Thursday, 25 June 2020

स्मृति के एकांत से .... स्वान्तः सुखाय 29 व 30


स्मृति के एकांत से     

स्वान्तः सुखाय 29 व 30

29
शुरुआती संवेदनाएँ और पहला दफ्तर


सन् 1978 के फरवरी माह की 16 तारीख को इंदौर बैंक (अब स्टेट बैंक ऑफ इंडिया) की कन्नौद (जिला देवास,म प्र) शाखा में लगभग 21 बरस की उम्र में नौकरी ज्वाइन की तब वहां शाखा प्रबंधक थे श्री एस आर रेगे (सुभाष रेगे) साहब।
खूब मजाकिया स्वभाव के धनी इस व्यक्तित्व ने मेरे व्यंग्य लेखन को खूब प्रोत्साहित किया था। सामाजिक और व्यावहारिक जीवन के अनेक सबक इसी रेगे पाठशाला में सीखने को मिले।

कन्नौद के संदर्भ में उन दिनों एक कहावत सुनने को अक्सर मिल जाती थी कि वहां के सौ लोगों में से नब्बे नेता,उनमें भी नौ वकील, नौ पहलवान और एक जनता हुआ करते थे।
सच भी था। खेती और कृषि से जुड़े काम धंधों के अलावा रोजगार के अन्य विकल्प नहीँ होने से युवा काला कोट पहनकर ग्रामीणों के आम विवाद सुलझाने के काम में कोर्ट कचहरी से जुड़ जाया करते थे। वकील किसी न किसी राजनीतिक दल से भी जुड़ जाते तो नेताजी भी कहलाने लगते। बाकी एक हिस्सा जनता का छोड़ दें तो कस्बे के नौ ही क्या लगभग सभी लोग पहलवान टाइप ही होते थे।

बहरहाल, इस बात में कितना तथ्यात्मक सच रहा होगा कह नहीं सकता लेकिन बाहर से आये प्रवासियों को मुस्कुराने का अवसर तो दे ही देती थी। शहरों से दूर स्थित कस्बों में सामान्यतः यही स्थिति आज भी हुआ करती है। वहां के जन जीवन की खुशबू और संरचना महानगरों और शहरों से आज भी बहुत भिन्न होती है। यही कारण है कि कस्बों और छोटे शहरों से निकले रचनाकारों की संवेदनाएं मेट्रो की संवेदनाओं से बहुत अलग और देशज होती हैं।

इस दिलचस्प जुमले वाले छोटे से कस्बे में बैंक के साथी श्री अब्दुल खालिक खान ने पहले ही दिन अपने कमरे का उनका पलंग मेरे लिए खाली कर दिया था। वे स्वयं फर्श पर अपना बिस्तर लगा कर सोते थे। मेरा अपना आशियाना नहीं मिलने तक उन्होंने ही भोजन भी कराया।  दरअसल वे स्वयं देवास के रहने वाले थे। अपने शहर से आए किसी अपरिचित युवक के प्रति ऐसी आत्मीयता की कल्पना करना अब बहुत मुश्किल है।

दफ्तर के अन्य साथियों में एक श्री देवीसिंह ठाकुर थे जिनके बाल थोड़े सत्य साईं कट थे। वे खूब जोरदार ठहाका लगाकर हंसते थे। एक दफ्तरी थे श्री रमेश जी, जो पहलवान भी थे, साक्षर थे, केवल 'रमेश' लिख पाते थे लेकिन बैंक के खातेदारों विशेषकर बकायादारों को दूर से पहचान लेते थे।

बहुत आत्मीय और पारिवारिक वातावरण था हमारी शाखा का। प्रबंधक रेगे साहब ने हमें खुद बनाकर कई बार गिलकी की सब्जी खिलाई थी। बाद में जब 1979 में मेरी शादी हो गई और मनोरमा ने घर संभाल लिया, रेगे साहब ने बेटी की तरह उन्हें भी स्नेह दिया। सेवानिवृत्त बैंक अधिकारियों की बैठक में रेगे साहब का आशीर्वाद अब भी मिल जाता है।

