स्मृति के एकांत से ...
स्वान्तः सुखाय 39 व 40
39
जय जवान जय किसान
यह मेरा सौभाग्य ही था कि अनिवार्य ग्रामीण पोस्टिंग के लिए बैंक ने मुझे बरोठा जैसी ग्रामीण शाखा का शाखा प्रबंधक बनाया था।
एक रचनाकार के नाते भी बैंक प्रबंधन का सदैव कृतज्ञ रहूंगा जिसके कारण किसानों और ग्रामीण समाज के जीवन को निकट से अनुभव करने का थोड़ा सा अनुभव मिल सका।
छोटे से गांव में स्थित बैंक शाखा के प्रबंधक को उस वक्त तक तो बहुत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। उन दिनों जिन अनुभूतियों से मैं गुजरा वे मेरे लिए हमेशा के लिए मन में बस गईं हैं।
मैंने महसूस किया कि जो परिवार खेती के साथ साथ अन्य हुनर भी जानते हैं उन परिवारों की युवा पीढी कामकाज की तलाश में शहरों,महानगरों की ओर पलायन कर जाते हैं। जहां कारपेंटरी, इलेक्ट्रिशियन, प्लम्बर आदि के अलावा कारखानों में उन्हें रोजगार मिल जाता है।
इसके उलट बहुत से किसान युवक पुश्तैनी खेती में ही पूरी तरह खप जाते हैं। इन्ही परिवारों के बहुत से किसान पुत्रों में सेना में भर्ती होकर देश सेवा करने की राष्ट्रीय भावना कूट कूट कर भरी होती है। जय जवान जय किसान का नारा बहुत से ग्रामीण परिवारों में चरितार्थ होता दिखाई दिया मुझे।
कारगिल युद्ध (1999-2000) में विजय के बाद गाँव के कुछ सैनिक बेटे घर आए तो उनका जोरदार स्वागत किया गया। गांव भर में ढोल बाजों के साथ उनका जुलूस निकाला गया। युवक पूरे समय सैनिक गणवेश में अभिवादन स्वीकार करते रहे। चौराहों पर पुष्पमालाओं से उनका अभिनन्दन किया गया।
हमारे बैंक कार्यालय में भी उनके सम्मान का एक कार्यक्रम रखा गया। अंततः हम लोग भी उसी गाँव के परिवार का हिस्सा हो गए थे।
कोतवाली के अलावा बैंक शाखा ही एक ऐसी संस्था थी जिसकी भागीदारी की गांव वालों में काफी आकांक्षा व प्रतिष्ठा होती थी।
बैंक के उस दिन के उस संक्षिप्त सैनिक सम्मान समारोह में बरोठा नगर के बड़े छोटे व्यापारी, शासकीय कर्मचारी, ग्राहक, किसान, पंच सरपंच सभी शामिल हुए थे।
निसंदेह उस दिन शाखा परिसर में देशप्रेम की जो हवा बहने लगी थी और भारतीयता की गौरव लहरें मन के सागर में बहुत दिनों तक उमड़ती रहीं , वह अविस्मरणीय ही हैं....
40
'सेठजी' से मुलाकात
कभी कभी ऐसे दिलचस्प प्रसंग उपस्थित हो जाते हैं कि हम आश्चर्य और खुशी से भर उठते हैं। ऐसा ही कुछ उस वक्त घटा था जब मैंने पहली बार अपने ग्रामीण दफ्तर का कार्यभार संभाला।
बैंक की बरोठा ग्रामीण शाखा में जिस दिन मैंने अपने पूर्ववर्ती प्रबन्धक को कार्यमुक्त करके अपना पदभार ग्रहण किया था, स्टाफ सदस्यों ने स्वागत और विदाई में एक छोटा सा आत्मीय कार्यक्रम रख लिया। इस बैठक में सरपंच, व्यवसायियों,सरकारी विभागों के कुछ सम्मानित ग्राहकों को भी आमंत्रित कर लिया गया।
शाखा के एक प्रतिष्ठित व्यापारी भी आमंत्रित किये गए थे। जैसे ही उन्होंने शाखा में प्रवेश किया पुराने प्रबन्धक और कुछ स्टाफ सदस्य उठकर द्वार तक उन्हें लिवाने चले गए।
बैठक में मैने गौर किया कि वे सम्मानित ग्राहक जिन्हें 'सेठजी' कहा जा रहा था मेरी ओर अपलक देखते रहे। बिदाई और स्वागत की औपचारिकताओं के बाद जब चाय पान के बाद बातचीत शुरू हुई तो 'सेठजी' थोड़ा मेरे और करीब आ गए। मुझे भी अब ऐसा अवश्य लगने लगा था कि वे मुझमे कुछ ज्यादा ही रुचि ले रहे थे। आखिर उनसे रहा नहीं गया। थोड़ा संकोच से बोले-' आप देवास में कहाँ रहते थे?'
