यात्रा डायरी
कनाडा से चिट्ठी: सात
28
‘स्ट्रीट
डॉग' और
संवेदना
बचपन से लेकर बड़ा होने तक मोहल्लों,गलियों में स्वच्छन्द विचरण करते कुत्तों को ही ‘कुत्ता’ समझता था। लेकिन अब भारत के हमारे अपने इन स्वच्छंद प्राणियों को सम्मान से 'स्ट्रीट डॉग्स' कहना ही ठीक रहेगा।
राह चलते श्वानों से संवाद करने में अक्सर घबराता रहा हूँ। किसी ने हिदायत भी दी थी कि 'स्ट्रीट डॉग' से नजर नहीं मिलाना चाहिए। स्कूटर और कार के पीछे कभी कभी जब ‘गलियों के राजा’ जबड़ा फैलाए लपकते हैं तो जान सूख जाती है।
सर्वपित्री अमावस्या पर एक सर्वे किया था, जिस पर आधारित एक लेख भी लिखा था। उस खास दिन मेरी छत पर कौआ तो एक नहीं आया मगर घर के आसपास एक किलोमीटर दायरे में 50 से अधिक 'स्ट्रीट डॉग्स' और 30 से अधिक गौवंश प्राणियों की स्वतंत्र उपस्थिति दिखाई दी थी। इधर कनाडा में मुझे 'स्ट्रीट डॉग' कहीं दिखाई नहीं दिए अन्य पशुओं का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। हाँ, कोई न कोई 'पेट' अवश्य पाला जाता है।
हमारे आसपास के लगभग
हरेक घर में कोई न कोई कुत्ता
या बिल्ली जैसा पेट देखने को मिल जाता है। बाएं पड़ोसी के यहां दो कुत्ते हैं वहीं
दाहिनी ओर दो गबरू बिल्लियाँ घूमती रहती हैं। हमारे यहाँ मिली जुली नस्ल Cockapoo काकापू की एक दो वर्षीय डॉगी है। बच्चों ने उसका नामकरण ' बेट्टी' किया हुआ है। उन्होंने बताया तो उसकी नस्ल
का पता चला वरना मैं तो उसे पामेरियन ही समझता था।
इस मामले में मेरी समझ
सीमित ही रही है। भारत में किसी मित्र के यहां कुत्तों से मुलाकात होती है तो यातो
वे ‘अल्सेशियन’ होते थे या फिर ‘पामेरियन’। इनके अलावा मेरे लिए सभी कुत्ते ‘स्ट्रीट
डॉग’ या वहीं से बच्चों द्वारा उठाए ‘पिल्ले’ ही बड़े होकर ‘लायन’, ‘टाइगर’ ‘टामी’
आदि बनते रहे हैं।
लेकिन इधर ‘बेट्टी’ नें
मन मोह लिया है। पहले एक संस्मरण में मैंने ‘बेट्टी’ के बारे में थोड़ा बहुत बताया
भी था लेकिन तब जान पहचान कम हुई थी। अब वह पहचान आत्मीयता में बदल गयी है। अब
उसकी ‘कू..कू..’ और ‘भों..भों...’ करने के फर्क को हम समझने लगें हैं। उसकी आँखों
में ‘प्रेम, और ‘याचना’ को पढ़ लेते हैं। समझ जाते हैं कि कब उसको कब्ज की शिकायत
हो गयी है और कब उसे खेलने का मन हो रहा है। शाम को बेटे के साथ सैर को निकले बिना
वह ठीक से सो नहीं पाती। पोते को तो बोलकर समझाबुझा कर साधा जा सकता है मगर इस
मासूम को तो अपनी बातें सब संकेतों में ही कहना होती है।
कनाडा की घरेलू पेट
‘बेट्टी’ हो या इंदौर के हमारे ‘स्ट्रीट डॉग’, संवेदनाओं का संचार तो कर ही देते
हैं। उधर जब सुबह सुबह सैर को निकली महिला मोहल्ले के कुत्तों को ढेर सारे टोस्ट
खिलाती हैं, लगभग ‘श्री दत्त भगवान’ के अवतार के रूप में दिखाई देती हैं, दर्जनों
श्वान उनके आसपास तब तक जुटे रहते हैं, जब तक कि उनके सारे टोस्ट ख़त्म नहीं हो
जाते.... पशुओं के प्रति हम भारतवासियों की यह प्रेम और करुणा का भी अपना अलग
महत्त्व है।
आज इसी सन्दर्भ में एक
कविता पुनः पढ़ लीजिये...
