Wednesday, 10 July 2019

यात्रा डायरी: कनाडा से चिट्ठी : पाँच


यात्रा डायरी 
कनाडा से चिट्ठी : पाँच

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खामोश !! कार्य प्रगति पर है

कनाडा प्रवास के दौरान जो कुछ मैंने सामान्य रूप से अनुभव किया उससे लगता है कि यहां प्रत्येक क्षेत्र में पेशेवर दृष्टिकोण और आचरण को प्राथमिकता दी जाती है। चाहे वह सडकों की मरम्मत का काम हो,रेस्टोरेंट का संचालन या डॉग ग्रूमिंग जैसी छोटी सेवाएं। 

रेस्टोरेंट्स के लिए हमारी तरह यहाँ भी हमने खाद्य विभाग द्वारा जारी किये गए गुणवत्ता, साफ़ सफाई आदि से सम्बंधित जारी प्रमाण पत्रों को लगा हुआ देखा। पिछ्ला निरीक्षण कब हुआ इसकी तिथि भी स्पष्ट रूप से अंकित रहती है। हमारी पालतू पेट ‘बेट्टी’ को  बालों की ग्रूमिंग के लिए वेटेरनरी हॉस्पिटल ले गए तो वहां चलने वाली इस अतिरिक्त सेवा के बारे में पता चला कि यह कार्य भी कोई भी सामान्य व्यक्ति नहीं कर सकता बल्कि इसके लिए भी ग्रूमर को तत्संबंधी प्रशिक्षण प्रमाण-पत्र लेना आवश्यक होता है। ग्रूमिंग के लिए पूर्व से अपोइन्टमेंट लेना होता है, अगली ग्रूमिंग के लिए भी आगे की तारीख मिल जाती है।      

जब हम भारत से आकर पहली बार न्यूमार्केट शहर के अपने मोहल्ले में प्रवेश कर रहे थे तब एक इलेक्ट्रोनिक बोर्ड पर  सूचना चमचमा रही थी कि आगामी सप्ताह से एक माह तक सड़कों के किनारे कुछ निर्माण और मरम्मत आदि का कार्य प्रारम्भ होने वाला है। 

दो तीन दिन बाद जब हम लोग शाम को पैदल घूम रहे थे, हमने देखा कि सड़क किनारे के सारे पेड़ों के आसपास आयताकार खूबसूरत गुलाबी जालियों से फेंसिंग कर दिया गया है। जहां जहां से अंडर ग्राउंड पाइप लाइन अथवा केबल गुजरे थे वहां भी छोटी झण्डियां लगा दी गईं। सड़कों पर भी रंगीन खड़िया से आवश्यक मार्क और संदेश लिखे दिखाई दिए।

पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता, क्षेत्र के नागरिकों को पूर्व सूचना, निर्माण कार्य में लगे कर्मियों और इंजीनियरों को काम के दौरान सावधानियों के संदर्भ में ये बहुत पेशेवर दृष्टिकोण ही कहा जायेगा।

कुछ दिनों में बड़ी मशीने और ट्रेलर भी शाम की सैर के समय दिखाई देने लगे। वे गाड़ियां सड़क के किनारे खड़ी रहती और उनके चारों तरफ भी अस्थायी डिवाइडर से उन्हें घेरा हुआ होता था। कोई एक सप्ताह हम उन्हें सुबह शाम देखते थे। हाँ, उनके पार्किंग का स्थान सड़क किनारे थोड़ा आगे जरूर खिसकता रहा।

शाम को उन्हें देखकर मैं अक्सर सोचता रहता था कि जब कोई निर्माण कार्य हो नही रहा तो फिर ये मशीने और निर्माण कार्य वाले वाहन किस बात के लिए खड़े रहते हैं। कोई मटेरियल भी नजर नहीं आ रहा। लेकिन ऐसा नहीं था। काम भी चल रहा था और लगभग समाप्ति की ओर भी बढ़ रहा था।

