Saturday, 20 June 2020

स्मृति के एकांत से... स्वान्तः सुखाय 25 व 26

स्मृति के एकांत से 
स्वान्तः सुखाय

25
सुशील सिद्धार्थ : सोशल मीडिया का प्रिय दोस्त जो मेरी माँ से मिलने चला गया...

सोशल मीडिया के जरिये मेरा परिचय स्व सुशील सिद्धार्थ से हुआ था। वाट्सएप समूह के जरिये सुशील सिद्धार्थ ने व्यंग्य विधा के विकास के लिए ठोस प्रयास किये। वाट्सएप समूह 'वलेस' (व्यंग्य लेखक समिति) के माध्यम से व्यंग्य लिखने वाले अनेक नए पुराने रचनाकारों को इकट्ठा करके, व्यंग्य विधा के लिए समझ बढ़ाने और आलोचना में उसके व्यवस्थित सौंदर्य शास्त्र के विकास की स्व सुशील सिद्धार्थ की गहरी आकांक्षा थी।

इसी उद्देश्य को साकार करने के लिए उनकी कई योजनाएं रहीं, जिनमे से कुछ पूरी भी हुईं लेकिन बहुत सारी के लिए वे लगातार प्रयासरत थे। वलेस समूह के सदस्य रचनाकारों के साझा संग्रह व्यंग्य बत्तीसीसे इसकी शुरुआत हुई थी. संग्रह बहुत चर्चित भी हुआ. फिर कुछ और किताबों के अलावाव्यंग्य के पांच स्वरकी रूप रेखा भी यहीं बनी जिसमें सर्वश्री ज्ञान चतुर्वेदी, प्रेम जनमेजय, सुरेश कान्त, अंजनी चौहान और सुशील सिद्धार्थ जी के व्यंग्य शामिल हुए. व्यंग्य के पांच स्वरसंकलन में सबसे जरूरी स्वर मेरी दृष्टि में सुशील सिद्धार्थ का रहा है. जरूरी इसलिए कि यदि यह स्वर नहीं होता तो शायद यह इस संग्रह का राग हमारे समक्ष नहीं आ पाता.

सुशील हमेशा से हाशिये का रागसुनाने के पक्षधर रहे. व्यंग्य आलोचना के किसी उपयुक्त सौन्दर्य शास्त्र के अभाव की चिंता उनके भीतर दिखाई देती रही है. सक्रीय समकालीन व्यंग्यकारों को एक मंच पर लाने के लिए ही उन्होंने व्यंग्य लेखक समितिका समूह बनाया था. वाट्सएप जैसे नए माध्यम में चर्चाओं और विधा विमर्श से रचनात्मकता के अनेक रास्ते खुल गए.
आलोचना और समकालीन व्यंग्य पर नया वातावरण बना. व्यंग्य में पठनीयता, सरलता जटिलता के प्रश्न, मैं व्यंग्य क्यों लिखता हूँ आदि जैसे विषयों पर वलेस समूह में खूब विमर्श होता था.

इसी समूह से उत्पन्न विचार से लमहीपत्रिका के व्यंग्य विशेषांक में व्यंग्य विधा पर महत्वपूर्ण परिचर्चा संभव हुई. जिसका संयोजन वलेस की ही युवा साथी सुश्री शशि पाण्डेय ने किया था. व्यंग्य विधा में बिम्ब-प्रतिबिम्ब की नई कल्पना के तहत व्यंग्यकार का खुद अपने बारे में और एक स्वतन्त्र आलोचक द्वारा उसके सृजन पर आलोचनात्मक आलेखों के संग्रह आलोचना का आईनाअपने आप में सुशील जी की यह अनोखी सोच रही. इस पुस्तक का सम्पादन के लिए उन्होंने समर्थ युवा लेखक,कवि राहुल देव को दायित्व सौंपा था.
सच तो यह है कि वलेस जैसे वाट्सएप समूह पर विमर्श के बहाने कई व्यंग्य और आलोचनात्मक लेख लिखने की मुझे ही नहीं सभी को प्रेरणा मिल जाती थी। ग्रुप के कई सक्रिय सदस्यों ने सुशील सिद्धार्थ जी के हस्तक्षेप से अपने लेखन को संवारने की पहल की और बेहतर दिशा में कदम बढ़ाए।