कविता
दृश्य
ब्रजेश कानूनगो
1
एक कुतिया पूरी लय में
खुरचती रही पेड़ के पास की जमीन
जैसे चिड़िया घोसला बनाती है डाली पर पत्तियों के बीच
जैसे छोटा मौजा बुनती है गुनगुनाते हुए कोई नवेली
और एक सुबह
पेड़ के ऊपर नई चहचहाट के साथ साथ
नीचे भी आबाद हो जाती है छोटी-सी खोह
दुनिया थोड़ी और घनी
कुछ और बड़ी हो जाती है
जब हड्डियां तक बजने लगती है हमारी
घर से निकलना तो दूर की बात है
रजाई से बाहर निकलने में ही छूटता हैं पसीना
पिल्ले बन जाते हैं ऊन के गोले और
ऐसे गुँथ जाते हैं एक दूसरे में कि एकाकार हो जाते
हैं
तैयार करते हैं खुद अपना कम्बल
घुसे रहते हैं उसमें सूरज के उगने तक
बच्चों को सर्दी से बचाने के जतन में
कुतिया का जबड़ा रूई का फोहा बन जाता है
निकालती है उन्हें खोह से
जैसे रजाई खींच कर जगाया जाता है सुबह-सुबह बच्चों को
धूप की सिगड़ी के पास गोटियाँ खेलने लगते हैं पिल्ले
अपने टुकड़ों का पेट भरने के लिए
टुकड़ों के इंतजाम में गई माँ जब लौटती है तो
ऐसे लपकते हैं पिल्ले
जैसे टाफियाँ लेकर दफ्तर से लौटे पिता को घेर लेते
हैं बच्चे
माँ की छाती से चिपक संसार का सारा सुख
उनके भीतर उतर जाता है
संतोष से भर जाती है एक पृथ्वी.
2
भरी बस में बह रहा है खून
बर्छियों की तरह चुभ रही है कुछ नजरें
बाहर देखते रहते हैं खिड़की के पास बैठे यात्री
एक मादा को घेरे घूम रहा है कुत्तों का झुंड
3
सड़क बंद है
बड़ा जाम लगा है
रुक गया है पहियों का घूमना
आक्रोश इतना अधिक है कि
पैदल भी गुजरने की हिम्मत नहीं किसी में
एक पिल्ला पड़ा है
लहुलुहान बीच सड़क में
लाश के पास
गुस्से से भरी बैठी है दुखी माँ.
*****
29
शहरी कनेडियन की 'कॉटेज कंट्री'
शहरी कनेडियन की 'कॉटेज कंट्री'
अपनी छुट्टियों के दौरान खासतौर पर 'समर' के दिनों में कनाडा के शहरी लोगों में परिवार के साथ मौज मस्ती पूर्ण 'कॉटेज जीवन' व्यतीत करना बहुत लोकप्रिय शौक के रूप
में विकसित हुआ है।
झीलों के निकट ग्रामीण क्षेत्रों में बसाई गई 'कॉटेज
कंट्री' में मनोरंजन,फिशिंग,तैराकी और वाटर स्पोर्ट्स के अलावा,बीचों पर तफरीह और
अन्य सुख सुविधाओं से युक्त खूबसूरत कॉटेज स्वयं की मालकियत के अलावा किराए पर भी
लिए जा सकते हैं। एक तरह से यहां पर यह एक व्यवसाय की तरह भी विकसित हुआ है।
हमारी बहुत इच्छा थी कि यहां विकसित 'कॉटेज
कन्ट्री' को स्वयं देखें और थोड़ा बहुत इस जीवन को निकट से
अनुभव भी करें। हालांकि यह 'कंट्री होम' कनाडा के ग्रामीण लोक जीवन से बिल्कुल अलग हटकर शहरों में निवास करने
वालों के लिए ही ग्रामीण परिवेश वाला नितांत अवकाशकालीन अस्थायी निवास या ‘घर के
बाहर एक और घर’ जैसा ही होता है, लेकिन हमारी दिलचस्पी इस
बहाने यहां के लोगों की इस जीवन शैली और यहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य का आनन्द उठाने
में भी थी।
सप्ताहांत में बच्चों ने एक टूर नियोजित किया जिसके तहत
हम कवारथा लेक के नजदीक विकसत हो रही ऐसी ‘कॉटेज बस्ती’ और वहां के जीवन और नजारों
का थोड़ा जायजा ले सकें।
घर से कोई 2 घण्टों की कार यात्रा के बाद हम लोग
कवारथा के नजदीक राइस लेक पर विकसित की जा रही बेल्मेर विंड्स गोल्फ रिसोर्ट (Bellmere
