Monday, 22 July 2019

यात्रा डायरी: कनाडा से चिट्ठी: सात


यात्रा डायरी 
कनाडा से चिट्ठी: सात  


28
‘स्ट्रीट डॉग' और संवेदना

बचपन से लेकर बड़ा होने तक मोहल्लों,गलियों में स्वच्छन्द विचरण करते कुत्तों को ही कुत्ता समझता था। लेकिन अब भारत के  हमारे अपने इन स्वच्छंद प्राणियों को सम्मान से 'स्ट्रीट डॉग्स' कहना ही ठीक रहेगा। 
राह चलते श्वानों से संवाद करने में अक्सर घबराता रहा हूँ। किसी ने हिदायत भी दी थी कि 'स्ट्रीट डॉग' से नजर नहीं मिलाना चाहिए। स्कूटर और कार के पीछे कभी कभी जब ‘गलियों के राजा’ जबड़ा फैलाए लपकते हैं तो जान सूख जाती है।

सर्वपित्री अमावस्या पर एक सर्वे किया था, जिस पर आधारित एक लेख भी लिखा था। उस खास दिन मेरी छत पर कौआ तो एक नहीं आया मगर घर के आसपास एक किलोमीटर दायरे में 50 से अधिक 'स्ट्रीट डॉग्स' और  30 से अधिक गौवंश प्राणियों की स्वतंत्र उपस्थिति दिखाई दी थी। इधर कनाडा में मुझे 'स्ट्रीट डॉगकहीं दिखाई नहीं दिए अन्य पशुओं का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। हाँकोई न कोई 'पेट' अवश्य पाला जाता है।

हमारे आसपास के लगभग हरेक घर में कोई न कोई  कुत्ता या बिल्ली जैसा पेट देखने को मिल जाता है। बाएं पड़ोसी के यहां दो कुत्ते हैं वहीं दाहिनी ओर दो गबरू बिल्लियाँ घूमती रहती हैं। हमारे यहाँ मिली जुली नस्ल Cockapoo काकापू की एक दो वर्षीय डॉगी है। बच्चों ने उसका नामकरण ' बेट्टी' किया हुआ है। उन्होंने बताया तो उसकी नस्ल का पता चला वरना मैं तो उसे पामेरियन ही समझता था। 
इस मामले में मेरी समझ सीमित ही रही है। भारत में किसी मित्र के यहां कुत्तों से मुलाकात होती है तो यातो वे ‘अल्सेशियन’ होते थे या फिर ‘पामेरियन’। इनके अलावा मेरे लिए सभी कुत्ते ‘स्ट्रीट डॉग’ या वहीं से बच्चों द्वारा उठाए ‘पिल्ले’ ही बड़े होकर ‘लायन’, ‘टाइगर’ ‘टामी’ आदि बनते रहे हैं।

लेकिन इधर ‘बेट्टी’ नें मन मोह लिया है। पहले एक संस्मरण में मैंने ‘बेट्टी’ के बारे में थोड़ा बहुत बताया भी था लेकिन तब जान पहचान कम हुई थी। अब वह पहचान आत्मीयता में बदल गयी है। अब उसकी ‘कू..कू..’ और ‘भों..भों...’ करने के फर्क को हम समझने लगें हैं। उसकी आँखों में ‘प्रेम, और ‘याचना’ को पढ़ लेते हैं। समझ जाते हैं कि कब उसको कब्ज की शिकायत हो गयी है और कब उसे खेलने का मन हो रहा है। शाम को बेटे के साथ सैर को निकले बिना वह ठीक से सो नहीं पाती। पोते को तो बोलकर समझाबुझा कर साधा जा सकता है मगर इस मासूम को तो अपनी बातें सब संकेतों में ही कहना होती है।

कनाडा की घरेलू पेट ‘बेट्टी’ हो या इंदौर के हमारे ‘स्ट्रीट डॉग’, संवेदनाओं का संचार तो कर ही देते हैं। उधर जब सुबह सुबह सैर को निकली महिला मोहल्ले के कुत्तों को ढेर सारे टोस्ट खिलाती हैं, लगभग ‘श्री दत्त भगवान’ के अवतार के रूप में दिखाई देती हैं, दर्जनों श्वान उनके आसपास तब तक जुटे रहते हैं, जब तक कि उनके सारे टोस्ट ख़त्म नहीं हो जाते.... पशुओं के प्रति हम भारतवासियों की यह प्रेम और करुणा का भी अपना अलग महत्त्व है।
आज इसी सन्दर्भ में एक कविता पुनः पढ़ लीजिये...     