दरअसल यही वह बात थी जो हमारे यहां से थोड़ी अलग लगी मुझे। पूरे इलाके में सड़क किनारे की पाइप लाइन को बदला जा रहा था। निर्माण सामग्री तैयार होकर शायद उतनी ही कार्य स्थल पर पहुंचती रही जितनी उस दिन के कार्य के लिए जरूरी होती थी।

हमारे सुबह शाम की सैर के बीच दोपहर को काम चलने से हलचल का हमें पता नहीं चलता था। शाम तक मटेरियल आदि की गंदगी को इस तरह साफ कर दिया जाता रहा कि कुछ पता ही नहीं चलता था कि यहां दिन भर कोई मरम्मत या पाइप लाइन बदलने का कार्य होता रहा है।

हमारे यहाँ निर्माण के पहले अक्सर मटेरियल के पहाड़ सड़कों पर दिखाई देने लगते हैं। समारोह पूर्वक पहले गिट्टी के ढेर का कोई नेताजी  पूजन करते हैं। कार्य की प्रगति के दौरान मुहल्ले के नागरिक सड़कों पर फैले हुए मटेरियल और बिगड़े हुए ट्रैफिक से बेहाल होने को अभिशप्त हो जाते हैं। इससे इनकार शायद ही कोई करेगा कि हमारे यहां काम किये जाने का हल्ला, प्रदर्शन कुछ ज्यादा होता है।

यद्यपि अब इस दिशा में थोड़ा परिवर्तन कुछ-कुछ हमारे यहाँ के महानगरों की पालिकाओं के कामकाज में नजर आने लगा है। लेकिन कस्बों और छोटे शहरों में यह होना अब भी अभी बाकी है। फिर भी बिना हो-हल्ले के नागरिकों,पेड़-पौधों और पर्यावरण को कष्ट पहुंचाए बगैर, साफ सुथरे ढंग से चुपचाप काम सम्पन्न करना सचमुच अनुकरणीय बात कही जा सकती है। वह चाहे कनाडा में हो या फिर भारत में। 

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मिट्टी से शब्दचित्र तक


बैकयार्ड की सफाई के बाद एक क्यारी बनाई थी, जिसमे कुछ फूलों और सब्जियों के बीज डालने का मन हुआ था। गमलों और क्यारी के लिए खाद युक्त मिट्टी जरूरी थी और वह यहाँ बाजार से ही मिल सकती थी। ‘होम डिपो’ हमारी इस आवश्यकता की पूर्ति कर सकता था।
होम डिपो एक अमेरिकन कम्पनी है जो भवन निर्माण और विकास से सम्बंधित टूल्स, और निर्माण तथा उसमें प्रयुक्त सभी प्रकार की सामग्री और सेवाओं का विक्रय करती है। इसी बहाने भवन निर्माण से संबंधित इस बड़ी कंपनी के बहुत विशाल स्टोर 'द होम डिपो' को देखने का अवसर मिला।

कनाडा के न्यूमार्केट शहर के इस स्टोर को देखना हमारे लिए सचमुच हतप्रभ करने वाला था। एक ही छत के नीचे घर बनाने से लेकर उसे सजाने और जीवन की जरूरी आवश्यकताओं के साधन यहां उपलब्ध थे।

विकसित देशों के आधुनिकतम बाजार का यह एक छोटा हिस्सा भर था लेकिन मेरे जैसे विकासशील देश के बाशिंदे के लिए दांतों तले उंगली दबाने जैसी बात ही थी। स्टोर के प्रत्येक डिपार्टमेंट के व्यवसाय के लिए हमारे यहाँ अलग अलग बाजार,शो रूम्स और दुकानें होती हैं। जिसकी वजह से हजारों बेरोजगारों के लिए रोजगार और छोटे कारबारियों को अपने व्यवसाय के लिए अवसर मिलते हैं। सच तो यह है की हमारे जैसे विकासशील देशों में छोटे व्यापारियों और युवाओं को रोजगार देना आज भी बड़ी जिम्मेदारी है।

