Saturday, 24 October 2020

स्वान्तः सुखाय 58 महाअष्टमी : प्रसाद भोग व धूप

स्वान्तः सुखाय 58

महाअष्टमी : प्रसाद भोग व धूप 


दशहरे के पूर्व आने वाली महाअष्टमी का कुटुंब में बड़ा महत्व हुआ करता था। परिवार के छोटे बड़े जो भी सदस्य नौकरी या पढ़ाई आदि के सिलसिले में बाहर होते थे उन्हें भी एक तरह से महाअष्टमी के दिन घर आना जरूरी होता था। यह एक परंपरा सी बनी हुई थी। दशहरे या दिवाली पर यदि न आ सकें तो एक बार स्वीकार्य होता किन्तु 'माता पूजन' के प्रसाद की धूप देने के लिए परिवार के हर सदस्य का उपस्थित होना जरूरी होता था। 

इस बहाने अबोले में चल रहे सगे संबंधियों में पुनः संवाद शुरू होने की गुंजाइश भी रहती थी। भले मतभेद बने रहते किन्तु मनभेद थोड़े कम हो जाया करते थे।

 

माता का प्रसाद बनना और पूजन आदि भी उसी घर में होता था जहां परिवार के मुखिया का निवास होता। बोलचाल में उसे 'बड़ा घर' कहते। बड़े घर पर सब इकट्ठा होकर पूजन,भोजन आदि एक साथ करते थे।


हमारे यहां भी ऐसा ही होता था। इसके अलावा कई बार हमारे नाना व नानी का भी स्नेह सानिध्य हमे मिल जाता था। दरअसल, उन्होंने किसी कठिन क्षण में यह मानता या संकल्प ले लिया था कि हर वर्ष नवरात्रि का समय चामुंडा की नगरी देवास में ही गुजारेंगे। पूरी नवरात्रि और दशहरे तक वे यहां रहते तो घर में बड़ी चहल पहल बनी रहती। नाते रिश्तेदार भी उनसे मिलने जुलने आते। कुटुंब में नए सगाई संबंधों और रिश्तों के सूत्र खोजने में उनकी बड़ी मदद रहती थी। 


नौकरी में मैं जब भी बाहर रहा महाअष्टमी के दिन माँ के पास देवास आ ही जाता था। कुटुंब के कई परिवारों में तो प्रसाद के बनने की बड़ी कठिन व्यवस्था होती थी। घर की घट्टी पर अनाज पीसा जाता था। बनता हुआ भोग कोई अन्य व्यक्ति देख नहीं सकता था। स्वयं घर की महिलाएं ही प्रसाद भोग की तैयारी कर बनातीं थीं। 

हमारी दादी अधिक कट्टर नहीं थीं,उन्होंने माँ को भी रियायतें दे रखीं थी। जमाने के हिसाब से जो सहजता से संभव हो वह करने की छूट मिल गई थी। बाद में पत्नी को भी यह रियायत प्राप्त हो गई। 

हाँ, इतना अवश्य था कि प्रसाद में भेल नहीं करना होता है, जैसे पकोड़ी सिर्फ बेसन की बनेगी,उसमें हरी मिर्च और प्याज नहीं पड़ेगा। पूरियों में नमक नहीं डलेगा। इसके पीछे का तथ्य मुझे अब तक समझ नहीं आया।

यह भी दिलचस्प है कि बिना भेल का भोग लगाने वाले हमारे परिवार में अष्टमी की धूप अष्टमी-नवमी के भेल समय में दी जाने की परंपरा है। सबके यहां अष्टमी की दोपहर भोग लगता है हमारे यहां गोधूलि बेला में।


प्रतिवर्ष अष्टमी के दिन प्रातः देवास की बड़ी माता तुलजा भवानी मंदिर में कभी दादाजी नियमित हवन करवाया करते थे। बाद में पिताजी उस दिन नारियल व पूजा सामग्री चढ़ाकर आते रहे। बाद में स्थानीय भाई आदि यह जिम्मेदारी निभाने लगे। 


अब तो कुटुंब में सामूहिक पूजन कभी कभार ही सम्भव हो पाता है।  इकट्ठा होने की वह परम्परा निभाई जाने की स्थितियां वैसी नहीं रहीं।

हालांकि भोग अब भी लगता है, माता को धूप भी दी जाती है। पात्र में उठती अग्नि और धूम्र का चित्र वाट्सएप पर शेयर हो जाता है। परदेस में बैठे बच्चे अगली सुबह जागने पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग करके प्रणाम कर लेते हैं....


ब्रजेश कानूनगो

स्वान्तः सुखाय 57 चामुंडा पहाड़ी से स्मृतियों का फ्लैशबैक

स्वान्तः सुखाय 57

चामुंडा पहाड़ी से स्मृतियों का फ्लैशबैक

नवरात्रि को लेकर संस्मरण लिखते वक्त अचानक मुझे मेरे सहपाठी और बाद में बैंक में मेरे साथी भीमराज स्वामी की याद हो आई। कुछ वर्ष पूर्व ही वे सेवानिवृत्त होकर स्थायी रूप से इंदौर आ गए हैं। प्रत्यक्ष मुलाकात तो हाल फिलहाल सम्भव नही हुई है किंतु  कुछ समय पहले की उनकी कही एक बात याद आ गई। उन्होंने स्कूल के दिनों को याद करते हुए कहा था- ' ब्रजेश तुम कक्षा के ब्लैकबोर्ड पर कितनी जल्दी और सुंदर चामुंडा माता की तस्वीर चॉक से बना दिया करते थे।' मुझे तो याद ही नही था किंतु उनके याद दिलाने पर जैसे आज पुनः सब कुछ याद आने लगा है।

