Monday, 8 June 2020

स्मृति के एकांत से ..स्वान्तः सुखाय 17 से 20



स्मृति के एकांत से...
स्वान्तःसुखाय 17 से 20

17
किसके रोके रुका है सवेरा

टीवी नहीं चलता इन दिनों हमारे यहां। नहीं देखने से बीपी नॉर्मल और रचनात्मकता बनी रहती है। आजमा कर देख लीजिए,भले ही साथ में काढ़ा पीना चाहें तो पीते रहें, बस खबरिया चैनलों की बहसों से डिस्टेन्स बनाए रखें।
बहरहाल इन दिनों रेडियो बजता रहता है। सुबह जागते हैं तब से अनवरत रात ग्यारह बजे तक। वह भी ज्यादातर विविधभारती।

थोड़ी देर बीच में बस सुबह 11 बजे से 1 बजे तक अन्नू कपूर के साथ अतीत के सिने गीत संगीत और पुराने दिनों का सफर करते रहते हैं, बिग एफ एम पर। बाकी समय विविध भारती का पंचरंगी चलता रहता है। हमारे वर्तमान जीवन का यही पार्श्व संगीत है।

कुछ दिन पहले विविध भारती पर छायागीत कार्यक्रम में रेडियो सखी ममतासिंह साहिर लुधियानवी का पुराना गाना बजा रहीं थीं 'रात भर का है मेहमाँ अंधेरा...किस के रोके रुका है सवेरा..!'
सुनते सुनते खो गया देवास के अपने बचपन के मोहल्ले में निकलने वाले मुहर्रम के जुलूस की स्मृतियों में।

झिलमिलाती गली में देर रात रंग बिरंगे और खूबसूरत ताजिए, बुर्राक, घोड़े और अन्य निशान निकलते थे। अखाड़ों के साथ करतब दिखाते जांबाज कलाकार और खिलाड़ियों को देखना बहुत कौतुक और रोमांच भरा होता।
उस्ताद यासीन खां साहब के विख्यात बैंड पर फ़िल्म 'सोने की चिड़िया'(1958) के गीत की ओ पी नय्यर साहब की बनाई 'रात भर का है मेहमां अंधेरा' धुन बजा करती थी।
बाद में शायद उनके भाई अजीज खां साहब इस बैंड के प्रोपाइटर हो गए थे। तब इस बैंड को अजीज खाँ साहब का बेंड कहा जाने लगा। कुछ अन्य व्यावसायिक नाम भी था बैंड के बैनर पर लेकिन पहचान तो यासीन साहब और अजीज खां साहब के नाम से ही थी। उस जमाने में इलाके का यह बहुत मशहूर बैंड हुआ करता था। हर कोई चाहता था कि उसके यहां शुभ कार्यक्रमो में यही बैंड बजे।

बढ़ते शहर में अजीज भाई के बैंड की मांग बढ़ने पर बाद में कई नए बैंड भी आए और शादी ब्याह के मौसम में अनाप शनाप चार्ज भी करने लगे। यासीन खां साहब की सरपरस्ती में इस खास बैंड ने हमेशा अपनी साख को बनाए रखा था और मुनासिब मेहनताना ही लिया, मेरा निजी अनुभव तो तब यही रहा। सन 1984 में अपनी बहन की शादी में घोड़ी सहित मात्र 500 रुपयों में पूरे चार घण्टों के लिए हमने इस शानदार बैंड को बुक किया था। उसी दौर में अन्य बैंड इसी काम के 2000 रुपये तक मांग रहे थे, वह भी इस शर्त पर की समय हो जाने पर प्रति घण्टा 500 रुपये अलग से चार्ज किए जाएंगे।

बहरहाल, बात यादों में बसे मुहर्रम के जुलूस की ही करते हैं। यासीन खां साहब सामान्यतः बैंड प्रस्तुतियों में खुद नहीं जाया करते थे लेकिन मुझे अपनी कच्ची पक्की स्मृतियों से स्मरण होता है, जन्माष्टमी पर निकलने वाली राजकीय डिंडी यात्रा और मुहर्रम के जुलूस में स्वयं 'डायरेक्शन स्टिक' थामें अपना विशिष्ठ ड्रेस पहन बैंड का नेतृत्व किया करते थे। उनकी छड़ी के इशारों पर साजिंदों के बाजों से सुर निकलते थे। सभी वादकों से सबसे आगे वे किसी फौजी कप्तान की तरह शान से चलते थे।

