स्मृति के एकांत से...
स्वान्तः
सुखाय 36 व 37
36
खिलौना
स्मृतियों में परिजात की खुशबू
आषाढ़ी
पूर्णिमा पर देवास में चामुंडा पहाड़ी की तलहटी में तीन दिवसीय मेला लगता था।
ग्रामीण प्रकृति के इस मेले की बहुत सारी मजेदार बातें पिछली कड़ियों में मैंने
विस्तार से लिखीं हैं।
उस
जत्रा में खिलौनों की दुकानों पर बच्चों की बड़ी भीड़ उमड़ती थी। लकडी की चमकीली
तलवारों, बांसुरियों के साथ मिट्टी के खिलौनों
का बडा आकर्षण रहता था। मेले के दौरान
बरसात तो आनी ही होती थी। हम बच्चे थैली भरकर मिट्टी के बने
सुंदर सुंदर खिलौने खरीद लेते और बरसात में भीगते हुए चहकते हुए घर लौटते थे।
'जत्रा' में से खरीदे गए खिलौनों की संख्या
प्रतिवर्ष बढ़ती जाती थी। बहुत संभाल कर रखा जाता था इन्हें। कुछ खिलौने तो पिताजी
और काका साहब के बचपन में खरीदे हुए भी संग्रहित थे। चीनी मिट्टी से बनी जवाहर लाल
नेहरू और सरदार पटेल की सफेद मूर्तियां बहुत सहेज कर रखीं हुईं थीं। इंग्लैंड की
महारानी व कुछ पुराने खूबसूरत गुलदान भी हमारे यहां थे।
इस
संग्रह को हमने भी मिट्टी के सेठ सेठानी, मर्फी बॉय, नाचती
लड़की, ग्वालन, धेनु से पीठ टिकाए बांसुरी बजाते गोपाल,शिवाजी,बुद्ध,शिरडी
के साईं बाबा,हाथी,घोड़ा, ऊंट, तोता, सारस आदि जैसे नए खिलौनों से समृद्ध
किया।
दरअसल, इन
खिलौनों का जिस भी घर में अच्छा संग्रह होता था उसकी 'झांकी' बहुत
अच्छी जमा करती थी। झांकी जमाने के दो अर्थ होते हैं। एक अर्थ तो 'साख' जमाना
और दूसरे अर्थ में वह 'झांकी' जो सचमुच भौतिक रूप से किसी उत्सव आदि
पर सजाई जाती है। गणतंत्र दिवस पर देश की राजधानी में और अन्य जगहों पर धार्मिक, सामाजिक
चल समारोह में भी कुछ इसी तरह सजी संवरी झांकियां निकालने की परंपरा रही है।
यहाँ
मेरा आशय उस झांकी से है जो हमारे नगर के लगभग प्रत्येक घर में गणेशोत्सव के अवसर
पर दस दिन के लिए सजाई जाती थी। गणेश चतुर्थी के दिन मिट्टी की बनी
गणपति की प्रतिमा लाकर उसकी स्थापना की जाती थी। सीढी नुमा उनका भव्य आसन बनाया
जाता था। सबसे ऊपर के आसन पर गणेश जी विराजते। उनके आसपास गुलदानों में पुष्प सजाए
जाते। नीचे की पायदानों पर 'जत्रा' से लाए खिलौना संग्रह के ऐतिहासिक
चरित्र, पशु पक्षी,देवी
देवताओं की मिट्टी की प्रतिकृतियां शोभा बढ़ातीं। इसी लिए मैंने कहा कि जिस बच्चे का खिलौना संग्रह जितना समृद्ध होता था, उसकी 'झांकी' खूब
जमती थी।
बात
इतनी ही नही है। जिस कमरे में गणेश जी की यह झांकी बनाई जाती, उसका
फर्श भी प्रकृति के किसी सुंदर मॉडल की तरह बना दिया जाता था। जिसमें हरे भरे लॉन
होते। बगिया होती। नदी,पहाड़,झरने,पशु-पक्षी, किसान, खेत
खलिहान, झोपड़ियां सब कुछ। हमारे खिलौनों में
जैसे प्राण से आ बसते थे। गणेश प्रतिमा के दरबार में एक दुनिया बस जाती, जीवन की
हर धड़कन झांकी में सुनने लगते थे हम बच्चे।
रंगोली
के खूबसूरत रंगों से झांकी वाले कमरे का फर्श ही नहीं पूरा वातावरण रंगीन हो जाता
था। आंगन में लगे परिजात के पेड़ से केसरिया डंडियों वाले मुलायम पुष्प झरते रहते