छठी कक्षा से लेकर आठवी कक्षा तक की पढ़ाई हमने जिस स्कूल में की थी उस सरकारी मिडिल स्कूल को 'नई बिल्डिंग स्कूल' के नाम से ही जाना जाता था। यकीनन वह बिल्कुल नया ही बना था। पूरे प्रदेश में उसी डिजाइन के स्कूल भवन बनने लगे थे। आज भी लगभग उसी पैटर्न में याने अंग्रेजी के 'एच' आकार में बनते हैं,इससे सुविधा यह रहती है कि हर मौसम में पूरे स्कूल के हर कमरे में सुगमता से आया जाया जा सकता है।

इस स्कूल की खासियत इसकी खास लोकेशन भी थी। पास में शहर के महाविद्यालय तो थे ही लेकिन इस बिल्डिंग से लगा हुआ ही एक खेल का मैदान भी था,जिसे 'ओलंपिक ग्राउंड' कहा जाता था। बिल्डिंग से लगी हुई एक तलैया सी थी,जिसमे बरसात में पानी भरा रहता। उसमें पत्थरों की कत्तलें सनसनाते तैराने में हम बच्चों को बड़ा मजा आया करता था। इसी तलैया के पीछे राजा महाराजाओं की समाधियां थीं, जहां बहुत खूबसूरत छतरियाँ बनाकर शिवलिंग स्थापित किये गए थे। इसे छत्री बाग कहा जाता था। इससे जुड़ा देवास का बहुत सुंदर 'मीठा तालाब' था। मीठे तालाब में कमल खिला करते थे।

स्कूल के पास बल्कि स्कूल प्रांगण के भीतर तक पुराना लेकिन उपयोग में नहीं आ रहा कब्रिस्तान भी था। इन पुरानी कब्रों पर पेड़ की छाया में बैठकर छुट्टी के बीच हम दोस्त हंसी मजाक करते रहते थे। कोई भय नहीं लगता था।इतनी बात इसलिए कही कि इन्हीं कक्षाओं में पढ़ते हुए हमारी कई रुचियाँ उभरने लगीं थीं। बहुत से मित्रों में जो दो मुझे खास तौर से याद आ रहे। उनमे एक भीमराज स्वामी तो हैं ही दूसरे मित्र थे शेखर पागे। 

भीमराज मूलतः दक्षिण भारत के होते हुए भी मालवी व्यक्ति हैं। उनके जन्म से लेकर पालन पोषण,पढाई सब कुछ इधर देवास मालवा में ही हुआ था। उन्हें तमिल नहीं आती। मित्रों के परिजनों से मालवी में बढ़िया बतिया लेते हैं। नौकरी के दौरान उनके प्रमोशन पर गलतफहमी में उनका ट्रांसफर जब चैनई करके प्रबन्धन ने उनका भला करना चाहा तो वे घबरा गए। बहुत मुश्किल से मैनेजमेंट को गले उतारना पड़ा कि स्वामीजी ठेठ मालवी और हिंदी भाषी व्यक्ति हैं। ओलम्पिक ग्राउंड पर होने वाले खेलों खासकर फुटबॉल व  क्रिकेट देखते,खेलते हुए भीमराज प्रतिभाशाली क्रिकेटर बने और आगे चलकर कई टूर्नामेंट्स में विक्रम विश्वविद्यालय की टीम का प्रतिनिधित्व व टीम का नेतृत्व भी किया।

ऐसे ही शेखर पागे स्कूल में मौलिक कविताएं लिखा करते थे। खूब पढ़ने लिखने वाले बुद्धिमान किस्म के विद्यार्थी थे। मैंने उन पर कविता की कुछ पंक्तियाँ लिखीं थीं-' शेखर पागे एक कवि हैं,कुछ दुबले कुछ पतले से!' शेखर के सानिध्य में शायद कविता आदि करने का कोई वायरस प्रवेश किया होगा ,ऐसा मुझे अब भी लगता रहता है। शेखर पागे से प्रत्यक्ष मिले बरसों हो गए हैं। कोरोना स्थितियां सामान्य होने पर अवश्य मिलने की कोशिश होगी।

बहरहाल, बात तो चामुंडा माता और देवास टेकरी की ही हो रही है। जैसा मैंने पहले की कड़ियों में कहा भी है कि देवास की टेकरी एक ऐसा डेस्टिनेशन है जहां शहर के निवासी ही नहीं बाहर से आए मेहमान की भी वहां की सैर के लिए रुचि जागृत हो ही जाती है। पहाड़ी पर पहुंचकर नीचे के दृश्य को निहारना बहुत कुतूहल पैदा करता है। भोपाल, ग्वालियर,उज्जैन,इंदौर की ओर जाने वाली सड़कें शहर से दूर जाते जाते बारीक लकीरों में बदलती दिखाई देते हुए विलीन हो जाती है... इंदौर से उज्जैन की दिशा में आने जाने वाली रेल गाड़ियों को घुमावदार पटरियों पर रेंगते हम लोग बरसों से देखकर रोमांचित होते रहे हैं। सबसे ऊंचे पीपल के पेड़ से बचपन के मोहल्ले के पुश्तैनी घर को पहचान कर हम लोग उंगली के इशारे से मेहमानों को बताकर अद्भुत खुशी को आज भी महसूस कर पाते हैं। मीठा तालाब और छत्री बाग के सुंदर दृश्य मन को मोह लेते हैं। टेकरी पर सात कुंड और कुछ में सुंदर मछलियों की अठखेलियां, दमदमे (हिल टॉप) पर खड़ा विजय स्तम्भ, सूखी हुई दूध तलाई और उसके सूख जाने की किवदंती। क्या कुछ याद नहीं आ रहा।

जन्माष्टमी पर टेकरी स्थित राजकीय तोप घर से तोप का बाहर निकलकर आना और 21 तोपों की भगवान को सलामी। अब तो इस तोपखाने के नजदीक  ख़ूबसूरत और शांत जैन मंदिर का नव निर्माण हो गया है।  

पुराने शहर के दूसरी तरफ वाले दृश्य में बैंक नोट प्रेस, पुलिस परेड ग्राउंड, सबसे पुरानी फेक्ट्री गाजरा गियर्स और स्टील ट्यूब्स आदि। एरिना जिसमें कई कुश्तियां लड़ी गईं। ओह!! क्या क्या याद करें.….