एक बुजुर्ग कलाकार अपनी कमर में घोड़े के शरीर का पुतला कंधों पर लटकाए रास थामें मोहक नृत्य किया करते थे। उनके पैरों में घुंघरू बंधे होते थे और सिर पर ताज चमकता था। घोड़े पर जैसे कोई युवराज सवारी कर रहा हो। गीत की लय पर थिरकते हुए वे बहुत मोहक लगते। उस पूरे नजारे को देखकर तन में सरसरी सी और भीतर शर्बत सी मिठास घुलने लगती थी। मन करता है यादों में बसा वह अश्व नृत्य फिर से निहार सकूं।

न जाने क्यों इस कोरोना काल में बहुत कुछ याद आता रहा है... अभी कुछ दिन पहले देवास से बचपन के सहपाठी और काव्य मंच के राष्ट्रवादी कवि देवकृष्ण व्यास जी का फोन आया था। खैर खबर पूछ रहे थे। बोले- मोबाइल में सेव सभी मित्रों से बातचीत कर रहा हूँ।
वैश्विक महामारी से बनी अनिश्चतता के बावजूद साहिर साहब के बोलों से जीवन में विश्वास पैदा होता है...

रात भर का है मेहमाँ अंधेरा........किसके रोके रुका है सवेरा....।
मौका भी है तो आइए पढ़ते हैं साहिर साहब का वही आशा जगाता लाजवाब गीत....

रात भर का है मेहमां अंधेरा,
किसके रोके रुका है सवेरा..

कोई मिलके तदबीर सोचे
दुःख के सपनो की ताबीर सोचे
जो तेरा है वोही ग़म है मेरा
किसके रोके रुका है सवेरा
रात भर का है मेहमां..

रात जितनी भी संगीन होगी,
सुबह उतनी ही रंगीन होगी..
ग़म न कर दर है पागल घनेरा
किसके रोके रुका है सवेरा
रात भर का है मेहमां अंधेरा..

****

18
पहली किताब, घमंडी की लस्सी और कुमार अम्बुज

जीवन में कई मित्र आए और गए लेकिन कुमार अम्बुज की दोस्ती ने मेरी सोच समझ और लेखन की दिशा ही बदल दी। सबके जीवन में बचपन के कुछ प्यारे लंगोटिया यार होते हैं लेकिन कुमार अम्बुज की दोस्ती इससे थोड़ी ज्यादा आत्मीय और अलग किस्म की रही।
कुमार अम्बुज से मित्रता थोड़ी देर से ही हुई थी। पत्र-मित्रता के वे बड़े शौकीन थे। उस जमाने में खतों किताबत का बड़ा महत्व हुआ करता था। मेरे स्थानीय लेखक मित्र ओम वर्मा और अम्बुज पत्र-मित्र थे। ओम कभी-कभी उनके वैचारिक और रचनात्मक पत्र अक्सर मुझे दिखाया करते थे। पत्रों में प्रायः विचारधारा और कविताओं को लेकर दोनों के बीच छोटी-मोटी प्रबोधन कार्यशाला सी चला करती थी।

यों उन दिनों अखबारों के लोकप्रिय व्यंग्य कॉलमों में कुमार अम्बुज के लेख यदा-कदा दिखाई दे जाते थे। पर वे इस तरह की छपास के मोह में ज्यादा न पड़े। उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़कर वैचारिक परिपक्वता ग्रहण करने का बेहतर रास्ता चुना। और लगातार समृद्ध होते चले गए।
कुमार अम्बुज और मैं रचनात्मक रूप से एक ही समय में सक्रिय थे। लेकिन जहां मैं उस दौर की लोकप्रिय पत्र-पत्रिकाओं में बालगीत, बालकथाएं, व्यंग्य, कहानियां, पत्र आदि निरंतर लिखकर अपनी जगह और पहचान बना रहा था , वहीं अम्बुज महत्वपूर्ण साहित्यिक लघुपत्रिकाओं में प्रतिष्ठित हो रहे थे। साहित्य में नवोदितों को दिए जाने वाले भारतभूषण पुरस्कार जैसे महत्वपूर्ण सम्मानों से उन्हें सम्मानित भी किया जाने लगा था। प्रगतिशील हिंदी साहिय जगत की समकालीन परंपराएं और वामपंथी चेतना उनकी रचनाओं और आचरण में शुरू से ही परिलक्षित होने लगी थीं।

