स्मृति के एकांत से...
स्वान्तः सुखाय 38
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स्कूटर पर सवार गणेश
इस बात को अब दोहराने की आवश्यकता नहीं रही है कि जन जागरण के उद्देश्य से जिस रूप में बाल गंगाधर तिलक जी ने सार्वजनिक 'गणेशोत्सव' की परंपरा देश में शुरू की थी उसका स्वरूप अब बिल्कुल बदल चुका है।
गणेशोत्सव का जैसा रूप देवास में पहले हुआ करता था वैसा अब नही रहा। सब कुछ बदल गया।
ख्यात शास्त्रीय गायक पंडित कुमार गन्धर्व जी की अध्यक्षता वाले 'शिव छत्रपति गणेश मंडल' के कार्यक्रमों का सालभर हमें इंतज़ार रहता था। हम लोग सौभाग्यशाली रहे कि हमारी पीढी ने तब के गणेशोत्सव कार्यक्रमों में पंडित भीमसेन जोशी,हरिप्रसाद चौरसिया,शोभा गुर्टू,शंकर शंभू जैसे नामचीन कलाकारों को देखते सुनते हुए कला संस्कृति के संस्कार पाए। बहुत सी प्रतिभाओं ने शहर के छोटे छोटे गणेश मंडलों में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते बड़ी हुई और प्रसिद्धि पाई है।
एक जागरूकता अवश्य अब देखी जाती है इन दिनों। शहर के कुछ स्कूलों में पर्यावरण सुरक्षा की दृष्टि से बच्चों को मिट्टी के गणेश बनवाने का प्रशिक्षण भी दिया जाने का प्रयास होता है।
फिर भी महाराष्ट्र, दक्षिण के कुछ राज्यों और मध्यभारत के कुछ क्षेत्रों में मोहल्लों व घरों में गणेश चतुर्थी से लेकर अनन्त चतुर्दशी तक दस दिनों गणेश प्रतिमा स्थापित कर पूजन अर्चन के साथ साथ कुछ सांस्कृतिक और मनोरंजक कार्यक्रमों के आयोजन करने के प्रयास होते हैं। कवि सम्मेलनों और कुछ जगह मुशायरे भी होते हैं किंतु पहले वाली गंभीरता और रुचि अब उतनी नहीं रही।
अब तो अपनी सुविधा से कुछ घरों में डेढ़ दिन, तीन दिन, पांच दिन भी गणेश बैठाए जाने लगे हैं। पुणे, मुम्बई और इंदौर के गणेश उत्सव तो देश दुनिया में काफी ख्याति अर्जित कर चुके हैं।
यहां बात मैं अपने बचपन के अपने नगर की ही करता हूँ। गणेश चतुर्थी के दिन गणेश प्रतिमाएं बाजार से लाने का बड़ा उत्साह रहता था। चौराहों पर अनेक दुकानें सजी होती थीं। जो लोग गणेशजी की कलात्मक प्रतिमाओं में रुचि रखते थे वे नगर के कुशल और नामी कलाकारों द्वारा बनाई मूर्तियां ही खरीदते थे। देवास सीनियर के धर्माधिकारी बन्धु, देवास जूनियर के कापडे माटसाब द्वारा बनाई गई प्रतिमाओं का सौंदर्य,कलात्मकता और मटेरियल की फिनिशिंग, रंग रोगन बहुत उत्कृष्ट हुआ करता था। बड़े बड़े संस्थानों के यहां उन्ही के यहां से छोटी बड़ी प्रतिमाएं ढोल नगाड़ों के साथ ले जाएं जाती थीं।
देवास में होने वाले गणेशोत्सव का ही शायद प्रभाव रहा कि बचपन से ही गणपति प्रतिमा से मुझे बड़ा अपनत्व व जुड़ाव रहा है। कई बार घर में ही कागज की लुगदी, पीली मिट्टी आदि से बड़ी मेहनत करके गणेश प्रतिमाएं बनाया करते थे। बाजार की प्रतिमाओं जैसे भले ही नहीं बनते, किन्तु उन्हें बनाने में मजा बहुत आता था।