चामुंडा माता की प्रतिमा में अलग अलग रूप नजर आने की दन्त कथाएं भी खूब प्रचलित रहीं हैं। हमें भी लगता था जैसे प्रतिमा में सुबह किसी बच्चे की मासूमियत, दोपहर में किसी युवती सा उत्साह और शाम को प्रौढ़ता का गाम्भीर्य दमकने लगता है।

देवी की हमारी समझ का बाद में और विस्तार हुआ।  स्त्री के वे भिन्न स्वरूप हमें अन्यत्र भी दिखाई देने लगे....लगा जैसे वह प्रतिमा तो सर्व व्यापी है...कई जगह अलग अलग स्वरूपों में दिखाई देने लगती हैं।

एक कविता यहां पढ़ें जो कुछ वर्ष पूर्व लिखी थी..


कविता

देवी मंदिर में

ब्रजेश कानूनगो


श्रीमानजी !

आप बहुत भाग्यशाली हैं

जो पधारें हैं माता मंदिर


सुबह बच्ची

दोपहर युवती

शाम को औरत का

रूप धरती है चमत्कारी प्रतिमा


धन्यवाद पंडित जी! 

सच तो यह है कि

फूल-पत्तों, धरती-आकाश

हर जगह दिख जाता है अक्सर

देवी का यह अद्भुत रूप मुझे


एक देवी चहक उठती है सुबह-सुबह   

थकान को हर लेती दूसरी

एक का नेह भरा हाथ

विश्वास से भर देता है हर शाम        


क्षमा करें

भीतर नगाड़े सा कुछ बजने लगा है

मुझे घर लौटना चाहिए अब.


(रचनाकाल: 2016)


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ब्रजेश कानूनगो

स्वान्तः सुखाय 56 चलो बुलावा आया है…..

स्वान्तः सुखाय 56

चलो बुलावा आया है…..


नवरात्रि के समय  वैसे तो पूरा देश बहुत उल्लास और पूजा आराधना से सराबोर रहता है किंतु जिन शहर कस्बों आदि में किसी देवी का मंदिर या स्थान होता है वहां का समूचा वातावरण ही 'मातामय' हो जाता है। बड़ी धूमधाम बनी रहती है।

आमतौर पर जहां देवी मंदिर किसी पहाड़ी पर स्थित होता है,वहां की रौनक देखते ही बनती है। जत्रा, मेले आदि भी इन दिनों खूब सजते हैं और लोग त्योहारों और पर्व का खूब आनन्द उठाते हैं। मेरे गृहनगर देवास की भी यही विशेषता रही है। बचपन से ही सुनते रहे कि  इस सांस्कृतिक नगरी का नाम 'देवास' भी 'देवताओं के वास' की वजह से ही पड़ा है। लगभग 300 फुट ऊंची पहाड़ी पर देवी चामुंडा और देवी तुलजा भवानी के मंदिर स्थित होने से इस पहाड़ी को 'माताजी की टेकरी' ही कहा जाता है। बाद में ब्रिटिश इतिहासकार ईएम फॉस्टर ने अपनी पुस्तक 'हिल ऑफ देवी' में भी देवास का उल्लेख किया है। 

शहर के स्त्री,पुरुष, युवा सभी नित्य ही बारहों महीने सुबह शाम इस पहाड़ी पर भ्रमण के लिए जाते हैं। बचपन में परिवार के बड़े बूढ़े बच्चों को सुबह शाम की सैर के लिए टेकरी पर नियमित जाने को कहते थे। खासतौर से टेकरी पर जाना दैनिक वर्जिश का प्रमुख हिस्सा होता था। 

देवास की टेकरी पर जाने के उस वक्त दो रास्ते हुआ करते थे। एक खड़ी रपट थी जो पश्चिम क्षेत्र के रेलवे स्टेशन की ओर से ऊपर जाती है। इसी के मोहक मुहाने पर आज भी शास्त्रीय गायक पद्मविभूषण प. कुमार गंधर्व जी का निवास 'भानुकुल' स्थित है। दूसरा रास्ता सीढ़ियों का  था जो काले पत्थरों से निर्मित था, बीच में कुछ जगह कच्ची रपट भी हुआ करती थीं। कुछ अन्य रोमांचक पैदल रास्ते बच्चों और युवाओं ने खोज निकाला थे। इन रास्तों से होकर पहाड़ी के ऊपर तक पहुंचने को 'खड़े पहाड़ चढ़ना' बोला जाता था। पेरेंट्स बच्चों को अक्सर हिदायत देते थे कि जाओ मगर खड़े पहाड़ मत चढ़ना। हम लोग हामी जरूर भरते थे 'नहीं चढ़ेंगे' किंतु करते इसके ठीक विपरीत  टेकरी पर 'खड़े पहाड़'  चढ़ने का ही जोखिम उठाते। 