कविता
दृश्य
ब्रजेश कानूनगो


1
एक कुतिया पूरी लय में 
खुरचती रही पेड़ के पास की जमीन
जैसे चिड़िया घोसला बनाती है डाली पर पत्तियों के बीच
जैसे छोटा मौजा बुनती है गुनगुनाते हुए कोई नवेली

और एक सुबह
पेड़ के ऊपर नई चहचहाट के साथ साथ
नीचे भी आबाद हो जाती है छोटी-सी खोह
दुनिया थोड़ी और घनी
कुछ और बड़ी हो जाती है

जब हड्डियां तक बजने लगती है हमारी
घर से निकलना तो दूर की बात है
रजाई से बाहर निकलने में ही छूटता हैं पसीना
पिल्ले बन जाते हैं ऊन के गोले और
ऐसे गुँथ जाते हैं एक दूसरे में कि एकाकार हो जाते हैं
तैयार करते हैं खुद अपना कम्बल
घुसे रहते हैं उसमें सूरज के उगने तक

बच्चों को सर्दी से बचाने के जतन में
कुतिया का जबड़ा रूई का फोहा बन जाता है
निकालती है उन्हें खोह से 
जैसे रजाई खींच कर जगाया जाता है सुबह-सुबह बच्चों को
धूप की सिगड़ी के पास गोटियाँ खेलने लगते हैं पिल्ले 

अपने टुकड़ों का पेट भरने के लिए
टुकड़ों के इंतजाम में गई माँ जब लौटती है तो
ऐसे लपकते हैं पिल्ले 
जैसे टाफियाँ लेकर दफ्तर से लौटे पिता को घेर लेते हैं बच्चे
माँ की छाती से चिपक संसार का सारा सुख
उनके भीतर उतर जाता है
संतोष से भर जाती है एक पृथ्वी.


2
भरी बस में बह रहा है खून 
बर्छियों की तरह चुभ रही है कुछ नजरें
बाहर देखते रहते हैं खिड़की के पास बैठे यात्री
एक मादा को घेरे घूम रहा है कुत्तों का झुंड    

3
सड़क बंद है
बड़ा जाम लगा है
रुक गया है पहियों का घूमना
आक्रोश इतना अधिक है कि 
पैदल भी गुजरने की हिम्मत नहीं किसी में

एक पिल्ला पड़ा है
लहुलुहान बीच सड़क में

लाश के पास 
गुस्से से भरी बैठी है दुखी माँ.

*****

  

29
शहरी कनेडियन की 'कॉटेज कंट्री'


अपनी छुट्टियों के दौरान खासतौर पर 'समर' के दिनों में कनाडा के शहरी लोगों में परिवार के साथ मौज मस्ती पूर्ण 'कॉटेज जीवन' व्यतीत करना बहुत लोकप्रिय शौक के रूप में विकसित हुआ है।
झीलों के निकट ग्रामीण क्षेत्रों में बसाई गई 'कॉटेज कंट्री' में मनोरंजन,फिशिंग,तैराकी और वाटर स्पोर्ट्स के अलावा,बीचों पर तफरीह और अन्य सुख सुविधाओं से युक्त खूबसूरत कॉटेज स्वयं की मालकियत के अलावा किराए पर भी लिए जा सकते हैं। एक तरह से यहां पर यह एक व्यवसाय की तरह भी विकसित हुआ है।