मैने जब बताया कि मैं देवास विकास प्राधिकरण की बनाई नई कॉलोनी विजय नगर में रहता हूँ। अपना घर वहीं खरीद लिया है।
किन्तु वे इस उत्तर से संतुष्ट नहीं हुए। कहने लगे-'देवास के नाना बाजार से आपका कुछ सम्बन्ध रहा है कभी?'
'हाँ, सेठजी वह तो मेरा बचपन का पुश्तैनी मोहल्ला है।' मेरा इतना कहते ही वे उठ खड़े हुए और खुशी से बोल उठे- 'तुम ब्रजेश ही हो न?'
'जी, बिल्कुल! मगर आप?...
'अरे मैं 'गोपाल'(परिवर्तित) हूँ। हम दोनों अत्रे भवन स्कूल में एक साथ टाटपट्टी पर बैठकर पढ़े हैं। रामदुलारे माटसाब हमारे हेडमास्टर साहब थे।'
अब क्या था। सेठजी ने उठकर मुझे गले लगा लिया।
अपने बचपन के दोस्त का इस तरह मिलने की जो अनुभूति हुई थी वह मैं और गोपाल सेठ ही शायद समझ सकते हैं।
बाद में गोपाल सेठ ने बचपन की उस मित्रता को खूब यहां भी निभाया। शाखा में जब कभी अकस्मात नकदी की कमी पड़ जाती, देवास से रोकड़ आने तक सेठजी धन भिजवा दिया करते उनके खाते में जमा करवाने के लिए। हमारा काम चल जाता। गांव के अधिकाँश ग्राहकों का बहुत स्नेह सहयोग मिलता रहा। गोपाल सेठ का प्रेम तो सचमुच हमारे लिए द्वारकाधीश की तरह उदात्त था। बालसखा जो थे हम दोनों।
गोपाल सेठ भी हमारे स्कूल में ही पढ़े थे। दरअसल,देवास के आसपास के गांवों के बहुत से बच्चे हमारे मोहल्ले में ही किराए का कमरा लेकर पढ़ाई किया करते थे। अत्रे भवन प्राथमिक शाला में पांचवीं तक की शिक्षा मोहल्ले में ही मिल जाती थी। नाना बाजार (अब रज्जब अली खां मार्ग) हमारा मुहल्ला था। अत्रे भवन स्कूल भी उसी गली में स्थित था।
पिछली कुछ किश्तों में मैंने अपने मोहल्ले को स्मरण किया है। आगे मैं अपने उस स्कूल के बारे में भी कुछ और कहने का प्रयास करूंगा।
आज अपने मोहल्ले पर लिखी 25 वर्ष पुरानी मेरी वह कविता पढ़ लीजिये यहां, जिसे गोपाल सेठ ने भी अवश्य वैसा ही जिया होगा जैसा मैंने....यह कविता नईदुनिया अखबार के बहुत लोकप्रिय और विशिष्ट 'दीपावली विशेषांक' में प्रकाशित हुई थी.....
