स्मृति के एकांत से
स्वान्तः
सुखाय
21
स्मृति के सितार पर बूंदों का संगीत
इस श्रृंखला
की पिछली कड़ी में मैंने आषाडी पूर्णिमा पर लगने वाली 'जत्रा' को याद करते हुए उस दिन तेज बारिश होने का जिक्र किया था। उस दिन तो बारिश
का होना तय होता ही था। तब आई बारिश भी लगातार सप्ताह-पखवाडे तक चलती रहती थी।
कई-कई दिनों
तक सूरज के दीदार नही हो पाते थे। लम्बे इंतजार के बाद धूप छिटकने के बाद क्षेत्र
के अखबारों का पहले पृष्ठ पर शीर्षक बन जाता था कि ‘एक पखवाडे बाद हुए सूर्य देवता के
दर्शन!’ पुरानी पीढ़ी के पाठक जानते होंगे कि कोई पैंतीस
चालीस बरस पहले ऐसी हेड लाइन अखबारों में आम हुआ करती थीं।
पर्यावरण का
संतुलन अब इस तरह गडबडा गया है कि नए बच्चों को तो शायद याद ही नही रहेगा कि कभी
लम्बे समय तक बादल छाए रहते थे और बूंदों का सितार मन को कई दिनों तक झंकृत करता
रहता था। अब तो खंड वर्षा है या फिर अचानक बादल फाड़कर बरसे कहर से तबाही का मंजर।
बहरहाल आज भी
बरसात का मौसम आते ही हमारा मन जैसे भीगा-भीगा सा हो जाता है। ऐसे में मुझे अपने
कच्चे-पक्के बचपन के दिन बहुत तीव्रता से याद आने लगते हैं।
बिल्कुल अभी
अभी की बात लगती है जब तेज बरसात के बाद हमारे मुहल्ले की गली से पानी ऐसे बहता था
जैसे कोई छोटी-मोटी नदी बह रही हो। उस नदी के बहने का हम बहुत बेसब्री इंतजार किया
करते थे। उसका बडा दिलचस्प कारण भी हुआ करता था। हमारी गली के ठीक आगे चौराहा था
और उसके आगे पहाडी का ढलान। चौराहे पर अपनी बैलगाडिय़ों से गाँव से आकर किसान
ककडियों और भुट्टों की दुकान लगाते थे। अचानक जब तेज बरसात होती और पहाडी का पानी
बाजार में उतरता, किसानों के ककडी-भुट्टे गली में बहने लगते। कोशिश के बाद भी कई
भुट्टों-ककडियों को बचाने में किसान नाकाम ही होते थे।
मुहल्ले के
बच्चों के लिए नदी बन गई गली जैसे भुट्टों और ककडियों की सौगात लेकर आती। हम सब
अपने जोश और आनन्द की बंसी बजाते भुट्टों-ककडियों के शिकार में जुट जाते थे।
गली के एक ओर
हमारे ही परिवारों के घर थे और सामनेवाली पट्टी में ज्यादातर मुस्लिम परिवार रहते
थे। दोनो पट्टियों के बच्चे बहती गली का भरपूर मजा लिया करते थे। सामनेवाले
इस्माइल भाई की अम्मा जिन्हे हम आपा कहा कहते थे, ऐसी ही बहती नदी से गुजर कर पतंग
बनाना छोडकर उस रात हमारे घर आईं थीं। मेरी चाची को तेज दर्द हो रहा था, पूरे नौ माह चल रहे थे। जैसे तैसे मेरी माँ और आपा उन्हे जच्चाखाने ले गए
थे।
जब तक चाची
अस्पताल रहीं, आपा भरी बरसात में चाची और नवजात की खिदमत में जुटीं रहीं। हम बच्चे उनकी
बकरियों और पतंगों को बरसात की बौछारों से बचाते रहे। जब वे नन्हे चचेरे भाई को
गोद में उठाए तांगे से घर लौटीं तब बरसात तो थम चुकी थी लेकिन खुशी में पानी की
कुछ बूँदों और नमी ने जैसे आपा और हम सब की आँखों में डेरा ही डाल लिया था।
बरसात के
दिनों में हमारे यहां कथा, सत्संग,प्रवचन, कीर्तन की बड़ी
पुरानी परंपरा रही है। हमारे मोहल्ले से जुड़े बड़ा बाजार में लम्बी लम्बी चलनेवाली
बारिश की तरह लम्बी ही चलती थी कानडकर बुआ की कथा।पन्द्रह दिन तक कानडकर बुआ रोज