हमारी बहुत इच्छा थी कि यहां विकसित 'कॉटेज कन्ट्री' को स्वयं देखें और थोड़ा बहुत इस जीवन को निकट से अनुभव भी करें। हालांकि यह 'कंट्री होम' कनाडा के ग्रामीण लोक जीवन से बिल्कुल अलग हटकर शहरों में निवास करने वालों के लिए ही ग्रामीण परिवेश वाला नितांत अवकाशकालीन अस्थायी निवास या ‘घर के बाहर एक और घर’ जैसा ही होता है, लेकिन हमारी दिलचस्पी इस बहाने यहां के लोगों की इस जीवन शैली और यहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य का आनन्द उठाने में भी थी।
सप्ताहांत में बच्चों ने एक टूर नियोजित किया जिसके तहत हम कवारथा लेक के नजदीक विकसत हो रही ऐसी ‘कॉटेज बस्ती’ और वहां के जीवन और नजारों का थोड़ा जायजा ले सकें।

घर से कोई 2 घण्टों की कार यात्रा के बाद हम लोग कवारथा के नजदीक राइस लेक पर विकसित की जा रही बेल्मेर विंड्स गोल्फ रिसोर्ट (Bellmere winds golf resort) 'कॉटेज कंट्री' की साइट पर पहुंच गए। खूबसूरत विशाल लेक के बीच हमें कुछ छोटे छोटे आइलैंड भी नजर आए। इस कॉटेज बस्ती का स्वागत कक्ष और दफ्तर थोड़ा ऊँचाई पर स्थित था। वहां ऊपर डेक से जो विहंगम दृश्य दिखाई दिया वह बहुत मन मोहने वाला था। यहीं डेक पर बैठकर रिसोर्ट प्रतिनिधि ने यहां कॉटेज खरीदने या किराये पर लेने सम्बन्धी जानकारी उपलब्ध कराई।
बैटरी चलित वाहन से हमें नीचे झील किनारे बनी कॉटेज बस्ती तक ले जाकर वहां बने 'जिम', बॉस्केट बॉल कोर्ट, स्वीमिंग पूल और कॉटेज के भीतर की साज-सज्जा का अवलोकन कराया। कॉटेज में निवास कर रहे कई लोग हमें वहां झील में बोटिंग करते नजर आए। बीच पर कुछ धूप सेक रहे थे तो कुछ मछलियों को पकड़ने के लिए कांटा डाले हुए भी दिखाई दिए। कुछ लोग ‘बारबेक्यू’ लगाए खाना पकाते, गर्म करते नजर आए। हम लोग अपना शाकाहारी भोजन साथ लेकर गए  थे।
बने बनाये वुडन स्ट्रक्चरों को गाड़ियों से लाकर यहां स्थापित करने के बाद इन्हें बहार-भीतर से सुसज्जित कर दिया जाता है। ख़ूबसूरत इंटीरियर के तहत किचन में फ्रीज, गैस चूल्हा, मैक्रोवेव, डाइनिंग सेट, ड्राइंग रूम में सोफ़ा,टीवी, डेक आदि के अलावा इन कॉटेजों में एक या दो छोटे बेड रूम्स और प्रसाधन केबिन भी होते हैं। और हाँ चौबीसों घंटे वातानुकूलन तो होता ही है।

कोई दो घण्टा समय हमने यहां बिताया। यहां गोल्फ फील्ड का होना और क्लब की निशुल्क सदस्यता रिसोर्ट की खास विशेषता थी। गोल्फ और वाटर स्पोर्ट और फिशिंग के शौकीन लोगों द्वारा ऐसी बस्ती में अधिक रुचि दिखाई देती है। गोल्फ फील्ड में कई क्लब सदस्यों को हमने बैटरी चलित इको गाड़ियों पर आते जाते और खेलते देखा।

