Friday, 9 October 2020

स्वान्तः सुखाय 54 जिंदाबाद आकाशवाणी !!

स्वान्तः सुखाय 54  

जिंदाबाद आकाशवाणी !!


कॉलेज के दिनों में विज्ञान में स्नातक की पढ़ाई (शायद 1974) के समय अखबार में आकाशवाणी,इंदौर के लिए उद्घोषक की नियुक्ति के लिए विज्ञप्ति निकली थी। मन में रेडियो पर बोलने का सपना उस वक्त बहुत से रचनात्मक युवकों को आकर्षित करता था। 

यद्यपि आकाशवाणी का इंदौर केंद्र गृह नगर देवास से बस 35 किलोमीटर की दूरी पर ही था किंतु तब तक कभी अवसर मिला नहीं था। 


उद्घोषक के लिए विज्ञप्ति देखी तो मन में गुब्बारे से फूटने लगे। देवास के पंडित परिवार से हमारे पारिवारिक संबंध रहे थे। छोटी जगह या कस्बे में सभी एक तरह से उस वक्त रिश्तेदार की तरह ही माने जाते थे। गांव भाई और गांव काका आदि की परम्परा में सब अपने ही होते हैं। इसी परंपरा में देवास मूल के श्री नरेन्द्र पंडित हमारे काका की तरह ही थे।

अब यह बताना जरूरी भी नहीं कि श्री नरेन्द्र पंडित देवास के होकर आकाशवाणी इंदौर पर वरिष्ठ उद्घोषक, प्रोग्राम डायरेक्टर और केंद्र निदेशक तक रहे। वे संगीत और रंगकर्म में भी बहुत प्रतिभा सम्पन्न थे।


हमारी ख्वाहिश के बारे में हमारे काकाश्री ने पंडित जी को बताया और उनका मशविरा लिया। पंडित जी ने परिवार के किसी बड़े सदस्य की तरह ही राय दी कि अभी हमें अनाउंसर जैसी नौकरी का न सोचकर अपनी आगे की पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए। स्नातक और स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी करके देवास के औद्योगिक क्षेत्र में वैज्ञानिक के तौर पर बड़ी नौकरी के लिए कोशिश करना चाहिए। रेडियो आदि पर प्रस्तुति का सपना तो अन्य नौकरी करते हुए भी पूरा किया जा सकता है।

और बाद में हुआ भी यही। हम वैज्ञानिक तो नही बन सके किन्तु बैंक में क्लर्क जरूर बन गए। बैंक राष्ट्रीयकरण का दौर था। खूब भर्तियां हो रहीं थीं। वैज्ञानिक ही क्या इंजीनियर  और संभावित आईएएस तक बैंकों में चले गए। यह अलग बात है कि रुचिवान लोगों ने वहां रहकर भी अपने रचनात्मक शौक पूरे करने के अवसर तलाश ही लिए।  


'आई' कहानी के प्रसारण के बाद आकाशवाणी के इंदौर केंद्र से रचनाओं को प्रसारित करने के अवसर बाद में मिलते ही रहे। पहले अंतराल कम होता था,बाद में बुलावे का अंतराल बढ़ता गया। अब तो दो तीन साल में किसी स्नेही को याद आ जाती है।


आकाशवाणी पर जाकर वहां प्रसारण करने के भी बहुत से ऐसे प्रसंग हैं जिनकी स्मृति सुख देती रहती हैं। 'खेती गृहस्थी' में नन्दा जी और भैराजी की उपस्थिति में जाजम पर स्क्रिप्ट फैलाकर बैठना। वार्ता के आलेख को प्रश्नोत्तरी में बदल कर प्रस्तुत करना। हर पेरा के पहले नंदा जी और भैरा जी का प्रश्न। कान्हा जी थोड़ा बाद में आए थे। मुझे याद आ रहा... वह मेरा एक रम्य लेख था-'नामकरण मनोविज्ञान'। आज जब आकाशवाणी के उन लीजेंड्स के साथ फर्श पर बैठकर प्रस्तुति की कल्पना करता हूँ,रोमांच की अनुभूति से भर उठता हूँ।


एक विनोद वार्ता 'सफर में समाधि' मुझे खुद पढ़ना थी किन्तु नरेंद्र पंडित जी को इतना पसंद आई कि वह वार्ता उन्होंने स्वयं अपनी आवाज में पढी। उनके वाचन से मैने विनोद वार्ता पढ़ने के सूत्र समझे। आज भी जब कोई व्यंग्य रचना का पाठ करता हूँ नरेंद्र पंडित जी की स्मृति हो आती है।

एक प्रोग्राम के डायरेक्टर श्री प्रभु जोशी जी (प्रभु दा) थे। वे न सिर्फ चित्रकार,कथाकार हैं बल्कि बहुत जीनियस व्यक्ति हैं। उनके निर्देशित कई कार्यक्रमों को आकाशवाणी के बड़े पुरस्कार मिलते रहे हैं। बाद में वे दूरदर्शन में भी गए। मुझे एक विनोद वार्ता 'मतदान कैसा दान' पत्रिका कार्यक्रम  में पढ़ना थी। प्रभु दा तो फिर प्रभु दा ही थे, वे वार्ता को सामान्य कैसे रहने देते। उन्होंने वार्ता को मुझ से भाषण शैली में पढ़वाया। दो चार लोगों को भी साथ में बैठा लिया ताकि किसी सभा की तरह वातावरण बन सके। एकत्र लोग हर बात और जुमले के बाद तालियां बजाते। 

ऐसा लगता जैसे किसी नेताजी की सभा चल रही हो। 

और जब वार्ता के अंत में भीड़ नारे लगाती है..'ब्रजेश भैया जिंदाबाद..!' धीरे धीरे प्रभु दा फेड आउट करते जाते हैं। मेरा मन खुशी से फूलता जाता है।


आकाशवाणी के इन प्रयोधर्मी और जीनियस लोगों के प्रति जितनी कृतज्ञता व्यक्त की जाए कम होगी...


नमन इनकी प्रतिभा और प्रेरक समर्पण और काम के प्रति निष्ठा को...!


ब्रजेश कानूनगो

No comments:

Post a Comment