Wednesday, 22 July 2020

स्मृति के एकांत से... स्वान्तः सुखाय 47

स्मृति के एकांत से... स्वान्तः सुखाय 47

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सुर में होते थे नाम और संबंध

राजेश,नरेश,मुकेश, ब्रजेश,महेश,शैलेश,गिरीश, योगेश,दिनेश,रमेश,यतीश,सुरेश,सुभाष, सतीश।

ये 'नामकरण  शब्दकोश' के किसी अध्याय का अंश नहीं है।  हमारे कुटुंब की दो पीढ़ियों के बालकों के नाम रहे हैं। बहुत सुर में थे ये नाम और सम्बन्ध भी। अब ये सब लोग उम्र में 55/60 से ऊपर हैं।

ये तो फिर वे नाम हैं जो स्कूल में प्रवेश के समय दर्ज कराए गए थे। कुछ की पहचान तो बोलते नाम से ही अब तक कायम है। एक विवाह समारोह में एक युवक ने मेरे पांव छुए और बताया कि अंकल मैं प्रतीक हूँ। मैंने पहचानने में थोड़ा समय लगाया तो उसने तुरंत मेरी जिज्ञासा शांत करते हुए कहा-अरे अंकल मैं 'भय्यू जी' का बेटा हूँ। मैंने स्नेह से गले लगा लिया। 

मेरे बचपन के मित्र और हमउम्र रिश्ते में काका को 'भय्यू' के अलावा और कैसे जान सकता था। 'टुन्ना' जी टुन्ना साहब कहलाने लगे। 'मुन्ना' जी बड़े होने से मुन्ना साहब हो गये किन्तु बहुत कम लोग जान पाए कि उनके असली नाम क्या थे? इसी रिदम में मुन्ना के साथ बहन मुन्नी भी रहेंगीं। 'टुन्ना' हैं तो उनकी बहन निश्चित ही 'टुन्नी' कहलाएंगीं।

अब 'बुग्गा' को ही लीजिए। वे अब भी 'बुग्गा जी' ही हैं। हमारे बच्चों के वे बुग्गा अंकल हो गए हैं किंतु उन्हें उनका असली नाम पता ही नहीं होगा।
ऐसा भी नहीं है कि इन सबके स्कूली नाम अच्छे नहीं थे। वे बहुत सोच समझकर रखे गए  अभिजात्य नाम थे परन्तु बुग्गा जी को कोई राहुल से, भय्यू जी को शरद से टुन्नाजी को इंद्रजीत के नाम से या मुन्ना साहब को प्रदीपकुमार नाम से आज भी कोई संबोधित नहीं कर पाता।

कुटुंब इतना विशाल होता था कि बाहर से आने वाला अनजान व्यक्ति जान ही नहीं पाता था कि किस बच्चे के माता पिता कौन हैं। महेश जी के पिताजी किताब की दुकान पर साथ आये ब्रजेश को भी अगली कक्षा की किताबें खरीदकर दे देते थे। शैलेश को दोपहर का नाश्ता गिरीश की चाची करवा देती थीं।

फोटोग्राफर आता था तो आधा घंटा ग्रुप फोटोग्राफ की तैयारी में लगता था। अब अपने-अपने सेल्फी हैं।
लोगों के समूह में भी बच्चों के प्रति अधिकारपूर्ण व्यवहार से ही अनुमान हो जाता है कि फलां बच्चे के माँ बाप कौन से हैं।

एक किस्सा याद आ रहा। गर्मी की एक दोपहर को कुटुंब के कोई सात आठ बच्चे घर के पिछवाड़े बाड़े में खेल रहे थे। पास के गांव से ग्रामीण दंपत्ति शुद्ध घी बेचने आया करते थे। उस दिन भी आगे मुख्य द्वार की चौखट पर बैठकर दादी और माँ उनसे मोल भाव कर रहे थे। धूप में आये थे तो माँ ने उन्हें ठंडा पानी लाकर दिया। थोड़ी देर सुस्ताने लगे तभी हम बच्चों का खेल खत्म हो गया और बाड़े से निकलकर एक एक बच्चा चौखट पार कर बाहर निकलने लगा। अब मैदान में जाकर खेलना था।
वे घी बेचने आये ग्रामीण दंपत्ति हम सबको देखते रहे। मैं और मेरा भाई सबसे पीछे थे।
तभी मैंने पीछे से सुना कि घी वाली औरत दादी से पूछ रही थी - 'काय हो मासाब , ई सारा नाना नानी अन्ही लाड़ी काज है?!!'
(क्या ये सारे सात आठ बच्चे तुम्हारी इस बहू के ही हैं?')