सीढ़ियों वाले रास्ते से जाने का भी अपना अलग रोमांच था। एक तो वह हमारे मुहल्ले से बहुत नजदीक था। दौड़ते दौड़ते टेकरी के सीढ़ियों वाले रास्ते पर पहुंच जाते थे। सीढ़ियों को भी दौड़ते हुए चढ़ जाया करते। सीढ़ियों की गिनती करते। अब तो याद नहीं रही उस वक्त की सीढ़ियों की संख्या। बीच में कच्ची रपट भी थी। इसी के किनारे एक जगह पत्थर गिरा करते थे। यहां की कच्ची चट्टान की खास विशेषता यह थी कि इसकी बजरी को जब पानी भरे पात्र में डालते तो उसमें से सनसनाहट की आवाज  निकलती और हवा के बुलबुले निकलते थे। बहुत मजा आता था ऐसा करते हुए। इसी जगह गिरे हुए पत्थरों को जोड़कर घर नुमा कुछ बनाते। मान्यता थी कि माताजी उनके सपनों के आशियाने का सपना पूरा करेंगीं। 

देवास पहाड़ी की चट्टानों में कई जगह सफेद चमकती रंगोली सी दिखाई देती है। यह सम्भवतः अभ्रक खनिज है,कुछ लोग रंगोली पत्थर भी कहते हैं।

सीढ़ियां चढ़ने के बाद पूरी टेकरी पर परिक्रमा मार्ग है। जिस पर चलते हुए पुराने शहर और नए देवास का नजारा किया जा सकता है। पैदल सीढ़ियां देवी चामुंडा (छोटी माता) और जीप आदि वाला रपट मार्ग देवी तुलजा भवानी (बड़ी माता) के चरणों तक पहुंचता है।

कुछ दिलचस्प बातें याद आती हैं। चामुंडा माता मंदिर के ठीक सामने पत्थर का एक भारी गोला पड़ा होता था, मन्दिर प्रवेश से पूर्व जिसे कुछ भक्त अपने हाथों से बहुत मुश्किल से उठाकर कन्धे पर रखते और फिर उसे धरती पर पटकने के बाद चौखट पर मत्था टेक दर्शन के लिए प्रवेश करते थे। जोखिम भरा यह काम हर कोई नहीं कर पाता था। लेकिन जिसे यह कला आ जाती थी वह बहुत सहजता से भारी पत्थर उठाकर क्षण में धरती पर पटक देता था। हमारे पड़ोस के उस वक्त के 60/ 65 वर्षीय वृद्ध 'वल्लभ जी' जिन्हें हम 'बल्ला बा' कहते थे सहजता से यह करिश्मा करके सबको चकित कर देते थे। अब यह पत्थर का गोला शायद नहीं है वहां। किसी ने बताया था, वह नीचे खाई में गिराया जा चुका है।

खड़े पहाड़ चढ़ने के कई रास्ते अब सीढ़ियों में बदल गए हैं। खासतौर से शीलनाथ धूनी वाला एरिना (अखाड़ा) मार्ग। निराले नेता पोल साहब के निराले घोषणापत्र में उस समय के मजाकिया आश्वासन ने साकार रूप ले लिया है। अब टेकरी पर 'रोप वे' की सहायता से भी पहुंच कर माताजी के दर्शन किये जा सकते हैं।

और जो देवास में न हैं उन्हें तो किसी भी रास्ते पर पैदल चलने की जरूरत नहीं पड़ती। पंख लगे होते हैं मन पर...जहां चाहे पहुंच ही जाता है...

आइये यहां मेरी पहली कविता पढ़ लेते हैं....


कविता

अस्पताल की खिडकी से


कैसा होगा वहाँ ?

दूर दिखाई देती पहाडी के पीछे

सूरज निकलता है रोज जहाँ से


एक नदी होगी शायद

झरना भी हो सकता है

जो गिरता होगा पहाडी के ऊपर से

धरती पर गहरा गड्ढा हो गया होगा

पिकनिक मनाने आए बच्चों को

उधर जाने से रोक रहे होंगे दादाजी हाँक लगाते हुए


धान का खेत होगा पहाडी के पीछे

सतरंगे वस्त्रों को कमर में खोंसकर औरतें

रोप रहीं होंगी हरे पत्तेदार पौधे

गुनगुनाते हुए


देवी का मन्दिर होगा पहाडी की चोटी पर

तलहटी से सैकडों सीढियाँ पहुंचती होंगी वहाँ

एक दीप स्तम्भ होगा

और रात को रोशनी बिखर जाती होगी चारों ओर

एक बडा घंटा कुछ नगाडे रखे होंगे

आरती के वक्त बजाया जाता होगा जिन्हे


सडक बन रही होगी

काली टंकियों में पिघल रहा होगा तारकोल

चक्के पर घूम रहे डमरू में खडखडा रही होगी गिट्टियाँ

रोड रोलर के इंजिन की आवाज बदल रही होगी लोरी में

बबूल की छाया में बंधी झोली में सो रहा होगा कोई बच्चा

शोरगुल के बीच 


तमाम जीवित ध्वनियाँ उपस्थित होंगी वहाँ

जो नहीं है अस्पताल में खिडकी के पास लगे पलंग के आस-पास । 


(रचनाकाल :1995)


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(टेकरी की कुछ और यादें आगे...)


ब्रजेश कानूनगो

Saturday, 10 October 2020

स्वान्तः सुखाय 55 देशज को बचाने में चिंतित मालवी मनक : नरहरि पटेल

स्वान्तः सुखाय 55

देशज को बचाने में चिंतित मालवी मनक : नरहरि पटेल


उस दिन रविवार था। हमारे लिए वह खास दिन जब सामान्यतः अखबारों में 'साहित्य पृष्ठ' का प्रकाशन किया जाता रहा है। अब ऐसा नहीं है। या तो उस तरह के पृष्ठ अब रहे नहीं या फिर वहां साहित्य नहीं रहा। कुछ अपवाद हो सकते हैं किंतु उस दिन रविवार ही हो यह जरूरी भी नहीं।


तो उस दिन रविवार था और सुबह सुबह अखबार में छपी अपनी कविता का पुनर्पाठ कर ही रहा था कि मोबाइल में अन सेव्ड नम्बर से काल आया।


'बधाई ब्रजेश भाई! क्या खूब लिखा है आपने...मन प्रसन्न हो गया...अब तो उस अनुभूति को समझने वाले लोग ही नहीं रहे...कौन देखता है अब किसी कुतिया को इस तरह...नीम के नीचे जमीन खुरचकर खो बनाते...पिल्लों का धूप में खेलना और ठंड में एक दूसरे में कम्बल की तरह गुंथ जाना...!'

