Thursday, 8 October 2020

स्वान्तः सुखाय 52 : रेडियो का फिर लौटना और स्मृतियों का

स्वान्तः सुखाय 52

रेडियो का फिर लौटना और स्मृतियों का झरोखा

बचपन के दिनों में रेडियो सुनते हुए सोचा करते थे कि कितना अच्छा हो कि इस जादूई बक्से के भीतर के लोग स्पीकर लगे पर्दे पर साक्षात गाते,बजाते,नाचते,नाटक करते,समाचार सुनाते दिखाई भी देने लगे।


और जब हमारी यह ख्वाहिश विज्ञान और टेक्नोलोजी ने पूरी कर दी और भारत में भी दूरदर्शन का उदय हुआ किन्तु रेडियो के श्रोता धीरे धीरे टीवी के दर्शकों में बदलते गए।


घर घर में टीवी आ गया। पहले एक मात्र सरकारी चैनल और वह भी श्वेत श्याम जिसे चुने हुए केंद्रों पर बमुश्किल देखना सम्भव होता था। दूरदर्शन के विकास की सारी कहानी हमारी सबकी देखी समझी है। टीवी की चर्चा फिर कभी। आज यहां मैं रेडियो के उस स्वर्णिम काल के उतार और उसके पुनः लौटने के दौर की बात करना चाह रहा हूँ।


दूरदर्शन के आने के बाद जब टीवी पर अन्य मनोरंजक चैनलों को अनुमति मिल गई तो भारतीय परिवारों के बहुत बड़े हिस्से के घरों से बचे खुचे रेडियो सेट भी गायब हो गए या उनका स्थान घर के कबाड़खाने में ही रह गया। 

जब किसी से कहते भी कि भाई आज हमारी कहानी रेडियो पर आने वाली है तो अपने ही परिचितों के घर में वह सुनी नहीं जा सकती थी। ऐसे में रचनाकार अपनी रचना आकाशवाणी केंद्र के माइक्रोफोन को सुनाकर, चेक प्राप्त कर संतृष्ट हो लेता।


लेकिन यह सब रेडियो के स्वर्णिम दौर के बाद के उस वक्त की विडंबना है जब टीवी ने रेडियो माध्यम को प्रतिस्थापित करना प्रारंभ कर दिया था।


और अब जब टीवी से दुनियाभर में लोग ऊबने लगे हैं। निजी मनोरंजक व खबरिया चैनलों में प्रतिस्पर्धा की घटिया लड़ाइयां चलने लगी हैं। समाचार,विचार सब कुछ किन्ही दबावों और स्वार्थों से संचालित होने लगे हैं। ऐसे में यह दिलचस्प है कि लोग पुनः रेडियो का रुख करने को उद्यत हुए हैं।


एफएम प्रसारणों और मोबाइल एप्स के जरिये रेडियो सुनना अब बहुत आसान हुआ है। भारत के लोक प्रसारण चैनलों पर भी अधिकतर सुरुचि और स्वच्छता नजर आती है। 

यह अच्छा ही है कि रेडियो पर अभी 'टीआरपी' का  गणित खुल कर गंदगी पैदा नहीं कर पाया है। लोग टीवी चैनलों के आतंक ,सनसनी,उत्तेजना और विवेक को कुंठित करने वाली हरकतों से ऊबकर रेडियो के पुराने दौर में लौटने को उद्यत हुए हैं।

आइए एक कविता पढ़ते हैं आज...


कविता

रेडियो की स्मृति

ब्रजेश कानूनगो


गुम हो गए हैं रेडियो इन दिनों

बेगम अख्तर और तलत मेहमूद की आवाज की तरह


कबाड मे पड़े रेडियो का इतिहास जानकर

फैल जाती है छोटे बच्चे की आँखें


न जाने क्या सुनते रहते हैं

छोटे से डिब्बे से कान सटाए चौधरी काका

जैसे सुन रहा हो नेताजी का सन्देश

आजाद हिन्द फौज का कोई सिपाही


स्मृति मे सुनाई पड़ता है

पायदानों पर चढता

अमीन सयानी का बिगुल


न जाने किस तिजोरी में कैद है

देवकीनन्दन पांडे की कलदार खनक

हॉकियों पर सवार होकर

मैदान की यात्रा नही करवाते अब जसदेव सिंह


स्टूडियो में गूंजकर रह जाते हैं

फसलों के बचाव के तरीके

माइक्रोफोन को सुनाकर चला आता है कविता

अपने समय का महत्वपूर्ण कवि


सारंगी रोती रहती है अकेली

कोई नही पोंछ्ता उसके आँसू  


याद आता है रेडियो

सुनसान देवालय की तरह

मुख्य मन्दिर मे प्रवेश पाना

जब सम्भव नही होता आसानी से

और तब आता है याद

जब मारा गया हो बडा आदमी

वित्त मंत्री देश का भविष्य

निश्चित करने वाले हों संसद के सामनें

परिणाम निकलने वाला हो दान किए अधिकारों की संख्या का

धुएँ के बवंडर के बीच बिछ गईं हों लाशें

फैंकी जाने वाली हो क्रिकेट के घमासान में फैसलेवाली अंतिम गेन्द

और निकल जाए प्राण टेलीविजन के

सूख जाए तारों में दौडता हुआ रक्त

तब आता है याद

कबाड में पडा बैटरी से चलनेवाला

पुराना रेडियो


याद आती है जैसे वर्षों पुरानी स्मृति

जब युवा पिता

इमरती से भरा दौना लिए

दफ्तर से घर लौटते थे।


(रचनाकाल 1995)


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ब्रजेश कानूनगो

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