स्मृति के एकांत से
स्वान्तः सुखाय 14
स्मृति में नईदुनिया
पांच जून को
विश्व पर्यावरण दिवस है। हिन्दी पत्रकारिता के पर्यावरण में जिस अखबार की भूमिका
का महत्वपूर्ण स्थान रहा है और जिसने मुझ जैसे अनेक एकलव्यों को लिखने,पढ़ने और रचनात्मक बनाने
में गुरु द्रोणाचार्य की तरह परोक्ष रूप से योगदान दिया है उस 'नईदुनिया' अखबार का स्थापना दिवस भी 5 जून को ही होता है।
बाबू लाभचंद
छजलानी और उनके परिवार के स्वामित्व तथा श्री राहुल बारपुते जी, राजेन्द्र माथुर जी और
अभय छजलानी जी के संपादकीय दौर में निकलने वाले नईदुनिया के बारे में एक पाठक
रचनाकार की नजर से इस कोरोना काल के एकांत में स्वान्तः सुखाय मित्रों से बातचीत
करने का मन हो रहा है।
जानकारी के
अनुसार 'नईदुनिया' अखबार का प्रकाशन इंदौर से 5 जून 1947 को श्री कृष्णचन्द्र मुदगल तथा श्री
कृष्णकांत व्यास के प्रयासों से एक छोटे सायंकालीन दैनिक पत्र के रूप में हुआ था।
तब से अब तक इस अखबार ने कई उतार चढ़ाव देखें हैं। इसके प्रबन्धकीय, व्यावसायिक और नीतिगत बिंदुओं पर बात करना यहां मेरा उद्देश्य कतई नहीं
है। वैश्विक संकट के इस भयावह समय में अपने प्रिय अखबार के गौरवशाली व रचनात्मक
इतिहास की स्मृति का तनिक आनन्द उठाने का प्रयास भर है। अपने अनुभव और अनुभूतियों
की सुखद स्मृतियाँ साझा करने की इच्छा हो रही है। 5 जून को नईदुनिया
के जन्म की 73 वीं वर्षगांठ जो है।
नईदुनिया के
सम्पादकीय पृष्ठ के उन दिनों के उस खास ले आउट को याद करें तो वहां पहले कॉलम में
तीन,चार अलग अलग विषयों तथ्यात्मक सम्पादकीय आलेख हुआ करते थे। आज की तरह ही
पास के ऊपरी स्पेस में लेख के रूप में तात्कालिक और प्रासंगिक मुद्दे पर मुख्य लेख
होता। नीचे एक अन्य लेख रहता जिसमें आर्थिक, सामाजिक,
प्रासंगिक विषयों के अलावा विज्ञान, इतिहास,
क़ानून आदि विषयों पर विशेषज्ञों की विचारोत्तेजक टिप्पणियां और
विश्लेषण होते थे।
इसी जगह परसाई
जी का 'सुनो भाई साधो', शरद जी का नियमित साप्ताहिक स्तंभ 'परिक्रमा' तथा बाद में 'और शरद
जोशी...' आदि छपते रहते थे। कुछ अन्य उभरते हुए लेखकों,
विचारकों, व्यंग्यकारों को भी मौका मिल जाया
करता था। बाद में वरिष्ठ व्यंग्यकारों के स्तंभ बन्द होने के बाद 'अधबीच' जैसा लोकप्रिय कॉलम छपने लगा। हाल ही में 'अधबीच' ने प्रकाशन की 40 वीं
वर्षगांठ (21 अप्रैल 2020) को मनाई है।
वस्तुतः इसके प्रकाशन के पहले दिन ही दिन मेरी रचना ‘एटनबरो
का गांधी और सफलता के देसी नुस्खे’ शीर्षक से छपी थी,
सो मुझे यह ख़ास तारीख हमेशा याद रह जाती है।
अधबीच की 40 वीं वर्षगांठ पर इस बार
मैंने अपने विचार इसी कॉलम व्यक्त करते हुए कुछ यूं कहा था...‘21 अप्रैल 1981 के दिन इस लोकप्रिय कॉलम ‘अधबीच’ की शुरुआत तत्कालीन प्रधान संपादक स्व
राजेन्द्र माथुर जी की पहल पर हुई थी। जो वरिष्ठ पाठक नईदुनिया को अपने बचपन से
पढ़ते आ रहे हैं वे जानते हैं कि नईदुनिया परिवार ने पाठकों को सदैव अपने परिवार का
