Wednesday, 8 July 2020

स्मृति के एकांत से...स्वान्तः सुखाय 42 व 43

स्मृति के एकांत से...स्वान्तः सुखाय 42 व 43

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अंटियों की सतरंगी खिलखिलाहट

बचपन में जो खास 'गेम्स' खेलते थे उनमें से कुछ अब भी बहुत याद आते हैं।
क्रिकेट तो कुछ बड़े होने पर ही खेलने लगे किन्तु उस वक्त के कुछ 'स्ट्रीट गेम्स' बहुत लुभाते  थे।

किताबी भाषा में जिस खेल को 'गोटी खेलना' या 'कंचे खेलना' कहते हैं उसे हम 'अंटी खेलना' कहा करते थे। अंटी कांच की बनी गोली होती है। इन पारदर्शी रंगबिरंगी अंटियों के भीतर रंगों के इंद्रधनुषी डोरे से पड़े होते थे जो इनके भीतर बहुत खूबसूरत कृतियां सी बनाते थे। कांच की बनी ये गोटियां कई आकारों में मिला करती थीं। छोटी, मध्यम और कुछ थोड़ी बड़ी। सबसे बड़ी को 'रब्बू' कहते थे। यह 'रब्बू' कैरम के स्ट्राइकर की तरह मुख्य भूमिका में प्रहारक होता था। कुछ बड़े रब्बू जो स्टील के बने होते थे उन्हें 'छर्रा' कहा जाता था। ये 'छर्रे' तो बेचारी शिकार अंटियों का कचूमर ही बना देते थे। इन 'रब्बुओं' और 'छर्रों' से खेल में छोटी 'अंटियों' का सीधे शिकार किया जाता था या खास एंगल से इन्हें लुढ़काकर  शिकार अंटी को 'गल' में भेजना होता था। 'गल' याने जमीन पर बनाया गोल्फ की तरह एक छोटा सा गड्ढा जिसमें गोटियों को पहुंचाकर उसे जीत लिया जाता है। कुछ बच्चे इसे 'गच्च' भी कहते थे।

सीधी चोट वाले खेल को  'खड़ी चोट' और अंटी को रब्बू की मदद से गल में पहुंचाने वाले खेल का नाम अभी याद नहीं आ रहा... शायद 'इक्कल' कहते थे। कोई मित्र पुष्टि करेगा ही...।  '
अब जरा इस खेल को खेलने के तरीकों का स्मरण करते हैं।
अंटियों के इस खेल में अनेक बच्चे या पूरी मित्र मंडली हिस्सा ले सकती थी। पहले बराबर बराबर संख्या में अंटियों का सहयोग सभी को करना होता।

आम तौर पर 'खड़ी चोट' खेल में 'गल' किसी दीवार से एक फुट दूर बनाया जाता और उससे कुछ दूरी पर अधिक से अधिक पांच फुट पर एक रेखा खींच दी जाती। इस रेखा पर खड़े होकर खिलाड़ी बच्चा एकत्र की गईं अंटियों को फेंकता है, जिसकी जितनी अंटियाँ गड्ढे में जातीं वे उसकी हो जातीं। जो गड्ढे से बाहर रह जातीं उनमें से अन्य खिलाड़ी द्वारा बताए गए किसी अंटी पर वहीं खड़े रहकर निशाना लगाना होता। अगर निशाना लग जाता है, तो निशाना लगा रहा खिलाड़ी वह बाज़ी जीत जाता , अन्यथा दूसरे खिलाड़ी को ढैय्या (अंटियाँ) फेकने का मौका मिल जाता।

दूसरी तरह के खेल में 'गच्च' या 'गल' मैदान के बीच में रहता है। दूर खींची गई रेखा के पार से उसी तरह जमीन पर अंटियों को लुढ़काकर कुछ इस तरह फैंकना होता था कि गोटी गल में जाए। बाद में वहीं से रब्बू को कैरम के स्ट्राइकर की तरह लुढ़काकर गोटियों को गल में पहुंचाने के प्रयास होते। कई बार अपनी उंगलियों में 'रब्बू' को फंसाकर भी अन्य अंटियों पर प्रहार किया जाता था।

बारिश में भीग गई मोहल्ले की मुलायम मिट्टी के कुछ हिस्सों में घंटों तक हमारा यह खेल तब तक चला करता जब तक कि किसी दोस्त के घर से पिता या कोई बड़ा व्यक्ति गालियां सुनाता डंडा लेकर नहीं आ धमकता।

आज घर की सफाई करते हुए एक पुरानी जुराब में संग्रहित रंगबिरंगी अंटियाँ क्या निकलकर बिखर गईं... लगा  जैसे बचपन के सारे दोस्त   एक साथ खिलखिला पड़े हों...!