सबेरे कथा सुनाते थे। संगीत मय कथा-कथन और प्रवचन के बाद अंत में देश प्रेम के गीत
और कीर्तन का सामूहिक गान भी हुआ करता था।
स्कूल की
छुट्टी होते ही बारिश में भीगते-भागते हम भी दत्त मन्दिर में पहुँच जाया करते थे।
कीर्तन और देश-प्रेम गान में हमे बहुत मजा आता था। कभी-कभी जल्दी पहुँच जाते तो
बुआ को कथा सुनाते हुए भी देख लेते। वे इतने भावुक होकर अभिनय के साथ प्रवचन करते
थे कि न सिर्फ उनकी बल्कि श्रोताओं, श्रद्धालुओं की आँखों से भी आँसुओं
की झड़ी लग जाती थी। प्रंगानुसार उनकी भावपूर्ण प्रस्तुति होती थी। बाहर बारिश होती
थी और भीतर बुआ संवेदनाओं की बारिश करवा दिया करते थे। सब कुछ भीग भीग जाता था।
हमारा लालच तो
वस्तुत: आखिर में वितरित किया जानेवाला प्रसाद होता था। अद्भुत स्वादवाले उस विशेष
प्रसाद को ‘गोपाल काळा’ कहते थे। जुवार की धानी को दही में मथ
कर वह बनाया जाता था,जिसमें नमक,हरी
मिर्च,अदरख व हरे धनिए का स्वाद समाहित होता था। दोना भर कर
मिलने वाले इस प्रसाद का स्वाद आज भी जबान पर कायम है।
आज जब इसकी
रेसिपी इंटरनेट पर यहां आप सबसे साझा करने के लिए ढूंढना चाही तो वहाँ 'दही पोहा गोपाल काळा'
तो मिला लेकिन अफसोस है, जुवार की धानी से बना
दत्त मंदिर वाला वह अद्वितीय प्रसाद मिल नही सका।
बरसात होते ही
अलग-अलग तरह की पकौडियाँ घर में बनती हैं लेकिन मेरा मन उस दौरान स्मृतियों की झडी
के बीच बचपन के उस 'गोपाल काळा' की ख्वाहिश लिए लगातार अन्दर से भीगता
रहता है।
22
संस्मरणों की सेल्फी
तस्वीरें
अक्सर हमारी स्मृतियों को सहेज कर रखतीं हैं. अब ज़माना सेल्फी का है. पहले
तस्वीरों में सेल्फ इतना नहीं जुडा होता था. पहले कैमरा किसी और के हाथ में होता
था और लेंस को वांछित और महत्वपूर्ण वस्तु या व्यक्ति पर फोकस करके ही क्लिक किया
जाता था. ऐसे में कभी-कभार अपनी देह का कोई हिस्सा भी फ्रेम में आ जाने से ऐसी ही
खुशी मिल जाती थी जैसे टारगेटेड व्यक्ति को पद्मभूषण मिलने के साथ अपन को भी
पद्मश्री मिल गयी हो.
तस्वीर हमें
इतराने का मौक़ा सुलभ करा देती है. यदि तस्वीर किसी युगपुरुष के साथ हो तो हम जीवन
भर इठला सकते हैं. जिन दिनों व्यंग्य के महापुरुष स्व शरद जोशी जी को पद्मश्री
घोषित हुई थी तब विख्यात नवगीतकार प्रो नईम जी की कृपा से मैं भी एक ऐसे कार्यक्रम
में था जहां शरद जी का सम्मान किया गया था. शाजापुर में लायंस क्लब के एक कार्यक्रम
में चूंकि शरद जी से रचनाएं सुनी जानी थी सो डग्गे-मग्गे की तरह मुझे और उस समय
शाजापुर महाविद्यालय में पदस्थ आलोचक एवं व्यंग्यकार प्रो. बी एल आच्छा जी को भी
रचना पाठ का अवसर मिल गया. यह मेरा पहला मौक़ा था जब मैंने किसी मंच से रचना पाठ
किया था. मैं सबसे युवा था. उसी समय की एक तस्वीर में शरद जी, नईम जी, साहित्यकार झाला जी आदि के साथ काले बालों में मेरी मुंडी और देह का कुछ
हिस्सा दिखता था.
इस तस्वीर और
उन आठ दस घंटों के अनुभव को मैंने अब तक साहित्यिक संस्मरण की तरह खूब भुनाया है.
आदरणीय श्री प्रेम जनमेजय ने भी इसे महत्व दिया और इसे पहले शरद जी पर केन्द्रित
व्यंग्य यात्रा के विशेष अंक में और बाद में एक संग्रहणीय पुस्तक में भी स्थान
दिया.