उधर से यह सब हिंदी, मालवी में बहुत आत्मीयता से कहा जा रहा था। मालवी व्यक्ति होते हुए मालवी भाषा मेरी रफत में नहीं रही, खड़ी बोली का व्यक्ति हूँ अतः सामने से आ रही उस मीठी मालवी और उस रस को यहां शब्दों में व्यक्त करना मुश्किल हो रहा है। 


यह भी निश्चित है कि जैसे ही मैं यहां यह बताऊंगा कि उधर से आने वाला यह उत्साहवर्धक आत्मीय फोन आदरणीय दादा नरहरि पटेल जी का था तो बहुत से लोगों को वे साक्षात अपनी शैली में प्रत्यक्ष बतियाते नजर आने लगेंगे।


दादा नरहरि पटेल जी को मैं लोक संस्कृति के बड़े जानकार, मालवी,निमाड़ी भाषा और परंपराओं से आत्मसात सुकवि, रंगकर्मी के रूप में भाषा और लोकजीवन में देशज पहचान को मिटते देखकर दुःखी और चिंतित रहने वाले संवेदनशील व्यक्ति के रूप में जानता रहा हूँ। इन्ही सब प्रयासों में उनके कार्य देखे जा सकते हैं। वह चाहे उनकी कविता हो,  नाट्यवाचन या अभिनय हो, वार्तालाप हो,व्याख्यान हो,संवाद हो या अभिव्यक्ति का अन्य कोई स्वरूप रहा हो। उनकी उसी खास रचनात्मक प्रतिबद्धता को रेखांकित किया जा सकता है। एक प्रतिबद्धता उनकी अपने युवाकाल से प्रगतिशील लेखक संघ से भी रही और उस जमाने के साहित्यकारों के साथ उन्होंने बहुत काम भी किया। एक सुखद सत्य यह भी है कि जब 1957 में मैं जब इस संसार में आ रहा था उस वक्त इंदौर आकाशवाणी केंद्र ने भी जन्म लिया। तब से ही दादा नरहरि पटेल रेडियो के श्रेष्ठ कलाकारों में शामिल रहे और आज 86 वर्ष की आयु में हम उनकी इस प्रतिभा का लाभ लेते रहते हैं... 


बहरहाल, जब भी मैंने किसी देशज और लुप्त होती बात या प्रसंग का उल्लेख अपनी किसी रचना में किया तब उनका एक फोन मुझ तक अवश्य पहुंचा। बड़ी देर तक वे स्वयं उस बहाने अपनी पीड़ा के साथ उस खुशी और आनन्द का अहसास भी कराते हैं जो उस देशज प्रयोग से संभव हो जाती है।


'मालवी जाजम' उनका एक ऐसा उपक्रम रहा है जिसमें वे मालवी बोली,संस्कृति को बचाए रखने के लिए नियमित बैठक करते रहते हैं। यह बहुत सुखद है कि उनके इस कार्य को आगे बढ़ाने के लिए एक पूरी टीम उनके मार्गदर्शन में तैयार हो गई है। उनके सुयोग्य पुत्र भाई संजय पटेल में उनके व्यक्तित्व और सुकर्मों की छवि स्पष्ट दिखाई देती है।


एक दो बार मुझे भी 'जाजम' में शिरकत करने का सौभाग्य मिला। गोष्ठी की अपनी खास पहचान है जिसमें लोकगीतों से लेकर साहित्य की सभी विधा में मालवी रचनाएं सुनाई और गाई जाती हैं। उनके ऐसे प्रयासों में श्री प्रह्लादसिंह टिपानिया जी सहित कई ख्यात कलाकारों को भी गौरव मिलता रहा है। 


मेरी कविता 'चिड़िया का सितार' पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए जैसे वे भावुक ही हो गए। बाद में पूरा संग्रह पढ़कर इत्मिनान से मेरा हौसला बढ़ाया। मैं धन्य हो गया उनका आशीष पा कर। लिखना सफल हुआ।


वरिष्ठ समाजसेवी व बैंक अधिकारी नेता श्री आलोक खरे जी के संयोजन में हमारे प्रकल्प 'समाज सेवा प्रकोष्ठ' द्वारा संयोजित तंगबस्ती के गरीब बच्चों के शिविर में जब एक बार उन्होंने बच्चों से बातचीत की,कविताएं सुनाई तो बच्चों को वह सब इतना भाया कि बाद में भी कई मौकों पर उन्हें शिरकत करनी पड़ी। 

कविता और गीतों की वे इतनी रोचक और भावभंगिमाओं के साथ प्रस्तुति देते हैं कि दर्शक, श्रोता मुग्ध तो होते ही हैं बल्कि  लोककाव्य और लोक संस्कृति का सीधा असर हृदय के भीतर तक महसूस किया जाने लगता है।


सच तो यह है कि दादा नरहरि पटेल जी को ठीक से जानना समझना है तो उनको आमने सामने बैठकर रचना पाठ करते,नाट्यवाचन या अभिनय करते देखना बहुत जरूरी होगा।


दादा के स्वस्थ और सुदीर्घ जीवन की कामना के साथ यहां उनका एक मालवी गीत पढ़ते हैं...कल्पना में उनको सामने महसूस जरूर करें...