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आकाश में उड़ती इंद्रधनुषी स्मृतियाँ 

बचपन में 'कंचे' खेलने के अलावा गिल्ली डंडा, लट्टू घुमाना आदि में भी सक्रियता रही किन्तु सबसे ज्यादा मजा 'पतंग बाजी' में ही आता था।

गंगा जमुनी संस्कृति वाले हमारे मुहल्ले की कुछ बातें मैंने संस्मरण की पिछली कड़ियों में कही भी हैं।
हमारे घर के सामने की पट्टी हमारी तरह ही निम्न मध्यम वर्ग के लोगों के घरों की थी। हमारी तरह मनुष्य धर्म में विश्वास के साथ उनकी उपासना पद्धति और जीवन शैली में हमसे से थोड़ी भिन्नता अवश्य थी किन्तु दोनों पट्टियों के रहवासियों के बीच बहुत आत्मीय और पारिवारिक रिश्ते हुआ करते थे।
कहीं कहीं तो राखी बन्ध भाई बहन के सम्बंध भी अंत तक निभाए जाते रहे।

हमारे ठीक सामने जो आपा रहतीं थीं वे बहुत अच्छी पतंगे बनाया करती थीं। पहले से उन्हें यह हुनर नहीं आता था, किन्तु कुछ कारण ऐसे आए कि उन्होंने पतंग बनाना सीखा। सबसे दिलचस्प यह बात थी कि उन्हें पतंग बनाना सिखाने वाले और कोई नहीं, मेरे वही जीनियस काका थे, जिनके पास रहकर मैंने पढाई की और साहित्य,कला के प्रारंभिक संस्कार पाने का सौभाग्य मिला।

उन्हीं आपा के पास बैठकर मैं उन्हें पतंग बनाना देखता रहता था। कैसे हरे बांस की कीमचों को छीलकर पतंग के 'कांप' और 'मुड्डे' बनाए जाते हैं। कैसे कागज के रंगीन 'ताव' की कटिंग करके पतंगों के खास प्रारूप याने 'चील', 'कनकव्वा', 'लम्बोतरा','डग्गा','परियल','पूँछधारी' के कागज की कटिंग की जाती है। तिरंगा, चाँदभात, लँगोटिया,सीरिया जैसी बहुरंगी पतंगों के लिए किस तरह कागज की कतरनों को अलग करके नई कतरन लगाई जाती है। आटे की लेई बनाकर उसे चूहों से बचाने के लिए कितना 'नीला थोथा'(जहर) मिलाना चाहिए। किस तरह पतंग के कागज पर कांप और मुड्डे लगाए जाते हैं। कांप के नमन और मुड्डे की मोटाई का ऊपर नीचे का अनुपात अच्छी उड़ने वाली पतंग के लिए कितना बेहतर होता है।यह सब आपा के करीब बैठकर सीखने का बड़ा मजा हुआ करता था।

मोहल्ले भर के बच्चे आपा से ही पतंग खरीदते थे। मांजा हमे खुद तैयार करना होता था। पुराने बेकार हुए बल्बों और ट्यूब लाइट की रॉड्स, कांच की टूटी बरनियों आदि के कॉन्च को मोटे कपडे में लपेट कर फर्शी पर चटनी पीसने वाले सिलबट्टे से रगड़ रगड़ कर चूर्ण तैयार करते। वांछित रंग,सरेस को घर के पीछे के बाड़े में ईंट के चूल्हे पर पकाते। गाढ़ा होने पर कॉन्च का चूर्ण मिला देते।  किसी मैदान के एक छोर पर इस मसाले से धागा गुजरता, जो कपड़े की चुटकी से संवरता हुआ दूसरे छोर तक ले जाया जाता। जब सूख जाता दूसरे छोर वाला दोस्तअपनी चकरी या 'हुचके' में लपेटता हुआ वापिस पहले किनारे पर लौट आता। आगे के धागे पर यही कारवाई तब दोहराई जाती जब तक कि धागे की पूरी गट्टी खत्म न हो जाती। इस पूरी प्रक्रिया को 'मंजा सूतना' कहा जाता था। घण्टों चलने वाली यह प्रक्रिया मनभावक तो होती ही थी किन्तु पतंगबाजी में पेंच लड़ाने और जीतने की आशा और विश्वास से भरी भी होती थी। अब तो मांजा आदि सब बाजार में तैयार मिल जाता है। चीन से भी आने लगा है। नई परिस्थितियों में आयातित मांजे की क्या स्थिति बनती है कुछ कहा नहीं जा सकता।