कविता
मेरा मुहल्ला
कहाँ गया मेरा मुहल्ला
जो मै छोड़ गया था बीस बरस पहले यहीं कहीं
नहीं दिखाई दे रहा वह नुक्कड़ का हलवाई
रस से भरी मिठाइयाँ दूर दूर तक जाती थी जिसकी
चिढ़ती-झल्लाती जगत बुआजी
जिसके बरामदे में होली पर गंदगी फैंक आया करते थे हुड़दंगी
अंगूठा छाप टेलर मास्टर जिन्हे मैंने
चंद्रकांता संतति पढ़कर सुनाई थी रोज-रोज
अख्तरख़ान जिसे देखकर हम गली में छुप जाते थे इस डर से
कि कहीं वह हमारी किताबें न छीन ले
वह काला और मरियल सा नन्हा शायर
जो मधुर आवाज में गाया करता था फिल्मी गाने
क्रिकेट की गेंद जब्त कर लेने वाली कठोर महिला
जो पहले तो डांटती थी
फिर उढ़ेल देती थी स्नेह का पूरा समुद्र
न जाने कहाँ चले गए हैं सब
वह इमली का पेड़ जो दादी की कहानियों के प्रेत की तरह
हमारी पतंग को पकड़ लिया करता था अक्सर
वह टूटा पुराना ध्वस्त मकान भी दिखाई नही दे रहा
जिसकी सड़ी हुई लकड़ियाँ होली में जलाते रहने से
हमारा चंदा बच जाया करता था-सिनेमा देखने के लिए
शायद यही है मेरा मुहल्ला लेकिन
उग आया है एक बाजार हमारी गेंद पट्टी पर
होली के वृक्ष की स्थापना चिंता की बात हो गई है
टेलर की दुकान में खुल गई है एक नई दुकान
जो अंग्रेजी माध्यम में सिखा रही है त्यौहार मनाना
गर्म जलेबियों की खुशबू नही बिखरती अब नुक्कड पर
नई जमीन के नक्शे पर
सपने बेच रहा है हलवाई का बेटा
धराशायी मकान की भस्म पर खड़ी हो गई है ऊँची इमारत
जिसकी ओट में छिप गया है नीला कैनवास
पतंग के रंगों से बनते थे जिस पर स्मृतियों के अल्हड़ चित्र
वैसा ही हो गया है मेरा मुहल्ला
जैसे कोई कहे-कितना अलग है तुम्हारा छोटा बेटा ।
000
ब्रजेश कानूनगो
स्वान्तः सुखाय 39 व 40
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जय जवान जय किसान
यह मेरा सौभाग्य ही था कि अनिवार्य ग्रामीण पोस्टिंग के लिए बैंक ने मुझे बरोठा जैसी ग्रामीण शाखा का शाखा प्रबंधक बनाया था।
एक रचनाकार के नाते भी बैंक प्रबंधन का सदैव कृतज्ञ रहूंगा जिसके कारण किसानों और ग्रामीण समाज के जीवन को निकट से अनुभव करने का थोड़ा सा अनुभव मिल सका।
छोटे से गांव में स्थित बैंक शाखा के प्रबंधक को उस वक्त तक तो बहुत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। उन दिनों जिन अनुभूतियों से मैं गुजरा वे मेरे लिए हमेशा के लिए मन में बस गईं हैं।
मैंने महसूस किया कि जो परिवार खेती के साथ साथ अन्य हुनर भी जानते हैं उन परिवारों की युवा पीढी कामकाज की तलाश में शहरों,महानगरों की ओर पलायन कर जाते हैं। जहां कारपेंटरी, इलेक्ट्रिशियन, प्लम्बर आदि के अलावा कारखानों में उन्हें रोजगार मिल जाता है।
इसके उलट बहुत से किसान युवक पुश्तैनी खेती में ही पूरी तरह खप जाते हैं। इन्ही परिवारों के बहुत से किसान पुत्रों में सेना में भर्ती होकर देश सेवा करने की राष्ट्रीय भावना कूट कूट कर भरी होती है। जय जवान जय किसान का नारा बहुत से ग्रामीण परिवारों में चरितार्थ होता दिखाई दिया मुझे।
कारगिल युद्ध (1999-2000) में विजय के बाद गाँव के कुछ सैनिक बेटे घर आए तो उनका जोरदार स्वागत किया गया। गांव भर में ढोल बाजों के साथ उनका जुलूस निकाला गया। युवक पूरे समय सैनिक गणवेश में अभिवादन स्वीकार करते रहे। चौराहों पर पुष्पमालाओं से उनका अभिनन्दन किया गया।
हमारे बैंक कार्यालय में भी उनके सम्मान का एक कार्यक्रम रखा गया। अंततः हम लोग भी उसी गाँव के परिवार का हिस्सा हो गए थे।
कोतवाली के अलावा बैंक शाखा ही एक ऐसी संस्था थी जिसकी भागीदारी की गांव वालों में काफी आकांक्षा व प्रतिष्ठा होती थी।
बैंक के उस दिन के उस संक्षिप्त सैनिक सम्मान समारोह में बरोठा नगर के बड़े छोटे व्यापारी, शासकीय कर्मचारी, ग्राहक, किसान, पंच सरपंच सभी शामिल हुए थे।
निसंदेह उस दिन शाखा परिसर में देशप्रेम की जो हवा बहने लगी थी और भारतीयता की गौरव लहरें मन के सागर में बहुत दिनों तक उमड़ती रहीं , वह अविस्मरणीय ही हैं....