यहाँ से विदा लेकर हम लोग 27 किलोमीटर आगे सीमोर लेक पर इन्ही डेवलपर की पुरानी स्थापित योजना वुडलैंड्स एस्टेट्स (Woodlands estates) भी गए। पुरानी होकर भी यह ‘कॉटेज कंट्री’ खूबसूरत और अधिक आकर्षक लगी। यहां की खास बात यह थी कि हरेक कॉटेज का अपना एक पृथक बोटिंग प्लेटफॉर्म था जो सीधे झील से जुड़ता था। यह बस्ती पूरी तरह विकसित थी और इसमें अब आगे किसी नए फेज की शुरुआत भी नहीं होनी थी।
सैर सपाटे के साथ ओंटारियो राज्य की तीन में से एक कवारथा 'कॉटेज कंट्री' का थोड़ा बहुत जायजा लेना और इस कांसेप्ट से रू-बरु होना हमारा इस वीकेंड का नया और स्मरणीय अनुभव रहा।

लौटते हुए सड़क मार्ग पर एक जगह पर पुल के गेट बंद होने लगे। गाड़ी रोकना पड़ी। धीरे धीरे पुल की सड़क हटकर साइड में हो गई। वस्तुतः पुल के नीचे से जल मार्ग गुजरता था। जल मार्ग से एक बड़ा बोट गुजरने के बाद,धीरे धीरे सड़क अपनी जगह फिर लौट आई। गेट खुले और हम फिर न्यूमार्केट शहर की ओर आगे बढ़ गए।
दरअसल, यह ओंटारियो राज्य का एक ऐतिहासिक जल मार्ग और ब्रिज था। यह अनोखा दृश्य पहले फिल्मों में या यू ट्यूब वीडियो पर अवश्य देखा था, प्रत्यक्ष देखने का अवसर आज की यात्रा में हमें उपहार के रूप में अनायास मिल गया था।



30
सहज सरल व्यवस्थित कचरा संग्रहण 

स्वच्छता अभियान में तीन बार देश में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले इंदौर शहर का वाशिंदा होने का गौरव प्राप्त व्यक्ति हूँ, इसलिए एक नजर न्यूमार्केट शहर के अपने घर और स्ट्रीट के कचरा निपटान प्रणाली पर डालना स्वाभाविक था।

प्रत्येक मंगलवार शाम 7 बजे के बाद यहां घर का कचरा कंटेनरों में बाहर सड़क किनारे रखना होता है। रिसायकल किये जाने वाला कचरा और खाद में बदले जाने वाले कचरे को अलग अलग कंटेनर में रखना पड़ता है। नीले कन्टेनरों में रिसाइकिल होने वाला, हरे में वानस्पतिक, किचन वेस्ट  तथा ब्राउन कंटेनर  में वह कचरा रखा जाता है जिसे रिसायकल नहीं किया जा सकता और नहीं जिसे खाद में परिवर्तित किया जा सकता है। संक्रामक और रासायनिक कचरा भी अलग ही रखकर विशेष स्थलों पर ही स्वयं ड्राप करना होता है। 

हर सप्ताह घरों से नीले और हरे कन्टेनरों का कचरा संग्रहण होता है। बाकी कचरा पाक्षिक रूप से लिया जाता है।

निर्धारित दिन की पूर्व रात होते होते सड़क किनारे हरेक घर के बाहर व्यवस्थित रूप से कंटेनर रखे जा चुके होते हैं । इधर कनाडा के शहरों  की स्ट्रीट्स पर  रात को कचरा बिखर जाने का कोई खतरा नहीं होता है। वैसे भी यहां कोई आवारा पशु मुंह मारने को दिखाई नहीं देता है।  हाँ, 'रकून' नाम का एक जानवर अवश्य भोजन के लालच में हरे कचरा बीन की ओर आकर्षित होता है, इसलिए हरा कंटेनर विशेष रूप से निर्मित किया गया होता है।उसके ढक्कन को इस ढंग से सील किया जाता है कि रकून  पहुंचकर उसे बिखेर न सके। 

