स्मृति के एकांत से ...स्वान्तः सुखाय 44
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बचपन में साइकिल
अब तो बच्चों को दो,ढाई साल का होते ही छोटी सी खिलौना साइकिल की सवारी करने का मौका मिल जाता है किंतु हमारे बचपन मे हमें साइकिल चलाने का मौका पहली कक्षा में भर्ती होने के बाद ही मिल पाया। वह भी बहुत मिन्नतों और जिद के बाद बाजार की दुकान से 15 पैसे प्रति घण्टा पर किराए पर मिलने वाली 'अद्धा' साइकिल हाथ से धकाते हुए घर तक लाए।
उन दिनों किराए पर मिलने वाली साइकिलों का बहुत चलन था। बस स्टैंड पर से मेहमान भी किराए की साइकिल दिनभर के लिए किराए पर उठाकर मिलने आ सकते थे। आज भी कुछ जगह ऐसा चलन है भी। बाहर से सामान आदि बेचने आए फेरी वाले इसी तरह दिनभर के लिए साइकिल किराए पर लेकर माल बेचकर शाम को वापिस अपने गांव लौट जाते हैं।
इन्ही साइकिल दुकानों पर बच्चों के लिए छोटी छोटी साइकिलें भी मिलती थीं। उनकी अलग अलग ऊंचाई होती थीं।अपनी ऊंचाई के हिसाब से बच्चे साइकिल किराए पर ले लेते। हमारे लिए साइकिल किराए पर लाना भी थोड़ा मुश्किल ही रहा। एक तो हम खुद 'राजा बाबू' टाइप थोड़े नरम नाजुक किस्म के प्राणी थे। मजाक में हमें कुछ लोग 'हाथ पैर अगरबत्ती और मुंह मोमबत्ती' कहकर सम्मानित किया करते थे। सो हाथ पैर तुड़वाने से खुद भी डरते थे और घरवाले भी। एक दिन दोस्त की अद्धा साइकिल पर कुछ देर साइकिल सीखने की कोशिश की तो थोड़ा मजा आने लगा। फिर माँ के सामने जिद और मगरमच्छी टेसुए बहाने के बाद पन्द्रह पैसे मिल गए।
दुकान से सवारी करते हुए साइकिल घर तक लाने की हिम्मत नहीं हुई तो हैंडल थामकर धकाते हुए ही ले आए। मुहल्ले में घुसते ही बहुत से दोस्त इकट्ठा हो गए। जो दोस्त साइकिल पर बैठाकर पीछे से सीट पकड़कर बैलेंस बनाकर धकाता था उसे भी साइकिल चलाने का मौका मिलता था। इसलिए फिर ज्यादा दिक्कत नहीं हुई। दोस्तों ने मिलकर सिखा भी दी। फिर शुरू हुआ बिना किसी सहारे के स्वतंत्र रूप से साइकिल चलाना। तब आज की तरह छोटी साइकिलों में पीछे अतिरिक्त छोटे पहियों के सहारे तो लगे होते नहीं थे। स्वतंत्र चालन में घुटने और कोहनी कलाइयां घायल होना अवश्यम्भावी होती थीं। एक तरह से ये घाव ड्राइविंग लाइसेंस की तरह होता था। जो बच्चा घायल हो जाता समझो उसे साइकिल चलाना आ गया। हमारे घुटने भी चार पांच बार छिले किन्तु हम अद्धा साइकिल कुशलता से चलाने लग गए।
कुछ बड़ा हुए तो पिताजी की 24 इंची साइकिल को बिना सीट पर बैठे फ्रेम के बीच से पैरों को कैंची की शक्ल में पैडलों पर टिकाकर एक हाथ से हैंडल का एक सिरा और दूसरे से सीट को पकड़कर साइकिल चलाने का अद्भुत कौशल हांसिल कर लिया। हमारे पूर्ववर्ती खिलाड़ी इस कला में निपुण थे तो आसानी रही। शहर के एक कोने से दूसरे कोने तक कि दूरी इसी तरह के साइकिल चालन से हम सब दोस्त कर लिया करते थे। ब्रेक तो लगा नहीं सकते थे। पैरों से ही रोकना पड़ती थी साइकिल। फिर जब दोनों हाथों से हैंडल पकड़कर चलाने में कुशलता हासिल की तो एक दिन पिताजी की 24 इंची साइकिल पर सीट पर ओटले के किनारे की सहायता से चढ़ बैठे। लगा जैसे चांद पर बैठकर धरती को निहार रहे हों। धक्के से साइकिल आगे बढ़ाई तो पैर पैडलों तक पहुंच ही नहीं पाए। एक पैडल ऊपर आता, हम पैर से उसे नीचे ढकेल देते तो दूसरा पैडल ऊपर आ जाता। दूसरे पैर से उसे नीचे ढकेल देते। साइकिल आगे बढ़ती जाती।
