स्मृति के एकांत से...स्वान्तः सुखाय 48
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व्यंग्य के अक्ष पर चमकता 'जवाहर'
सन 1994 में इंदौर स्थान्तरित होकर आने तक मैं श्री जवाहर चौधरी जी से व्यक्तिगत रूप से कभी मिला नहीं था।
देवास, नीमच आदि में अपनी नौकरी करते हुए जब मेरी कोई व्यंग्य रचना नईदुनिया के 'अधबीच' स्तंभ में प्रकाशित होती तब उनका एक सुंदर अक्षरों में रचना की प्रशंसा में लिखा पोस्ट कार्ड अवश्य प्राप्त होता था। न सर्फ उनके खूबसूरत अक्षरों में लिखे शब्दों से मैं उत्साहित हो जाता था किन्तु उससे भी अधिक पत्र के नीचे उनके हस्ताक्षर बहुत मोहित करते थे। उनका हस्ताक्षर लगभग 'वन लाइनर' जैसा नजर आता है किंतु उसमें व्यंग्य की तरह वक्रता की बजाए उनकी आत्मीयता और स्नेह की झलक प्रवाहित होती दिखती रही है।
बाद में इंदौर में होने वाले प्रत्येक साहित्यिक आयोजनों में उनसे भेंट होने लगी। प्रलेस की गोष्ठी में मुझे उनके महत्वपूर्ण व्यंग्य संग्रह 'प्रबुद्ध बकरियाँ' पर चर्चा करने का अवसर मिला था।उसके बाद तो हिंदी साहित्य समिति, केंद्रीय पुस्तकालय में होने वाली गोष्ठियों में नित्य प्रति मेल मुलाकात और साहित्यिक चर्चाएं होती रहीं। जो अभी तक कोरोना समय से पहले तक जारी रहीं हैं। हमारी बैंक में होने वाली रचनात्मक गतिविधियों और साहित्यिक संगठन 'प्राची' के कई कार्यक्रमों में उन्होंने मुख्य अतिथि का दायित्व स्वीकार करके हमें अनुग्रहित किया है।
हिंदी साहित्य में व्यंग्य विधा में इंदौर की पहचान बनाने में शरद जोशी के बाद जवाहर भाई का नाम सबसे पहले आना स्वाभाविक है। उनके रचनात्मक योगदान पर बातचीत तो हमेशा ही होती रही है लेकिन जवाहर भाई को मैं कुछ अलग कोणों से भी महसूस करता हूँ।
जवाहर चौधरी जी के व्यंग्य लेखों का मैं प्रशंसक रहा हूँ। बल्कि एक तरह से व्यंग्य लेखन के प्रति उनकी एकाग्रता और समझ मेरे लिए प्रेरणा बनती रही है। वे पूर्ण रूप से व्यंग्य लेखन के प्रति समर्पित रहे हैं इसलिए व्यंग्य के उनके कीर्तिमान और प्रतिमान उनकी निष्ठा और मेहनत के परिणाम हैं। नाटक हो या कहानी या लघुकथा उनकी व्यंग्य दृष्टि हर विधा में मौजूद रही है। व्यंग्य के अक्ष के आसपास उनका समग्र सृजन गतिमान रहता रहा है।
मंच पर व्यंग्य पढ़ते हुए कई बार सुना है। व्यंग्य के संवादों को वे बहुत मिमिक्री और पात्र के अपने स्वभाव की तरह बहुत रोचकता से सुनाते हैं। रचना का वह चरित्र हमें उनके मुंह से बोलते दिखाई देने लगता है। मुझे उनके भीतर का कुशल नाट्य वार्ताकार संवाद करते नजर आता रहा है। संवाद लिखते समय जवाहर चौधरी उसकी नाट्य प्रस्तुति और समग्र प्रभाव का पूरा ध्यान रखते हैं। उनकी रचनाओं में दिलचस्पी का एक यह भी बड़ा कारण होता है। यही वजह है कि उनकी अनेक रचनाओं के नाट्य रूपांतरण हुए हैं। प्रहसन और नाटक रचने की उनकी यह प्रतिभा अन्य व्यंग्यकारों में उन्हें विशिष्ट स्थान दिलाती है। यह तो मुझे बहुत बाद में पता चला था कि वे बहुत अच्छे कार्टूनिस्ट भी हैं और एक सांध्यकालीन में नियमित व्यंग्य चित्र बनाते रहे हैं।
साफगोई और धैर्य जैसे गुण मैंने उनके व्यवहार और लेखन में हमेशा महसूस किए हैं। मित्र की खुशी का उन्हें हमेशा खयाल रहता है। वे कभी नहीं चाहते कि उनके किसी कृत्य से रिश्तों की डोर में कोई गांठ पड़ जाए। लेकिन बेहतरी के लिए उनका सहयोग हमेशा मित्रों को मिलना बहुत सहज होता है।
दूसरों के मन की बात को समझ कर गलती को स्वीकार कर लेना बहुत कम लोगों में पाया जाता है। मैंने महसूस किया कि वे इस मामले में बहुत बड़ा हृदय रखते हैं।
बहुत संभव है कुछ मित्रों को शायद जवाहर चौधरी जी के लिए मेरे ये कथन अजीब लगे किन्तु यह बिल्कुल सही है कि व्यंग्य लेखन के प्रति उनका समर्पण और रचना की पूर्णता और प्रकाशन में धैर्य मेरे मन में उनके प्रति सम्मान में वृद्धि करता है।
व्यंग्य लेखन में उन्होंने जो अर्जित किया वह किसी भी व्यंग्यकार की आकांक्षा हो सकती है....मेरी भी है....किन्तु वैसा जवाहर बनना इतना आसान भी नहीं....