कचरा बीनकर जीवन चलाने वाले व्यक्तियों की बातें यहां किसी परिकल्पना की तरह ही है। हाँ यह जरूर सुना है कि कुछ नशेडची यहां भी कचरे में से अपने काम की बोतलें अवश्य तलाशते मिल जाते हैं।

बुधवार को दिन भर म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के स्वच्छता विभाग की कचरा गाड़ियां चक्कर लगाती हैं। कुछ मशीन द्वारा तो कुछ कर्मचारी घर के बाहर रखे कंटेनरों का कचरा लिफ्ट कर गाड़ी में उंडेलते रहते हैं। कचरा संग्रहण के बाद कंटेनरों को पुनः उलट कर उसी स्थान पर व्यवस्थित रूप से रख देंगे। 

इधर भी इस काम के लिए हमारी तरह ही कॉरपोरेशन द्वारा एक कम्पनी को नियुक्त किया हुआ है। जिसके कर्मचारी निर्धारित गणवेश, ग्लोव्स और मास्क आदि धारण किये होते हैं। हमारे द्वारा यदि कुछ गलत तरीके से कचरा अलग किया गया होता है तो कंटेनर पर एक पर्ची चिपका कर बिना कुछ कहे लौट जाते हैं।  इससे हम समझ लेते हैं कि कचरा सहेजने,विलग करने में हमसे कुछ गलती हुई है।

कांच के टूटे हुए हिस्सों को एक गार्बेज बेग में सील कर उस पर चिट्ठी लगाना जरूरी है। बगीचे की पत्तियों, टहनियों के लिए अलग से कागज के ब्राउन बैग्स नियत हैं। उनके संग्रहण के लिए दिन भी अलग है। नियत दिन उन्हें भी इसी तरह सड़क किनारे घर के सामने रखा जाना होता है।

न घर के किसी व्यक्ति के पास या स्वच्छता कर्मचारी के पास फिजूल बातों और बहस के लिए समय है और न ही कोई मानसिक तनाव उत्त्पन्न करने वाली  बेवजह की कोई प्रक्रिया। रोजमर्रा जीवन का हिस्सा है यह सब....

खुशी है भारत में भी अब हम इस दिशा में आगे बढ़ने को थोड़ा संकल्पित हुए हैं, लेकिन मंजिल अभी बहुत दूर है....!



 



Monday, 15 July 2019

यात्रा डायरी : कनाडा से चिट्ठी : छह


यात्रा डायरी 
कनाडा से चिट्ठी : छह

25
हम होंगे कामयाब एक दिन


आज 11 जुलाई को जब मैं कनाडा में बेटे के घर के बैकयार्ड में बैठा गुनगुनी धूप का मजा ले रहा हूँ दुनिया भर के कई देश 'विश्व जनसंख्या दिवस' मना रहे हैं। भारत में इस वक्त  यह दिन समाप्ति की ओर होगा, इधर कनाडा में दिन के ढाई बजने को आए हैं।

जनसंख्या घड़ी के मुताबिक कनाडा की आबादी आज 3 करोड़ 72 लाख 87 हजार के लगभग है। जोकि दुनिया की सम्पूर्ण आबादी का केवल 0.48% बनता है।जनसंख्या रैंकिंग में अन्य देशों की तुलना में उसका क्रम 38 वें स्थान पर आता है।उपलब्ध जमीन के आधार पर यहां प्रति वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में मात्र 4 व्यक्तियों का घनत्व आंकड़ा बैठता है।

यहाँ की आबादी का 82% हिस्सा शहरों में निवास करता है तथा median age लगभग 40.7 वर्ष है याने 50 प्रतिशत आबादी में लोग लगभग 41 वर्ष के नीचे की आयु के शामिल हैं। स्पष्ट है प्रौढ़ों और बुजुर्गों की तादाद यहां बहुत अधिक है। लोग लम्बा जीवन जीते हैं। स्वास्थ्य समस्याएं कम और चिकित्सा या तो बेहतर है या उसकी कम आवश्यकता पड़ती है या फिर लोग अपने स्वास्थ्य पर पर्याप्त ध्यान दे पाते हैं। दूसरी तरफ आंकड़ों के विश्लेषण से जन्म दर और यहां बाहर से आकर बसने वाले युवाओं की संख्या भी बहुत कम नहीं कही जा सकती।