वलेस समूह पर ही जब देवास के व्यंग्यकार और मेरे मित्र श्री ओम वर्मा के बीच अपने बचपन के एक किस्से की चर्चा हुई तो उससे प्रेरित होते हुए सुशील जी ने तुरंत व्यंग्यकारों का बचपनशीर्षक से एक संस्मरण संग्रह की योजना बना डाली. यहाँ तक की पुस्तक के कवर को भी डिजाइन करवा लिया, वनिका प्रकाशन की डॉ नीरज सुधांशु से सम्पादन और प्रकाशन की अनुमति लेकर लेख भी आमंत्रित कर लिए. इस कार्य को नीरज जी बाद में बड़ी खूबसूरती से साकार किया.

बाद में दिसम्बर 17 में पहली बार भोपाल में सुशील जी द्वारा शुरू किए गए पहले 'ज्ञान चतुर्वेदी सम्मान' समारोह में प्रत्यक्ष मुलाकात हुई। बहुत विचारवान, विवेकशील, ऊर्जावान और व्यवस्थित व्यक्ति के रूप में मेरे मन में जो छबि थी उसकी पुष्टि वहां हुई।
एक समर्थ रचनाकार,आलोचक,संपादक और संगठक के असमय दुनिया से बिदा हो जाने से मन अब तक दुखी हो जाता है. सुशील जी के बिना जैसे सोशल मीडिया की दुनिया का एक खास दोस्त मैंने खो दिया.

सुशीलजी और मेरी उम्र लगभग बराबर रही है सही तिथि से मैं उनसे कुछ महीने ही बड़ा था. वे मेरी माँ से मिलना चाहते थे. अफसोस नवम्बर 17 में माँ मुझे छोड़कर विदा हो गईं. उस दुःख से अभी उभर ही रहा था कि सुशील स्वयं शायद उनसे मिलने कुछ माह बाद चले गए...
आभासी दुनिया का कोई मित्र इतना आत्मीय और अपना कैसे हो जाता है..यह मैंने सुशील जी के चले जाने के बाद गहराई से महसूस किया है.


26
इकतालीस बरस की मनोरम यात्रा....

सम्भवतः 1962/63 की बात रही होगी। पचपहाड़ (राजस्थान) से एक बच्ची अपनी माँ के साथ और देवास (एमपी) से एक बालक अपनी दादी के साथ इंदौर के जूनी इंदौर क्षेत्र के एक पारिवारिक शादी समारोह में शामिल होने आए थे।
उधर शाम को शादी में गाना बजाना चलता रहा और उधर ये दोनों नन्हे बच्चे गली में उतर गए। दिन में गली का डामरीकरण हुआ था। जब बाहर खेलकर ये लौटे तो दोनों के हाथों में डामर था। दोनों के चेहरे भी डामर से सन गए थे।
परिजनों ने जब इनको इस हालात में देखा तो पहले तो चिंतित हुए लेकिन दोनों बच्चों को खुशी में चहकते देख वे सब भी खिलखिला उठे।

लड़की की माँ और लड़के की दादी भी मुस्कुराए बगैर रह न सके। ममत्व से कुछ ऐसी भर उठीं दादी और मां कि कह उठीं-- 'देखो कितनी सुंदर जोड़ी है,कृष्ण राधा जैसी...अपन तो इन दोनों का रिश्ता आज ही तय कर देते है... !'