कन्नौद से 20 किलोमीटर दूर आगे खातेगांव में उन दिनों दोस्तबाज श्री इंदरसिंह सलूजा साहब ब्रांच मैनेजर थे। शनिवार शाम अक्सर वहीं गुजरती थी। इलाके का टॉकीज वहीं था।
उस वक्त मुझे बिल्कुल भी पता नहीं था कि कन्नौद में ज्वाइन करने के बाद कभी जिला समन्वयक बनकर सम्पूर्ण देवास जिले की शाखाओं के साथ साथ उसकी भौगोलिक सुंदरता और जन जीवन से रूबरू होने का सौभाग्य भी 30 साल बाद मिलेगा। आगे देवास जिले से जुड़े कुछ और दिलचस्प प्रसंगों की चर्चा करने की अवश्य कोशिश करूंगा।


30
गंधर्वपुरी का सन्नाटा और शापित मूर्तियाँ

वर्ष 1990 से 1992 तक देवास जिले के सोनकच्छ मुख्यालय की बैंक शाखा में पदस्थ रहा था। वहीं रहता भी था लेकिन नजदीक की पुरातत्व की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक नगरी 'गंधर्वपुरी' के बारे में बस सुनता ही रहा, उस वक्त वहां जाना नहीं हो पाया।

सोनकच्छ के कबीर मोहल्ले के हमारे पड़ोसी रचनाकार मित्र श्री रमेश सिसोदिया जी ने कई बार कहा भी कि मुझे वहां एक बार अवश्य जाना चाहिए। सिसोदिया जी स्वयं बहुत अच्छे रचनाकार व शिल्पी हैं। अपने घर की ऊपरी मंजिल पर उन्होंने अपना स्वयं का स्टूडियो बना रखा है। जहां अनेक काष्ठ कृतियाँ और मेटल,मिट्टी में उनका काम देखकर बड़ा अचरज होता है कि छोटे कस्बे का एक प्रतिभावान सर्जक अपने एकांत में कितनी संलग्नता से बिना किसी महत्त्वाकांक्षा से कला साधना में रत है।

रमेश जी जहां तहां से लकड़ी के टुकड़े,पेड़ों की टहनियां जुटा लेते हैं और उनको रेत कर, छीलकर, अनावश्यक को हटाकर उसको एक अर्थपूर्ण स्वरूप प्रदान कर सबको दांतो तले उंगलियां दबाने को बाध्य कर देते हैं। कविताएं लिखने के अलावा चित्रकार भी हैं जलरंग से उनके बनाए चित्र भी मन मोह लेते हैं। कबीर बस्ती में उनका घर सोनकच्छ आए किसी भी कलाप्रेमी व्यक्ति के लिए किसी 'कला दीर्घा' से कम नहीं होगा।

सोनकच्छ प्रवास के समय उनके होने से पूरे समय साहित्य और कला क्षुधा कुछ हद तक शांत करने में बड़ी मदद मिली थी। यद्यपि सोनकच्छ में हम लोगों ने दो बार 'प्राची' के बैनर तले 'रचना शिविरों' का आयोजन किया मगर गंधर्वपुरी जाने का योग नहीं बन पाया।
गंधर्वपुरी जाने का योग अंततः वर्ष 2017 में तब बन पाया जब हमारे वरिष्ठ मार्गदर्शक श्री आलोक खरे जी ने समाजसेवा प्रकोष्ठ के तत्वावधान में ग्रामीण बच्चों के लिए दो दिवसीय व्यक्तित्व विकास शिविर गंधर्वपुरी कस्बे में संयोजित किया। मुझे याद है इस शिविर में इंदौर देवास के कई महत्वपूर्ण व्यक्तियों ने बच्चों का मार्गदर्शन कई कला विधाओं में किया था। जिनमें चिंतक कथाकार श्री जीवनसिंह ठाकुर, कथाकार सुश्री कविता वर्मा, केलिग्राफर चित्रकार श्री अशोक दुबे, वरिष्ठ चित्रकार भारती सरवटे जी के साथ साथ मैंने भी रचनात्मक लेखन पर कुछ बातचीत की थी।

खैर, एक शिविर की सफलता के अलावा जो बात मुझे गंधर्वपुरी के संदर्भ में
कहना जरूरी लगती है वह यह कि यदि यही कस्बा पर्यटन और पुरातत्व की अधिक समझ रखने वाले किसी अन्य प्रांत में होता तो न सिर्फ पिकनिक, पर्यटन और सैर सपाटे,मनोरंजन की दृष्टि से बल्कि शैक्षणिक शोध और राजस्व के लिए भी बहुत लाभकारी व उपयोगी सिद्ध होता।