हमारी बैंक की यूनियन के नेता और देश में बैंक अधिकारियों के संगठन के शीर्ष नेतृत्व में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले श्री आलोक खरे की दूरदृष्टि के परिणामस्वरूप विभिन्न क्षेत्रों में प्रतिभावान कर्मचारियों को उनकी प्रतिभा के प्रोत्साहन और विकास के लिए कई मंच उपलब्ध कराए गए थे। जब बैंक कर्मियों की यूनियन में साहित्यिक प्रकोष्ठ के गठन की बात सोची गयी तो सबसे पहले कुमार अम्बुज सहित कुछ नाम ध्यान में आए तो सर्वश्री सुरेश उपाध्याय, राजेन्द्र पाण्डेय, सतीश राठी, संगीता चौधरी सहित कई सक्रीय रचनाकार मित्रों के साथ मेरा नाम भी वहां था। बैंककर्मी रचनाकारों की एक संस्था प्राचीबनाई गयी, जिसका उद्देश्य लेखन में रुचि रखने वाले बैंककर्मी रचनाकार साथियों को प्रोत्साहन देना था। साथ ही संस्था की गतिविधियों के जरिये बैंककर्मी रचनाकारों की वैचारिक और रचनात्मक दृष्टि को चेतना सम्पन्न बनाने का भी एक प्रयोजन इसमें निहित था। इस पहल से बैंक की ट्रेड यूनियन के कार्यों में भी वैचारिक गुणवत्ता को बल मिलने लगा.

उधर बैंक ने प्रधान कार्यालय से आर्थिक और बैंकिंग विषयों पर हिंदी में एक पत्रिका निकालने की योजना बनाई थी। वहां किसी ऐसे व्यक्ति की जरूरत थी जो बैंकिंग के साथ हिंदी लेखन में भी दक्षता रखता हो। इस कार्य के लिए मेरा चयन किया गया। गृह पत्रिका भी यहीं से निकलती थी। बैंक के प्रधान कार्यालय और क्षेत्रीय कार्यालयों में हम दोनों की पोस्टिंग में कोई ख़ास दिक्कतें नहीं आईं।

एक ही नगर में होने से अम्बुज और मेरा मिलना जुलना अब रोज होने लगा। साहित्यिक प्रकोष्ठ की गतिविधियां शुरू हुई तो अम्बुज और मेरी मित्रता भी गहराती गई। साहित्यिक प्रकोष्ठ प्राचीके माध्यम से कई बुलेटिनों का प्रकाशन हुआ। साहित्य गोष्ठियों और सम्मेलनों में देश के लब्ध-प्रतिष्ठ साहित्यकारों के व्याख्यानों का सिलसिला चलता रहा। संस्था की कई इकाइयां भी बनी अलग अलग स्थानों पर। कविता कार्यशालाएं भी आयोजित हुईं जिनमें महत्वपूर्ण और वरिष्ठ चिन्तक, कवि, साहित्यकार बैंककर्मी लेखकों का मार्गदर्शन करने लगे।

संस्थाओं को गति देने और नेतृत्व की कुशलता के कई सूत्र कुमार अम्बुज में अभी भी देखे जा सकते हैं। श्री आलोक खरे जी की तरह ही सांगठनिक नेतृत्व की कला उनके पास भरपूर थी,लेकिन इस क्षमता का उपयोग उन्होंने केवल साहित्य संगठनों के लिए ही किया। यह ठीक भी था, अम्बुज को अभी कई कृतियों की रचना और करनी थी।

बहरहाल, उन्ही दिनों सितम्बर माह में मेरी पहली किताब व्यंग्य संग्रह पुनः पधारेंछपकर आया था। किसी भी लेखक के जीवन में पहली किताब के आने का अपना सुख होता है। मैं भी उसी गौरव भाव से लबालब हो रहा था। पता नहीं यह मेरी भूल थी या ठीक हुआ कि उत्साह में आकर हिन्दी दिवस के एक दिन पहले मैं अपने विभाग के जीएम साहब से हिन्दी पखवाड़ा शुभारम्भ समारोह की रूपरेखा अनुमोदित कराने गया तो साथ में नए संग्रह की एक प्रति उन्हें भी सादर भेंट कर दी।

