम,दही,चटनी,रोटी के बाद साबूदाने की खीर। पत्नी ने जीरा युक्त छाछ का अतिरिक्त सेवन
किया। इंदौरी शब्दों में कहें तो पेट ही क्या हम लोगों
की आत्मा तक तृप्त हो गई। भिया क्या केने। मजा आ गिया.....!
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