Saturday, 20 June 2020

स्मृति के एकांत से ....स्वान्तः सुखाय 27 व 28


स्वान्तः सुखाय 

27
नगर 'नागदा' और कस्बा 'देवास'

कोई चालीस पैंतालीस साल पहले पिताजी देवास के नजदीक गांव 'नागदा' में पशु चिकित्सक के पद पर नियुक्त थे। कोई 15 किलोमीटर साइकिल चलाकर देवास से ड्यूटी पर जाते थे।
कहने को भले ही कहें कि साइकिल चलाकर जाते थे लेकिन यह अर्धसत्य है। वे गांव जाते समय साइकिल कम चलाते बल्कि उसका हैंडल पकड़कर पैदल ज्यादा चला करते थे। आधा रास्ता इसी तरह साइकिल थामें पैदल चलते। नगर सीमा के बाहर निकलने पर अपने पेंट की मोरी पर एक क्लिप सा लगाते जिससे पेंट या पायजामें की चौड़ी मोरी सिमटकर पिंडलियों से चिपक जाती। फिर साइकिल की सीट पर बैठकर धीरे धीरे पैडल मारते,साइकिल आगे बढ़ने लगती। जैसे ही गांव की सीमा में प्रवेश करते, सीट से उतरकर पतलून से क्लिप अलग कर पुनः पैदल अपने दफ्तर (पशु चिकित्सा केंद्र) तक जाते। ऐसा करने वाले वे अकेले नहीं थे। कई लोगों को मैने उन दिनों इसी तरह साइकिल यात्रा करते देखा है।

हम उम्र मामा आदि या अन्य रिश्तेदार देवास आते तो हम लोग नागदा में पिकनिक के लिए वहां जाते। हम लोग भी अपनी अपनी साइकिलों से ही वहां तक यात्रा करते थे।
प्राथमिक स्कूल के दिनों में भी एक बार हमें गुरुजी उधर बालगढ़ और शंकरगढ़ तक पिकनिक पर ले गए थे। उनके साथ सभी छात्रों ने लाइन बनाकर पैदल ही वह दूरी तय की थी। आगे आगे हमारे गुरुजी रमेश राठौर जी देशभक्ति गीत गाते हुए चलते और हम गीत की पंक्ति को लय में दोहराते जाते थे। उस वक्त ख्यात फ़िल्म अभिनेता अभि भट्टाचार्य 'जागृति' जैसी फिल्मों में आदर्श शिक्षक और मूल्यों में यकीन रखने वाले व्यक्ति की भूमिकाओं में बहुत आते थे। पिकनिक पर निकले हम बच्चों को रमेश राठौर सर अभि भट्टाचार्य की तरह ही लगा करते थे। वे थे भी उसी तरह के आदर्शवादी। हमारे क्लास टीचर तो थे ही किंतु बहुत जाने माने चित्रकार भी थे। उनके घर का कमरा ही उनका कलाकक्ष और आर्ट गैलरी सा हुआ करता था। स्कूल के पास की गली में ही वे रहते भी थे। स्कूल में 'बीच की छुट्टी' होती तो कभी कभी हम लोग भी उनके घर चले जाया करते थे। उनके यहां जाना और उनके बनाए चित्रों को देखना मुझे बहुत अच्छा लगता था। उनकी एक कला अब तक याद आती है। ब्लाटिंग पेपर पर अपने नाखूनों से वे चित्र उभार दिया करते थे। किसी बच्चे की प्रतिभा से खुश हो जाते तो उसके चेहरे का हूबहू चित्र बनाकर उसे भेंट करते। गुरु,शिष्य की वह स्नेह परंपरा अब देखने को प्रायः नहीं मिलती।

राठौर सर स्कूल के पास जिस गली में रहते थे वह वृंदावन महाराज की गली के नाम से ही जानी जाती थी। गली में वृंदावन महाराज का घर और मंदिर दोनों एक साथ थे। घर कहें या मंदिर एक ही बात है। वे उस समय के देवास के उच्च कोटि के वैद्य थे। जड़ी बूटियों से दवाइयाँ बनाकर बड़ी शीशियों में व्यवस्थित रूप से लेबल लगा कर रखी होती थी। कुछ धातुओं की भस्म भी वे बना कर रखते थे। महाराज एक तख़्त पर बैठे रहते थे और नाड़ी जांचकर दवाई की पूड़िया बनाकर मरीजों को देते थे। करीने से कटे हुए छोटे कागज निश्चित संख्या में तख्त पर जमाकर उन पर विभिन्न शीशियों से निश्चित मात्रा में दवाई गिराने का उनका अपना विशिष्ट अंदाज देखने लायक होता था। शीशी को बहुत हलके से अंगुली द्वारा थपकी देना,फिर पुड़िया बांधना वह भी बहुत ही सलीके से। यह सब प्रक्रिया देखने में ही आनंद आ जाता था। मोतीझरा की उनकी दवाई बहुत कारगर और प्रसिद्ध थी।