हिन्दी दिवस समारोह में तब भी वही हुआ जो हमेशा होता रहा है और आज भी होता है। अलग हुआ तो केवल यह कि मंत्रियों के संदेशों के वाचन और हिन्दी में कामकाज करने की शपथ विधि के बाद जीएम साहब ने यकायक मेरी ओर देखकर कहा –‘तुम्हारी किताब भी ले आओ ब्रजेश, हिन्दी दिवस के अवसर पर एमडी से उसका विमोचन करवा लेते हैं।
स्केल सेवनअधिकारी के बोल किसी निर्देश से कम नहीं होते.. क्या करता एक स्केल वनकारिन्दा बेचारा..दौड़ता हुआ गया और एक गुलाबी कागज़ में सद्य प्रकाशित संग्रह की कुछ प्रतियाँ लपेट लाया.. एमडी का स्केल कुछ होता नहीं, उसे सरकार नियुक्त करती है... मेरी पुस्तक का सरकारी विमोचन प्रबंध निदेशक के करकमलों से ऑन द स्पॉटहो गया था...
उन दिनों बैंक में भी ऑन द स्पॉटपर बड़ा जोर दिया जा रहा था। जिन नौकरी पेशा लोगों की ओर बैंके देखती भी नहीं थी, अब सीधे वेतन से रिपेमेंट की गारंटी होने के कारण स्कूटर से लेकर कार और मकानों तक के लिए ऑन द स्पॉटउन्हें ऋण स्वीकृत किये जा रहे थे।
एमडी के हाथों किताब का विमोचन अन्य सहकर्मियों के लिए बहुत बड़ी बात थी। कार्यक्रम समाप्त होते ही कुछ साथी मन से तो कुछ जबरन मुझे बधाई देने लगे।

पुस्तक के आकस्मिक विमोचन से जो व्यक्ति सबसे अधिक व्यथित हुआ वह और कोई नहीं वह कुमार अम्बुज ही थे. पहले तो अम्बुज ने बधाई दी फिर बोले-
यह ठीक नहीं हुआ ब्रजेश, किताब का विमोचन इस तरह थोडे किया जाना चाहिए। माना कि तुम्हारे बॉस के आदेश से ऐसा हुआ है लेकिन किताब तो तुम्हारी निजी रचना है। इतनी विनम्रता भी ठीक नहीं। तुम मना कर सकते थे।

कुमार अम्बुज को पलट कर जवाब तो नहीं दिया मैंने लेकिन मन ही मन सोचने अवश्य लगा था..
मना कैसे कर सकता था... दिन भर उनके नीचे काम करना होता था..विभाग प्रमुख से भी ज्यादा जीएम साहब मुझ को तवज्जो देते थे... निर्देश का अनुपालन मेरी ड्यूटी थी... अब तोबॉस इस आलवेज राईटकी आदत सी हो गयी थी...
बाद में समझ भी आया कि कुमार अम्बुज के एतराज में बहुत दम था। हर लेखक का आत्म सम्मान होता है, होना भी चाहिए... मैं बैंक का केवल एक मुलाजिम ही तो नहीं था...लेखक भी था।

चलो यार जो हुआ सो हुआ...किताब पर चर्चा हम अपनी गोष्ठी में कर लेंगे। कार्यक्रम भी व्यवस्थित करेंगे। तुम कहोगे तो ज्ञान जी को या प्रेम जी को मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित कर लेंगें।कुमार अम्बुज ने कहा था तो मेरी तंद्रा टूटी थी।

हिन्दी दिवस के उस दिन पहली किताब का विमोचन तो एमडी साहब ने अचानक कर दिया था, किन्तु उसी शाम इंदौर की प्रसिद्ध घमंडी मधुशाला में लस्सी पीकर असली जश्न मनाया गया। हिन्दी दिवस समारोह की तरह सभागृह खचाखच भरा हुआ तो नहीं था लेकिन कुमार अम्बुज और मेरे अलावा तीन चार व्यक्ति फालूदा कुल्फी अवश्य खा रहे थे..
बिल का भुगतान मुझे कुमार अम्बुज ने करने नहीं दिया.... आखिर वह मेरा दिन था...पहली किताब आने की खुशी का दिन....!

प्रसंगवश यह भी बता दूं की फिर कभी मेरी किताब का कोई विमोचन अलग से नहीं हो पाया,जिन अतिथियों की उपस्थिति में पुनः पधारेंपर चर्चा प्रस्तावित थी उन्हें बाद में अवश्य आमंत्रित किया गया था। वरिष्ठ व्यंग्यकार सर्वश्री डॉ ज्ञान चतुर्वेदी, डॉ प्रेम जनमेजय, विष्णु नागर, डॉ अंजनी चौहान, प्रकाश पुरोहित जैसी श्रेष्ठ और नामी हस्तियों को हमारे बैंक के प्रधान कार्यालय में प्राचीके कार्यक्रम में ऐन रंगपंचमी के रंगारंग दिन आमत्रित कर व्यंग्य गोष्ठी अवश्य आयोजित की गई। जिसमें उसी संग्रह से मैंने अपनी रचना ताले और चाबियाँपढ़कर प्रशंसा पाई थी।