सदस्य जैसा ही माना है। बहुत से तो ऐसे भी हैं जिन्होंने केवल नईदुनिया पढ़ते हुए
ही अपनी भाषा को संवारा और और पाठक से धीरे धीरे एक रचनाकार के रूप में विकसित
होते चले गए। इन अर्थों में अपने पाठकों को लेखकों में रूपांतरित करने में
नईदुनिया विशेषकर 'संपादक के नाम पत्र' तथा 'अधबीच' स्तंभ की बहुत
महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
यद्यपि 'अधबीच' को मोटेतौर पर व्यंग्य विधा का एक नियमित कॉलम मान लिया गया है लेकिन यह
यहीं तक सीमित नहीं है। नईदुनिया में अधबीच प्रकाशन का एक वर्ष पूर्ण होने पर एक
धन्यवाद पत्र तत्कालीन प्रधान संपादक स्व. राजेन्द्र माथुर जी ने इसमें सहयोग करने
वाले रचनाकारों को लिखा था। इस पत्र में अधबीच को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा
था- 'रोचक प्रसंग,अटपटेआचरण,मानवीय दुर्बलताएँ,खप्त, सामाजिक
रूढ़ियों, जंग लगी परम्पराओं, अंधविश्वासों
पर लिखे आलेखों का 'अधबीच' में स्वागत
है,पैतरा व्यंग्यात्मक भी हो सकता है या विनोदपूर्ण भी,या हास्य लिए हुए, यदा कदा सीधा सपाट भी हो सकता है।
विषय अखबारों में चमकने वाली खबरों ,सुर्खियों से भी लिए जा
सकते हैं। कैनवास विशाल है। जरूरत है सजीव रंगों की।
अधबीच की
रचनाओं में ताजगी हो,लोकोपकार की भावना हो और सबसे जरूरी पठनीयता हो।
निसंदेह 'अधबीच' की परिभाषा के तहत ही इसे पढ़ा जाना चाहिए। यह भी बहुत दिलचस्प बात है कि
बहुत से नए पाठक तो 'अधबीच' को एक
स्वतंत्र विधा की तरह ही देखने लगे हैं।‘
बहरहाल, उन दिनों सम्पादकीय पृष्ठ
पर नीचे दाहिने कोने पर 'विश्व कविता' कॉलम
में कवि सोमदत्त लिखते थे। इसी जगह पर कवि प्रो सरोज कुमार 'स्वान्तः
दुखाय' शीर्षक से व्यंग्यात्मक कविताएं लिखते जो उस वक्त के
प्रबुद्ध पाठकों को बहुत पसंद आती थीं।
सरोज कुमार जी
ने बहुत लंबे समय तक नईदुनिया के रविवारीय अंक में साहित्य पृष्ठ का सम्पादन किया
था। नईदुनिया में साहित्यकारों, विषय के विशेषज्ञों से सेवाएं लेने की बहुत अच्छी परम्परा
रही है। इससे सामग्री की गुणवत्ता पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ता था। मुझे जहां तक याद
आता है,कला गुरु विष्णु चिंचालकर, प्रो
रणवीर सक्सेना, सिनेमा के जानकार श्रीराम ताम्रकर, वरिष्ठ साहित्यकार सूर्यकांत नागर, कथाकार, चित्रकार प्रभु जोशी भी नईदुनिया से कुछ समय तक ऐसे ही जुड़े हुए रहे थे।
आर्थिक
विश्लेषणों के साथ डॉ विष्णुदत्त नागर और कानूनी मामलों पर विनय झेलावत जी के
त्वरित आलेख बहुत रुचि से पढ़े जाते थे। उस वक्त के युवा संस्कृतिकर्मी संजय पटेल
की सांस्कृतिक रिपोर्टिंग किसी साहित्यिक रचना से कम नहीं होती थी। इंदौर की कई
महफिलों का जीवंत और विश्लेषणात्मक विवरण पाठक बहुत रुचि से पढ़ते थे। आज भी उनकी
सक्रियता उसी तरह बनी हुई है।
प्रति वर्ष 5 जून को बदनावर जैसे छोटे
से कस्बे के पाठक,रचनाकार श्री जगजीवन सिंह पंवार का एक लेख