वैद्यराज वृंदावन महाराज द्वारा सूखिया बीमारी से पीड़ित बच्चे की पीठ से कीड़े निकालने का दृश्य भी याद आता है। कत्था चूना लगे हुए पान के पत्ते में कोई दवाई रखकर पीठ पर मलते तो कीड़ों के सिर पीठ से बाहर निकल आते। फिर चिमटी से एक एक कीड़ा निकाल कर बीमारी का निदान कर देते। चौमासे में भागवत कथा भी वे हाथों,कानों में मोगरे के फूलों के गजरे पहनकर अपने खास अंदाज में सुनाया करते थे, जो सुनने वालों को बमुश्किल समझ में आ पाती थी।

बहरहाल, बात 'नागदा' की ही करते हैं। मुझे याद आता है, नागदा गांव में खेतों के बीच प्राचीन शिव मंदिर और नाग देवता का ओटला बना हुआ था। जिस पर पाषाण की काली शिला पर फन फैलाये नाग प्रतिमा बनी थी।
लोक मान्यता है कि संभवतः नागदा की ये प्रतिमाएँ दसवीं सदी के आसपास की होकर परमारकालीन हैं। गाँव से मंदिर के रास्ते पर कभी एक बड़ी बावड़ी हुआ करती थी ,अब इसका कुछ हिस्सा ही बचा हुआ है। इसी शेष से उस वक्त का इसका वैभव समझा जा सकता है। यहीं से थोड़ा आगे नाग धम्मन नदी का उद्गम बताया जाता है। इसी नदी और नागदा के नाम पर यहाँ नाग यज्ञ का एक मिथक जुड़ता है। मान्यता है कि प्राचीन काल मे अगस्त्य मुनि ने इसी जगह नागों का दहन किया था, इसीलिए नाले रूपी उस छोटी सी नदी जिसमे बारह मास पानी होता था का नाम 'नाग दहन' जो बाद में अपभ्रंश होकर 'नाग धम्मन' हो गया।

ग्राम नागदा देवास की ऐतिहासिक एवं पुरातत्विक धरोहर है। बताया गया है कि कभी प्रसिद्ध पुरातत्व वेत्ता डॉक्टर वाकणकर जी ने भी यहां शोध कार्य किया था।
अब यहां एक गणेश मंदिर भी है, मुझे लगता है वह बाद में निर्मित हुआ होगा।
रियासत कालीन कहावत है कि 'नगर नागदा और कस्बा देवास' । उस जमाने के नगर को हमने मालवा के एक परम्परागत गांव के रूप में ही देखा-जाना था। पान की खेती के लिए इसे और समीप के 'पालनगर' को भी पहचान मिली हुई थी। बड़ी संख्या में किसान पान की खेती किया करते थे।

देवास की एक मात्र सूत मिल 'स्टेंडर्ड मिल' देवास से नागदा जाते हुए बीच में बालगढ़ ग्राम में थी। मफतलाल ग्रुप की होने से गुजराती समाज का नवरात्रि उत्सव यहां बहुत धूमधाम से मनता था। देवी प्रतिमा की स्थापना के साथ नौ दिनों तक पूजा अर्चना के अलावा सांस्कृतिक कार्यक्रम खासकर 'गरबा' बहुत रुचि से खेला, देखा जाता था।
अब देवास शहर में के हर मोहल्ले में नवरात्रि उत्सव के दौरान जो गरबा किया जाता है उसकी शुरुआत में कपड़ा मिल के कार्यक्रम और परम्परा की भी थोड़ी भूमिका रही है।
मिल के कारीगर और कर्मचारियों में से कुछ को बेहतरीन क्रिकेटर के रूप में ख्याति मिली हुई थी। यह हम लोगों में एक अलग गौरव भाव पैदा करता रहता था।