बहरहाल, हम एक प्रवासी पर्यटक की निगाह से एक विकसित देश के जन-जीवन को देखने समझने और स्मृतियों में दर्ज करने के प्रयास में यहाँ मौजूद थे। इसी स्टोर के एक हिस्से में एक 'गार्डन सेंटर' था,जिसमें फूलों और पौधों की खूबसूरत गैलरियां सजी थीं। एक नर्सरी भी थी जिसमें फलों,सब्जियों और फूलों के बीजों के पैकेट्स और तैयार किये गए पौधों के अलावा गार्डन विकास के साधन और उन्हें सजाने के लिए खूबसूरत गमले,शो पीस,खिलौने आदि भी उपलब्ध थे।

यहीं अलग अलग कामों के लिए प्रयुक्त होने वाली मिट्टी भिन्न भिन्न मात्रा की बोरियों में उपलब्ध होती है। मसलन फूलों की क्यारियों के लिए अलग तो लॉन और सब्जियों के लिए अलग। उपयुक्त खाद और समिश्रण से उपचारित मिट्टी का भाव भी अलग अलग था।
लगभग एक घण्टे तक स्टोर के भ्रमण व अवलोकन के बाद हमने 10/10 किलो की 3 परिष्कृत मिट्टी की बोरियां यहां से खरीदीं। वैसे मुख्य उद्देश्य तो इस विशाल स्टोर को देखना ही था।
यहां होम डिपो में ज्यादातर खरीददार मुझे सामान्य गृहस्थ लोग नजर आए। कॉन्ट्रेक्टर की बजाय इधर बहुत सा घर का काम लोग खुद ही कर लेते हैं। इलेक्ट्रिशियन,कारपेंटर,प्लम्बर, बागवान आदि के काम के लिए बहुत जरूरत होने पर ही किसी बाहरी व्यक्ति को बुलाया जाता है।

इस खास बात से मुझे अपने बचपन के उन दिनों की याद हो आई, जब घर के काम के लिए किसी बाहरी कामगार या कारीगर को नही बुलाना पड़ता था। छोटी मोटी कारपेंटरी, इलेक्ट्रिशियन, घर की पुताई, बाड़े में बागवानी और दीपावली पर घर की लिपाई,पुताई तक हम घर के सदस्य मिल जुल कर कर लिया करते थे। यहां तक कि हम लोगों ने घर के बाड़े में ईंटों को गारे(गीली मिट्टी) से चुनकर एक कमरा भी बना लिया था, जिसमें रसोईघर के लिए जलाऊ लकड़ियां, लकड़ी का बुरादा, कोयले आदि रखे जाते थे। हम बच्चों के इन कामों का नेतृत्व और दिशा देने का काम अक्सर मेरे जीनियस काका और मेरी मेहनती माँ किया करती थीं। जिनकी प्रेरणा और प्रोत्साहन से लिखना सीखा और अब कुछ शब्दचित्र रचने की कोशिश करता रहता हूँ।
यहाँ परदेस में उनकी याद बारिश की बूंदों की तरह मन को भिगो रही है....

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सहयोग की दिव्य अनुभूति

प्राकृतिक रूप से या किसी दुर्घटनावश शारीरिक रूप से कुछ कमियों के रह जाने पर ऐसे विशेष व्यक्तियों को ‘फिजिकली हेंडीकेप्ट’ या ‘विकलांग’ जैसे शब्दों से पुकारा जाता रहा है. बाद में संबोधन में सम्मान देने की दृष्टि से ‘स्पेशली चैलेंजड’ या ‘दिव्यांग’ जैसे बेहतर शब्दों को आगे बढाया गया. बोलने और सुनने की शक्ति में कमी होने पर ऐसे लोगों को गूंगे बहरे की जगह ‘मूक बधिर’ और आँखों से देखने में अक्षम होने पर या नजर कम हो जाने पर ‘नेत्रहीन’ की बजाए ‘दृष्टि बाधित’ का प्रयोग किया जाना किसी भी सभ्य समाज में इन विशेष व्यक्तियों के लिए सम्मानजनक जगह बनाने के प्रयासों का एक महत्वपूर्ण और मानवीय संवेदनाओं का अनुकरणीय उदाहरण कहा जा सकता है.