40
'सेठजी' से मुलाकात
कभी कभी ऐसे दिलचस्प प्रसंग उपस्थित हो जाते हैं कि हम आश्चर्य और खुशी से भर उठते हैं। ऐसा ही कुछ उस वक्त घटा था जब मैंने पहली बार अपने ग्रामीण दफ्तर का कार्यभार संभाला।
बैंक की बरोठा ग्रामीण शाखा में जिस दिन मैंने अपने पूर्ववर्ती प्रबन्धक को कार्यमुक्त करके अपना पदभार ग्रहण किया था, स्टाफ सदस्यों ने स्वागत और विदाई में एक छोटा सा आत्मीय कार्यक्रम रख लिया। इस बैठक में सरपंच, व्यवसायियों,सरकारी विभागों के कुछ सम्मानित ग्राहकों को भी आमंत्रित कर लिया गया।
शाखा के एक प्रतिष्ठित व्यापारी भी आमंत्रित किये गए थे। जैसे ही उन्होंने शाखा में प्रवेश किया पुराने प्रबन्धक और कुछ स्टाफ सदस्य उठकर द्वार तक उन्हें लिवाने चले गए।
बैठक में मैने गौर किया कि वे सम्मानित ग्राहक जिन्हें 'सेठजी' कहा जा रहा था मेरी ओर अपलक देखते रहे। बिदाई और स्वागत की औपचारिकताओं के बाद जब चाय पान के बाद बातचीत शुरू हुई तो 'सेठजी' थोड़ा मेरे और करीब आ गए। मुझे भी अब ऐसा अवश्य लगने लगा था कि वे मुझमे कुछ ज्यादा ही रुचि ले रहे थे। आखिर उनसे रहा नहीं गया। थोड़ा संकोच से बोले-' आप देवास में कहाँ रहते थे?'
मैने जब बताया कि मैं देवास विकास प्राधिकरण की बनाई नई कॉलोनी विजय नगर में रहता हूँ। अपना घर वहीं खरीद लिया है।
किन्तु वे इस उत्तर से संतुष्ट नहीं हुए। कहने लगे-'देवास के नाना बाजार से आपका कुछ सम्बन्ध रहा है कभी?'
'हाँ, सेठजी वह तो मेरा बचपन का पुश्तैनी मोहल्ला है।' मेरा इतना कहते ही वे उठ खड़े हुए और खुशी से बोल उठे- 'तुम ब्रजेश ही हो न?'
'जी, बिल्कुल! मगर आप?...