छपता था जिस में बीते वर्ष में सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित पत्रों, लेखों आदि का लेखा जोखा होता था। कौन लेखक कितनी बार छपकर कौनसी पायदान पर
रहा यह जिज्ञासा बहुत सहज हुआ करती थी पाठकों में भी।
नईदुनिया
हमेशा से पत्रकारिता की एक उत्कृष्ठ पाठशाला माना जाता रहा था। ज्यादातर हिन्दी
पाठक जानते हैं कि पत्रकारिता क्षेत्र के अनेक दिग्गज इसी स्कूल से दीक्षा लेकर
राष्ट्रीय आकाश में जगमगाए हैं। सर्वश्री प्रभाष जोशी, आलोक मेहता, यशवंत व्यास, श्रवण गर्ग, राजेश
बादल, अवधेश व्यास, अजय बोकिल, शाहिद मिर्जा, महेश जोशी, उमेश
त्रिवेदी, प्रकाश हिन्दुस्तानी, प्रकाश
पुरोहित जी, निर्मला भुराडिया,हेमंत
पाल आदि के लेखन की गुणवत्ता और श्रेष्ठ रचनात्मक पत्रकारिता से कौन परिचित नहीं
होगा। आज मैं इन सबको भी आदर सहित याद करते हुए मन से सम्मान देना चाहता हूँ। ये
सब किसी न किसी तरह मेरे रचनात्मक जीवन से जुड़े रहे हैं और कुछ अच्छा करने के लिए
अदृश्य रह कर परोक्ष रूप से प्रेरित करते रहते हैं।
अपने विशिष्ठ
व्यंग्य चित्रों और टिप्पणियों के साथ नईदुनिया से लंबे समय से जुड़े वरिष्ठ
कार्टूनिस्ट देवेंद्र शर्मा आज भी हमारे भीतर गुदगुदाहट उत्पन्न करते रहते हैं।
बहरहाल थोड़ी
बात 'संपादक के नाम पत्र' स्तंभ की भी कर लेते हैं। यह एक
ऐसा लोकप्रिय स्तंभ था जिसमे कभी कभी मध्य लेख से बड़े और महत्वपूर्ण पत्र छपा करते
थे। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से सम्बंधित विषयों पर पर प्रबुद्ध और विशेषज्ञ
पाठकों की वैचारिक ही नहीं व्यावहारिक टिप्पणियां भी इसका हिस्सा होती थीं। पाठक
सबसे पहले इन पत्रों को ही पढ़ना पसंद किया करता था। नईदुनिया में रचना छप जाना उस
दौर में बहुत महत्वपूर्ण बात होती थी। भले ही वह 'संपादक के
नाम पत्र' में चन्द पंक्तियाँ ही क्यों न हो।
मेरे मित्र
प्रदीप कुमार दीक्षित ने भी इस कालम को संभालने की जिम्मेदारी बहुत दिनों तक निभाई
थी। इसके साथ वे ‘विदेश और अंतर्राष्ट्रीय’ मसलों पर भी नियमित लिखा
करते थे। उस वक्त पत्रों वाले स्तम्भ में किसी किसी विषय पर बड़ी लम्बी लम्बी
चर्चाएँ चला करती थीं। बहुत दिनों तक चलने के बाद सम्पादक की टिप्पणी के साथ उसे
विराम देना जरूरी हो जाता था।
मुझे याद है
व्यंग्यकार लक्ष्मीकांत वैष्णव ने तत्कालीन सरकारी व्यवस्था और नौकरी में प्रताड़ना
के चलते हताशा में आत्महत्या कर ली थी। तब अजातशत्रु जी ने अपने नियमित स्तम्भ ‘हस्तक्षेप’ में आक्रोश भरा संवेदना से ओतप्रोत महत्वपूर्ण लेख लिखा था ’एक हत्या मेरी बिरादरी में’। इस विषय को लेकर इसी
पाठकीय पत्रों वाले कालम में लम्बी बहस ‘खिलाड़ी बनाम
नौकरीपेशा रचनाकार’ की समस्याओं पर छिड़ गई थी। इस विमर्श में
अनेक प्रतिष्ठित और विचारवान लोगों के पत्र छपे। मैंने भी कुछ पत्र लिखे थे। बाद
में इसी बहस के पत्रों को संपादित कर एक आलेख मैंने तैयार किया था जो प्रधान
सम्पादक को भेजा था। यह आलेख कुछ साहित्यिक व वैचारिक पत्रिकाओं में भी प्रकाशित
हुआ था।
वर्ष 1995 में जब समकालीन कविता