दरअसल विश्व जनसंख्या दिवस को प्रति वर्ष मनाने के पीछे मुख्य उद्देश्य यह है कि देश के लोग और सरकारें जनसंख्या से जुड़े मसलों को समझ सकें और अपने लिए विकास की योजनाओं पर पर्याप्त ध्यान देकर उनके कार्यान्वयन को सुगम और प्रभावकारी बना सकें।
आज की तारीख में 131 करोड़ आबादी वाले हमारे देश के संदर्भ में यह जान लेना भी बड़ा दिलचस्प है कि एक अध्ययन के मुताबिक जनसंख्या वृद्धि की यही दर रही तो वर्ष 2100 तक भारत चीन से भी आगे बढ़कर दुनिया का सबसे बड़ी आबादी वाला मुल्क बन जायेगा।
भारत के पास दुनिया के कुल भू क्षेत्र का मात्र 2% ही है लेकिन जनसंख्या वृद्धि में उसका योगदान बहुत बड़ा अर्थात लगभग 16 % होता है और उसकी आबादी के घनत्व की बात तो निराली ही है। लगभग 35% आबादी तो केवल बिहार, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र राज्य में ही निवास करती हैं।
देखा जाए तो हमारी ज्यादातर आर्थिक,सामाजिक समस्याओं की जड़ में विशाल जनसंख्या का भी एक बड़ा कारण कहा जा सकता है।
इस सबके बावजूद आजादी के 72 सालों में हम अपनी समस्याओं से जूझते हुए यदि सचमुच मजबूत हुए हैं, विकसित देश में बदलने के अपने संघर्ष में लगातार संलग्न हैं तो यह बड़ी बात है।
राजनीतिक नारों और आश्वासनों से इतर शायद हम लोग ही होंगे जो भारत को 'विकसित देश' बनाने का अपना सपना पूरा कर सकते हैं, बशर्ते निरर्थक जयकारों से ऊपर उठकर वास्तविकता को स्वीकारते हुए कोई प्रभावी कदम उठा सकें।

तब तक यह गीत तो गुनगुनाया ही जा सकता है.....हम होंगे कामयाब एक दिन...!


26
फिर कब मिलोगे...ब्लू माउंटेन 

न्यूमार्केट में शनिवार को मौसम खुशनुमा था। तापमान 15 से 26 के बीच रहना था। लेकिन दोपहर होते होते तेज बारिश हो गई। सप्ताहांत में पहले विश्व प्रसिद्ध और दुनिया के सबसे बड़े जलप्रपात का लुत्फ उठाने का कार्यक्रम बन रहा था लेकिन फिर किन्ही कारणों से अगले किसी सप्ताहांत तक के लिए स्थगित कर दिया।

दूसरा विकल्प था खूबसूरत 'ब्लू माउंटेन विलेज' की सैर करना। वहां के मौसम का हाल गूगल पर सर्च किया तो पाया कि रविवार(15 जुलाई) को तापमान 15 से 21 तक ही रहने वाला था और धूप भी खिली रहने की संभावना थी। याने सोने में सुहागा।
ब्लू माउंटेन विलेज घर से थोड़ा नजदीक भी था। लगभग 200 किलो मीटर की दूरी दो ढाई घण्टों की ड्राइव में अधिक थकाने वाली भी नहीं थी। सोमवार को बच्चों को फिर अपने कामकाज में भी लगना था।

आखिर रविवार को सुबह कोई 10 बजे नाश्ता करके हम लोग घर से निकल गए। हाइवे को एवॉइड करते हुए हमारी कार क्षेत्रीय मार्गो से जब आगे बढ़ने लगी तो हमारे सामने सिवाय प्रकृति के खूबसूरत नजारों को निहारने और प्रफुल्लित होने के अतिरिक्त और क्या हो सकता था।