बहरहाल, उस दिन की खास घमंडी लस्सी तो नहीं है आज लेकिन कुमार अम्बुज की उन्हीं दिनों की एक कविता में पहुंचकर गुमटी पर, एक कप चाय पीते हैं, जहाँ हम दोनों कभी-कभी साथ में पीते थे।

चाय की गुमटी

वह रास्ते से एक तरफ थी
लेकिन कई लोगों की जिंदगी के रास्ते में पड़ती थी
छोटी-सी ढलान थी वहाँ
जो थके हुए राहगीरों को बुलाती थी आवाज देकर
वहाँ ऐसे लोग भी आते रहे जिन्हें नहीं होती थी चाय की तलब
वे ऊबे हुए लोग रहा करते जिन्हें कहीं और नहीं मिल पाती थी शांति

उस ढलान से लुढ़कता रहा दफ्तरों का बोझ
वहीं छूटती रहीं घर-गृहस्थी की चिंताएँ
नये लगाए गए करों और अनंत महँगाई के बीच
वहाँ पिचहत्तर पैसे की चाय थी चीजों को दुर्लभ होने से बचाती
विद्वानों को नहीं पता होगा लेकिन वह गुमटीवाला
पिछले कई सालों से वित्तमंत्री की खिल्ली उड़ा रहा था

काम पर जाते मजदूर इकट्ठा होते रहे वहाँ
कभी भी पहुँच सकते थे आसपास रहनेवाले विद्यार्थी
रिक्शेवालों, अध्यापकों, बाबुओं- हर एक के लिए जगह थी वहाँ
बेंच कुल एक थी और एक स्टूल
जिन पर धूल और पसीने के अमर दाग थे
उनका सौंदर्य बुलाता रहा दुखी लोगों को बार-बार
उसके करीब की जगहें पहचानी जाती रहीं चाय की गुमटी से
अजनबियों को बताया जाता रहा- 'वहाँ, उस गुमटी से दाएँ'

एक दिन मैं अपने दोस्त के साथ वहाँ गया
मन ही मन शर्मिंदा होता हुआ कि मेरे शहर में
कोई जगह ऐसी नहीं जहाँ मैं उसे, बाहर से आए
उस उत्सुक आदमी को ले जा सकूँ
खाली नहीं थे बेंच और स्टूल
हमने एक बड़े पत्थर पर बैठकर
एक पेड़ के नीचे चाय पी
फिर एक-एक कट और
दोस्त ने कहा
यह कितनी खूबसूरत जगह है
जो हर शहर में होती है
लेकिन हर किसी को खूबसूरत नहीं लगती।
000
( कुमार अम्बुज के संग्रह 'क्रूरता' से साभार, रचना काल 1994)


19
माँ की मौजूदगी

मन का क्या है। पंख लगे होते हैं उसके। उड़ते उड़ते आज फिर से जा बैठा पचास बरस पहले के अपने घर की छत के कंगूरे पर। दो मंजिले मकान की छत पर लकड़ी की बल्लियां लगी थीं जिन्हें जुपीए कहते थे, जिसके ऊपर मिटटी की तह बिछाई गई थी। फिर थोडे ऊपर टीन की चद्दरें ठोंकी हुई थीं।

नीचे याने ग्राउंड फ्लोर पर अगला कमरा बैठक खाना और उसके बाद एक अँधेरा कोठार जिसमे केवल एक दरवाजा। कोई खिड़की नहीं। हवा का कोई आवागमन नहीं। इसमें गुड़ समेत खजाना सा भरा होता था। कुछ बोतलों में गार(ओले) का पानी ऐसे सहेजा हुआ था जैसे अमृत रखा हो। मुहल्ले में यदा कदा चम्मच भर कोई मांगने आ जाता था। बर्नियों में बहुत ख़ास अचार रखा, कोठार को महकाता रहता था।

गर्मियों में कोठार की ज़रा सी जगह में दादी बोरी बिछा कर दोपहर की नींद निकालती। वहां उनके बगल में जैसे शिमला बसी थी।
और मई जून की दोपहर में बैठक खाने के दरवाजे की दरार से धधकती सड़क से कुल्फी के ठेले की चमक और परछाइयों का प्रवेश चलचित्र की रौशनी सा दीवारों पर गुजरता था। कोई कूलर या पंखा नहीं था।

आज कांक्रीट के स्वर्ग में बैठे बैठे अपना बचपन किसी पुराने चलचित्र की तरह दृश्य दर दृश्य गुजरता जा रहा है !! वह कुमार गन्धर्व की नगरी में संगीत सम्राट रज्जब अली खां मार्ग का एक मकान भर नहीं था। सभी दुखों का समाधान करता एक घर था हमारा।

