Thursday, 25 June 2020

स्मृति के एकांत से... स्वान्तः सुखाय 31


स्मृति के एकांत से...  
स्वान्तः सुखाय 31

31
गलत को गलत कहने वाले भाई साहब


जिस तरह हिंदी साहित्य के संदर्भ में कहा जाता है कि आजादी पूर्व के भारत की स्थिति जानना है तो प्रेमचन्द जी को पढ़िए और स्वतंत्रत भारत की तस्वीर निरखना है तो परसाई जी को पढ़िए।

कुछ इसी तरह विवाह पूर्व मेरे लिखने पढ़ने के वातावरण और रुचि में मेरे काका श्री यतीश जी की भूमिका रही है और विवाह पश्चात भाई साहब श्री ईश्वरचन्द्र जी की प्रेरणा और उनके विचारों का भी बड़ा योगदान रहा। मेरे रचनात्मक विकास में इन दोनों महानुभावों से प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों प्रकार से आत्मीय व प्रोत्साहन भरा वातावरण मिलता रहा है। ये दोनों मेरे व्यक्तिगत जीवन में लगभग प्रेमचन्द और परसाई जैसे ही कहे जा सकते हैं।

मनोरमा से विवाह होने के पूर्व भी भाई साहब श्री ईश्वरचन्द्र जी मेरे लिए अपरिचित नहीं थे। मनोरमा के वे सबसे बड़े भाई हैं और मेरे ननिहाल पक्ष से उनकी सीधी रिश्तेदारी भी रही है। न सिर्फ पचपहाड़ में मेरे मौसाजी के मित्र थे बल्कि इनके खेत भी नजदीक ही हुआ करते थे। यद्यपि उन दिनों खेती बाड़ी के कामकाज का ध्यान घर के बुजुर्ग ही रखते थे।

मेरा जब 1979 में विवाह हुआ तब राजस्थान में जनता पार्टी की सरकार थी और भाई साहब पिड़ावा क्षेत्र से विधायक थे। वे झालावाड़ क्षेत्र के न सिर्फ वरिष्ठ वकील रहे बल्कि सामाजिक राजनीतिक क्षेत्रों में उनका नाम अग्रणी रहा है। लोहिया जी, जयप्रकाश जी, जॉर्ज फर्नांडिस, मधु लिमये जी के विचारों के अलावा व्यक्तिगत रूप से भी उनके काफी निकट से परिचित रहे। उन्हें इस बात का हमेशा दुख रहा कि जिस वक्त उनकी माताजी का आकस्मिक देहावसान हुआ था तब वे आपातकाल में मीसा बंदी थे।

अपने लिखने पढ़ने के प्रारंभिक दौर में जब सबसे समृद्ध घरेलू पुस्तकालय से रूबरू होने का अवसर मिला, तो वह भवानीमंडी में भाई साहब श्री ईश्वरचंद्र जी की लायब्रेरी ही थी,जिसमें गालिब से लेकर नईम,कुमार अम्बुज व अनिल यादव तक के संग्रहों और धर्मयुग,दिनमान से लेकर कथादेश और हंस तक कि तमाम साहित्यिक ,वैचारिक पत्र पत्रिकाओं को जिल्दों में सजोंकर रखने की अब तक परम्परा रही है।
धर्म पत्नी के बड़े भाई अवश्य हैं,मगर मेरे लिए वैचारिक प्रेरणा स्त्रोत। लोहिया विचार से प्रेरित भाई साहब से विमर्श ने हमेशा सम्पन्न किया है। वे स्वयं भी अच्छे राजनीतिक विश्लेषक हैं। यदा कदा लिखते भी रहते हैं। उनके लेखों की एक पांडुलिपि लगभग तैयार है।
यह मेरा सौभाग्य रहा कि परसाई रचनावली से लेकर भारतीय भाषाओं की अनेक साहित्यकारों और विचारकों के हिंदी अनुवाद अक्सर ससुराल प्रवास के दौरान पढ़ता रहा। अब यह समृद्ध पुस्तकालय भवानीमंडी के निवास से पचपहाड़ के फॉर्म हाउस पर शिफ्ट हो गया है।

कानूनी किताबों का उनका संग्रह भी बहुत सम्पन्न और व्यवस्थित है। सम्भवतः इतना विशाल संग्रह शायद ही उस इलाके में कोई अन्य रहा हो।

अपने अभिभाषकीय समय के पश्चात अब भाई साहब अपने खेतों पर प्रकृति और पंछियों की खूबसूरत क्रीड़ाओं में रुचि लेते हैं। अधिकांश समय पचपहाड़ के फॉर्म हाउस पर बिताते हैं।
सोशल मीडिया पर उनके लाजवाब चित्र हम सबकी और मित्रों की सुबहें सुगन्धित कर देतीं हैं। वर्तमान दौर की विसंगतियों पर इन दिनों उनकी आक्रोश भरी सोशल मीडिया पर वैचारिक टिप्पणियां प्रबुद्ध पाठकों को उद्वेलित कर देती हैं। अस्सी वर्ष की आयु में भी गलत को गलत कहने में उन्हें कोई हिचकिचाहट अब भी नहीं होती। हाँ, सही बात पर लोगों के सहमत न होने पर दुखी अब अवश्य हो जाते हैं।

छपे से दूर होते समय में आज भी भाई साहब के पास कोई दस हिंदी अंग्रेजी के अखबार और पत्रिकाएं रोज आती हैं। एक छोटा अध्ययन शेल्फ गुसलखाने तक में सजी ही नहीं बल्कि उस पर नई सामग्री भी उपलब्ध होती रहती है।

मेरे दूसरे कविता संग्रह 'कोहरे में सुबह' को मैंने भाई साहब ईश्वरचन्द्र जी को भी समर्पित कर अपने को ही उपकृत किया है। मैंने जब पुस्तक की प्रति उन्हें भिजवाई तो आशीर्वाद और शुभकामनाओं के साथ मेरे अनुरोध पर बाकायदा प्रकृति के बीच लोकार्पित भी किया और तस्वीर भी प्रेषित की थी।

वे सदैव स्वस्थ रहें और हमें सदैव प्रेरणा देते रहें,यही कामना है हमारी। गलत को गलत कहने वाले साहसी व्यक्तियों की देश,दुनिया को बहुत जरूरत है।


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