Wednesday, 15 July 2020

स्मृति के एकांत से...स्वान्तः सुखाय 46

स्मृति के एकांत से...स्वान्तः सुखाय 46

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'एकता और अनुशासन' का पाठ पढ़ाती एनसीसी  

स्कूल कॉलेज के दिनों में लिखने पढ़ने में रुचि के अलावा जिन अन्य गतिविधियों में बहुत मजा आता था उनमें से एनसीसी की  परेड, प्रशिक्षण और साल में एक बार लगने वाले आउटडोर कैम्प सबसे अधिक आकर्षित करते थे।

नवीं, दसवीं,ग्यारहवीं कक्षाओं तथा ग्रेजुएशन के तीन वर्षों तक लगातार नेशनल केडेड कोर( राष्ट्रीय छात्र सेना) का सदस्य होने का सौभाग्य मुझे मिला। इस प्रशिक्षण के जूनियर विंग के 'ए' प्रमाण पत्र तथा सीनियर विंग के 'बी' व 'सी' प्रमाणपत्रों की योग्यता अर्जित करने का गौरव भाव तो हमेशा रहा ही किन्तु इससे बढ़कर जीवन में हर काम को व्यवस्थित व अनुशासित रूप से करने की प्रवत्ति जो भी थोड़ी बहुत आई उसका अधिकांश श्रेय एनसीसी के प्रशिक्षण को ही दे सकता हूँ।

सन 1968 में आठवीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद देवास के नारायण विद्या मंदिर (एनवीएम) में दाखिला लिया तो उसी वक्त एनसीसी में प्रशिक्षण का फॉर्म भी भर दिया। स्काउट गाइड या एनसीसी में से कोई एक प्रशिक्षण लेना अनिवार्य होता था उन दिनों।

पंडित जवाहर लाल नेहरू के कहने पर एनसीसी प्रशिक्षण को पाठ्यक्रम के एक भाग के रूप में सामुदायिक विकास, सामाजिक सेवा गतिविधियों में शामिल करने के लिए बढ़ाया गया था। राष्ट्र की आवश्यकता को पूरा करने के लिए। भारत चीन युद्ध के बाद एनसीसी प्रशिक्षण 1963 में अनिवार्य किया गया था। बाद में 1968 में इस कोर को फिर स्वैच्छिक कर दिया गया था। हमारे समय में स्काउट गाइड या एनसीसी में से कोई एक प्रशिक्षण लेना अनिवार्य होता था उन दिनों। मैंने एनसीसी को प्राथमिकता दे दी।

प्रसंगवश यहां यह जानकारी देना उचित होगा कि एनसीसी 15 जुलाई 1948 को राष्ट्रीय कैडेट कोर अधिनियम के अंतर्गत स्थापित की गई थी। जो भारतीय रक्षा अधिनियम 1917 के अधीन  था। अब यह स्वैच्छिक आधार पर स्कूल और कॉलेज के छात्रों के लिए उपलब्ध है। राष्ट्रीय कैडेट कोर अनुशासित और देशभक्त नागरिकों में देश के युवाओं को संवारने में लगे हुए सेना, नौसेना और वायु सेना के घटकों का एक त्रिकोणीय सेवा संगठन है। कैडेटों को छोटे हथियारों और परेड में बुनियादी सैन्य प्रशिक्षण दिया जाता है। अधिकारियों और कैडेटों को सैन्य सेवा के लिए कोई दायित्व नहीं होता लेकिन कोर में उपलब्धियों के आधार पर चयन के दौरान सामान्य उम्मीदवारों पर वरीयता दी जा सकती है।

कैरियर में एनसीसी प्रमाणपत्रों के कारण मिलने वाले अतिरिक्त लाभ को देखते हुए ही मैं भी 'एकता और अनुशासन' जैसे आदर्श वाक्य वाले इस महत्वपूर्ण संगठन  का सदस्य बना था।

स्कूल के ही एक व्याख्याता को उचित प्रशिक्षण के बाद कैप्टन की रेंक देकर स्कूल इकाई का प्रमुख बनाया जाता था। उन्हें बाकयदा खाकी रंग का निर्धारित गणवेश भी पहनना होता था। गणित और भौतिकशास्त्र के हमारे व्याख्याता कैप्टन सहस्रबुद्धे सर हमारे प्रमुख अधिकारी थे। 

स्कूल के खेल मैदान पर प्रत्येक रविवार को प्रशिक्षण की खुली कक्षाएं लगती थीं। व्यावहारिक और सैद्धांतिक जानकारियां दी जातीं। एनसीसी दफ्तर में नियुक्त सेना के सेवानिवृत्त लेकिन यहां प्रतिनियुक्त अधिकारी ट्रेनिंग देते। परेड करवाते। उनके सैनिक गणवेश बहुत आकर्षित करते थे। हमें भी इसी तरह अपने यूनिफॉर्म के साथ पूरी चमक और धमक के साथ परेड में शामिल होना होता था।