लिखने वाले मित्र कुमार अम्बुज जैसे दोस्तों का साथ मिला तो कविताओं लिखने की और
रुझान हुआ। कुछ कविताएँ लिखीं और नईदुनिया में प्रकाशनार्थ भेज दीं। एक दिन
प्रो.सरोजकुमार जी का फोन आया कि तुमको कविताएँ अवश्य लिखनी चाहिए। पहली कविता ‘अस्पताल की खिड़की से’ रविवारीय साहित्यक पृष्ठ पर
प्रकाशित कर उन्होंने मेरे कवि रूप को ब्रेक दे दिया।
कवि मित्रों
के साथ और सबके सकारात्मक प्रोत्साहन से कविता लिखने का सिलसिला चल पड़ा।
महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिकाओं के साथ नईदुनिया में भी कविताएँ छपती रहीं।
नईदुनिया में तब तक छप चुकी (1995 से 2014) सारी चालीस कविताएँ वर्ष
2014 में आए पहले कविता संग्रह ‘इस
गणराज्य में’ में संग्रहीत की गईं हैं।
नईदुनिया के
परिवार परिशिष्ट ‘नायिका’ में भी बहुत सी कविताओं, लघुकथाओं और कहानियों को स्थान मिलता रहा। मेरे लिए उस दिन का वह सुखद
रोमांच भुलाए नहीं भूलता जब मेरी कविता ‘छुप जाओ कजरी’
को सुन्दर ले आउट के साथ ‘नायिका’ के पूरे कवर पृष्ठ पर निर्मला भुराडिया जी ने प्रमुखता से प्रकाशित किया
था।
वर्त्तमान में
भी नईदुनिया में रचनाओं के प्रकाशन का सिलसिला जारी है। हालांकि नईदुनिया में अपनी
रचनाओं, पत्रों के प्रकाशन का वह दौर भी याद आता है जब हर पन्द्रह दिन में कुछ न
कुछ प्रकाशित होने से कई पाठक यह समझ लेते थे कि मैं भी नईदुनिया के स्टाफ का एक
सदस्य ही हूँ। नामवरसिंह जी से प्राची संस्था के अधिवेशन में जब भोपाल में मिलना
हुआ और अपना नाम बताया तो उन्होंने कहा.. ‘अच्छा आप हैं
ब्रजेश कानूनगो, आप तो नईदुनिया में काम करते हैं न?’
उनके कथन से
मैं भीतर से तो बहुत खुश हुआ मगर प्रत्यक्ष में अचकचाते हुए सच बोलना पडा... ‘नही सर, मैं बैंक में नौकरी करता हूँ।’ यही सब यादें सुख
देती रहती हैं।
इसी तरह शामिल
है नईदुनिया मेरे जीवन और स्मृतियों में। जो कुछ अब तक लिख पाया हूँ निसंदेह उसका
बहुत सारा श्रेय उन दिनों के नईदुनिया अखबार को देने में कोई संकोच मुझे नही होता
है। इच्छा तो यह भी बहुत थी उस वक्त कि कभी नईदुनिया के दफ्तर में बैठकर काम कर
सकूंगा...मगर यह सब अपने हाथ में नहीं होता...
नईदुनिया तो
अब भी प्रतिष्ठित व लोकप्रिय अखबार है। किसी सुमधुर आर्केस्ट्रा सा बजता रहता है।
साजिन्दे जरूर बदल गए हैं। अधिक आधुनिक और तकनीकी दृष्टि से भी सम्पन्न हुआ है, मगर अब वहां पत्रकारिता
और साहित्य के वे पुराने मन्ना डे, मुकेश, किशोर कुमार जैसे राहुल बारपुते, राजेन्द्र माथुर या
अभय छजलानी नहीं हैं, वे भी वहाँ नहीं हैं जिन्हें मैंने ऊपर
याद किया है।
प्यास अधूरी
सी रह जाती है। पुराने कानों को नई आवाजों का अभ्यस्त होने में थोड़ा वक्त तो लगता
ही है....
नईदुनिया धीरे
धीरे और नई होती गई है... पर पुरानी नईदुनिया की स्मृतियाँ भी मन को हरा करती रहती
है...
बधाई और
शुभकामनाएं प्रिय नईदुनिया...लांग लिव.....
ब्रजेश कानूनगो
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