स्वान्तः सुखाय : 51
'विविध भारती' के संग इन दिनों
इन दिनों दिनचर्या की पृष्ठभूमि में ज्यादातर रेडियो पर सुबह 7 बजे से रात 11 बजे तक 'विविध भारती' की स्वर लहरियां गूंजती रहती हैं। कभी मध्दिम तो कभी थोड़ी तेज आवाज में। मगर चलता रहता है पंचरंगी कार्यक्रम...
कोरोना काल में अब रेडियो की यह हमउम्र चैनल सोशल मीडिया के माध्यम से कुछ और करीब से जुड़ गई है।
दरअसल दोपहर 1 बजे 'कुछ बातें कुछ गीत' कार्यक्रम से शुरू होने पर फेसबुक के माध्यम से श्रोता सीधे अपने मन की बात करके कार्यक्रम की थीम से जुड़ जाते हैं। कुछ सवाल भी होते हैं, कुछ रोचक किस्से, कुछ यादें...
कुछ अतीत जीवी वरिष्ठ नागरिक जो स्मृतियों से प्रेम करते हैं वे वर्ग पहेली हल करना या झपकी लेना भूलकर रेडियो से इन दिनों कुछ अधिक ही जुड़ गए हैं। कला,संगीत, साहित्य, कथा,पटकथा,स्क्रिप्ट, फ़िल्म जगत, अभिनय,फ़िल्म प्रोडक्शन आदि में जिन्हें थोड़ी बहुत भी रुचि है उनके लिए तो विविधभारती की दोपहर 'गोल्डन टाइम' सी हो जाती है।
सुमधुर सदाबहार गीतों के अलावा 'उजाले उनकी यादों के' ,'बॉम्बे टाकीज' आदि में आकाशवाणी की अनमोल धरोहरों के खजाने से जैसे ज्ञान,तकनीक और स्मृतियों की जलधाराएं सी मन के भीतर बहने लगती हैं।
अभी पिछले दिनों विविधभारती ने अपना 63 वां जन्म दिन मनाया तो फेसबुक पृष्ठ पर बहुत कुछ लाइव भी रहा। मुम्बई विविधभारती के उद्घोषकों से मिलना,उनको प्रस्तुति देते हुए देखना तो सुखद था ही लेकिन एक प्रयोग जो किया गया वह बहुत प्रभावित कर गया। इस अवसर पर एक रेडियो नाटक को लाइव प्रस्तुत किया गया।
जाने माने उद्घोषकों को भावप्रवण नाट्य वाचन करना देखकर उनकी प्रतिभा और उनके समर्पण व निपुणता ने अचंभित कर दिया।
हाँ, यह जरूर है कि इस तरह उनको सजीव देखकर उनके हुनर, श्रम व तकनीक का अवलोकन तो हुआ किन्तु जो आनन्द आंख बंद करके रेडियो नाटक सुनने का है वह जादू लाइव देखने में अवश्य हाथ से निकल गया।
मुझे लगता है रेडियो नाटक, प्रहसन का असली मजा शायद आंख बंद करके सुनने में ही है।
जुग जुग जियो 'विविध भारती'.....! हार्दिक शुभकामनाएं कि तुम्हे किसी की नजर न लगे...!
ब्रजेश कानूनगो
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