इसी घर की छत पर गर्मियों में बिस्तर लगते थे। चौकी पर शीतल पानी के मटके पर रखा एक तरबूज अपने कटने की प्रतीक्षा किया करता था। घर के सब लोग जब सब कामों से निवृत्त हो कर छत पर सोने के लिए आते,गपशप के साथ तरबूज की फांकें सबके मन को आत्मीयता की मिठास से भर देतीं थीं।
इसी सुकून भरे वातावरण में माँ रात को छत पर सितारों की छाँव में लेटे लेटे अपने युवाकाल का एक किस्सा हमें सुनाया करती थीं अक्सर।

हुआ यूँ कि नाटक विक्रम का न्याय' का मंचन किया जा रहा था। दो स्त्रियों में विवाद था कि बच्चे की असली माँ कौन है और बच्चा किसे सौपा जाए। महान न्यायाधीश विक्रमादित्य ने अपने सिपाहियों को आदेश दिया कि बच्चे को दो टुकड़ों में बांटकर दोनो स्त्रियों को एक एक हिस्सा सौंप दिया जाए।
इसके पहले कि सिपाही आगे बढ़ते, दर्शकों मे से एक तीसरी स्त्री दौडती हुई मंच पर चढ गई और बच्चे को छीनकर नाट्‌यगृह से बाहर चली गई। नाटक मे भी अपने बच्चे का अहित न देख सकने वाली वह तीसरी स्त्री उस बच्चे की असली माँ थी।
नाटक के मंच पर चढ़ी वह तीसरी स्त्री और कोई नहीं मेरी अपनी माँ ही थी। जब मैं छह सात माह का ही रहा होंगा, युवा पिता के मित्रों ने कस्बे में नाटक का आयोजन किया था। छोटे बच्चे की दरकार थी, कोई भी व्यक्ति अपना शिशु नाटक के लिए देने के लिए तैयार नहीं थी। माँ ने हिम्मत की थी। मुझ नन्हे से बालक को नाट्य मंडली को सौंप दिया गया।
जो नाटक खेला गया था उसमें असली माँ बच्चे को नाटक के बीच से छीनकर तो नहीं भागी थी..लेकिन बड़े होकर मैंने जब पहली लघुकथा लिखी तो अपनी माँ की उस वक्त की मनोदशा का चित्रण करने का प्रयास जरूर किया था।

बचपन की स्मृतियों पर मेरी यह पहली सृजनात्मक पहल थी। जो बाद में हिन्दी दिवस पर बैंक द्वारा आयोजित प्रतियोगिता में पहले पुरस्कार हेतु चुनी गयी थी।
माँ हमेशा मेरी रचनात्मकता को प्रोत्साहित करती रहती थीं। उनके बारे में विस्तार से आगे कहूँगा ...

अब माँ नहीं हैं...फिर भी हैं हमारे साथ.....माँ अपने बच्चों को छोड़कर कहाँ जाती हैं...
इंतजार कर रहीं होगी घर पर चबूतरे पर बैठी हुईं....
उन्हीं को याद करते हुए ये कविता पढ़ लेते हैं आज...

इंतज़ार करती माँ

अमरूदों से लद गए हैं पेड़
आंवलों की होने लगी है बरसात
गूदे से भर गईं हैं सहजन की फलियाँ
बीते कसैले समय की तरह
मैथी दाने की कड़वाहट को गुड़ में घोलकर
तैयार हो गए हैं पौष्टिक लड्डू

होड़ में दौड़ते पैकेटों के समय में
शुक्रवारिया हाट से चुनकर लाई गयी है बेहतर मक्का
सामने बैठकर करवाई है ठीक से पिसाई
लहसुन के साथ लाल मिर्च कूटते हुए
थोड़ी सी उड़ गयी है चरपरी धूल आँखों में
बढ गई है मोतियाबिंद की चुभन कुछ और ज्यादा

भुरता तो बनना ही है मक्का की रोटी के साथ
तासीर ही कुछ ऐसी है बैंगन की
कि खाने के बाद उदर में
अग्निदेव और वातरानी करने लगते हैं उत्पात
छाछ ही है जो करती है बीच बचाव
कोई ख़ास समस्या नहीं है यह
घी बनने के बाद सेठजी के यहाँ
रोज ही होता है ताजी छाछ का वितरण

