स्वान्तः सुखाय 56
चलो बुलावा आया है…..
नवरात्रि के समय वैसे तो पूरा देश बहुत उल्लास और पूजा आराधना से सराबोर रहता है किंतु जिन शहर कस्बों आदि में किसी देवी का मंदिर या स्थान होता है वहां का समूचा वातावरण ही 'मातामय' हो जाता है। बड़ी धूमधाम बनी रहती है।
आमतौर पर जहां देवी मंदिर किसी पहाड़ी पर स्थित होता है,वहां की रौनक देखते ही बनती है। जत्रा, मेले आदि भी इन दिनों खूब सजते हैं और लोग त्योहारों और पर्व का खूब आनन्द उठाते हैं। मेरे गृहनगर देवास की भी यही विशेषता रही है। बचपन से ही सुनते रहे कि इस सांस्कृतिक नगरी का नाम 'देवास' भी 'देवताओं के वास' की वजह से ही पड़ा है। लगभग 300 फुट ऊंची पहाड़ी पर देवी चामुंडा और देवी तुलजा भवानी के मंदिर स्थित होने से इस पहाड़ी को 'माताजी की टेकरी' ही कहा जाता है। बाद में ब्रिटिश इतिहासकार ईएम फॉस्टर ने अपनी पुस्तक 'हिल ऑफ देवी' में भी देवास का उल्लेख किया है।
शहर के स्त्री,पुरुष, युवा सभी नित्य ही बारहों महीने सुबह शाम इस पहाड़ी पर भ्रमण के लिए जाते हैं। बचपन में परिवार के बड़े बूढ़े बच्चों को सुबह शाम की सैर के लिए टेकरी पर नियमित जाने को कहते थे। खासतौर से टेकरी पर जाना दैनिक वर्जिश का प्रमुख हिस्सा होता था।
देवास की टेकरी पर जाने के उस वक्त दो रास्ते हुआ करते थे। एक खड़ी रपट थी जो पश्चिम क्षेत्र के रेलवे स्टेशन की ओर से ऊपर जाती है। इसी के मोहक मुहाने पर आज भी शास्त्रीय गायक पद्मविभूषण प. कुमार गंधर्व जी का निवास 'भानुकुल' स्थित है। दूसरा रास्ता सीढ़ियों का था जो काले पत्थरों से निर्मित था, बीच में कुछ जगह कच्ची रपट भी हुआ करती थीं। कुछ अन्य रोमांचक पैदल रास्ते बच्चों और युवाओं ने खोज निकाला थे। इन रास्तों से होकर पहाड़ी के ऊपर तक पहुंचने को 'खड़े पहाड़ चढ़ना' बोला जाता था। पेरेंट्स बच्चों को अक्सर हिदायत देते थे कि जाओ मगर खड़े पहाड़ मत चढ़ना। हम लोग हामी जरूर भरते थे 'नहीं चढ़ेंगे' किंतु करते इसके ठीक विपरीत टेकरी पर 'खड़े पहाड़' चढ़ने का ही जोखिम उठाते।
सीढ़ियों वाले रास्ते से जाने का भी अपना अलग रोमांच था। एक तो वह हमारे मुहल्ले से बहुत नजदीक था। दौड़ते दौड़ते टेकरी के सीढ़ियों वाले रास्ते पर पहुंच जाते थे। सीढ़ियों को भी दौड़ते हुए चढ़ जाया करते। सीढ़ियों की गिनती करते। अब तो याद नहीं रही उस वक्त की सीढ़ियों की संख्या। बीच में कच्ची रपट भी थी। इसी के किनारे एक जगह पत्थर गिरा करते थे। यहां की कच्ची चट्टान की खास विशेषता यह थी कि इसकी बजरी को जब पानी भरे पात्र में डालते तो उसमें से सनसनाहट की आवाज निकलती और हवा के बुलबुले निकलते थे। बहुत मजा आता था ऐसा करते हुए। इसी जगह गिरे हुए पत्थरों को जोड़कर घर नुमा कुछ बनाते। मान्यता थी कि माताजी उनके सपनों के आशियाने का सपना पूरा करेंगीं।
देवास पहाड़ी की चट्टानों में कई जगह सफेद चमकती रंगोली सी दिखाई देती है। यह सम्भवतः अभ्रक खनिज है,कुछ लोग रंगोली पत्थर भी कहते हैं।