इस बार हमने रास्ते में फसलों से लहलहाते कई खेत भी देखे। सरसों के फूलों सी पीली चादर खेतों पर लहराती देखकर पचपहाड़ के अपने खेत याद आ गए। घास के रोल किये बंडल भी दिखाई दिए जो अब तक कुछ भारतीय फिल्मों के उन दृश्यों में देखे थे जिनमें विदेशी लोकेशन पर कुछ गीत फिल्माए जाते रहे हैं।

बेटा, बहू,पोता इस पर्यटन स्थल पर दूसरी बार आये थे। पहले विंटर में और अब समर में। पिछली बार बर्फीले मौसम में झील के रास्ते वे विलेज नहीं पहुंचे थे। इस बार जीपीएस ने हमें वृहद झील के समांतर सड़क की सैर करा दी। झील के किनारे करीब 11 किलोमीटर हम आगे निकल गए।दरअसल जीपीएस में पोते ने ब्लू माउंटेन डेस्टिनेशन लगा दिया था,विलेज लिखना ही भूल गया इससे खूबसूरत झील के दीदार भी हो गए।इसके किनारे भी अनेक रिसोर्ट और बीच नजर आए। लौटते में इधर आने का तय करके जीपीएस ठीक किया। और करीब 1 बजे के आसपास ब्लू माउंटेन के तीसरे पार्किंग एरिया में थोड़ी दूरी पर दो तीन चक्कर में कार के लिए स्पेस मिल गया।

दरअसल, ब्लू माउंटेन का असली मजा विंटर याने शीतकाल में हिमपात के बाद बर्फ जमने के बाद ही अधिक आता है। पहाड़ियों की ढलान पर जमी बर्फ पर सैलानी और खिलाड़ी विंटर स्पोर्ट्स का मजा खूब लेते हैं। स्कीइंग के लिए पहाड़ियों के टॉप पर तार पर चलने वाली ट्रालियों (रोप वे) द्वारा ऊपर पहुंच कर स्कीइंग करते हैं। रोमांच और जोखिम से भरी स्कीइंग का आनन्द लेने के लिए न सिर्फ खिलाड़ी बल्कि दर्शक भी खूब यहां जुटते हैं तथा ब्लू माउंटेन विलेज के रिसॉर्ट्स में रहते हैं।

समर में भी इसका विकल्प यहां मौजूद है। समर में साइकिलिस्ट अपनी साइकिलें ऊपर ले जाते हैं और उन्हें विशिष्ट और रोमांचपूर्ण रास्तों से नीचे तक चलाकर लाते हैं। बच्चों के लिए भी ऊपर से नीचे तक घुमावदार फिसलन रास्ता (फिसल पट्टी) बना है जिनपर ऊपर से बच्चे,युवा आदि गाड़ियों ( Ridge Runner Mountain Coaster) पर फिसलते हुए रोमांच का अनुभव करते हैं। छोटे बच्चों और किड्स के लिए भी मनोरंजक खेलों और बोटिंग आदि की व्यवस्थाएं हैं। पूरे परिवार का मन रम जाता है यहां।

इन्ही रिसॉर्ट्स के बीच की गलियों में छोटा सा खूबसूरत बाजार है जिसमें खाने,पीने, प्रसाधन, गारमेंट्स आदि से लेकर मनोरंजन के साधन और अन्य स्टोर्स पर्यटकों को  आकर्षित  करने के  लिए सजे रहते हैं। चार घंटों से लेकर चार दिन और चार रातों तक इस पर्यटन गांव का मजा लिया जा सकता है। हमने चार घण्टों में आनन्द का घनत्व बढ़ाने का प्रयास किया।

कई देशों के ध्वजों के साथ यहां हमारे तिरंगे को देखकर मन में भी 'जय है' जैसा कुछ अतिरिक्त ध्वनित हुआ।

अब हमें लौटते हुए 'वसागा बीच' पर कुछ समय लहरों से खेलना था। ब्लू माउंटेन को हमने अलविदा नही कहा बल्कि 'फिर आते है' कहकर विदा ली। कार में किशोर दा और लता दीदी मानो हमारे मनोभावों को ही गाकर अभिव्यक्त कर रहे थे- अच्छा तो हम चलते हैं... फिर कब मिलोगे...?'