पूरी तैयारी रहती है माँ की गाँव में
मैं ही नहीं पहुँच पाता हूँ हर बार
जानता हूँ बह जाता होगा बहुत सारा नमक प्रतीक्षा करते
ऊसर जाती होगी घर की धरती
आबोहवा में बढ़ जाती होगी थोड़ी सी आद्रता

सच तो यह है कि खूब जानती है माँ मेरी विवशता
खुद ही चली आती है कविता में हर रोज
सब कुछ समेटे अपनी पोटली में।
000

20
यादों के वे मेले

मानसून जल्दी आए या देर से मगर इतना तय रहता था कि गुरु पूर्णिमा याने 'आषाडी पूनम' पर देवास में झमाझम बारिश होती ही थी। किसी वर्ष अगर ऐसा नहीं हुआ तो यह मान लिया जाता था कि इलाके के लिए यह साल सुखद नहीं रहने वाला है।

इस पूनम का हम बच्चों के लिए बड़ा खास महत्व होता था और बहुत इंतजार भी किया करते थे। चामुंडा पहाड़ी की तलहटी में तीन दिवसीय एक 'जत्रा' भरती थी। आप कुछ यूं समझे की एक बड़ा हाट बाजार या ग्रामीण मेला सा लगता था। आज के बच्चों ने कुछ पुरानी फिल्मों में इसकी झलक अवश्य देखी होगी। जिसमें कभी कभी भगदड़ मच जाती है और माँ या पिता का हाथ थामे दो बच्चे अचानक बिछड़ जाते हैं और फिर बड़े होने पर क्लाइमेक्स में पता चलता है कि वे तो वही भाई हैं जो बचपन में गांव के मेले में गुम हो गए थे। जी हाँ, वही मेला। उसी को 'जत्रा' कहा जाता था।

यह 'जत्रा' दिन में सुबह से लेकर शाम तक आगरा मुम्बई राजमार्ग के दोनों ओर तथा पहाड़ी के ढलान पर लगती थी।
इसे बहुत व्यवस्थित नहीं कहा जा सकता था। बस लोग जुटते तो बाजार के साथ आमोद प्रमोद का इंतजाम हो जाया करता। आसपास के ग्रामीणों की तादाद अधिक होती थी। अपने गांवों से आकर दिन भर देवास में रंगीनियाँ बिखरते रहते थे। पहाड़ी पर माँ चामुंडा और तुलजा भवानी के दर्शन करते और फिर जत्रा का मजा लेते।
मिष्ठानों से लेकर भोजन आदि वाजिब दाम पर सब कुछ यहां उपलब्ध रहता था। वैसे हर तरह की नमकीन और मिठाई की दुकान सजती थीं लेकिन खास तौर से गुड़ के बने गुलगुले और जलेबियाँ,भूरे कोले का पेठा खूब बिकता था।

शहर के बच्चों को भी 'जत्रा' में बहुत मजा आता था। खासकर मिट्टी के खिलौने, बांस के बने तीर कमान, बांसुरियां और तलवारों की खूब बिक्री होती थी। लड़कियों को रसोईघर के सारे साधन मिट्टी के छोटे छोटे खिलौनों के रूप में मिल जाते थे बहुत से और और नए खिलोने भी होते थे किन्तु मिट्टी के बने मारवाड़ी सेठ,सेठानी, सुंदर मर्फी बॉय, तीन हिस्सों में बनी कमर और चेहरा मटकाती सुंदरी अब भी स्मृतियों में बसी हुई है।

लकड़ी के फट्टों से बनी रेहट (झूले) की कुर्सियों पर बैठकर बच्चे, बूढ़े सब आकाश में ऊपर उठने और फिर धरती पर आ जाने का मजा लेते।एक बार मैं भी रेहट में बैठा था लेकिन मजा आने की जगह मेरा दिल ही हलक में जा अटका। बीच में ही रहट रुकवाकर उतरना पड़ा। उसके बाद फिर कभी किसी ऐसे झूलों की ओर नहीं फटका।

सबसे मजेदार बात यह थी कि 'आषाडी पूनम' को बरसात तो होनी ही अवश्यम्भावी होती थी। झमाझम हो जाती तो सब कुछ उलट पलट जाता। खिलौनों के साथ साथ ढलान पर दुकान लगाए किसानों के भुट्टे और ककड़ियाँ भी पानी के बहाव के साथ हमारे मोहल्ले की गली तक आने लगती थीं। उस नजारे पर भी आगे अवश्य बात करेंगे।

