Saturday, 4 July 2020

स्मृति के एकांत से... स्वान्तः सुखाय 41

स्मृति के एकांत से...
स्वान्तः सुखाय 

41
किसान का दुख

'स्त्री' जाति को जिस तरह हमने जगत जननी, देवी, त्याग और समर्पण की प्रतिमूर्ति आदि कहकर उसकी वास्तविक चिंताओं,परेशानियों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया, ठीक उसी तरह 'अन्नदाता' आदि जैसे सम्मानजनक संबोधनों की आड़ में किसानों के वास्तविक दुख दर्द को समझने में भी हमारा समाज मुंह चुराता रहा है।

'अन्नदाता' के कल्याण के लिए आजादी के बाद से ही कई योजनाएं रूप बदल बदलकर आती रहीं हैं। किसी भी सरकार की नीतियों में 'कृषक कल्याण' की योजनाएं यद्यपि प्राथमिकता में रहती हैं किंतु यह बड़ी विडंबना है कि उनकी दशा ज्यों की त्यों दिखाई देती हैं। किसान के जीवन पर छद्म आधुनिकता का झीना पर्दा अब अवश्य दिखाई देता है किंतु उनके आंसुओं के खार से बदबदाती  खेत,खलिहान  और हृदय की मिट्टी को देख पाना किसी संवेदनशील व्यक्ति के लिए अधिक मुश्किल भी नहीं होगा।

बैंकों के राष्ट्रीकरण के पीछे सबसे बड़ी वजहों में किसान की दशा सुधारना और कृषि में आधुनिक साधनों के माध्यम से उन्नत कृषि को प्रोत्साहन देना भी रहा है। इसके बहुत सकारात्मक परिणाम भी देखने को मिले। भारत खाद्यान के मामले में आत्मनिर्भर भी हुआ। कृषि कार्य में ट्रैक्टरों सहित अन्य उन्नत और आधुनिक साधनों का प्रयोग होने लगा। लेकिन कई बार इन कल्याणकारी प्रयासों के कुछ 'साइड इफेक्ट' भी दिखाई देने लग जाते हैं।  ऋणों का दुरुपयोग होने के अलावा अनचाहे या अनावश्यक और पुनर्भुगतान सामर्थ्य की कमी से किसानों की दशा सुधरने की बजाए बिगड़ती भी गई है।

उदाहरण के तौर पर जिस किसान के पास पर्याप्त जमीन नहीं होती है कि  उसका ट्रेक्टर पर्याप्त रूप से लाभ अर्जित करवा सके। उसने भी ट्रैक्टर के रूप में घर एक हाथी बांध लिया। या कहें कि उसे अनावश्यक रूप से गैर जरूरी ऋण दे दिया गया। यह ऋण अंततः उसके ऊपर बोझ बन  जाता है। ऋण चुकाना लगभग असंभव हो जाता है।
इसतरह की विसंगतियों में बैंकों,सरकारी विभागों द्वारा लक्ष्य आबंटन और वास्तविक जरूरतों में तालमेल के अभाव और भ्रष्टाचार की भूमिका से पूरी तरह इनकार भी नहीं किया जा सकता। यह एक अलग विषय है जिस पर कई बार आर्थिक,सामाजिक विचारक गंभीरता से सचेत करते रहे हैं।
किसान की पारिवारिक कठिनाइयों या मौसम की विकटता के चलते बाद  में जब ऋण डूबन्त या आम समझ में 'एनपीए' की श्रेणी में आ जाते हैं तब 'ऋण माफी', 'समझौता योजनाएं', 'पुनर्भुगतान हेतु नई सूची' आदि जैसी प्रक्रियाएं जोश खरोश के साथ शुरू कर दी जाती हैं। एक तरह से ये भी 'साइड इफेक्ट' ही होता है जिसमें बैंकिंग प्रणाली अपने मूल कामकाज से अलग कामों में व्यस्त हो जाती है। किसान भी अपनी एक समस्या को खत्म करने की कोशिश में नई कठिनाइयों में फंसता जाता है। उसके आँसू कभी कम नहीं हो पाते।

ऊपर से उसकी अपनी जीवन शैली में रूढ़ परम्पराओं का निर्वहन,शादी ब्याह आदि में हैसियत से अधिक का खर्च और दिखावा जैसी बातें भी उसके तात्कालिक सुख को लंबी अवधि के दुख में बदल देता है।