मालवी गीत

नरहरि पटेल


कसा चेहकता था चेरकला कई याद हे के नी याद हे।

मस्ती में गम्मत रतजगा कई याद हे के नी याद है।


दादी की मीठी लोरियाँ नानी की रेशम झोरियाँ।

माँ की कसूमल थपकियाँ कई याद हे के नी याद हे।


होली दिवाली थी कसी राखी पे मनवाराँ कसी

घूमर दिवासा ढुमकणा कई याद हे के नी याद हे।


थानक पे माँगी थी मन्नताँ बस एक बालूड़ो दे माँ

माता की पूजा वंदना कई याद हे के नी याद हे।


सूरज उगाता था कूकड़ा संजा सुलाती थी रूँखड़ा

राताँ का चमचम चूड़ला कई याद हे के नी याद हे।


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ब्रजेश कानूनगो

Friday, 9 October 2020

स्वान्तः सुखाय 54 जिंदाबाद आकाशवाणी !!

स्वान्तः सुखाय 54  

जिंदाबाद आकाशवाणी !!


कॉलेज के दिनों में विज्ञान में स्नातक की पढ़ाई (शायद 1974) के समय अखबार में आकाशवाणी,इंदौर के लिए उद्घोषक की नियुक्ति के लिए विज्ञप्ति निकली थी। मन में रेडियो पर बोलने का सपना उस वक्त बहुत से रचनात्मक युवकों को आकर्षित करता था। 

यद्यपि आकाशवाणी का इंदौर केंद्र गृह नगर देवास से बस 35 किलोमीटर की दूरी पर ही था किंतु तब तक कभी अवसर मिला नहीं था। 


उद्घोषक के लिए विज्ञप्ति देखी तो मन में गुब्बारे से फूटने लगे। देवास के पंडित परिवार से हमारे पारिवारिक संबंध रहे थे। छोटी जगह या कस्बे में सभी एक तरह से उस वक्त रिश्तेदार की तरह ही माने जाते थे। गांव भाई और गांव काका आदि की परम्परा में सब अपने ही होते हैं। इसी परंपरा में देवास मूल के श्री नरेन्द्र पंडित हमारे काका की तरह ही थे।

अब यह बताना जरूरी भी नहीं कि श्री नरेन्द्र पंडित देवास के होकर आकाशवाणी इंदौर पर वरिष्ठ उद्घोषक, प्रोग्राम डायरेक्टर और केंद्र निदेशक तक रहे। वे संगीत और रंगकर्म में भी बहुत प्रतिभा सम्पन्न थे।


हमारी ख्वाहिश के बारे में हमारे काकाश्री ने पंडित जी को बताया और उनका मशविरा लिया। पंडित जी ने परिवार के किसी बड़े सदस्य की तरह ही राय दी कि अभी हमें अनाउंसर जैसी नौकरी का न सोचकर अपनी आगे की पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए। स्नातक और स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी करके देवास के औद्योगिक क्षेत्र में वैज्ञानिक के तौर पर बड़ी नौकरी के लिए कोशिश करना चाहिए। रेडियो आदि पर प्रस्तुति का सपना तो अन्य नौकरी करते हुए भी पूरा किया जा सकता है।

और बाद में हुआ भी यही। हम वैज्ञानिक तो नही बन सके किन्तु बैंक में क्लर्क जरूर बन गए। बैंक राष्ट्रीयकरण का दौर था। खूब भर्तियां हो रहीं थीं। वैज्ञानिक ही क्या इंजीनियर  और संभावित आईएएस तक बैंकों में चले गए। यह अलग बात है कि रुचिवान लोगों ने वहां रहकर भी अपने रचनात्मक शौक पूरे करने के अवसर तलाश ही लिए।  


'आई' कहानी के प्रसारण के बाद आकाशवाणी के इंदौर केंद्र से रचनाओं को प्रसारित करने के अवसर बाद में मिलते ही रहे। पहले अंतराल कम होता था,बाद में बुलावे का अंतराल बढ़ता गया। अब तो दो तीन साल में किसी स्नेही को याद आ जाती है।


आकाशवाणी पर जाकर वहां प्रसारण करने के भी बहुत से ऐसे प्रसंग हैं जिनकी स्मृति सुख देती रहती हैं। 'खेती गृहस्थी' में नन्दा जी और भैराजी की उपस्थिति में जाजम पर स्क्रिप्ट फैलाकर बैठना। वार्ता के आलेख को प्रश्नोत्तरी में बदल कर प्रस्तुत करना। हर पेरा के पहले नंदा जी और भैरा जी का प्रश्न। कान्हा जी थोड़ा बाद में आए थे। मुझे याद आ रहा... वह मेरा एक रम्य लेख था-'नामकरण मनोविज्ञान'। आज जब आकाशवाणी के उन लीजेंड्स के साथ फर्श पर बैठकर प्रस्तुति की कल्पना करता हूँ,रोमांच की अनुभूति से भर उठता हूँ।


एक विनोद वार्ता 'सफर में समाधि' मुझे खुद पढ़ना थी किन्तु नरेंद्र पंडित जी को इतना पसंद आई कि वह वार्ता उन्होंने स्वयं अपनी आवाज में पढी। उनके वाचन से मैने विनोद वार्ता पढ़ने के सूत्र समझे। आज भी जब कोई व्यंग्य रचना का पाठ करता हूँ नरेंद्र पंडित जी की स्मृति हो आती है।