'अरे मैं 'गोपाल'(परिवर्तित) हूँ। हम दोनों अत्रे भवन स्कूल में एक साथ टाटपट्टी पर बैठकर पढ़े हैं। रामदुलारे माटसाब हमारे हेडमास्टर साहब थे।'
अब क्या था। सेठजी ने उठकर मुझे गले लगा लिया।
अपने बचपन के दोस्त का इस तरह मिलने की जो अनुभूति हुई थी वह मैं और गोपाल सेठ ही शायद समझ सकते हैं।
बाद में गोपाल सेठ ने बचपन की उस मित्रता को खूब यहां भी निभाया। शाखा में जब कभी अकस्मात नकदी की कमी पड़ जाती, देवास से रोकड़ आने तक सेठजी धन भिजवा दिया करते उनके खाते में जमा करवाने के लिए। हमारा काम चल जाता। गांव के अधिकाँश ग्राहकों का बहुत स्नेह सहयोग मिलता रहा। गोपाल सेठ का प्रेम तो सचमुच हमारे लिए द्वारकाधीश की तरह उदात्त था। बालसखा जो थे हम दोनों।
गोपाल सेठ भी हमारे स्कूल में ही पढ़े थे। दरअसल,देवास के आसपास के गांवों के बहुत से बच्चे हमारे मोहल्ले में ही किराए का कमरा लेकर पढ़ाई किया करते थे। अत्रे भवन प्राथमिक शाला में पांचवीं तक की शिक्षा मोहल्ले में ही मिल जाती थी। नाना बाजार (अब रज्जब अली खां मार्ग) हमारा मुहल्ला था। अत्रे भवन स्कूल भी उसी गली में स्थित था।
पिछली कुछ किश्तों में मैंने अपने मोहल्ले को स्मरण किया है। आगे मैं अपने उस स्कूल के बारे में भी कुछ और कहने का प्रयास करूंगा।
आज अपने मोहल्ले पर लिखी 25 वर्ष पुरानी मेरी वह कविता पढ़ लीजिये यहां, जिसे गोपाल सेठ ने भी अवश्य वैसा ही जिया होगा जैसा मैंने....यह कविता नईदुनिया अखबार के बहुत लोकप्रिय और विशिष्ट 'दीपावली विशेषांक' में प्रकाशित हुई थी.....
कविता
मेरा मुहल्ला
कहाँ गया मेरा मुहल्ला
जो मै छोड़ गया था बीस बरस पहले यहीं कहीं
नहीं दिखाई दे रहा वह नुक्कड़ का हलवाई
रस से भरी मिठाइयाँ दूर दूर तक जाती थी जिसकी
चिढ़ती-झल्लाती जगत बुआजी
जिसके बरामदे में होली पर गंदगी फैंक आया करते थे हुड़दंगी
अंगूठा छाप टेलर मास्टर जिन्हे मैंने
चंद्रकांता संतति पढ़कर सुनाई थी रोज-रोज
अख्तरख़ान जिसे देखकर हम गली में छुप जाते थे इस डर से
कि कहीं वह हमारी किताबें न छीन ले
वह काला और मरियल सा नन्हा शायर
जो मधुर आवाज में गाया करता था फिल्मी गाने
क्रिकेट की गेंद जब्त कर लेने वाली कठोर महिला
जो पहले तो डांटती थी
फिर उढ़ेल देती थी स्नेह का पूरा समुद्र
न जाने कहाँ चले गए हैं सब
वह इमली का पेड़ जो दादी की कहानियों के प्रेत की तरह
हमारी पतंग को पकड़ लिया करता था अक्सर
वह टूटा पुराना ध्वस्त मकान भी दिखाई नही दे रहा
जिसकी सड़ी हुई लकड़ियाँ होली में जलाते रहने से
हमारा चंदा बच जाया करता था-सिनेमा देखने के लिए
शायद यही है मेरा मुहल्ला लेकिन
उग आया है एक बाजार हमारी गेंद पट्टी पर
होली के वृक्ष की स्थापना चिंता की बात हो गई है
टेलर की दुकान में खुल गई है एक नई दुकान
जो अंग्रेजी माध्यम में सिखा रही है त्यौहार मनाना
गर्म जलेबियों की खुशबू नही बिखरती अब नुक्कड पर
नई जमीन के नक्शे पर
सपने बेच रहा है हलवाई का बेटा
धराशायी मकान की भस्म पर खड़ी हो गई है ऊँची इमारत
जिसकी ओट में छिप गया है नीला कैनवास
पतंग के रंगों से बनते थे जिस पर स्मृतियों के अल्हड़ चित्र
वैसा ही हो गया है मेरा मुहल्ला
जैसे कोई कहे-कितना अलग है तुम्हारा छोटा बेटा ।
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ब्रजेश कानूनगो
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