winds golf resort) 'कॉटेज कंट्री' की साइट पर पहुंच गए। खूबसूरत विशाल लेक के बीच हमें कुछ छोटे छोटे आइलैंड
भी नजर आए। इस कॉटेज बस्ती का स्वागत कक्ष और दफ्तर थोड़ा ऊँचाई पर स्थित था। वहां ऊपर
डेक से जो विहंगम दृश्य दिखाई दिया वह बहुत मन मोहने वाला था। यहीं डेक पर बैठकर
रिसोर्ट प्रतिनिधि ने यहां कॉटेज खरीदने या किराये पर लेने सम्बन्धी जानकारी
उपलब्ध कराई।
बैटरी चलित वाहन से हमें नीचे झील किनारे बनी कॉटेज
बस्ती तक ले जाकर वहां बने 'जिम', बॉस्केट बॉल
कोर्ट, स्वीमिंग पूल और कॉटेज के भीतर की साज-सज्जा का अवलोकन
कराया। कॉटेज में निवास कर रहे कई लोग हमें वहां झील में बोटिंग करते नजर आए। बीच
पर कुछ धूप सेक रहे थे तो कुछ मछलियों को पकड़ने के लिए कांटा डाले हुए भी दिखाई
दिए। कुछ लोग ‘बारबेक्यू’ लगाए खाना पकाते, गर्म करते नजर
आए। हम लोग अपना शाकाहारी भोजन साथ लेकर गए थे।
बने बनाये वुडन स्ट्रक्चरों को गाड़ियों से लाकर यहां
स्थापित करने के बाद इन्हें बहार-भीतर से सुसज्जित कर दिया जाता है। ख़ूबसूरत इंटीरियर
के तहत किचन में फ्रीज, गैस चूल्हा, मैक्रोवेव,
डाइनिंग सेट, ड्राइंग रूम में सोफ़ा,टीवी, डेक आदि के अलावा इन कॉटेजों में एक या दो
छोटे बेड रूम्स और प्रसाधन केबिन भी होते हैं। और हाँ चौबीसों घंटे वातानुकूलन तो
होता ही है।
कोई दो घण्टा समय हमने यहां बिताया। यहां गोल्फ फील्ड
का होना और क्लब की निशुल्क सदस्यता रिसोर्ट की खास विशेषता थी। गोल्फ और वाटर
स्पोर्ट और फिशिंग के शौकीन लोगों द्वारा ऐसी बस्ती में अधिक रुचि दिखाई देती है।
गोल्फ फील्ड में कई क्लब सदस्यों को हमने बैटरी चलित इको गाड़ियों पर आते जाते और
खेलते देखा।
यहाँ से विदा लेकर हम लोग 27 किलोमीटर
आगे सीमोर लेक पर इन्ही डेवलपर की पुरानी स्थापित योजना वुडलैंड्स एस्टेट्स (Woodlands
estates) भी गए। पुरानी होकर भी यह ‘कॉटेज कंट्री’ खूबसूरत और अधिक
आकर्षक लगी। यहां की खास बात यह थी कि हरेक कॉटेज का अपना एक पृथक बोटिंग
प्लेटफॉर्म था जो सीधे झील से जुड़ता था। यह बस्ती पूरी तरह विकसित थी और इसमें अब
आगे किसी नए फेज की शुरुआत भी नहीं होनी थी।
सैर सपाटे के साथ ओंटारियो राज्य की तीन में से एक
कवारथा 'कॉटेज कंट्री' का थोड़ा बहुत
जायजा लेना और इस कांसेप्ट से रू-बरु होना हमारा इस वीकेंड का नया और स्मरणीय
अनुभव रहा।
लौटते हुए सड़क मार्ग पर एक जगह पर पुल के गेट बंद होने
लगे। गाड़ी रोकना पड़ी। धीरे धीरे पुल की सड़क हटकर साइड में हो गई। वस्तुतः पुल के
नीचे से जल मार्ग गुजरता था। जल मार्ग से एक बड़ा बोट गुजरने के बाद,धीरे
धीरे सड़क अपनी जगह फिर लौट आई। गेट खुले और हम फिर न्यूमार्केट शहर की ओर आगे बढ़
गए।
दरअसल, यह ओंटारियो राज्य का एक ऐतिहासिक जल मार्ग और ब्रिज था। यह अनोखा दृश्य पहले फिल्मों में या यू ट्यूब वीडियो पर अवश्य देखा था, प्रत्यक्ष देखने का अवसर आज की यात्रा में हमें उपहार के रूप में अनायास मिल गया था।
दरअसल, यह ओंटारियो राज्य का एक ऐतिहासिक जल मार्ग और ब्रिज था। यह अनोखा दृश्य पहले फिल्मों में या यू ट्यूब वीडियो पर अवश्य देखा था, प्रत्यक्ष देखने का अवसर आज की यात्रा में हमें उपहार के रूप में अनायास मिल गया था।