27
ताजगी से लबालब शाम 


दरअसल, 'वसागा बीच' ओंटारियो राज्य की जॉर्जियन खाड़ी के दक्षिण छोर पर बसा लगभग 25 हजार आबादी का एक खूबसूरत कनेडियन शहर है। नोत्तावासागा खाड़ी पर यह एक लंबे रेतीले बीच के रूप में जाना जाता है।नियाग्रा के ढलान वाले बीहड़ों के बीच नोटावासागा नदी के डोंगी मार्ग के रूप में भी इसका महत्व है। नदी के मुहाने पर स्थित इस कस्बे का अपना ऐतिहासिक महत्व भी है। प्रोविंशियल पार्क,साइकिल ट्रैक्स वाले इस कस्बे में लेक के किनारे कोई 33 किलोमीटर तक 8 अलग अलग बीच एरिया हैं। हम लोग ब्लू माउन्टेनविलेज से करीब एक घंटे के ड्राइव के बाद यहाँ तीसरे नम्बर के एरिया पर पहुंचे।

कुछ क्षेत्रों में तैरने की अनुमति है। कुछ पर पालतू पेट्स को भी ले जाया जा सकता है। हम लोग जब बीच पर पहुंचे तब शाम के 5 बजने को आये थे। सूर्यास्त 9 बजे के बाद होना था। लोग तैर रहे थे। कुछ बीच पर लगी बैंचों,टेबलों पर अपना ठिया जमाये खान पान का आनन्द ले रहे थे। कुछ बच्चे खूबसूरत पतंगों को आकाश में ऊपर उठाने के प्रयास में थे। कुछ परिवार सीधे रेत पर या दरियां बिछाकर सुस्ताते दिखे।

कार की डिक्की में फोल्डिंग चेयर्स हमारे साथ ही रहती हैं। वहीं रेत पर कुर्सियों पर बैठ कर सूर्यास्त के पूर्व की धूप, विशाल जल राशि में उठती लहरों और पर्यटकों की क्रीड़ाओं का लुत्फ लेते रहे। कहने को भले इसे झील कहें, लेकिन यह फ्रेश वाटर (मीठे पानी) की बड़ी खाड़ी ही थी जिसमें समुद्र की तरह ही विशाल लहरें उठ रहीं थीं।

यहाँ यह जान लेना भी बड़ा दिलचस्प और हतप्रभ कर देने वाला है कि कनाडा में दुनिया की सबसे ज्यादा फ्रेश वाटर झीलें स्थित हैं। कनाडा के नक्शे में तीन वर्ग किलोमीटर से बड़ी झीलों को ही मात्र दर्शाया गया है जिनकी संख्या ही 31752 हो जाती है। इनमें से भी 561 बड़ी झीलें ऐसी हैं जिनका क्षेत्रफल 100 वर्ग किलोमीटर से अधिक है। इस तरह कनाडा के कुल क्षेत्रफल का 9 % हिस्सा झीलों के फ्रेश वाटर से भरा हुआ है। छोटी छोटी हजारों झीलों का तो कोई आधिकारिक रिकॉर्ड ही दर्ज नहीं है। जिस दौर में अधिकांश देशों में ग्लोबल वार्मिंग और भूगर्भीय जल के असीमित दोहन से पीने के पानी का महासंकट आ खड़ा हुआ है, कनाडा के विशाल मीठे और ताजे जल स्रोत शेष दुनिया को आश्वस्त करते हैं।

कनाडा की लबालब झीलों के खूबसूरत नजारे और स्मृतियाँ घर लौटने पर उदास दिनों में भी जीवन में ताजगी लाने का काम करती रहेंगी, इस बात में कोई संदेह नहीं है हमें।