सीढ़ियां चढ़ने के बाद पूरी टेकरी पर परिक्रमा मार्ग है। जिस पर चलते हुए पुराने शहर और नए देवास का नजारा किया जा सकता है। पैदल सीढ़ियां देवी चामुंडा (छोटी माता) और जीप आदि वाला रपट मार्ग देवी तुलजा भवानी (बड़ी माता) के चरणों तक पहुंचता है।
कुछ दिलचस्प बातें याद आती हैं। चामुंडा माता मंदिर के ठीक सामने पत्थर का एक भारी गोला पड़ा होता था, मन्दिर प्रवेश से पूर्व जिसे कुछ भक्त अपने हाथों से बहुत मुश्किल से उठाकर कन्धे पर रखते और फिर उसे धरती पर पटकने के बाद चौखट पर मत्था टेक दर्शन के लिए प्रवेश करते थे। जोखिम भरा यह काम हर कोई नहीं कर पाता था। लेकिन जिसे यह कला आ जाती थी वह बहुत सहजता से भारी पत्थर उठाकर क्षण में धरती पर पटक देता था। हमारे पड़ोस के उस वक्त के 60/ 65 वर्षीय वृद्ध 'वल्लभ जी' जिन्हें हम 'बल्ला बा' कहते थे सहजता से यह करिश्मा करके सबको चकित कर देते थे। अब यह पत्थर का गोला शायद नहीं है वहां। किसी ने बताया था, वह नीचे खाई में गिराया जा चुका है।
खड़े पहाड़ चढ़ने के कई रास्ते अब सीढ़ियों में बदल गए हैं। खासतौर से शीलनाथ धूनी वाला एरिना (अखाड़ा) मार्ग। निराले नेता पोल साहब के निराले घोषणापत्र में उस समय के मजाकिया आश्वासन ने साकार रूप ले लिया है। अब टेकरी पर 'रोप वे' की सहायता से भी पहुंच कर माताजी के दर्शन किये जा सकते हैं।
और जो देवास में न हैं उन्हें तो किसी भी रास्ते पर पैदल चलने की जरूरत नहीं पड़ती। पंख लगे होते हैं मन पर...जहां चाहे पहुंच ही जाता है...
आइये यहां मेरी पहली कविता पढ़ लेते हैं....
कविता
अस्पताल की खिडकी से
कैसा होगा वहाँ ?
दूर दिखाई देती पहाडी के पीछे
सूरज निकलता है रोज जहाँ से
एक नदी होगी शायद
झरना भी हो सकता है
जो गिरता होगा पहाडी के ऊपर से
धरती पर गहरा गड्ढा हो गया होगा
पिकनिक मनाने आए बच्चों को
उधर जाने से रोक रहे होंगे दादाजी हाँक लगाते हुए
धान का खेत होगा पहाडी के पीछे
सतरंगे वस्त्रों को कमर में खोंसकर औरतें
रोप रहीं होंगी हरे पत्तेदार पौधे
गुनगुनाते हुए
देवी का मन्दिर होगा पहाडी की चोटी पर
तलहटी से सैकडों सीढियाँ पहुंचती होंगी वहाँ
एक दीप स्तम्भ होगा
और रात को रोशनी बिखर जाती होगी चारों ओर
एक बडा घंटा कुछ नगाडे रखे होंगे
आरती के वक्त बजाया जाता होगा जिन्हे
सडक बन रही होगी
काली टंकियों में पिघल रहा होगा तारकोल
चक्के पर घूम रहे डमरू में खडखडा रही होगी गिट्टियाँ
रोड रोलर के इंजिन की आवाज बदल रही होगी लोरी में
बबूल की छाया में बंधी झोली में सो रहा होगा कोई बच्चा
शोरगुल के बीच
तमाम जीवित ध्वनियाँ उपस्थित होंगी वहाँ
जो नहीं है अस्पताल में खिडकी के पास लगे पलंग के आस-पास ।
(रचनाकाल :1995)
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(टेकरी की कुछ और यादें आगे...)
ब्रजेश कानूनगो
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