इस करिश्मे को करते हुए भी कई बार हाथ पैरों में चोट आई। किन्तु साइकिल चलाने के आनन्द में जख्मों का दर्द कम हो जाता था। हालांकि रात को माँ हल्दी और तेल का लेप लगा देती थी किन्तु रात भर घावों में जो टीस उठती रहती थी, दर्द की वह 'झपक' अब भी याद आ जाती है।
आइये बचपन के उस साइकिल समय के बहाने स्मृतियों से थोड़ी धूल हटाते हैं।
आजादी के बाद से ही न सिर्फ देश की यातायात व्यवस्था में बल्कि सामान्य जनजीवन और समाजार्थिक व्यवस्था के संचालन में भी साइकिलों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। खासतौर पर साठ से लेकर अस्सी के दशक तक ज्यादातर परिवारों के पास साइकिल अवश्य होती थी।
गांवों में किसान साप्ताहिक मंडियों तक सब्जी और दूसरी फसलों को साइकिल से ही लाते ले जाते थे। दूध की सप्लाई गांवों से पास से कस्बाई बाजारों तक साइकिल के जरिये ही होती थी। डाक विभाग का तो पूरा तंत्र ही साइकिल के माध्यम से चलता था।
हालांकिआज भी कई पोस्टमैन साइकिल से चिट्ठियां बांटते हैं।बड़ी संख्या में कूरियर बाँटने वाले भी साइकिल का इस्तेमाल अब भी करते हैं किन्तु उदारीकरण और आर्थिक बदलाव के बाद से ही देश की युवा पीढ़ी ने मोटरसाइकिल को अपना लिया।
यह संतोषजनक है कि भारत में साइकिल की अहमियत खत्म नहीं हुई है। शायद यही वजह है कि चीन के बाद दुनिया में आज भी सबसे ज्यादा साइकिलें भारत में बनती हैं।
एक तरह से बचपन का वह समय साइकिलों का स्वर्णकाल ही था। स्कूल,कॉलेजों के शिक्षक प्रोफेसर, सरकारी दफ्तरों के कर्मचारी आदि सभी साइकिलों पर सवार होकर ही अपने कामकाज के लिए दफ्तरों तक आते थे। पेट्रोल और डीजल से चलने वाले वाहनों के आने के बाद आधुनिकीकरण के साथ धीरे धीरे साइकिलों का चलन कम होता गया। किराए पर मिलने वाली साइकिलों का स्थान ऑटो रिक्शा आदि ने ले लिया।
बढ़ते हुए प्रदूषण से बचाव और स्वास्थ्य जरूरतों के कारण अब पुनः साइकिलों के प्रयोग के प्रति जागरूकता हेतु प्रयास होने लगे हैं किंतु अपेक्षित सफलता मिलना संदिग्ध ही लग रहा।
स्मार्ट सिटी अवधारणा में साइकिलों की निशुल्क (नाम मात्र एक रुपया शुल्क) उपलब्धता और साइकिल ट्रैक की बात भी की गई है किंतु जमीन पर हकीकत कुछ और कहानी कहती है।
कुछ राज्य आजकल स्कूलों में छात्राओं को निशुल्क साइकिलें प्रदान करती हैं, अच्छी पहल है किंतु आम नागरिक के लिए बाजार में साइकिलों की कीमत बहुत बढ़ गई हैं। सामान्य साइकिलों की बिक्री भी अब पर्याप्त लाभ जितनी नहीं होती इसलिए उन्नत फिटनेस साइकिलों के नाम पर इनके दाम भी सबकी पहुंच से दूर होते जा रहे हैं। शौकिया ही खरीद हो रही इनकी। पेट्रोल की बढ़ती कीमतों के बावजूद मोटरसाइकिल और स्कूटर आज भी प्राथमिकता में रहते हैं।
बहरहाल, उम्मीद करें कि हमारे बचपन की साइकिलों के दिन फिर से लौट सकें...