एक प्रोग्राम के डायरेक्टर श्री प्रभु जोशी जी (प्रभु दा) थे। वे न सिर्फ चित्रकार,कथाकार हैं बल्कि बहुत जीनियस व्यक्ति हैं। उनके निर्देशित कई कार्यक्रमों को आकाशवाणी के बड़े पुरस्कार मिलते रहे हैं। बाद में वे दूरदर्शन में भी गए। मुझे एक विनोद वार्ता 'मतदान कैसा दान' पत्रिका कार्यक्रम  में पढ़ना थी। प्रभु दा तो फिर प्रभु दा ही थे, वे वार्ता को सामान्य कैसे रहने देते। उन्होंने वार्ता को मुझ से भाषण शैली में पढ़वाया। दो चार लोगों को भी साथ में बैठा लिया ताकि किसी सभा की तरह वातावरण बन सके। एकत्र लोग हर बात और जुमले के बाद तालियां बजाते। 

ऐसा लगता जैसे किसी नेताजी की सभा चल रही हो। 

और जब वार्ता के अंत में भीड़ नारे लगाती है..'ब्रजेश भैया जिंदाबाद..!' धीरे धीरे प्रभु दा फेड आउट करते जाते हैं। मेरा मन खुशी से फूलता जाता है।


आकाशवाणी के इन प्रयोधर्मी और जीनियस लोगों के प्रति जितनी कृतज्ञता व्यक्त की जाए कम होगी...


नमन इनकी प्रतिभा और प्रेरक समर्पण और काम के प्रति निष्ठा को...!


ब्रजेश कानूनगो

स्वान्तः सुखाय 53 'मालवा हाउस' से आई गत्ते की वह अटैची

स्वान्तः सुखाय 53 

'मालवा हाउस' से आई गत्ते की वह अटैची 


गत्ते और रैग्जीन से बनी एक छोटी सी अटैची (ब्रीफकेस) माँ बहुत संभालकर रखा करती थी। अपने आखिरी समय तक वे उसमे अपने कुछ जरूरी सामान और पत्र पत्रिकाओं में छपी मेरी रचनाओं की कतरने बहुत जतन से सहेजा करती थीं। जब भी मैं उनसे मिलने जाता वे सभी कतरनें दिखातीं। मन करता तब लगभग उनका पारायण सा भी करती रहती थीं। वे नियमित अखबार पढ़ती थीं। जब मैं घर से बाहर नौकरी पर या स्थायी रूप से इंदौर रहने लगा तब अखबार में प्रकाशित रचना का सबसे पहला बधाई फोन देवास से उनका ही आता था।  9 नवंबर 2017 से माँ के वैसे ममतामयी बधाई फोन का अब सिर्फ इंतजार ही रह जाता है...!


बात माँ की उस खास 'अटैची' की ही करते हैं। दरअसल, वह माँ के लिए इसलिए खास थी कि वह मेरी किसी रचना के पहले मानदेय की राशि से खरीदी गई थी। अस्सी के दशक में युवावस्था के दौरान शुरुआती समय में अपने दोस्तों,आसपास के लोगों,स्वजनों,पड़ोसियों आदि के चरित्रों,घटनाओं से प्रेरित होकर कहानियां लिखने का प्रयास करता था। 

ऐसी ही एक कहानी 'आई' शीर्षक से लिखी थी जो बचपन मे मुझे माँ की तरह स्नेह देने वाली पिताजी के दफ्तर के सहायक की पत्नी के जीवन संघर्ष को लेकर लिखी थी। 


'आई' को रेडियो सुनने का बहुत शौक था। हर साल वे नया ट्रांजिस्टर खरीद लाया करती थीं। रविवार या छुट्टी के दिन मैं उनसे वह हथिया लेता और पूरे दिन सुना करता था। उनकी कोई संतान नहीं थी।

बहरहाल, उन्ही स्नेहमयी 'आई' पर लिखी वह कहानी आकाशवाणी के इंदौर केंद्र से 'युववाणी' कार्यक्रम मेरी ही आवाज में प्रसारित हुई। 


उस कार्यक्रम की उस वक्त की संयोजक और उद्घोषक की एक छवि मन में अभी तक बनी हुई है। वे बहुत मोहक थीं,सांवली थीं किन्तु उनकी आंखें और आवाज मन मोह लेती थीं। स्वर कोकिला की तरह मधुरता उनकी सहज उपस्थिति से बिखर जाया करती थी। लोकप्रिय गानों के लोकप्रिय 'मन भावन' कार्यक्रम सुनते हुए रेडियो पर उनकी आवाज के हम दीवाने थे लेकिन प्रत्यक्ष मिलना पहली बार उस पहले प्रसारण के दिन ही हुआ। 

आज दिमाग पर बहुत जोर डालकर उनका नाम याद करने की कोशिश की लगता है सम्भवतः वे 'इंदु आनन्द' ही रही होंगीं। 


'मालवा हाउस' स्थित आकाशवाणी के इंदौर केंद्र के देश के सबसे बड़े व शक्तिशाली ट्रांसमीटर से निकली तरंगे उन दिनों देश के कोने कोने तक आसानी से पहुंच जाया करती थी। राजस्थान,गुजरात,महाराष्ट्र में आकाशवाणी इंदौर के कार्यक्रम बहुत रुचि से सुने जाते थे।


इंदु आनन्द जैसी स्टार उद्घोषिका के संयोजन में हमारी कहानी 'आई' का पहली बार प्रसारण के बाद हमें कुछ मानदेय नकद प्राप्त हुआ।  देवास लौटते हुए इंदौर से गत्ते की वह अटैची हमने खरीद ली। बहुत दिनों उसमें हमारे प्रमाण पत्र, अंक सूचियां रखते  रहे। जब पुरानी होकर टूटने , फटने लगी तो खाली कर दी हमने।

यह माँ की ही समझ थी कि उन्होंने उस पर अपने हाथों से कपडे का कवर सिलकर उसकी उम्र बढ़ा दी। 

पुत्र की उपलब्धि को इसतरह कोई माँ ही धरोहर की तरह महत्वपूर्ण बना सकती है...