थे। इन्हीं फूलों की माला को जब झांकी में स्थापित प्रतिमा पर चढ़ाया
जाता था तो समूचा वातावरण किसी दिव्य सुगन्ध से सराबोर हो जाता
था।
बचपन की
उन खिलौना स्मृतियों को आज भी परिजात के फूलों की अलौकिक खुशबू महकाती रहती है।
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व्रत
करती स्त्री
गणेश
चतुर्थी के ठीक एक दिन पहले परिवार व कुटुंब की महिलाओं का बहुत महत्वपूर्ण व्रत
हुआ करता था। 'हरतालिका' का व्रत
पर्याप्त वर्षा हो जाने के बाद भाद्रपद,शुक्ल पक्ष की तृतीया के दिन किया जाता
है।
इस दिन
परिवार की महिलाएं दिन भर भूखी रह कर हर प्रहर की समाप्ति पर वनस्पतियों, विशेषतः
बेलपत्र, शमी पत्र, केले का
पत्ता, धतूरे का फल एवं फूल, अकांव
का फूल, तुलसी, मंजरी, सभी प्रकार के फूलों और विभिन्न पेड़ पौधों की हरी पत्तियों से गीली मिट्टी से बनाई गौरी
और शंकर की प्रतीकात्मक मूर्तियों की पूजा करतीं।
मुख्य पूजा संध्या समय प्रदोषकाल में सभी महिलाएं सामूहिक रूप से करती थीं। रातभर
जागरण के पश्चात सुबह तड़के तड़के महाआरती के पश्चात यह व्रतोत्सव पूर्ण होता।
हम
बच्चों के लिए भी यह माकूल रहता था क्योंकि अगली सुबह हमारे गणेशोत्सव की धूम शुरू
होने वाली होती थी। रातभर हम लोग भी गणेश प्रतिमा स्थापना और झांकी बनाने की योजना
बनाने में मशगूल व उत्साह से भरे रहते थे। उन दिनों आज की तरह फूल पत्तियां बाजार
में एक साथ मिलती नहीं थी। कई बार हम बच्चों को ही इधर उधर से हरी पत्तियां आदि
ढूंढ ढाँढ कर लाना पड़ती थीं। रात को विशेष सावधानी रखना होती, दादी
माँ की हिदायत रहती कि किसी भी हालत में 'चांद' को नहीं देख लेना है, वरना
चोरी का लांछन लग सकता है। लोक मान्यता रही है कि चतुर्थी का चन्द्रमा देख लेने पर
चोरी का आरोप लगने की संभावना रहती है।
घर की
महिलाओं के साथ हम लोगों का भी रात भर का जागरण हो जाता। सुबह जब हरतालिका की
आखिरी आरती होती तब हमारी आंखें मुंदने लगती। थोड़ा
बहुत सोने का प्रयास करते किन्तु अर्धनिंद्रा के बीच ढोल नगाड़ों की आवाजों और 'गणपति
बप्पा मोरिया' का उद्घोष ऐसा होने नहीं देता था...
आइए आज
हरतालिका व्रत की उन अनुभूतियों से बरसों बाद निकली कविता को पढ़ लेते हैं..
कविता
व्रत
करती स्त्री
प्यासी
रहती है दिनभर
और उडेल
देती है ढेर सारा जल शिवलिंग के ऊपर
पत्थर
पर न्यौछावर कर देती है
जंगल की
सारी वनस्पति
बनाकर
मिट्टी का पुतला
नहला
देती है उसे लाल पीले रंगों से
लपेटती
जाती है सूत का लम्बा धागा
पुराने
पीपल की छाती पर
करती है
परिक्रमा पवित्र नदी की
और लगा
लेती है चन्दन का लेप पैरों के घावों पर
सरावलों
में उगाकर हरे जवारे
प्रवाहित
करती है सरोवर में उन्हे
क्षयित
चन्द्रमा को चलनी की आड से निहारते हुए
पति के
अक्षत जीवन की कामना करती है
व्रत
करती स्त्री
एक आबंध
की खातिर
सम्बन्धों
की बहुत बडी डोर बुन रही है
जैसे
बाँध लेना चाहती है धरती-आकाश।
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