ब्रजेश कानूनगो
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बचपन में साइकिल
अब तो बच्चों को दो,ढाई साल का होते ही छोटी सी खिलौना साइकिल की सवारी करने का मौका मिल जाता है किंतु हमारे बचपन मे हमें साइकिल चलाने का मौका पहली कक्षा में भर्ती होने के बाद ही मिल पाया। वह भी बहुत मिन्नतों और जिद के बाद बाजार की दुकान से 15 पैसे प्रति घण्टा पर किराए पर मिलने वाली 'अद्धा' साइकिल हाथ से धकाते हुए घर तक लाए।
उन दिनों किराए पर मिलने वाली साइकिलों का बहुत चलन था। बस स्टैंड पर से मेहमान भी किराए की साइकिल दिनभर के लिए किराए पर उठाकर मिलने आ सकते थे। आज भी कुछ जगह ऐसा चलन है भी। बाहर से सामान आदि बेचने आए फेरी वाले इसी तरह दिनभर के लिए साइकिल किराए पर लेकर माल बेचकर शाम को वापिस अपने गांव लौट जाते हैं।
इन्ही साइकिल दुकानों पर बच्चों के लिए छोटी छोटी साइकिलें भी मिलती थीं। उनकी अलग अलग ऊंचाई होती थीं।अपनी ऊंचाई के हिसाब से बच्चे साइकिल किराए पर ले लेते। हमारे लिए साइकिल किराए पर लाना भी थोड़ा मुश्किल ही रहा। एक तो हम खुद 'राजा बाबू' टाइप थोड़े नरम नाजुक किस्म के प्राणी थे। मजाक में हमें कुछ लोग 'हाथ पैर अगरबत्ती और मुंह मोमबत्ती' कहकर सम्मानित किया करते थे। सो हाथ पैर तुड़वाने से खुद भी डरते थे और घरवाले भी। एक दिन दोस्त की अद्धा साइकिल पर कुछ देर साइकिल सीखने की कोशिश की तो थोड़ा मजा आने लगा। फिर माँ के सामने जिद और मगरमच्छी टेसुए बहाने के बाद पन्द्रह पैसे मिल गए।
दुकान से सवारी करते हुए साइकिल घर तक लाने की हिम्मत नहीं हुई तो हैंडल थामकर धकाते हुए ही ले आए। मुहल्ले में घुसते ही बहुत से दोस्त इकट्ठा हो गए। जो दोस्त साइकिल पर बैठाकर पीछे से सीट पकड़कर बैलेंस बनाकर धकाता था उसे भी साइकिल चलाने का मौका मिलता था। इसलिए फिर ज्यादा दिक्कत नहीं हुई। दोस्तों ने मिलकर सिखा भी दी। फिर शुरू हुआ बिना किसी सहारे के स्वतंत्र रूप से साइकिल चलाना। तब आज की तरह छोटी साइकिलों में पीछे अतिरिक्त छोटे पहियों के सहारे तो लगे होते नहीं थे। स्वतंत्र चालन में घुटने और कोहनी कलाइयां घायल होना अवश्यम्भावी होती थीं। एक तरह से ये घाव ड्राइविंग लाइसेंस की तरह होता था। जो बच्चा घायल हो जाता समझो उसे साइकिल चलाना आ गया। हमारे घुटने भी चार पांच बार छिले किन्तु हम अद्धा साइकिल कुशलता से चलाने लग गए।
कुछ बड़ा हुए तो पिताजी की 24 इंची साइकिल को बिना सीट पर बैठे फ्रेम के बीच से पैरों को कैंची की शक्ल में पैडलों पर टिकाकर एक हाथ से हैंडल का एक सिरा और दूसरे से सीट को पकड़कर साइकिल चलाने का अद्भुत कौशल हांसिल कर लिया। हमारे पूर्ववर्ती खिलाड़ी इस कला में निपुण थे तो आसानी रही। शहर के एक कोने से दूसरे कोने तक कि दूरी इसी तरह के साइकिल चालन से हम सब दोस्त कर लिया करते थे। ब्रेक तो लगा नहीं सकते थे। पैरों से ही रोकना पड़ती थी साइकिल। फिर जब दोनों हाथों से हैंडल पकड़कर चलाने में कुशलता हासिल की तो एक दिन पिताजी की 24 इंची साइकिल पर सीट पर ओटले के किनारे की सहायता से चढ़ बैठे। लगा जैसे चांद पर बैठकर धरती को निहार रहे हों। धक्के से साइकिल आगे बढ़ाई तो पैर पैडलों तक पहुंच ही नहीं पाए। एक पैडल ऊपर आता, हम पैर से उसे नीचे ढकेल देते तो दूसरा पैडल ऊपर आ जाता। दूसरे पैर से उसे नीचे ढकेल देते। साइकिल आगे बढ़ती जाती।
