स्वान्तः सुखाय 57
चामुंडा पहाड़ी से स्मृतियों का फ्लैशबैक
नवरात्रि को लेकर संस्मरण लिखते वक्त अचानक मुझे मेरे सहपाठी और बाद में बैंक में मेरे साथी भीमराज स्वामी की याद हो आई। कुछ वर्ष पूर्व ही वे सेवानिवृत्त होकर स्थायी रूप से इंदौर आ गए हैं। प्रत्यक्ष मुलाकात तो हाल फिलहाल सम्भव नही हुई है किंतु कुछ समय पहले की उनकी कही एक बात याद आ गई। उन्होंने स्कूल के दिनों को याद करते हुए कहा था- ' ब्रजेश तुम कक्षा के ब्लैकबोर्ड पर कितनी जल्दी और सुंदर चामुंडा माता की तस्वीर चॉक से बना दिया करते थे।' मुझे तो याद ही नही था किंतु उनके याद दिलाने पर जैसे आज पुनः सब कुछ याद आने लगा है।
छठी कक्षा से लेकर आठवी कक्षा तक की पढ़ाई हमने जिस स्कूल में की थी उस सरकारी मिडिल स्कूल को 'नई बिल्डिंग स्कूल' के नाम से ही जाना जाता था। यकीनन वह बिल्कुल नया ही बना था। पूरे प्रदेश में उसी डिजाइन के स्कूल भवन बनने लगे थे। आज भी लगभग उसी पैटर्न में याने अंग्रेजी के 'एच' आकार में बनते हैं,इससे सुविधा यह रहती है कि हर मौसम में पूरे स्कूल के हर कमरे में सुगमता से आया जाया जा सकता है।
इस स्कूल की खासियत इसकी खास लोकेशन भी थी। पास में शहर के महाविद्यालय तो थे ही लेकिन इस बिल्डिंग से लगा हुआ ही एक खेल का मैदान भी था,जिसे 'ओलंपिक ग्राउंड' कहा जाता था। बिल्डिंग से लगी हुई एक तलैया सी थी,जिसमे बरसात में पानी भरा रहता। उसमें पत्थरों की कत्तलें सनसनाते तैराने में हम बच्चों को बड़ा मजा आया करता था। इसी तलैया के पीछे राजा महाराजाओं की समाधियां थीं, जहां बहुत खूबसूरत छतरियाँ बनाकर शिवलिंग स्थापित किये गए थे। इसे छत्री बाग कहा जाता था। इससे जुड़ा देवास का बहुत सुंदर 'मीठा तालाब' था। मीठे तालाब में कमल खिला करते थे।
स्कूल के पास बल्कि स्कूल प्रांगण के भीतर तक पुराना लेकिन उपयोग में नहीं आ रहा कब्रिस्तान भी था। इन पुरानी कब्रों पर पेड़ की छाया में बैठकर छुट्टी के बीच हम दोस्त हंसी मजाक करते रहते थे। कोई भय नहीं लगता था।इतनी बात इसलिए कही कि इन्हीं कक्षाओं में पढ़ते हुए हमारी कई रुचियाँ उभरने लगीं थीं। बहुत से मित्रों में जो दो मुझे खास तौर से याद आ रहे। उनमे एक भीमराज स्वामी तो हैं ही दूसरे मित्र थे शेखर पागे।
भीमराज मूलतः दक्षिण भारत के होते हुए भी मालवी व्यक्ति हैं। उनके जन्म से लेकर पालन पोषण,पढाई सब कुछ इधर देवास मालवा में ही हुआ था। उन्हें तमिल नहीं आती। मित्रों के परिजनों से मालवी में बढ़िया बतिया लेते हैं। नौकरी के दौरान उनके प्रमोशन पर गलतफहमी में उनका ट्रांसफर जब चैनई करके प्रबन्धन ने उनका भला करना चाहा तो वे घबरा गए। बहुत मुश्किल से मैनेजमेंट को गले उतारना पड़ा कि स्वामीजी ठेठ मालवी और हिंदी भाषी व्यक्ति हैं। ओलम्पिक ग्राउंड पर होने वाले खेलों खासकर फुटबॉल व क्रिकेट देखते,खेलते हुए भीमराज प्रतिभाशाली क्रिकेटर बने और आगे चलकर कई टूर्नामेंट्स में विक्रम विश्वविद्यालय की टीम का प्रतिनिधित्व व टीम का नेतृत्व भी किया।