और सचमुच दो माताओं के मन की बात कोई पन्द्रह सोलह वर्षों बाद साकार हो गई। एक दूसरे के साथ डामर से होली खेलने वाले वे दो बच्चे और कोई नहीं मैं और 'मनोरमा' ही थे।
18 जून का दिन मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। यही वह दिन है जब मेरे जीवन में 'मनोरमा' आईं। यों दस्तावेजों में उनका नाम 'कुमुद' दर्ज है।

लग्न पत्रिका छपने तक मुझे स्वयं पता नहीं था कि जिस लड़की के साथ जीवन भर का साथ होना है उसका नाम कुछ और भी हो सकता है। इससे जुड़ा भी एक बड़ा दिलचस्प वाकया है। अपने यहां होने वाली शादी की पत्रिकाएं पूर्व में किसी के यहां होने वाली शादी में रिश्तेदारों में वितरित कर दी जाती थीं। ऐसी ही एक शादी में मनोरमा के पिताजी शादी के कार्ड ले आए। जो दो माह बाद होनी थी। मैं भी उस समारोह में शामिल हुआ था। पत्रिका पर नजर पड़ी तो चौंक गया। दूल्हे की जगह तो 'ब्रजेश' छपा था किंतु दुल्हन कोई 'कुमुद' दिखीं। मन बैचैन हो उठा। रिश्ता तो मनोरमा के लिए मांगा था, यह 'कुमुद' कौन है?
बहरहाल, बाद में नानाजी ने तलाश किया तो जान में जान आई। 'कुमुद' और 'मनोरमा' एक ही लड़की के दो नाम थे।

बचपन में डामर से होली खेलने वाली 'मनोरमा' के यहां जब बड़े होने पर विवाह प्रस्ताव भेजा गया तो उसके सहज स्वीकृत हो जाने के लिए मैं थोड़ा बहुत धर्मवीर भारती जी का परोक्ष योगदान भी मानता हूँ। उन दिनों धर्मयुग में पाठकों के लिए भी कुछ कॉलम हुआ करते थे। 'रंग और व्यंग्य' तथा 'हास परिहास अपने आसपास' जैसे स्तंभों में पाठकों के भेजे लतीफे और रोचक प्रसंग छपा करते थे। हमने भी कुछ ऐसे ही चुटकुलों नुमा प्रसंग लिख भेजे थे। भारती जी ने छाप भी दिए। मनोरमा धर्मयुग पढ़ा करती थीं। पता चला कि लड़का धर्मयुग में छपता है तो उन्होंने शादी के लिए फौरन 'हाँ' कह दी।

धर्मयुग में 1976 में छपा चुटकुला 1979 में जीवन की कहानी का बीज बन गया।
बाद में इसी जीवन कथा को 2018 में 'डेबिट क्रेडिट' नाम से एक संसमरणात्मक उपन्यास की शक्ल में लिखने का प्रयोग किया।
जिस कविता से इस 'डेबिट क्रेडिट' का अल्प विराम हुआ है, आज यहां साझा कर रहा.....

कविता
खाता बही में प्रेम

चांदनी में नहाए
किसी ख़ूबसूरत लम्हे में
लाड में आकर तुम कहीं पूछ बैठो
कितना प्यार मिला जीवन में मुझसे ?
तो क्या कहूंगा मैं !

दुनियादारी के खाता-बही में
आधी सदी तक प्रविष्टियों के उपरांत
कभी प्यार का कोई रिकार्ड नहीं संजोया बेशक
मगर जो मन की एक किताब है उसमें
हर पन्ने पर सबसे पहले
स्वतः दर्ज हो जाता है तुम्हारा प्रेम

इतनी बड़ी हो गयी है पूंजी
कि बही-खाते की रेखाओं से बाहर निकल रहे हैं आंकड़े
समुद्र के आयतन से कुछ अधिक हो गया है उसका मान
धरती के घनत्व से ज्यादा सघन है यह अर्जित प्रेम

संभव ही नहीं शायद
तुम्हारे प्रेम का हिसाब रखना
आकाश जितने अगले पन्ने पर
दर्ज नहीं हो पा रहा मुझसे पिछला बाकी.

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