एक वक्त ऐसा भी आया था जब कपड़ा मिल की क्रिकेट टीम, मध्यप्रदेश की 'रनजी ट्राफी टीम' को बराबर की टक्कर देती थी। मिल टीम में उस वक्त अब्दुल वहीद,गनी भाई,दिलीप महाडिक, सुनील व्यास,नसरु भाई,सलीम शेख, प्रकाश जाधव, दुष्यंत पटेल, विजय मिश्रा जैसे बहुत कुशल और जुझारू खिलाड़ी हुआ करते थे।
टीम के स्टार खिलाड़ियों 'अब्दुल वहीद' और 'गनी भाई' को खेलते देखने हम लोग खूब जाया करते थे। एक बार गावस्कर जी की गेंद पर इंदौर के एक मैच में वहीद साहब ने छक्का जमा दिया था। देवास के अखबारों में खबर छपी तो बड़े दिनों तक चर्चा होती रही। गनी भाई ऊंचे कद के तेज गेंदबाज थे। बैट्स मेन उनकी तेज गेंदों से खौफ खाया करते थे। अब तो बस यादें ही शेष हैं। कपड़ा मिल को बंद हुए अरसा हो गया।

इसी कपड़ा मिल में कई लोक गायक काम करते थे जो आकाशवाणी सहित कई संगीत गोष्ठियों में 'कबीर' के पदों को मालवी अंदाज में सुनाया करते। उन दिनों पंडित कुमार गंधर्व मालवा में कबीर परंपरा और गायन पर बहुत शोध करते रहते थे। ऐसे लोक गायकों के प्रोत्साहन में उनका आशीर्वाद सदैव बना रहता था। इस विषय पर कभी बाद में आगे और बात करेंगे।

कुछ समय पूर्व बरसों बाद 'नागदा' जाने का संयोग बना।भतीजी के विवाह का पहला निमंत्रण गणनायक को देने के लिए छोटे भाई ने इसी मंछा से नागदा के गणेशजी को चुना ताकी मैं याद कर पाऊँ कि क्या वह वही पैंतालीस साल पुराना क्षेत्र है जो मेरी स्मृतियों में बसा है।
जब अवलोकन किया तो पाया कि सब कुछ अब रंगीन हो गया था। स्मृतियाँ ही ब्लेक एंड व्हाइट बचीं थीं। नाग प्रतिमा तो दिखी ही नहीं। मैंने नारियल हार वाले के सामने अपनी जिज्ञासा रखी तो उसने अपने ठेले के पीछे की दीवार की ओर इशारा किया,बोला 'यह क्या रहे सर,नाग महाराज! पहले ओटले पर दिखाई देते थे,अब ओटला भराव में छिप गया है। आसपास चार दीवारी से घेर दिया है।' मैंने वहां गड्ढे में उतरकर देखा। नाग देवता थे उसी तरह शिला पर बने हुए, लेकिन अब उन पर सिंदूर पोता जा चुका था। काला नाग समय बीतते सिंदूरी हो चुका था। इसी तरह वहां के विशाल वट वृक्ष की जड़ों पर चढ़ा सिंदूरी रंग आस्था के चलते गणेश प्रतिमा के दर्शन करा देता है। गणेश मंदिर में प्रतिमा को इंदौर की खजराना के मंदिर की प्रतिमा की तरह ही श्रृंगारित किया हुआ है।धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से देवास के नजदीक यह सुरम्य स्थान बन गया है।

आसपास की पहाड़ियों पर पवन ऊर्जा के कई विशालकाय पंखे दृश्य को और आकर्षक बना देते हैं। बारिश के बाद अवश्य ही बहुत अच्छा लगता होगा यहाँ। यहां की गई 'गोठ' और दाल बाफलों का लुत्फ तो बहुत ही आनन्द दायक हो जाता होगा।

28
उनके जैसा मैं मेरे जैसे वे

पिछली पोस्ट में मैंने पिताजी की साइकिल सवारी को लेकर कुछ बातें कहीं थी कि किस तरह वे साइकिल चलाते कम थे और उसका हैंडल पकड़ कर पैदल अधिक चला करते थे। जब उनकी साइकिल पुरानी हो गई तो बैंक में नौकरी लगने पर मैंने नई साइकिल खरीद कर उन्हें भेंट की थी। वह भी एक दिन उनके दफ्तर से चोरी चली गई तो उन्होंने एक दिन ठीक से खाना तक नहीं खाया।

ऐसी ही कुछ विशेष आदतें उनमें हमने देखीं थीं जो अब भी याद आती रहती हैं।
जब कभी अपने युवा काल में वे बीमार पड़ते तो बुखार उतारने के लिए शीर्षासन किया करते थे। कहते इससे ब्लड सर्कुलेशन ठीक होकर बुखार उतर जाता है।

