स्वान्तः सुखाय 55
देशज को बचाने में चिंतित मालवी मनक : नरहरि पटेल
उस दिन रविवार था। हमारे लिए वह खास दिन जब सामान्यतः अखबारों में 'साहित्य पृष्ठ' का प्रकाशन किया जाता रहा है। अब ऐसा नहीं है। या तो उस तरह के पृष्ठ अब रहे नहीं या फिर वहां साहित्य नहीं रहा। कुछ अपवाद हो सकते हैं किंतु उस दिन रविवार ही हो यह जरूरी भी नहीं।
तो उस दिन रविवार था और सुबह सुबह अखबार में छपी अपनी कविता का पुनर्पाठ कर ही रहा था कि मोबाइल में अन सेव्ड नम्बर से काल आया।
'बधाई ब्रजेश भाई! क्या खूब लिखा है आपने...मन प्रसन्न हो गया...अब तो उस अनुभूति को समझने वाले लोग ही नहीं रहे...कौन देखता है अब किसी कुतिया को इस तरह...नीम के नीचे जमीन खुरचकर खो बनाते...पिल्लों का धूप में खेलना और ठंड में एक दूसरे में कम्बल की तरह गुंथ जाना...!'
उधर से यह सब हिंदी, मालवी में बहुत आत्मीयता से कहा जा रहा था। मालवी व्यक्ति होते हुए मालवी भाषा मेरी रफत में नहीं रही, खड़ी बोली का व्यक्ति हूँ अतः सामने से आ रही उस मीठी मालवी और उस रस को यहां शब्दों में व्यक्त करना मुश्किल हो रहा है।
यह भी निश्चित है कि जैसे ही मैं यहां यह बताऊंगा कि उधर से आने वाला यह उत्साहवर्धक आत्मीय फोन आदरणीय दादा नरहरि पटेल जी का था तो बहुत से लोगों को वे साक्षात अपनी शैली में प्रत्यक्ष बतियाते नजर आने लगेंगे।
दादा नरहरि पटेल जी को मैं लोक संस्कृति के बड़े जानकार, मालवी,निमाड़ी भाषा और परंपराओं से आत्मसात सुकवि, रंगकर्मी के रूप में भाषा और लोकजीवन में देशज पहचान को मिटते देखकर दुःखी और चिंतित रहने वाले संवेदनशील व्यक्ति के रूप में जानता रहा हूँ। इन्ही सब प्रयासों में उनके कार्य देखे जा सकते हैं। वह चाहे उनकी कविता हो, नाट्यवाचन या अभिनय हो, वार्तालाप हो,व्याख्यान हो,संवाद हो या अभिव्यक्ति का अन्य कोई स्वरूप रहा हो। उनकी उसी खास रचनात्मक प्रतिबद्धता को रेखांकित किया जा सकता है। एक प्रतिबद्धता उनकी अपने युवाकाल से प्रगतिशील लेखक संघ से भी रही और उस जमाने के साहित्यकारों के साथ उन्होंने बहुत काम भी किया। एक सुखद सत्य यह भी है कि जब 1957 में मैं जब इस संसार में आ रहा था उस वक्त इंदौर आकाशवाणी केंद्र ने भी जन्म लिया। तब से ही दादा नरहरि पटेल रेडियो के श्रेष्ठ कलाकारों में शामिल रहे और आज 86 वर्ष की आयु में हम उनकी इस प्रतिभा का लाभ लेते रहते हैं...
बहरहाल, जब भी मैंने किसी देशज और लुप्त होती बात या प्रसंग का उल्लेख अपनी किसी रचना में किया तब उनका एक फोन मुझ तक अवश्य पहुंचा। बड़ी देर तक वे स्वयं उस बहाने अपनी पीड़ा के साथ उस खुशी और आनन्द का अहसास भी कराते हैं जो उस देशज प्रयोग से संभव हो जाती है।
'मालवी जाजम' उनका एक ऐसा उपक्रम रहा है जिसमें वे मालवी बोली,संस्कृति को बचाए रखने के लिए नियमित बैठक करते रहते हैं। यह बहुत सुखद है कि उनके इस कार्य को आगे बढ़ाने के लिए एक पूरी टीम उनके मार्गदर्शन में तैयार हो गई है। उनके सुयोग्य पुत्र भाई संजय पटेल में उनके व्यक्तित्व और सुकर्मों की छवि स्पष्ट दिखाई देती है।
एक दो बार मुझे भी 'जाजम' में शिरकत करने का सौभाग्य मिला। गोष्ठी की अपनी खास पहचान है जिसमें लोकगीतों से लेकर साहित्य की सभी विधा में मालवी रचनाएं सुनाई और गाई जाती हैं। उनके ऐसे प्रयासों में श्री प्रह्लादसिंह टिपानिया जी सहित कई ख्यात कलाकारों को भी गौरव मिलता रहा है।
मेरी कविता 'चिड़िया का सितार' पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए जैसे वे भावुक ही हो गए। बाद में पूरा संग्रह पढ़कर इत्मिनान से मेरा हौसला बढ़ाया। मैं धन्य हो गया उनका आशीष पा कर। लिखना सफल हुआ।
वरिष्ठ समाजसेवी व बैंक अधिकारी नेता श्री आलोक खरे जी के संयोजन में हमारे प्रकल्प 'समाज सेवा प्रकोष्ठ' द्वारा संयोजित तंगबस्ती के गरीब बच्चों के शिविर में जब एक बार उन्होंने बच्चों से बातचीत की,कविताएं सुनाई तो बच्चों को वह सब इतना भाया कि बाद में भी कई मौकों पर उन्हें शिरकत करनी पड़ी।
कविता और गीतों की वे इतनी रोचक और भावभंगिमाओं के साथ प्रस्तुति देते हैं कि दर्शक, श्रोता मुग्ध तो होते ही हैं बल्कि लोककाव्य और लोक संस्कृति का सीधा असर हृदय के भीतर तक महसूस किया जाने लगता है।
सच तो यह है कि दादा नरहरि पटेल जी को ठीक से जानना समझना है तो उनको आमने सामने बैठकर रचना पाठ करते,नाट्यवाचन या अभिनय करते देखना बहुत जरूरी होगा।
दादा के स्वस्थ और सुदीर्घ जीवन की कामना के साथ यहां उनका एक मालवी गीत पढ़ते हैं...कल्पना में उनको सामने महसूस जरूर करें...
मालवी गीत
नरहरि पटेल
कसा चेहकता था चेरकला कई याद हे के नी याद हे।
मस्ती में गम्मत रतजगा कई याद हे के नी याद है।
दादी की मीठी लोरियाँ नानी की रेशम झोरियाँ।
माँ की कसूमल थपकियाँ कई याद हे के नी याद हे।
होली दिवाली थी कसी राखी पे मनवाराँ कसी
घूमर दिवासा ढुमकणा कई याद हे के नी याद हे।
थानक पे माँगी थी मन्नताँ बस एक बालूड़ो दे माँ
माता की पूजा वंदना कई याद हे के नी याद हे।
सूरज उगाता था कूकड़ा संजा सुलाती थी रूँखड़ा
राताँ का चमचम चूड़ला कई याद हे के नी याद हे।
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ब्रजेश कानूनगो
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