Saturday, 11 July 2020

स्मृति के एकांत से...स्वान्तः सुखाय 45

स्मृति के एकांत से...स्वान्तः सुखाय 45

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महफ़िल में लूट ! 

कोरोना काल में पहले लॉक डाउन और फिर अनलॉक के नए नए अनुभव हो रहे हैं। अनलॉक होते ही बदमाशों ने दिन दहाड़े घरों में घुसकर चाकू की नोक पर लोगों की संपत्ति और धन लूटने की घटनाओं को अंजाम दिया। अभी कुछ युवकों ने इंदौर की एक बैंक में 'डकैती' करके  भारी रकम की 'लूट' की।
इन घटनाओं पर बहुत लोग लिखेंगे। शासन और व्यवस्थाओं के प्रति अपना आक्रोश व्यक्त करेंगे। जो जरूरी भी है किंतु मुझे इस 'लूट' ने किसी और सकारात्मक संदर्भों की ओर विचार करने को मोड़ दिया है।

मैं आज उन 'दिल लूटने वाले जादूगरों' को याद करना चाहता हूँ जो अपने हुनर या प्रतिभा से महफिलें लूट लिया करते थे। कई बार अखबारों में सुर्खियां होती थी कि फलां शायर ने तो आज मुशायरा ही लूट लिया। ये ऐसी लूट हुआ करती थी जिसकी रपट किसी थाने में नहीं लिखवानी पड़ती थी। लुटरे को कभी हथकड़ी नहीं पड़ती थी बल्कि गले में फूलों की मालाएं पहना दी जाती थीं।

इन महफिलों में शामिल होने और उन्हें सुनने के पर्याप्त अवसर मिलते रहे। कवि सम्मेलन, मुशायरों के अलावा सुगम और शास्त्रीय संगीत की सभाओं या महफिलों का बड़ा मजा हुआ करता था। खासकर युवावस्था के दौरान जब देवास के मल्हार स्मृति मंदिर सभागृह में जब कोई महफ़िल सजती तो शहर भर के कला संस्कृति प्रेमी लोगों की भीड़ ही उमड़ पड़ती थी।
यहाँ आयोजित किसी भी कार्यक्रम का स्तर और महत्व केवल इसी बात से बढ़ जाता था कि वह इस सभागार में सम्पन्न हो रहा है।

पंडित कुमार गंधर्व जी के प्रयासों से देश के ख्याति प्राप्त कलाकारों, गायकों, संगीतकारों की गौरवशाली महफिलें यहां सजतीं तो जैसे पूरा नगर ही कला मर्मज्ञों की आबादी में तब्दील हो जाया करता था। कुछ बड़े कलाविन्द तो देशभर से मात्र श्रोता की हैसियत से ही इन महफिलों में शामिल हुआ करते थे।खासतौर से जब कुमार साहब के गायन की महफ़िल सजती नीचे जमीन पर बिछी चादर पर वरिष्ठ पत्रकार राहुल बारपुते, चित्रकार विष्णु चिंचालकर, नवगीतकार प्रो नईम जी सहित पुणे,भोपाल,मुम्बई आदि से आए गुणीजन सबसे आगे की पंक्ति में बैठकर 'दाद' दिया करते थे।
ये वे लोग थे जिनकी 'वाह' बिल्कुल ठीक समय पर निकलकर गायक की हौसला हफजाई करती थी। उनकी गर्दनों का हिलना और तालियों के स्वर मंच के स्वरों की संगीत की समझ के साथ संगत किया करते थे।
मुशायरों, कवि सम्मेलनों में तो इन दिनों 'दाद', 'प्रशंसा' और 'तालियां' मांगकर पाने की प्रथा चल पड़ी है किंतु उस दौर में कवि, शायर की पंक्तियों पर तथा संगीत महफिलों में  केवल स्वर लहरियों की प्रस्तुति पर बिन मांगे ही देर तक सभागृह तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजता रहता था।

ऐसा नहीं है कि अब महफिलें बेजान हो गईं हैं, आज भी खूब  लूटी जाती हैं महफिलें किन्तु अब पहली पंक्ति में बैठने वाले वैसे पारखी श्रोता व दिलों की संख्या में बहुत कमी आ गई है। दिल से मिली वास्तविक दाद दुर्लभ सी लगती है...

सोशल मीडिया के 'लाइक्स' और 'वेलडन' जैसी आभासी प्रशंसाओं के इस जमाने में महफिलें लूट लेने और दिल लुटाने वाले लोगों की बातें थोड़ी अविश्वसनीय लगें पर यह होता रहा है हमारे यहां...

आइये इसी 'दाद', 'प्रशंसा' और 'तालियों' की अनुभूतियों पर लिखी कविता पढ़ लेते हैं....

कविता
वाह ! क्या बात है ! 

अद्भुत नजारा है सभागार में
सुरों का साम्राज्य पसरा हुआ है चारों तरफ
गायक की भंगिमाओं के साथ
एक आलाप चल रहा है श्रोताओं के भीतर
तानपुरे की मद्दिम लहरों पर सवार
तबले और आवाज की नाँवें दौड़ने लगती है
तो निहाल हो जाते हैं संगीत यात्री

लम्बी दौड़ के बाद जब सफ़र थमता है तो
अचंभित सैंकड़ों स्वर फूट पड़ते हैं-
वाह-वाह ! क्या बात है !

वाह-वाह के दो शब्द
नई ऊर्जा से भर देते हैं कलाकारों को

और वह एक बैठा है
सभागार में बिलकुल चुपचाप
उठती उतराती तरंगों का
हो नहीं रहा कोई असर
किसी कंपनी के ट्रेड मार्क की तरह
जड़ हो गया है उसका चेहरा

इतना तो वह जानता ही होगा
आया है जब महफ़िल में 
कि मित्र ही नहीं
शत्रु भी होते हैं तारीफ़ के हकदार
कलाएँ तो फिर दुश्मन भी नहीं रहीं कभी किसी की 

संवेदनाओं के पौधों में प्रशंसा की कलियाँ
खिली नहीं अब तक उसके भीतर 
क्या शिकार हो गया है वह
प्रशंसा नहीं करने की किसी कूटनीति का

लगता है उसका कोई दोष नहीं इसमें
कि वह बजा नहीं पा रहा तालियाँ
हो सकता है पहले बहुत की हो उसने मेहनत
खूब लिखी हों जीवन की ख़ूबसूरत कविताएं
और किसी ने बजाई नहीं हों ताली 

सुन ही नहीं पाया हो कभी
कि- वाह! क्या बात है !

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ब्रजेश कानूनगो

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