इसकी भौगोलिक स्थिति भी इंदौर भोपाल राजमार्ग पर होने से पहुंच भी इतनी सुगम है कि पर्यटकों की भारी संख्या आकर्षित की जा सकती है। लेकिन शायद लोकश्रुति के अनुसार शापित गंधर्वपुरी वर्तमान में भी शापित ही बना हुआ है।

गंधर्वपुरी सोनकच्छ तहसील में स्थित एक ऐसा गाँव है जो भारत के बौद्धकालीन इतिहास का साक्षी रहा है। बताते हैं इस गाँव का नाम पहले 'चंपावती' था। चंपावती के पुत्र 'गंधर्वसेन' के नाम पर बाद में गंधर्वपुरी हो गया। 'गंधर्वपुरी' के नाम से ही अब इसे जाना जाता है।

राजा गंधर्वसेन के बारे में अनेकानेक किस्से प्रचलित हैं। कहते हैं कि गंधर्वसेन ने चार विवाह किए थे। उनकी पत्नियाँ चारों वर्णों से थीं। क्षत्राणी से उनके तीन पुत्र हुए सेनापति शंख,राजा विक्रमादित्य तथा ऋषि भर्तृहरि। बताते हैं कि इस नगरी के राजा की पुत्री ने राजा की मर्जी के खिलाफ गधे के मुख जैसे व्यक्ति गंधर्वसेन से विवाह रचाया था। गंधर्वसेन दिन में गधे और रात में गधे की खोल उतारकर राजकुमार बन जाते थे। जब एक दिन राजा को इस बात का पता चला तो उन्होंने रात को उस चमत्कारिक खोल को जलवा दिया। गंधर्वसेन भी जलने लगे तब जलते-जलते उन्होंने राजा सहित पूरी नगरी को शाप दे दिया कि जो भी इस नगर में रहते हैं, वे पत्थर के हो जाएँ।

इस दंत कथा में कितनी सत्यता रही है कह नहीं सकते किन्तु यह अवश्य सही है कि इस गाँव के नीचे एक प्राचीन नगरी दबी हुई है। यहाँ हजारों मूर्तियाँ हैं।
यहाँ पर 1966 में एक संग्रहालय का निर्माण किया गया। कुछ खास मूर्तियाँ एकत्रित कर ली गई हैं। एक खुले मैदानी संग्रहालय में अब तक लगभग 300 मूर्तियों को संग्रहित किया गया। इसके अलावा अनेक मूर्तियाँ राजा गंधर्वसेन के मंदिर में हैं, एक हॉल बनाकर भी कुछ संग्रहित की गईं हैं। अनेक मूर्तियां नगर में यहाँ-वहाँ खेतों के बीच भी बिखरी पड़ी दिखाई देती हैं।

गंधर्वपुरी के ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व को देखते हुए इस कस्बे पर ध्यान देकर इसका विकास किया जाना चाहिए। पर्यटन,खेलकूद और मनोरंजन के साधन और सरकारी संस्थान,होस्टल, प्रशिक्षण केंद्र आदि यहां स्थापित किये जाएं तो प्रदेश के हित में निश्चित ही एक उचित कदम होगा।

आइए इसी आकांक्षा के साथ आज गंधर्वपुरी के ही बेटे और वरिष्ठ कवि डॉ दुर्गाप्रसाद झाला जी की एक कविता पढ़ते हैं...कविता में शायद गंधर्वपुरी ही हमसे कुछ कह रही है...

कविता
सन्नाटा और आवाज़
दुर्गाप्रसाद झाला

मेरे अंदर
एक दीया जल रहा है
उसकी रौशनी में
खुद को पढ़ रहा हूँ
और सिर धुन रहा हूँ

एक सन्नाटा पसरता जाता है
लेकिन दूर से एक आवाज़
आती लगती है
और मैं उस ओर चल पड़ता हूँ

धीरे-धीरे बढ़ाता हूँ कदम
सोचता जाता हूँ
उस आवाज़ तक
पहुंच पाऊँगा या नहीं ?

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