बहरहाल, मैं उस संस्मरण को यहाँ
आगे नहीं बढ़ा रहा. चूंकि अब बाद की पीढी पर लिखे जाने का समय है और आग्रह भी,
इसलिए तस्वीरों को खोजने का काम करते हुए कुछ स्मृतियाँ एलबमों में
मिल गईं और कुछ दिल में बसीं हुईं थी.
शरद जी के साथ
रहने के बाद एक बार फिर ऐसा ऐतिहासिक बल्कि उससे भी अधिक चमकीला मौक़ा मुझे संभवतः 1996 के आसपास हमारे
बैंककर्मियों की साहित्यिक संस्था ‘प्राची’ और आकाशवाणी इंदौर की पहल पर वरिष्ठ कथाकार और ख्यात चित्रकार श्री प्रभु
जोशी (प्रभु दा) के स्नेह-सहयोग की वजह से नसीब हुआ. प्राची तो हमारी ही संस्था
रही है. वरिष्ठ और महत्वपूर्ण समकालीन कवि श्री कुमार अम्बुज मेरे मित्र, साथी बैंक कर्मी और संस्था के तत्कालीन महासचिव थे, अध्यक्षता
मैं खुद संभाल रहा था सो कुछ दायित्व मेरे भी बनते थे.
खैर, इंदौर के इस दो दिवसीय
आयोजन में पहले दिन कहानी और कविता पर केन्द्रित सत्र थे और दूसरे दिन व्यंग्य पाठ
होना था. बात हम यहाँ व्यंग्य पर केन्द्रित सत्र की ही करेंगे. कविता मैं उन दिनों
सीख रहा था. इस पर कभी कुमार अम्बुज ही कहने के अधिकारी हैं. व्यंग्य में मेरी
पहचान बन रही थी. नईदुनिया में ‘अधबीच’ जैसे दिलचस्प और लोकप्रिय कॉलम की शुरुआत हो चुकी थी. परसाई जी के ‘सुनो भाई साधो' और शरद जी के ‘..और शरद जोशी’ के कॉलमों के विराम के बाद राजेन्द्र
माथुर जी ने इस स्तम्भ की विवेकपूर्ण शुरुआत करके नए व्यंग्य रचनाकारों को
प्रोत्साहित करने का काम किया था. इस कॉलम के पहले दिन इसमे मेरा आलेख ‘एटनबरो का गांधी और सफलता के देसी नुस्खे’ दिनांक 21
अप्रैल 1981 को प्रकाशित हुआ था.
मैंने पहले ही
कहा है कि यह ‘सेल्फी’ का ज़माना है इसलिए मेरे संस्मरण में यह भी
आपको झेलना ही पडेगा. कोई चाहे न चाहे जिसने मोबाइल कैमरा थाम रखा है वह अपनी
तस्वीर तो लेगा ही सेल्फी में तो ऐसा ही होता है.
फिर संस्मरण
के ट्रेक पर आते हैं. तो वह व्यंग्य पाठ का सत्र था. स्थान था तत्कालीन स्टेट बैंक
ऑफ़ इंदौर के प्रधान कार्यालय का सुसज्जित सभागार. रंगपंचमी की वह सुहानी और रंगीन
शाम थी. यहाँ मैं आपको बताता चलूँ मालवा में होली-धुलेंडी के बाद रंग पंचमी को ही
रंगों से नहा धोकर उत्सव का आनंद लिया जाता है. रंग-तरंग आदि, सबका मजा इसी दिन लिया जाता
है. दिन भर रंग खेलकर, थक हार कर मालवी आदमी शाम को एन्जॉय
करता है. तो यह एन्जॉय की संध्या थी. सभागार में रंगे-अधरंगे चेहरे मंच पर बैठे
रचनाकारों को सुनने और ठहाके लगाने के इन्तजार में व्याकुल थे. संचालन का दायित्व
मेरे पास था.
बैंक ऑफिसर्स
एसोसियेएन के राष्ट्रीय अध्यक्ष कॉमरेड आलोक खरे मुख्य रचनाकारों को ससम्मान मंच
पर लेकर आये.
अब मैं यहाँ
उन सब व्यंग्यकारों की एक तस्वीर (सेल्फी) अपने शब्दों से उतार लेता हूँ. बाएं से
सर्वश्री डॉ अन्जनी चौहान(भोपाल), प्रकाश पुरोहित (इंदौर), डॉ ज्ञान
चतुर्वेदी (भोपाल), डॉ प्रेम जनमेजय (नई दिल्ली), विष्णु नागर (नई दिल्ली) और मैं याने ब्रजेश कानूनगो (इंदौर). चूंकि
शब्द-मोबाइल मेरे हाथ में है इसलिए मेरा चेहरा थोड़ा बड़ा और विकृत हो गया है लेकिन
सेल्फी-कला में सामान्यतः इसे खूबी माना जाता है.