घर की यदि कोई चीज टूट जाती या कोई नुकसान हो जाता तो वे बहुत दुखी हो जाते थे। बहुत देर तक उनके मन में संताप बना रहता। एक बार मुझ से चाय का एक प्याला टूट गया। मैंने उसे ठीक से संयोजित करके इस तरह रख दिया कि वह टूटा हुआ न लग सके। दोपहर को पापा ने जब संयोग से उसे छुआ तो वह फिर बिखर गया। अपनी गलती मैंने पापा के सर मढ़ दी। उन्हें बहुत अफसोस होता रहा। उस शरारत की जब भी याद आती है मैं ग्लानि से भर जाता हूँ।
पापा बहुत सरल, सहज और मूल्यों में विश्वास करने वाले बहुत सज्जन व्यक्ति थे। पूरे चालीस वर्ष सरकारी नौकरी करके सेवानिवृत्त जीवन के 20 वर्ष पूर्ण कर 1998 में हमें छोड़कर चले गए।

दरअसल पिताजी का बचपन बहुत अभावों में बीता था। वे बताते थे उनकी दादी माँ ने घर की घट्टी में लोगों का अनाज और दालें आदि पीस कर घर चलाया था। उनकी प्राथमिक पढाई मराठी माध्यम में हुई थी। बाद में हिंदी,अंग्रेजी में पढ़ाई करके पशुचिकित्सा के प्रशिक्षण हेतु ग्वालियर गए थे। उनके रहन सहन और बोलचाल में मराठी संस्कार,शब्द और ग्वालियर के प्रशिक्षण समय की स्मृतियाँ बहुतायत में होती थीं। उन्हें तैरना आता था।
जब उनकी सरकारी नौकरी लगी तो उनके पिताजी को बड़ा सहारा हो गया। उनके छोटे भाई की शिक्षा भी ठीक से हो पाई। अच्छा समय आता गया।

किताबें पढ़ने के वे बहुत शौकीन थे। सरकारी पुस्तकालयों और नगर परिषद के वाचनालयों में जाकर पत्र पत्रिकाएं शाम को वहीं बैठकर पढ़ते और आकाशवाणी के रात के समाचार सुनने के बाद ही घर लौटते थे। जब हम बच्चे पराग आदि खरीदने के लिए पैसे मांगते तो वे हमें वाचनालय जाकर पढ़ने को कहते। हालांकि बाद में माँ चुपके से हमें पैसे दे देतीं थीं।
राजनीतिक पार्टियों की जनसभाओं में जाकर उस दौर के श्रेष्ठ वक्ताओं के भाषणों को सुनना उन्हें बहुत भाता था। उन्होंने नेहरू जी,लोहिया जी,जयप्रकाश जी आदि जैसे नेताओं को मैदान में बैठ कर निकट से सुना था। मेरे बच्चों तक को वे किस्से और इतिहास की कहानियां अंत तक सुनाते रहे।

समाजवादी विचारधारा के बावजूद वे अन्यों को भी रुचि से सुनते थे। मेरे जन्म के पूर्व ही उन्होंने मेरा नाम सोंच लिया था। हिन्दू महासभा के ओजस्वी वक्ता ब्रजनारायण 'ब्रजेश' का भाषण सुनकर आए तो अपना निश्चय माँ को बता दिया कि पहली संतान का नाम 'ब्रजेश' रखेंगे। हुआ भी यही। मेरे जन्म के पहले मेरे लिए जो मैरून कलर का स्वेटर बना लिया गया था, उस पर आगे खूबसूरत डिजाइन के बीच 'ब्रजेश' लिखा चमचमा रहा था। डिजाइन की एक तरफ माँ के नाम कांता का 'के' और दूसरी तरफ पापा के नाम सुरेश का 'एस' भी नजर आता था। इस स्वेटर की यह कटिंग अब तक पत्नी ने सहेज कर रखी हुई है।

मेरे एक दादाजी पापा की सहजता और सरलता पर थोड़ा गुस्सा करते हुए कहा करते थे..ये सूरज बाबू तो देर से आया है इस दुनिया में...सतयुग के आदमी का इस युग में क्या औचित्य...!'
किन्तु मुझे लगता है आज भी इस नईदुनिया में पुराने संसार जैसे लोगों का महत्व हमेशा बना रहेगा...शायद ऐसे लोगों का होना दूषित पानी में फिटकरी के कुछ टुकड़े की तरह होता है....
आइये फादर्स डे पर पापा को याद करते हुए यह कविता पढ़ लेते हैं....

कविता
पहेली

वे थे
मैं था
सब था

वे थे वे
मैं मैं था
सब था अलग अलग

उनमें नहीं था मैं
मुझमें तो कतई
नहीं होते थे वे

अब मैं हूँ
नहीं हैं वे

पढ़कर सुनाता हूँ पत्नी को
कुमार अम्बुज की कविताएँ
सुनाने लगते हैं वे
धर्मयुग से नईम के नवगीत

ओह! मैं हूँ
वे भी हैं

उनके जैसा मैं
मेरे जैसे वे
सब कुछ पहले जैसा.
000


No comments:

Post a Comment