मेरी माँ की उस वक्त क्या हालत हुई होगी आप सहज कल्पना कर सकते हैं। दरअसल उस औरत का प्रश्न भी गलत नहीं था। उस जमाने में सात,आठ बच्चों के माता पिता हो जाना अधिक आश्चर्य की बात नहीं हुआ करती थी।

अब जो माइक्रो फेमिली का समय आया है उसमें ये बातें शायद अविश्वसनीय किस्से कहानियों की तरह ही लगें। बच्चों के जो नाम अब आ रहे हैं, उनमे ऐसी लय नहीं देखने को मिलती। बीट्स की तरह खण्ड-खण्ड बजते हैं नाम और सम्बन्ध।

आइये आज बचपन के उन मस्ती भरे दिनों और दोस्तों को याद करते हुए थोड़ा सा बड़ा बन जाते हैं इस कविता के साथ...

कविता
स्वाद
ब्रजेश कानूनगो 

खट्टे-कसैले की मौजूदगी के बावजूद
बहुत बड़ा हिस्सा मीठा ही था उन दिनों 
सलीम और मैं दौड़ते चले जाते थे
घंटी बजते ही दत्त मंदिर की ओर
प्रवचन के बाद बंटने वाला
‘गोपाल काला’ दही से बनता था
दोस्ती का वह स्वाद बना हुआ है अब तक 

कैसे भुलाया जा सकता है
खालिस दूध से बना शरबत
कमरू आपा के प्यार जैसा मधुर
इस्माइल चाचा की रेवड़ियाँ और रोट
माँ के बनाए लड्डुओं की तरह
घुलते जाते थे मुंह में

नहर बन गई गली में
मछलियों की तरह बहकर आते थे भुट्टे और ककड़ियाँ
किशोर, बुग्गा, भय्यू और सलीम सब मिल करते थे शिकार
गर्म पकौड़ों की तरह लगता था उनका स्वाद
बरसात में भीगते हुए

स्वाद तो सेव-परमल का भी कुछ कम नहीं होता था
जो होली की रात चंदे की रकम से खाते थे हम बच्चे 
पिता की दूकान से चुराकर लाता था अब्दुल
प्याज और हरी मिर्च 

चखा तो नहीं पर देखा जरूर है विष का असर
खँडहर की खुदाई करते हुए मंगल का अमंगल देखा है

कॉलेज के दिनों में साइनाइड चख लेने का
दावा किया था एक प्रोफ़ेसर ने तो हँसे थे सब लोग
जीवित बचे तो पागल कहा जाने लगा उन्हें   
झूठा नहीं था रसायन विज्ञानी
हो सकता है अधिक विषैले की उपस्थिति ने
बेअसर कर दिया हो जहर का असर
या भीतर के किसी विष निरोधक तत्व ने
किया हो जमकर मुकाबला   

विष का असर देखा जा सकता है अब भी आसानी से
रंग नहीं अब स्वाद से एकाकार होता है गिरगिट 
फलों, सब्जियों और अनाज के स्वाद में ऐसे घुलता है
कि पहचानना मुश्किल है विष का स्वाद

मनुष्यता के आँगन में घुसे आ रहे हैं विषैले जंतु
घुल रहा है साइनाइड आबोहवा में धीरे-धीरे
नदियाँ, भाषाएँ दूषित होने लगी हैं

पागल प्रोफ़ेसर कहाँ हो तुम
बताओ यह किस खतरनाक रसायन का विस्तार है 
चखो इसे ठीक से
घोषित करो इसका सही-सही स्वाद

विष के खिलाफ रणनीति बनाने में 
स्वाद का विश्लेषण बहुत जरूरी हो गया है अब.

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ब्रजेश कानूनगो

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