रेडियो से जुड़ी कुछ और बातें आगे....


ब्रजेश कानूनगो

Thursday, 8 October 2020

स्वान्तः सुखाय 52 : रेडियो का फिर लौटना और स्मृतियों का

स्वान्तः सुखाय 52

रेडियो का फिर लौटना और स्मृतियों का झरोखा

बचपन के दिनों में रेडियो सुनते हुए सोचा करते थे कि कितना अच्छा हो कि इस जादूई बक्से के भीतर के लोग स्पीकर लगे पर्दे पर साक्षात गाते,बजाते,नाचते,नाटक करते,समाचार सुनाते दिखाई भी देने लगे।


और जब हमारी यह ख्वाहिश विज्ञान और टेक्नोलोजी ने पूरी कर दी और भारत में भी दूरदर्शन का उदय हुआ किन्तु रेडियो के श्रोता धीरे धीरे टीवी के दर्शकों में बदलते गए।


घर घर में टीवी आ गया। पहले एक मात्र सरकारी चैनल और वह भी श्वेत श्याम जिसे चुने हुए केंद्रों पर बमुश्किल देखना सम्भव होता था। दूरदर्शन के विकास की सारी कहानी हमारी सबकी देखी समझी है। टीवी की चर्चा फिर कभी। आज यहां मैं रेडियो के उस स्वर्णिम काल के उतार और उसके पुनः लौटने के दौर की बात करना चाह रहा हूँ।


दूरदर्शन के आने के बाद जब टीवी पर अन्य मनोरंजक चैनलों को अनुमति मिल गई तो भारतीय परिवारों के बहुत बड़े हिस्से के घरों से बचे खुचे रेडियो सेट भी गायब हो गए या उनका स्थान घर के कबाड़खाने में ही रह गया। 

जब किसी से कहते भी कि भाई आज हमारी कहानी रेडियो पर आने वाली है तो अपने ही परिचितों के घर में वह सुनी नहीं जा सकती थी। ऐसे में रचनाकार अपनी रचना आकाशवाणी केंद्र के माइक्रोफोन को सुनाकर, चेक प्राप्त कर संतृष्ट हो लेता।


लेकिन यह सब रेडियो के स्वर्णिम दौर के बाद के उस वक्त की विडंबना है जब टीवी ने रेडियो माध्यम को प्रतिस्थापित करना प्रारंभ कर दिया था।


और अब जब टीवी से दुनियाभर में लोग ऊबने लगे हैं। निजी मनोरंजक व खबरिया चैनलों में प्रतिस्पर्धा की घटिया लड़ाइयां चलने लगी हैं। समाचार,विचार सब कुछ किन्ही दबावों और स्वार्थों से संचालित होने लगे हैं। ऐसे में यह दिलचस्प है कि लोग पुनः रेडियो का रुख करने को उद्यत हुए हैं।


एफएम प्रसारणों और मोबाइल एप्स के जरिये रेडियो सुनना अब बहुत आसान हुआ है। भारत के लोक प्रसारण चैनलों पर भी अधिकतर सुरुचि और स्वच्छता नजर आती है। 

यह अच्छा ही है कि रेडियो पर अभी 'टीआरपी' का  गणित खुल कर गंदगी पैदा नहीं कर पाया है। लोग टीवी चैनलों के आतंक ,सनसनी,उत्तेजना और विवेक को कुंठित करने वाली हरकतों से ऊबकर रेडियो के पुराने दौर में लौटने को उद्यत हुए हैं।

आइए एक कविता पढ़ते हैं आज...


कविता

रेडियो की स्मृति

ब्रजेश कानूनगो


गुम हो गए हैं रेडियो इन दिनों

बेगम अख्तर और तलत मेहमूद की आवाज की तरह


कबाड मे पड़े रेडियो का इतिहास जानकर

फैल जाती है छोटे बच्चे की आँखें


न जाने क्या सुनते रहते हैं

छोटे से डिब्बे से कान सटाए चौधरी काका

जैसे सुन रहा हो नेताजी का सन्देश

आजाद हिन्द फौज का कोई सिपाही


स्मृति मे सुनाई पड़ता है

पायदानों पर चढता

अमीन सयानी का बिगुल


न जाने किस तिजोरी में कैद है

देवकीनन्दन पांडे की कलदार खनक

हॉकियों पर सवार होकर

मैदान की यात्रा नही करवाते अब जसदेव सिंह


स्टूडियो में गूंजकर रह जाते हैं

फसलों के बचाव के तरीके

माइक्रोफोन को सुनाकर चला आता है कविता

अपने समय का महत्वपूर्ण कवि


सारंगी रोती रहती है अकेली

कोई नही पोंछ्ता उसके आँसू  


याद आता है रेडियो

सुनसान देवालय की तरह

मुख्य मन्दिर मे प्रवेश पाना

जब सम्भव नही होता आसानी से

और तब आता है याद

जब मारा गया हो बडा आदमी

वित्त मंत्री देश का भविष्य

निश्चित करने वाले हों संसद के सामनें

परिणाम निकलने वाला हो दान किए अधिकारों की संख्या का

धुएँ के बवंडर के बीच बिछ गईं हों लाशें

फैंकी जाने वाली हो क्रिकेट के घमासान में फैसलेवाली अंतिम गेन्द

और निकल जाए प्राण टेलीविजन के

सूख जाए तारों में दौडता हुआ रक्त

तब आता है याद

कबाड में पडा बैटरी से चलनेवाला

पुराना रेडियो


याद आती है जैसे वर्षों पुरानी स्मृति

जब युवा पिता

इमरती से भरा दौना लिए

दफ्तर से घर लौटते थे।


(रचनाकाल 1995)


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ब्रजेश कानूनगो