ऐसे ही शेखर पागे स्कूल में मौलिक कविताएं लिखा करते थे। खूब पढ़ने लिखने वाले बुद्धिमान किस्म के विद्यार्थी थे। मैंने उन पर कविता की कुछ पंक्तियाँ लिखीं थीं-' शेखर पागे एक कवि हैं,कुछ दुबले कुछ पतले से!' शेखर के सानिध्य में शायद कविता आदि करने का कोई वायरस प्रवेश किया होगा ,ऐसा मुझे अब भी लगता रहता है। शेखर पागे से प्रत्यक्ष मिले बरसों हो गए हैं। कोरोना स्थितियां सामान्य होने पर अवश्य मिलने की कोशिश होगी।
बहरहाल, बात तो चामुंडा माता और देवास टेकरी की ही हो रही है। जैसा मैंने पहले की कड़ियों में कहा भी है कि देवास की टेकरी एक ऐसा डेस्टिनेशन है जहां शहर के निवासी ही नहीं बाहर से आए मेहमान की भी वहां की सैर के लिए रुचि जागृत हो ही जाती है। पहाड़ी पर पहुंचकर नीचे के दृश्य को निहारना बहुत कुतूहल पैदा करता है। भोपाल, ग्वालियर,उज्जैन,इंदौर की ओर जाने वाली सड़कें शहर से दूर जाते जाते बारीक लकीरों में बदलती दिखाई देते हुए विलीन हो जाती है... इंदौर से उज्जैन की दिशा में आने जाने वाली रेल गाड़ियों को घुमावदार पटरियों पर रेंगते हम लोग बरसों से देखकर रोमांचित होते रहे हैं। सबसे ऊंचे पीपल के पेड़ से बचपन के मोहल्ले के पुश्तैनी घर को पहचान कर हम लोग उंगली के इशारे से मेहमानों को बताकर अद्भुत खुशी को आज भी महसूस कर पाते हैं। मीठा तालाब और छत्री बाग के सुंदर दृश्य मन को मोह लेते हैं। टेकरी पर सात कुंड और कुछ में सुंदर मछलियों की अठखेलियां, दमदमे (हिल टॉप) पर खड़ा विजय स्तम्भ, सूखी हुई दूध तलाई और उसके सूख जाने की किवदंती। क्या कुछ याद नहीं आ रहा।
जन्माष्टमी पर टेकरी स्थित राजकीय तोप घर से तोप का बाहर निकलकर आना और 21 तोपों की भगवान को सलामी। अब तो इस तोपखाने के नजदीक ख़ूबसूरत और शांत जैन मंदिर का नव निर्माण हो गया है।
पुराने शहर के दूसरी तरफ वाले दृश्य में बैंक नोट प्रेस, पुलिस परेड ग्राउंड, सबसे पुरानी फेक्ट्री गाजरा गियर्स और स्टील ट्यूब्स आदि। एरिना जिसमें कई कुश्तियां लड़ी गईं। ओह!! क्या क्या याद करें.….
चामुंडा माता की प्रतिमा में अलग अलग रूप नजर आने की दन्त कथाएं भी खूब प्रचलित रहीं हैं। हमें भी लगता था जैसे प्रतिमा में सुबह किसी बच्चे की मासूमियत, दोपहर में किसी युवती सा उत्साह और शाम को प्रौढ़ता का गाम्भीर्य दमकने लगता है।
देवी की हमारी समझ का बाद में और विस्तार हुआ। स्त्री के वे भिन्न स्वरूप हमें अन्यत्र भी दिखाई देने लगे....लगा जैसे वह प्रतिमा तो सर्व व्यापी है...कई जगह अलग अलग स्वरूपों में दिखाई देने लगती हैं।
एक कविता यहां पढ़ें जो कुछ वर्ष पूर्व लिखी थी..
कविता
देवी मंदिर में
ब्रजेश कानूनगो
श्रीमानजी !
आप बहुत भाग्यशाली हैं
जो पधारें हैं माता मंदिर
सुबह बच्ची
दोपहर युवती
शाम को औरत का
रूप धरती है चमत्कारी प्रतिमा
धन्यवाद पंडित जी!
सच तो यह है कि
फूल-पत्तों, धरती-आकाश
हर जगह दिख जाता है अक्सर
देवी का यह अद्भुत रूप मुझे
एक देवी चहक उठती है सुबह-सुबह
थकान को हर लेती दूसरी
एक का नेह भरा हाथ
विश्वास से भर देता है हर शाम
क्षमा करें
भीतर नगाड़े सा कुछ बजने लगा है
मुझे घर लौटना चाहिए अब.
(रचनाकाल: 2016)
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ब्रजेश कानूनगो
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