30
सहज
सरल व्यवस्थित कचरा संग्रहण
स्वच्छता अभियान में तीन बार देश में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले इंदौर शहर का वाशिंदा होने का गौरव प्राप्त व्यक्ति हूँ, इसलिए एक नजर न्यूमार्केट शहर के अपने घर और स्ट्रीट के कचरा निपटान प्रणाली पर डालना स्वाभाविक था।
प्रत्येक मंगलवार शाम 7 बजे के बाद यहां घर का कचरा कंटेनरों में बाहर सड़क किनारे रखना होता है। रिसायकल किये जाने वाला कचरा और खाद में बदले जाने वाले कचरे को अलग अलग कंटेनर में रखना पड़ता है। नीले कन्टेनरों में रिसाइकिल होने वाला, हरे में वानस्पतिक, किचन वेस्ट तथा ब्राउन कंटेनर में वह कचरा रखा जाता है जिसे रिसायकल नहीं किया जा सकता और नहीं जिसे खाद में परिवर्तित किया जा सकता है। संक्रामक और रासायनिक कचरा भी अलग ही रखकर विशेष स्थलों पर ही स्वयं ड्राप करना होता है।
हर सप्ताह घरों से नीले और हरे कन्टेनरों का कचरा संग्रहण होता है। बाकी कचरा पाक्षिक रूप से लिया जाता है।
निर्धारित दिन की पूर्व रात होते होते सड़क किनारे हरेक घर के बाहर व्यवस्थित रूप से कंटेनर रखे जा चुके होते हैं । इधर कनाडा के शहरों की स्ट्रीट्स पर रात को कचरा बिखर जाने का कोई खतरा नहीं होता है। वैसे भी यहां कोई आवारा पशु मुंह मारने को दिखाई नहीं देता है। हाँ, 'रकून' नाम का एक जानवर अवश्य भोजन के लालच में हरे कचरा बीन की ओर आकर्षित होता है, इसलिए हरा कंटेनर विशेष रूप से निर्मित किया गया होता है।उसके ढक्कन को इस ढंग से सील किया जाता है कि रकून पहुंचकर उसे बिखेर न सके।
कचरा बीनकर जीवन चलाने वाले व्यक्तियों की बातें यहां किसी परिकल्पना की तरह ही है। हाँ यह जरूर सुना है कि कुछ नशेडची यहां भी कचरे में से अपने काम की बोतलें अवश्य तलाशते मिल जाते हैं।
बुधवार को दिन भर म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के स्वच्छता विभाग की कचरा गाड़ियां चक्कर लगाती हैं। कुछ मशीन द्वारा तो कुछ कर्मचारी घर के बाहर रखे कंटेनरों का कचरा लिफ्ट कर गाड़ी में उंडेलते रहते हैं। कचरा संग्रहण के बाद कंटेनरों को पुनः उलट कर उसी स्थान पर व्यवस्थित रूप से रख देंगे।
इधर भी इस काम के लिए हमारी तरह ही कॉरपोरेशन द्वारा एक कम्पनी को नियुक्त किया हुआ है। जिसके कर्मचारी निर्धारित गणवेश, ग्लोव्स और मास्क आदि धारण किये होते हैं। हमारे द्वारा यदि कुछ गलत तरीके से कचरा अलग किया गया होता है तो कंटेनर पर एक पर्ची चिपका कर बिना कुछ कहे लौट जाते हैं। इससे हम समझ लेते हैं कि कचरा सहेजने,विलग करने में हमसे कुछ गलती हुई है।
कांच के टूटे हुए हिस्सों को एक गार्बेज बेग में सील कर उस पर चिट्ठी लगाना जरूरी है। बगीचे की पत्तियों, टहनियों के लिए अलग से कागज के ब्राउन बैग्स नियत हैं। उनके संग्रहण के लिए दिन भी अलग है। नियत दिन उन्हें भी इसी तरह सड़क किनारे घर के सामने रखा जाना होता है।
न घर के किसी व्यक्ति के पास या स्वच्छता कर्मचारी के पास फिजूल बातों और बहस के लिए समय है और न ही कोई मानसिक तनाव उत्त्पन्न करने वाली बेवजह की कोई प्रक्रिया। रोजमर्रा जीवन का हिस्सा है यह सब....
