Friday, 9 October 2020

स्वान्तः सुखाय 53 'मालवा हाउस' से आई गत्ते की वह अटैची

स्वान्तः सुखाय 53 

'मालवा हाउस' से आई गत्ते की वह अटैची 


गत्ते और रैग्जीन से बनी एक छोटी सी अटैची (ब्रीफकेस) माँ बहुत संभालकर रखा करती थी। अपने आखिरी समय तक वे उसमे अपने कुछ जरूरी सामान और पत्र पत्रिकाओं में छपी मेरी रचनाओं की कतरने बहुत जतन से सहेजा करती थीं। जब भी मैं उनसे मिलने जाता वे सभी कतरनें दिखातीं। मन करता तब लगभग उनका पारायण सा भी करती रहती थीं। वे नियमित अखबार पढ़ती थीं। जब मैं घर से बाहर नौकरी पर या स्थायी रूप से इंदौर रहने लगा तब अखबार में प्रकाशित रचना का सबसे पहला बधाई फोन देवास से उनका ही आता था।  9 नवंबर 2017 से माँ के वैसे ममतामयी बधाई फोन का अब सिर्फ इंतजार ही रह जाता है...!


बात माँ की उस खास 'अटैची' की ही करते हैं। दरअसल, वह माँ के लिए इसलिए खास थी कि वह मेरी किसी रचना के पहले मानदेय की राशि से खरीदी गई थी। अस्सी के दशक में युवावस्था के दौरान शुरुआती समय में अपने दोस्तों,आसपास के लोगों,स्वजनों,पड़ोसियों आदि के चरित्रों,घटनाओं से प्रेरित होकर कहानियां लिखने का प्रयास करता था। 

ऐसी ही एक कहानी 'आई' शीर्षक से लिखी थी जो बचपन मे मुझे माँ की तरह स्नेह देने वाली पिताजी के दफ्तर के सहायक की पत्नी के जीवन संघर्ष को लेकर लिखी थी। 


'आई' को रेडियो सुनने का बहुत शौक था। हर साल वे नया ट्रांजिस्टर खरीद लाया करती थीं। रविवार या छुट्टी के दिन मैं उनसे वह हथिया लेता और पूरे दिन सुना करता था। उनकी कोई संतान नहीं थी।

बहरहाल, उन्ही स्नेहमयी 'आई' पर लिखी वह कहानी आकाशवाणी के इंदौर केंद्र से 'युववाणी' कार्यक्रम मेरी ही आवाज में प्रसारित हुई। 


उस कार्यक्रम की उस वक्त की संयोजक और उद्घोषक की एक छवि मन में अभी तक बनी हुई है। वे बहुत मोहक थीं,सांवली थीं किन्तु उनकी आंखें और आवाज मन मोह लेती थीं। स्वर कोकिला की तरह मधुरता उनकी सहज उपस्थिति से बिखर जाया करती थी। लोकप्रिय गानों के लोकप्रिय 'मन भावन' कार्यक्रम सुनते हुए रेडियो पर उनकी आवाज के हम दीवाने थे लेकिन प्रत्यक्ष मिलना पहली बार उस पहले प्रसारण के दिन ही हुआ। 

आज दिमाग पर बहुत जोर डालकर उनका नाम याद करने की कोशिश की लगता है सम्भवतः वे 'इंदु आनन्द' ही रही होंगीं। 


'मालवा हाउस' स्थित आकाशवाणी के इंदौर केंद्र के देश के सबसे बड़े व शक्तिशाली ट्रांसमीटर से निकली तरंगे उन दिनों देश के कोने कोने तक आसानी से पहुंच जाया करती थी। राजस्थान,गुजरात,महाराष्ट्र में आकाशवाणी इंदौर के कार्यक्रम बहुत रुचि से सुने जाते थे।


इंदु आनन्द जैसी स्टार उद्घोषिका के संयोजन में हमारी कहानी 'आई' का पहली बार प्रसारण के बाद हमें कुछ मानदेय नकद प्राप्त हुआ।  देवास लौटते हुए इंदौर से गत्ते की वह अटैची हमने खरीद ली। बहुत दिनों उसमें हमारे प्रमाण पत्र, अंक सूचियां रखते  रहे। जब पुरानी होकर टूटने , फटने लगी तो खाली कर दी हमने।

यह माँ की ही समझ थी कि उन्होंने उस पर अपने हाथों से कपडे का कवर सिलकर उसकी उम्र बढ़ा दी। 

पुत्र की उपलब्धि को इसतरह कोई माँ ही धरोहर की तरह महत्वपूर्ण बना सकती है...


रेडियो से जुड़ी कुछ और बातें आगे....


ब्रजेश कानूनगो

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