जब थोड़ा बड़ा हो गए तो फिर पढाई वगैरह के कारण प्रतिमा बनाना छोड़ दिया। वर्षों बाद पिछले बरस जब बच्चों ने घर में ही प्रतिमा बनाने का आग्रह किया तो पुनः इस कला में हाथ आजमाने की कोशिश की थी। पड़ोसी के बच्चों को भी प्रतिमा बनाना सिखाया। नीचे उस दिन के चित्र दे रहा हूँ।
गणेशजी की विभिन्न रूपों में बनाई गई प्रतिमाओं को देखने खरीदने का शौक हमेशा बना रहा। गणेशजी की प्रतिमा को जितने विविध स्वरूप दिए गए हैं उतने शायद ही किसी भगवान की मूर्ति में प्रयोग हुए होंगे। जो भी तत्कालीन ज्वलन्त मुद्दा समाज मे रहता है, गणेशजी उसी रूप में उपलब्ध हो जाते हैं। कभी मुनीम, कभी संगीतकार, कभी कम्प्यूटर संचालक, कभी ट्रेक्टर चलाते किसान, कभी सैनिक, कभी कर्नल, यहां तक कि जनरल मानिक शॉ के प्रतिरूप वाले गणेश जी भी मैंने देखे थे। बाँसुरी बजाते मुरलीधर, वीणावादिनी की तरह वीणा बजाते,कभी शिवाजी महाराज की तरह तो कभी होलकर वंश की पगड़ी या गांधी टोपी धारण किए गणेश जी दिखते रहे हैं।
गणेश जी की सवारी आमतौर पर चूहा होती है किंतु इससे हटकर भी कई प्रयोग हुए हैं। कार्तिकेय के बगल में मयूर पर विराजे, तो कभी गजराज पर गजमुख सहित गणेश, कभी बस में सवारी करते, तो कभी विमान के पायलट की तरह। जब आर्मस्ट्रॉन्ग ने चांद पर पहला कदम रखा था, हमारे गणेश जी भी एस्ट्रोनॉट बनकर प्रतिमा में अवतरित हुए। इस संदर्भ में एक बड़ा दिलचस्प वाकया मुझे याद आता है।
प्रतिमाओं की विभिन्नता देखने के लिए हम लोग कई जगह इसी उद्देश्य से जाते थे कि देखें इस बार कौनसी नई प्रतिमा अलग हटकर लाई गई है। देवास के सुभाष चौक स्थित घण्टाघर के आसपास की बात है। तब मैं बैंक की देवास मुख्य शाखा में पदस्थ था। चौराहे पर हमारे एक मित्र मिल गए जो मेरी इस प्रवत्ति को जानते थे, मुझे देखकर बोले -'अरे देखो उधर...वहां स्कूटर पर बैठे गणेश मिल रहे हैं!' जिज्ञासा वश उधर के स्टाल की तरफ जाकर स्कूटर सवार गणेश जी को तलाशने लगा। किन्तु निराशा हाथ लगी। वहां वैसी कोई प्रतिमा नजर नहीं आई। मैंने मुडकर मित्र से जानना चाहा कि कहां देखे उन्होंने स्कूटर सवार गणेशजी?
तब हंसते हुए उन्होंने स्टाल के सामने इशारा करते हुए कहा- 'वह क्या बैठे हैं स्कूटर पर!'
वहाँ प्रतिमा तो नहीं करीब 90 किलो वजन वाले हमारे एक अन्य साथी स्कूटर पर ही बैठे बैठे छोटी सी प्रतिमा का मोल भाव कर रहे थे। फिर क्या था ठहाके लग उठे।
आज भी जब वह किस्सा याद आता है चेहरे पर मुस्कुराहट तैर जाती है...
ब्रजेश कानूनगो
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