Monday, 5 October 2020

स्मृति के एकांत से...स्वान्तः सुखाय 50

स्मृति के एकांत से...स्वान्तः सुखाय 

साहित्य परिवार के स्नेहिल मुखिया :श्री सूर्यकांत नागर

वर्षों दैनिक व्यंग्य कॉलमों में लिखते लिखते कुछ ऐसी आदत हो गई थी कि बहुत दूर तक रचना को खींच ले जाने का मन ही नहीं होता था। तुरन्त छप जाने और निरन्तरता के कारण मन भी नहीं हो पाता था कि कुछ बड़ी व्यंग्य रचना लिखी जाए।

ऐसे में जब नईदुनिया समाचार पत्र में 'खुला खाता' शीर्षक से व्यंग्य का साप्ताहिक कॉलम शुरू हुआ तो लम्बी रचनाएं लिखने, छपने और हाथ भाँजने के अवसर भी बढ़ गए।

इस बात का जिक्र महज इसलिए कि इस खास साप्ताहिक स्तंभ का सम्पादन श्री सूर्यकांत नागर जी किया करते थे।  कथात्मक और कुछ अधिक लम्बी रचनाओं की ओर रुचि पैदा होने में इस कॉलम की तथा आदरणीय श्री नागर साहब के प्रोत्साहन की भूमिका मेरे जीवन में महत्वपूर्ण रही है। हालांकि वे इतने सहज हैं कि वे कभी इस सच को स्वीकार करेंगे।

जितना भी मैंने श्री सूर्यकांत नागर जी को समझा है,महसूस किया है वे हमेशा परिवार के ही बड़े सदस्य की तरह लगे, जो परिवार के किसी छोटे सदस्य के भीतर थोड़ी भी साहित्यिक चमक देख उसकी प्रतिभा को सितारे की जगमगाहट में बदलने के प्रयास करने की कोशिश करते रहे हैं।

दरअसल, जिन वरिष्ठ रचनाकारों के कारण इंदौर को साहित्य जगत में जाना जाता है उनमें सूर्यकांत नागर जी की छवि और उनका सहज,आत्मीय और आडम्बर रहित व्यक्तित्व,आचरण उनके स्वीकार्य को बहुत बड़ा बना देता है।  मूलतः कथाकार,उपन्यासकार नागर साहब बहुत प्रभावी व्यंग्यकार, लघुकथाकार तो हैं ही कुछ खूबसूरत मार्मिक कविताएं भी उनकी कलम से निकली हैं। यही कारण है कि साहित्यिक विषयों पर उनके विश्लेषणात्मक,आलोचनात्मक  लेख और व्याख्यानों को भी बहुत महत्व मिलता रहा है। कई रचना शिविरों और कार्यशालाओं में उनसे सीखने समझने के अवसर मिलते रहे हैं। श्री नागर जी का प्रोत्साहन ही था कि मेरी पहली किताब 'पुनः पधारें' (1995) में आ सकी।

साहित्य की महत्वपूर्ण पत्रिका 'समावर्तन' में व्यंग्य केंद्रित 'वक्रोक्ति' खण्ड का वे त्रैमासिक सम्पादन करते हैं। इस खंड में मेरे व्यंग्य लेखन पर भी उन्होंने 8/10 पन्नों में सामग्री मंगवाकर प्रकाशित कर मुझे स्नेह दिया। उनकी विनम्रता देखिए कि आगे कहते हैं..'भाई! अन्यथा मत लेना आपको हम थोड़ा देरी से शामिल कर पाए।' 

यह बात उन जैसे मीठे फलों से लदे किसी पेड़ की विनम्र शाखा ही कह सकती है। उनके स्नेह की शाखा मेरे माथे पर किसी आशीर्वाद से कम नहीं।

आज भी जब किसी मेरी रचना या उपलब्धि का समाचार उन्हें मिलता है,वे मुझे  फोन करके मुझे नई जिम्मेदारी का अहसास करा देते हैं।


निसंदेह आदरणीय नागर साहब के प्रति गहरी आत्मीयता प्रकट करने के लिए शब्द तो कम पड़ ही जाते हैं। किन्तु उनकी तरह यदि हम साहित्य के प्रति, साहित्य की गतिविधियों के प्रति, साहित्यक रुचि वाले श्रोताओं के प्रति, बनते हुए लेखकों के प्रति,आयोजनों में सहजता से शामिल हो जाने वाले विनम्र व्यक्ति की तरह थोड़े भी हो सकें तो उनके प्रति हमारी सच्ची कृतज्ञता होगी।

ब्रजेश कानूनगो

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