'जत्रा' दिन में लगने वाला ग्रामीण प्रकृति और रुचि का मेला था तो दशहरे के आसपास एक पक्ष तक चलने वाला 'मीना बाजार' रात में रोशन होने वाला थोड़ा आधुनिक और शहरी लोगों को अधिक सुविधाजनक लगता था।
सुव्यस्थित 'मीना बाजार' नगर पालिका लगवाती थी। इसमें बहुत से सरकारी विभागों के स्टाल आदि भी लगते थे। इस मीना बाजार का सरकारी नाम 'कृषि कला एवं औद्योगिक प्रदर्शनी' होता था।

मीना बाजार जिस शिवाजी उद्यान के आसपास लगता था इंदौर, उज्जैन से आकर एक तरफ भोपाल तथा दूसरी तरफ आगरा की तरफ जाने वाले रास्तों से बीच एक त्रिभुजाकर जगह बनती है, जिसके मध्य घोड़े पर तलवार लिए शिवाजी महाराज की धातु की विशाल प्रतिमा स्थापित है। आसपास उद्यान था। उद्यान की हरी घास के आसपास कृषि,कला व उद्योगों से सम्बंधित स्टाल्स में प्रदर्शनी लगी होती थी। त्रिभुजाकार खण्ड की बॉर्डर पर देशभर से आए व्यापारी अपनी दुकान सजाए सबको आकर्षित करते थे। शिवाजी पार्क के गेट को बहुत आकर्षक रूप से सजाया जाता था पूरा मीना बाजार शाम छह बजे से देर रात तक रंगीन रोशनियों से झिलमिलाता रहता था।

मीनाबाजार पार्क के बीच कांक्रीट का विशाल मंच स्थायी रूप से निर्मित किया गया था। जहां प्रतिदिन सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे। राष्ट्रीय कवि सम्मेलन और मुशायरे के अलावा संस्कृति विभाग के कलाकारों की नाट्य प्रस्तितियाँ और लोक संगीत और लोक नृत्य बहुत लुभाते थे। प्रतिदिन सायंकाल पंचायत विभाग फ़िल्म प्रदर्शन करता तो बच्चों की भीड़ उमड़ पड़ती। वी शांताराम जी की यादगार फ़िल्म 'दो आंखें बारह हाथ' सबसे पहले मीना बाजार में ही देखी थी। बाद में हर वर्ष यह तो दिखाई ही जाती साथ में 'परिवार' और मनोज कुमार की 'उपकार' भी दिखाने लगे थे।

उदयपुर से प्रति वर्ष 'लोक कला मंडल' की टीम भी आकर अपना रंगारंग राजस्थानी कार्यक्रम करती। खासकर 'काल बेलिया नृत्य' और सिर पर मटकी पर मटकी रख पीतल की थाली की तीखी किनार पर 'भवाई नृत्य' करती नर्तकी को देखकर हम भौचक्क रह जाते थे। राजस्थानी कठपुतलियों का प्रदर्शन भी बहुत मजेदार होता था। एक बार तो लोक कला मंडल ने कठपुतलियों से दो घण्टे में 'सर्कस' का सम्पूर्ण खेल ही दिखा दिया था।

मीनाबाजार के समय मौसम में ठंडक घुलने लगती थी। शाम होते ठंडी हवाएं भी बहने लगती थीं जो रात को ठिठुरन पैदा करती। इस मौसम में सिकी हुई गर्म मूंगफलियां और सिंघाड़ों का लुत्फ लेते हुए हरी दूब पर बैठकर सांस्कृतिक कार्यक्रमों को देखने का अद्भुत मजा होता था। पूरे क्षेत्र में सिंगाड़े और मूंगफलियां बेचने वाले बच्चे हांक लगाते रहते थे। कुछ परिवार घर से भी मूंगफलियां सेक कर ले जाते।

कुछ शोहदे किस्म के युवक एकांगी मेला मार्ग पर उल्टी दिशा में चक्कर काटते। कारण साफ हुआ करता था। उन्हें दुकानों,प्रदर्शनी या कार्यक्रम से अधिक सुंदर मुखड़ों को निहारने में अधिक आनन्द आता था। ईमानदारी से कहूँ तो एकाध बार यह हरकत अपने मित्रों के साथ हमने भी की थी।

बहरहाल, मेरी यादों के ये मेले उस वक्त के हैं जब देवास कस्बे से शहर में बदलने के दौर में था।स्मृतियाँ भी रेहट की सवारी करते हुए अब महानगरीय चकाचौंध के बीच धुंधलाने लगीं हैं।
जितना भी देख पा रहा...वह भी कुछ कम नहीं...तन मन को खुशियों से भर रहा है इन दिनों...!





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