अपनी ग्रामीण पोस्टिंग के दौरान मुझे भी हमारे क्षेत्र के कृषक ग्राहकों के सुख दुख को देखकर बहुत सी अनुभूतियाँ हुईं।
बादलों के घिरने की खुशी और बिन बरसे गुजर जाने का दुख किसानों की आंखों में तैरते देखा। वह समय भी देखा उन दिनों जब क्षेत्र की 'केश क्रॉप' याने सोयाबीन की फसल असमय की खण्ड वर्षा से बर्बाद हो गई थी। कटी फसल खलिहानों में सड़ गई।

इन्हीं संवेदनाओं को मैं किसी कविता में व्यक्त करना चाहता था। उस वक्त कोशिश की भी, किन्तु बात बनी नहीं। ठीक कविता का आना कभी तय नहीं होता। वह जब भीतर से पक कर निकलती है तो हम खुद चकित हो जाते हैं।

उस वक्त की संवेदनाएं आखिर दो ढाई वर्ष बाद कविता में तब व्यक्त हो पाईं, जब मैं बैंक के आंचलिक कार्यालय में 2001 में पदस्थ हुआ।

जब यह कविता बैंक की गृह पत्रिका 'इंदौर बैंक परिवार' में छपी तो उसका उल्लेख प्रधान कार्यालय में 'मासिक निष्पादन बैठक' में हुआ। महाप्रबंधक ने कहा-'ब्रजेश की यह कविता 'पी बैठक' (परफॉर्मन्स मीटिंग) में विचार करने के सूत्र देती है...

अपनी कविता के संदर्भ में यह टिप्पणी बैंककर्मी रचनाकार के तौर पर मेरे लिए किसी सम्मान से कम नहीं थी।

बाद में इस कविता को बड़ी फ्रेम में मढ़वाकर इंदौर के 'सोयाबीन अनुसंधान केंद्र' को एक समारोह में आंचलिक प्रमुख ने भेंट भी किया। उम्मीद करें वह पोस्टर  अब भी वहां लगा होगा...

साहित्य की गंभीर पत्रिकाओं में प्रकाशित होने के बाद अब यह कविता मेरे संग्रह 'इस गणराज्य में' (2014) का हिस्सा है। आज आप भी पढ़ें....

कविता
सोयाबीन की फसल

एक

धरती के आँचल में
उम्मीद के कण बिखेरने के बाद
बादलों की तरह आती जाती है चिन्ताएँ

बंगाल की खाडी से उठा चक्रवात
छत्तीसगढ को ही भिगोकर लौट न जाए कहीं
उडीसा में बना कम दबाव
हवा न हो जाये मालवा तक आते आते

अरब सागर की मेहरबानी से
फट पडे आसमान
बरस जाए प्रलय का पानी
सपनो की नई बस्ती पर
तो क्या होगा सोयाबीन की फसल का

नष्ट न करदे आतंकी इल्लियाँ सोयाबीन के परिवार को

सूरज की चमक और आकाश के अंधेरो के साथ
बदलते है हरिया किसान के चेहरे के रंग

बडा ही जीवट वाला है
मौसम के हर मिजाज मे

पिता की तरह पालता है अपनी फसल को
सोयाबीन नही
खुशियों की फसल उगाता है
धरती का  बेटा  ।

दो

बडी जोरदार हुई थी बारिश
और सोयाबीन की फसल उस साल
पिताजी गए थे चारों धाम
मुन्ना की आई थी नई मोटरसाइकिल

दौडने लगा था नया ट्रेक्टर
सोयाबीन की फसल के बाद

गाँव-गाँव से आए थे
हजारों पाहुने बेटी के ब्याह में
दिखाई देता था उनके चेहरों पर
सोयाबीन की फसल का उत्साह

गूंज उठा था सोयाबीन का संगीत
गाँव की हवाओं में

ईद की मिठास,दिवाली का उजास
और होली की उमंग है
सोयाबीन की फसल
फसल से जुडे हैं किसान के उत्सव

धडकन की तरह बजता है सोयाबीन
किसान के जीवन में।

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ब्रजेश कानूनगो

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