खुशी है भारत में भी अब हम इस दिशा में आगे बढ़ने को थोड़ा संकल्पित हुए हैं, लेकिन मंजिल अभी बहुत दूर है....!
स्वच्छता अभियान में तीन बार देश में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले इंदौर शहर का वाशिंदा होने का गौरव प्राप्त व्यक्ति हूँ, इसलिए एक नजर न्यूमार्केट शहर के अपने घर और स्ट्रीट के कचरा निपटान प्रणाली पर डालना स्वाभाविक था।
प्रत्येक मंगलवार शाम 7 बजे के बाद यहां घर का कचरा कंटेनरों में बाहर सड़क किनारे रखना होता है। रिसायकल किये जाने वाला कचरा और खाद में बदले जाने वाले कचरे को अलग अलग कंटेनर में रखना पड़ता है। नीले कन्टेनरों में रिसाइकिल होने वाला, हरे में वानस्पतिक, किचन वेस्ट तथा ब्राउन कंटेनर में वह कचरा रखा जाता है जिसे रिसायकल नहीं किया जा सकता और नहीं जिसे खाद में परिवर्तित किया जा सकता है। संक्रामक और रासायनिक कचरा भी अलग ही रखकर विशेष स्थलों पर ही स्वयं ड्राप करना होता है।
हर सप्ताह घरों से नीले और हरे कन्टेनरों का कचरा संग्रहण होता है। बाकी कचरा पाक्षिक रूप से लिया जाता है।
निर्धारित दिन की पूर्व रात होते होते सड़क किनारे हरेक घर के बाहर व्यवस्थित रूप से कंटेनर रखे जा चुके होते हैं । इधर कनाडा के शहरों की स्ट्रीट्स पर रात को कचरा बिखर जाने का कोई खतरा नहीं होता है। वैसे भी यहां कोई आवारा पशु मुंह मारने को दिखाई नहीं देता है। हाँ, 'रकून' नाम का एक जानवर अवश्य भोजन के लालच में हरे कचरा बीन की ओर आकर्षित होता है, इसलिए हरा कंटेनर विशेष रूप से निर्मित किया गया होता है।उसके ढक्कन को इस ढंग से सील किया जाता है कि रकून पहुंचकर उसे बिखेर न सके।
कचरा बीनकर जीवन चलाने वाले व्यक्तियों की बातें यहां किसी परिकल्पना की तरह ही है। हाँ यह जरूर सुना है कि कुछ नशेडची यहां भी कचरे में से अपने काम की बोतलें अवश्य तलाशते मिल जाते हैं।
बुधवार को दिन भर म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के स्वच्छता विभाग की कचरा गाड़ियां चक्कर लगाती हैं। कुछ मशीन द्वारा तो कुछ कर्मचारी घर के बाहर रखे कंटेनरों का कचरा लिफ्ट कर गाड़ी में उंडेलते रहते हैं। कचरा संग्रहण के बाद कंटेनरों को पुनः उलट कर उसी स्थान पर व्यवस्थित रूप से रख देंगे।
इधर भी इस काम के लिए हमारी तरह ही कॉरपोरेशन द्वारा एक कम्पनी को नियुक्त किया हुआ है। जिसके कर्मचारी निर्धारित गणवेश, ग्लोव्स और मास्क आदि धारण किये होते हैं। हमारे द्वारा यदि कुछ गलत तरीके से कचरा अलग किया गया होता है तो कंटेनर पर एक पर्ची चिपका कर बिना कुछ कहे लौट जाते हैं। इससे हम समझ लेते हैं कि कचरा सहेजने,विलग करने में हमसे कुछ गलती हुई है।
कांच के टूटे हुए हिस्सों को एक गार्बेज बेग में सील कर उस पर चिट्ठी लगाना जरूरी है। बगीचे की पत्तियों, टहनियों के लिए अलग से कागज के ब्राउन बैग्स नियत हैं। उनके संग्रहण के लिए दिन भी अलग है। नियत दिन उन्हें भी इसी तरह सड़क किनारे घर के सामने रखा जाना होता है।
न घर के किसी व्यक्ति के पास या स्वच्छता कर्मचारी के पास फिजूल बातों और बहस के लिए समय है और न ही कोई मानसिक तनाव उत्त्पन्न करने वाली बेवजह की कोई प्रक्रिया। रोजमर्रा जीवन का हिस्सा है यह सब....
खुशी है भारत में भी अब हम इस दिशा में आगे बढ़ने को थोड़ा संकल्पित हुए हैं, लेकिन मंजिल अभी बहुत दूर है....!