पतंग उड़ाने की तरह ही पतंग बनाने और मांजा तैयार करना भी हम बच्चों के लिए बहुत मनचाहा कार्य होता था।
कुछ दोस्त पतंग उड़ाने में तो कुछ पेंच भिड़ाने में कुशल होते थे। कुछ दोस्त हुचका या चकरी थामने में होशियार होते। इस कार्य के अलावा उनका एक दायित्व पतंगबाजी का आंखों देखा हाल सुनाने का भी रहता था। पेंचबाज को वह अन्य पतंगों के खतरों से भी आगाह करता जाता था।

एक समूह ऐसा भी होता था जो न पतंग उड़ाता था,न हुचका थामता था वह कटी हुई पतंगों को पकड़ने के लिए कटीली झाड़ियों से बना एक 'झाँकरा' थामें सड़कों पर दौड़ लगाता रहता था। इस रोचक मगर जोखिमभरी प्रक्रिया  को 'पतंग लूटना' कहा जाता था।

मैं पतंग उड़ाता भी था और पतंग बना भी लेता था। मांजा भी खूब सूता बचपन में। एक वाकया याद आ रहा। आपा से पतंग बनाना सीखकर मेरे मन में थोड़ा लालच आ गया। एक दिन मैंने भी कुछ छोटी छोटी पतंगें बनाकर अपने घर में दीवार पर सजा लीं और मित्रों को कुछ बेच भी दीं।
जब काका साहब को यह बात मालूम पड़ी तो उन्होंने पास बैठाकर समझाया कि मैं यह सब न करूं। अपनी पढ़ाई करूं। उस वक्त तो बात समझ नहीं आई किन्तु अब मुझे यकीन है कि वे नहीं चाहते थे कि जो थोड़ी बहुत आमदनी आपा को पतंग बनाने,बेचने से होती थी,उसमें कोई कमी आए।

बचपन की ढेरों स्मृतियाँ हैं जो आकाश में उड़ती इंद्रधनुषी पतंगों की तरह जीवन में खुशियां भरती रहती हैं...
आज इसी संदर्भ की एक कविता पढ़ लीजिए...

कविता
पतंगबाजी

1
इद्रधनुष आकाश में
जैसे फूलों की घाटी में रंगों का मेला
जैसे भांगड़ा करमा झूमर और कथक का भरत नाट्यम
जैसे मणीपुरी कथकली ओडिसी एक साथ खेलते गरबा

जैसे इच्छाएँ हमारे भीतर की.

2

मगन हैं उड़ती पतंगे
जैसे सुन रहीं हों भीमसेन जोशी का आलाप

राग की तरह बह रही है आकाश में हवा

पता ही नहीं उन्हें कि 
प्रतिद्वंदी हो गए हैं सारे खिलाड़ी
कई अदृश्य डोरें हैं जिनकी तनी हुई पीठों पर सवार होकर   
पतंगों तक पहुँच रहा है आघात-प्रतिघात 

फड़फड़ करती आयेंगी अभी कुछ चील-पतंगें तलवार लिए
समझ नहीं पाएंगी अपनों का अकस्मात हमला

लय में नाचती पतंगें
कटेंगी, बिखरेंगी और अटक जायेंगी 
छत के कंगूरे पर 
पेड़ की टहनी में
बिजली के तारों में उलझ जायेंगे उनके अंग

आकाश में कर्फ्यू लग जाएगा शाम ढले.

000


ब्रजेश कानूनगो

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