दुनिया भर में कम ज्यादा पैमाने पर ऐसे प्रयास दिखाई देते हैं. कनाडा प्रवास के दौरान मुझे दिव्यांगों को लेकर नागरिक और सरकारी स्तर पर किये गए प्रयासों को देख-जानकर बहुत अच्छा लगा. कागज़ पर बनाई गयी योजनाओं का सचमुच धरातल पर क्रियान्वित होना विशेष व्यक्तियों के प्रति सहयोग और सच्ची संवेदनाओं का परिचायक है.

यहाँ हर सार्वजनिक स्थल पर विशेष व्यक्तियों के लिए आगे बढ़कर सुविधाएं उपलब्ध कराईं  गईं हैं. सार्वजनिक बसों में चढ़ने, उतरने के लिए लो फ्लोर और विशेष लोगों के ट्रेन कोच के सामने स्टेशनों पर कुछ ऊंचे उठे हुए प्लेटफोर्म बने हैं. विकलांग व्यक्ति अपनी व्हील चेयर सहित आसानी से भीतर प्रवेश कर लेता है. बस या कोच के भीतर भी व्हील चेयर को खडा रखने के लिए स्थान छोड़ा गया होता है. यहाँ दो-तीन व्हील चेयर्स अन्य यात्रियों को बिना कोई परेशानी के खडी की जा सकती हैं.

रजिस्ट्रेशन या टिकिट काउंटरों पर दिव्यांगों के लिए अलग से खिड़कियाँ, पार्किंग स्थलों पर उनकी चार पहिया या चेयर गाड़ियों के लिए आरक्षित स्थान, रेलवे स्टेशनों, बाजारों, पार्कों, सभागृहों, मनोरंजन स्थलों आदि में रैम्प, एक्सलेटरों के अलावा अलग से लिफ्ट आदि रखे जाना अनिवार्य सा ही है. मैंने कनाडा प्रवास के दौरान ऐसा कोई स्थान नहीं देखा जहां इन चीजों की उपेक्षा की गई हो. बल्कि इनके लिए नियत पार्किंग स्थानों का उपयोग सामान्य व्यक्ति द्वारा किया जाने पर दंडात्मक टिकट अवश्य कट जाता है.

जरूरतमंद की मदद और सहयोग करना तो यहाँ संस्कारों का हिस्सा महसूस हुआ. जहां सामान्य व्यक्ति के लिए ही जब सहयोग के हाथ बढ़ना सामान्य बात है वहां ‘विकलांग’ के लिए तो कोई कसर रह ही नहीं सकती इधर.
यद्यपि भारतीय समाज में भी विशेष व्यक्तियों के प्रति नजरिये और व्यवहार में शनै शनै सकारात्मक परिवर्तन आता दिखाई दे रहा है. लेकिन जन्म से शारीरिक कमी लिए बच्चे  के विकास और उसके शिक्षण प्रशिक्षण में वह रूचि और दायित्व अभी पालकों में पैदा नहीं हो सका है जो इधर विकसित समाज में नजर आता है. विकलांग व्यक्ति यहाँ लगभग मुख्यधारा का हिस्सा है. हमारे यहाँ आज भी अधिकाँश ग्रामीण और गरीब परिवारों के विशेष व्यक्ति चौराहों , मंदिरों या सार्वजनिक स्थलों पर मदद की गुहार लगाते दिखाई दे जाते हैं. सरकारें और स्वैच्छिक संगठन उनकी मदद के लिए जरूर कुछ आगे आकर तिपहिया आदि भेंट कर उनकी सहायता करने की थोड़ी सी कोशिश करते रहते हैं, लेकिन जब तक बचपन से ही उनमें आगे बढ़ने का जज्बा और अन्य सामान्य लोगों में उनके प्रति दृष्टिकोण में परिवर्तन जागृत नहीं होगा, तब तक बात बनती दिखाई नहीं देती.

‘विकलांग’ को ‘दिव्यांग’ जैसे शब्द में बदलकर भावनात्मक रूप से तो अपनी पीठ अवश्य ठोकी जा सकती है लेकिन आचरण और व्यवहार में वास्तविक दिव्यता तो तब ही आएगी जब हमारे मुंह से निकलेगा- ‘पहले आप!’




          


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