स्कूल में एक कक्ष एनसीसी के लिए ही आबंटित होता था,जिसमें गणवेश, जूते,सॉक्स, बेल्ट,कैप व अन्य बेजेस आदि रखे होते थे। प्रत्येक केडेड को यह सामग्री दी जाती थी।
मैं स्वयं बड़े उत्साह से घर पर प्रति सप्ताह गणवेश को धोकर, अरारोट का कलफ लगाकर प्रेस करता था। पीतल के बक्कलों को पीतल पोलिश (ब्रासो) लगाकर और जूतों को जूता पॉलिश लगाकर कपड़ा रगड़कर खूब चमका देता। हमारे ट्रेनर (उस्तादजी) के कहे अनुसार जूतों में अपने चेहरे की झलक नजर आने तक चमकाने की कोशिश होती थी। 

साप्ताहिक प्रशिक्षण के बाद परेड ग्राउंड पर ही हम लोगों को पर्याप्त नाश्ता दिया जाता था।

जब 303 राइफल चलाना सैद्धांतिक रूप से सिखा दिया जाता तो देवास की टेकडी के पीछे बनी फायरिंग रेंज पर हमें ले जाया जाता। असली बन्दूकों से व्यावहारिक व वास्तविक रूप से एक आंख बंद कर बंदूक की 'फ़ॉर साइट की नोक को बेक साइट की यू से देखते हुए' निशाना साधने और टारगेट  'बुल' याने सेंटर (केंद्र) में गोली दागने का बारी बारी से अभ्यास कराया जाता। दस गोलियों में से जिसकी जितनी अधिक सेंटर सर्किल में लगती वह निशानेबाजी में उतना ही प्रवीण माना जाता।

मुझे खुशी है कि निशाना लगाने की कला में मैं आज 'व्यंग्य विधा' से ज्यादा कुशल था। अधिकांश निशाने सही लगाया करता था। एक बार तो दस में से दस निशाने 'बुल' में लगाकर न सिर्फ उस्ताद जी से पीठ ठुकवाई बल्कि नीमच में आयोजित शूटिंग कॉम्पिटिशन के लिए मेरा चयन भी हुआ।
देवास टेकडी की उस फायरिंग रेंज पर तो शायद अब पिकनिक स्पॉट विकसित हो गया है। बाद में 'जामगोद' रेंज पर ले जाया जाने लगा।

कॉलेज के दौरान प्राणिकी के हमारे  प्रोफेसर मेजर डॉ खोचे साहब प्रमुख थे। उनका वैसे ही जीवन बहुत अनुशासित और प्रभावशाली था। बाद में वे महाविद्यालय के सफल प्राचार्य भी रहे।

कॉलेज ग्राउंड की बजाए कभी कभी पुलिस परेड ग्राउंड पर भी प्रशिक्षण होता था। मुझे यहां बी और सी प्रमाणपत्र के समय 'अंडर ऑफिसर' जैसे उच्च छात्र कैडेट पद का सौभाग्य मिला था। छब्बीस जनवरी की गणतंत्र दिवस की जिला स्तरीय सामूहिक परेड में छात्र कैडेट समूह का नेतृत्व करने का गौरव मिला।

दशहरा दीपावली अवकाश में जो आउटडोर कैम्प होते थे उनमे पूरी बटालियन से सम्बद्ध स्कूलों कॉलेजों के छात्र कैडेट हिस्सा लेते थे। ऐसे कुछ कैम्प इंदौर के देवधर्म टेकरी, महू के पशुचिकित्सा महाविद्यालय,नीमच के महाविद्यालय के निर्जन इलाकों में भी लगे थे। उस वक्त के सुनसान इलाके अब शहरों की सीमा में आकर आबाद हो गए हैं।

कैम्पों में हमें टेंटों को बांधने से लेकर शिविर स्थल को सजाने, टेंट में अपनी दरी,कम्बल की व्यवस्थित घड़ी करना तक सिखाया गया था। एक प्लेट और एक मग की नाम मात्र सामग्री से दैनिक कामकाज और भोजन आदि करना भी बहुत सहज हो जाता था।
दिन भर मैदान और किसी वृक्ष की छांव में कक्षाएं चलतीं। परेड होती।

यहां कृत्रिम युद्धाभ्यास भी कराया जाता था। छात्रों की दो टुकड़ियां बना दी जातीं और दूर छोड़ दी जातीं। उस्तादजी भी साथ होते। महू कैम्प के दौरान एक टुकड़ी जानापाव पहाड़ी के आसपास से रवाना हुई। दूसरी ओर से दूसरी टुकड़ी छोड़ी गई। रात को चंद्रमा के प्रकाश में घमासान हुआ। उस्तादजी सब कुछ समझाते सिखाते जाते थे। बाद में सबको लेकर पहाड़ी पर ले जाया गया। उस रोमांच की वह अनुभूति अब भी महसूस होती  रहती है।

पाठकों को सम्भवतः यह सब आत्म प्रवंचना सी लगे किन्तु  यही सब स्मृतियाँ अब भी जीवन में उत्साह भरती रहती हैं।

ब्रजेश कानूनगो

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