ब्रजेश कानूनगो
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व्यंग्य के अक्ष पर चमकता 'जवाहर'
सन 1994 में इंदौर स्थान्तरित होकर आने तक मैं श्री जवाहर चौधरी जी से व्यक्तिगत रूप से कभी मिला नहीं था।
देवास, नीमच आदि में अपनी नौकरी करते हुए जब मेरी कोई व्यंग्य रचना नईदुनिया के 'अधबीच' स्तंभ में प्रकाशित होती तब उनका एक सुंदर अक्षरों में रचना की प्रशंसा में लिखा पोस्ट कार्ड अवश्य प्राप्त होता था। न सर्फ उनके खूबसूरत अक्षरों में लिखे शब्दों से मैं उत्साहित हो जाता था किन्तु उससे भी अधिक पत्र के नीचे उनके हस्ताक्षर बहुत मोहित करते थे। उनका हस्ताक्षर लगभग 'वन लाइनर' जैसा नजर आता है किंतु उसमें व्यंग्य की तरह वक्रता की बजाए उनकी आत्मीयता और स्नेह की झलक प्रवाहित होती दिखती रही है।
बाद में इंदौर में होने वाले प्रत्येक साहित्यिक आयोजनों में उनसे भेंट होने लगी। प्रलेस की गोष्ठी में मुझे उनके महत्वपूर्ण व्यंग्य संग्रह 'प्रबुद्ध बकरियाँ' पर चर्चा करने का अवसर मिला था।उसके बाद तो हिंदी साहित्य समिति, केंद्रीय पुस्तकालय में होने वाली गोष्ठियों में नित्य प्रति मेल मुलाकात और साहित्यिक चर्चाएं होती रहीं। जो अभी तक कोरोना समय से पहले तक जारी रहीं हैं। हमारी बैंक में होने वाली रचनात्मक गतिविधियों और साहित्यिक संगठन 'प्राची' के कई कार्यक्रमों में उन्होंने मुख्य अतिथि का दायित्व स्वीकार करके हमें अनुग्रहित किया है।
हिंदी साहित्य में व्यंग्य विधा में इंदौर की पहचान बनाने में शरद जोशी के बाद जवाहर भाई का नाम सबसे पहले आना स्वाभाविक है। उनके रचनात्मक योगदान पर बातचीत तो हमेशा ही होती रही है लेकिन जवाहर भाई को मैं कुछ अलग कोणों से भी महसूस करता हूँ।
जवाहर चौधरी जी के व्यंग्य लेखों का मैं प्रशंसक रहा हूँ। बल्कि एक तरह से व्यंग्य लेखन के प्रति उनकी एकाग्रता और समझ मेरे लिए प्रेरणा बनती रही है। वे पूर्ण रूप से व्यंग्य लेखन के प्रति समर्पित रहे हैं इसलिए व्यंग्य के उनके कीर्तिमान और प्रतिमान उनकी निष्ठा और मेहनत के परिणाम हैं। नाटक हो या कहानी या लघुकथा उनकी व्यंग्य दृष्टि हर विधा में मौजूद रही है। व्यंग्य के अक्ष के आसपास उनका समग्र सृजन गतिमान रहता रहा है।
मंच पर व्यंग्य पढ़ते हुए कई बार सुना है। व्यंग्य के संवादों को वे बहुत मिमिक्री और पात्र के अपने स्वभाव की तरह बहुत रोचकता से सुनाते हैं। रचना का वह चरित्र हमें उनके मुंह से बोलते दिखाई देने लगता है। मुझे उनके भीतर का कुशल नाट्य वार्ताकार संवाद करते नजर आता रहा है। संवाद लिखते समय जवाहर चौधरी उसकी नाट्य प्रस्तुति और समग्र प्रभाव का पूरा ध्यान रखते हैं। उनकी रचनाओं में दिलचस्पी का एक यह भी बड़ा कारण होता है। यही वजह है कि उनकी अनेक रचनाओं के नाट्य रूपांतरण हुए हैं। प्रहसन और नाटक रचने की उनकी यह प्रतिभा अन्य व्यंग्यकारों में उन्हें विशिष्ट स्थान दिलाती है। यह तो मुझे बहुत बाद में पता चला था कि वे बहुत अच्छे कार्टूनिस्ट भी हैं और एक सांध्यकालीन में नियमित व्यंग्य चित्र बनाते रहे हैं।
साफगोई और धैर्य जैसे गुण मैंने उनके व्यवहार और लेखन में हमेशा महसूस किए हैं। मित्र की खुशी का उन्हें हमेशा खयाल रहता है। वे कभी नहीं चाहते कि उनके किसी कृत्य से रिश्तों की डोर में कोई गांठ पड़ जाए। लेकिन बेहतरी के लिए उनका सहयोग हमेशा मित्रों को मिलना बहुत सहज होता है।
दूसरों के मन की बात को समझ कर गलती को स्वीकार कर लेना बहुत कम लोगों में पाया जाता है। मैंने महसूस किया कि वे इस मामले में बहुत बड़ा हृदय रखते हैं।
बहुत संभव है कुछ मित्रों को शायद जवाहर चौधरी जी के लिए मेरे ये कथन अजीब लगे किन्तु यह बिल्कुल सही है कि व्यंग्य लेखन के प्रति उनका समर्पण और रचना की पूर्णता और प्रकाशन में धैर्य मेरे मन में उनके प्रति सम्मान में वृद्धि करता है।
व्यंग्य लेखन में उन्होंने जो अर्जित किया वह किसी भी व्यंग्यकार की आकांक्षा हो सकती है....मेरी भी है....किन्तु वैसा जवाहर बनना इतना आसान भी नहीं....
ब्रजेश कानूनगो