इस करिश्मे को करते हुए भी कई बार हाथ पैरों में चोट आई। किन्तु साइकिल चलाने के आनन्द में जख्मों का दर्द कम हो जाता था। हालांकि रात को माँ हल्दी और तेल का लेप लगा देती थी किन्तु रात भर घावों में जो टीस उठती रहती थी, दर्द की वह 'झपक' अब भी याद आ जाती है।
आइये बचपन के उस साइकिल समय के बहाने स्मृतियों से थोड़ी धूल हटाते हैं।
आजादी के बाद से ही न सिर्फ देश की यातायात व्यवस्था में बल्कि सामान्य जनजीवन और समाजार्थिक व्यवस्था के संचालन में भी साइकिलों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। खासतौर पर साठ से लेकर अस्सी के दशक तक ज्यादातर परिवारों के पास साइकिल अवश्य होती थी।
गांवों में किसान साप्ताहिक मंडियों तक सब्जी और दूसरी फसलों को साइकिल से ही लाते ले जाते थे। दूध की सप्लाई गांवों से पास से कस्बाई बाजारों तक साइकिल के जरिये ही होती थी। डाक विभाग का तो पूरा तंत्र ही साइकिल के माध्यम से चलता था।
हालांकिआज भी कई पोस्टमैन साइकिल से चिट्ठियां बांटते हैं।बड़ी संख्या में कूरियर बाँटने वाले भी साइकिल का इस्तेमाल अब भी करते हैं किन्तु उदारीकरण और आर्थिक बदलाव के बाद से ही देश की युवा पीढ़ी ने मोटरसाइकिल को अपना लिया।
यह संतोषजनक है कि भारत में साइकिल की अहमियत खत्म नहीं हुई है। शायद यही वजह है कि चीन के बाद दुनिया में आज भी सबसे ज्यादा साइकिलें भारत में बनती हैं।
एक तरह से बचपन का वह समय साइकिलों का स्वर्णकाल ही था। स्कूल,कॉलेजों के शिक्षक प्रोफेसर, सरकारी दफ्तरों के कर्मचारी आदि सभी साइकिलों पर सवार होकर ही अपने कामकाज के लिए दफ्तरों तक आते थे। पेट्रोल और डीजल से चलने वाले वाहनों के आने के बाद आधुनिकीकरण के साथ धीरे धीरे साइकिलों का चलन कम होता गया। किराए पर मिलने वाली साइकिलों का स्थान ऑटो रिक्शा आदि ने ले लिया।
बढ़ते हुए प्रदूषण से बचाव और स्वास्थ्य जरूरतों के कारण अब पुनः साइकिलों के प्रयोग के प्रति जागरूकता हेतु प्रयास होने लगे हैं किंतु अपेक्षित सफलता मिलना संदिग्ध ही लग रहा।
स्मार्ट सिटी अवधारणा में साइकिलों की निशुल्क (नाम मात्र एक रुपया शुल्क) उपलब्धता और साइकिल ट्रैक की बात भी की गई है किंतु जमीन पर हकीकत कुछ और कहानी कहती है।
कुछ राज्य आजकल स्कूलों में छात्राओं को निशुल्क साइकिलें प्रदान करती हैं, अच्छी पहल है किंतु आम नागरिक के लिए बाजार में साइकिलों की कीमत बहुत बढ़ गई हैं। सामान्य साइकिलों की बिक्री भी अब पर्याप्त लाभ जितनी नहीं होती इसलिए उन्नत फिटनेस साइकिलों के नाम पर इनके दाम भी सबकी पहुंच से दूर होते जा रहे हैं। शौकिया ही खरीद हो रही इनकी। पेट्रोल की बढ़ती कीमतों के बावजूद मोटरसाइकिल और स्कूटर आज भी प्राथमिकता में रहते हैं।
बहरहाल, उम्मीद करें कि हमारे बचपन की साइकिलों के दिन फिर से लौट सकें...
ब्रजेश कानूनगो
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