अफसोस मुझे अब
भी है कि इस अवसर का कोई चित्र मेरे एल्बम में क्यों नहीं है. इस संस्मरण को पढ़कर
यदि कोई उपलब्ध करा दे तो सचमुच मैं बड़ा शुक्रगुजार रहूँगा. शरद जी वाला चित्र
बहुत उपयोग किया जा चुका है. अब व्यंग्य के ये सितारे मेरे बहुत काम आ सकते हैं.
वैसे मैं भी कोई कम जुगाडू नहीं हूँ. चित्र नहीं पर मैंने इस रचनापाठ की रिकार्डेड
कैसेट से भी बहुत काम निकाला है सेल्फी की तरह. जब नई कार खरीदी थी तो घर आने वाले
हर अतिथी को इंदौर और आसपास की सैर के लिए विशेषकर इंदौर से नजदीक देवास में कुमार
गन्धर्व जी, नईमजी या अपनी माँ या रिश्तेदारों से मुलाक़ात के लिए ले जाता तो उसके
प्लेयर में हर मेहमान को इस में रिकोर्ड व्यंग्य रचनाएं सुनाने का बल पूर्वक
प्रयास करता था. जब मेरी रचना आती तो वोल्यूम थोड़ा बढ़ा भी देता था.
चलिए अब कुछ
उन रचनाओं के बारे में भी जान लें जो वहां सुनाई गईं और खूब ठहाके लगे. श्री
प्रकाश पुरोहित ने ‘सफ़ेद बालों’ की समस्या पर एक दिलचस्प रचना सुनाई.
प्रसंगवश बता दूँ. उनके केश एम एफ़ हुसैन की तरह झक सफेद तो नहीं है लेकिन चांदी
जरूर खिरती है उनके बालों में से. कवि व्यंग्यकार पत्रकार सम्पादक श्री विष्णु
नागर ने ‘ईश्वर की कहानियां’ सुनाईं.
आप पूछेंगे विष्णु जी के साथ इतने विशेषण क्यों लगाए? लगाए
साहब! जरूरी है! मेरे जीजा जी हैं. मेरे शहर के देवास के वरिष्ठ मालवी कवि श्री
मदन मोहन व्यास दादा के दामाद हैं. हमारे नगर के गौरव हैं जी. डॉ अंजनी चौहान ने ‘कुत्तों’ को लेकर विषय पर शानदार व्यंग्य पाठ किया,
खूब ठहाके लगे. डॉ ज्ञान चतुर्वेदी जी ने सभागार को क्लास रूम बना
दिया और बारह खडी का अभ्यास करा कर सोचने- विचारने को बाध्य कर दिया. उनकी रचना
में व्यंग्य ने श्रोताओं को उद्वेलित किया. अभी श्रोता डूबे ही हुए थे कि डॉ प्रेम
जनमेजय उन्हें ‘थानेदार की बारात’ में
खींच ले गए. श्रोताओं ने हास्य व्यंग्य के बैंड पर खूब भांगड़ा किया, कुछ तो नागिन डांस करते रहे मन ही मन. और इस व्यंग्य पाठ की शुरुआत इस
नाचीज ने अपनी रचना ‘ताले और चाबियाँ’ से
की थी.
उस वक्त मंच
पर विराजमान सभी प्रतिष्ठित व्यंग्यकारों ने मेरी पीठ पर हाथ रखा था. न भी रखा
होगा प्रत्यक्ष लेकिन मैंने तो उनकी आँखों में यही पढ़ लिया था. अब भी यही दिखाई
देता है मुझे. पहले व्यंग्य संग्रह ‘पुनः पधारें’ पढ़ने
के बाद प्रेम जनमेजय जी ने अपनी महत्वपूर्ण किताब ‘बीसवीं
शताब्दी की व्यंग्य रचनाएं’ में संभावनाशील व्यंग्यकार के
रूप में सम्मान देते हुए मेरी रचना ‘गणेश जी पहुंचे कर्जा
लेने’ को शामिल किया. मेरे दूसरे संग्रह ‘सूत्रों के हवाले से’ को पढ़कर ज्ञान जी ने खुद फोन
कर के उत्साह वर्धन किया. विष्णु जी और प्रकाश जी मिलने पर सदैव स्नेह प्रदान करते
हैं. अंजनी सर फेस बुक पर मेरी लगाई हरेक पोस्ट के पहले प्रशंसक होते हैं. रात तीन
बजे भी वे अपने फूल मेरी रचना पर खुले मन से न्योछावर कर देते हैं. इतराने के लिए
क्या इतना काफी नहीं मेरे लिए.
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तांगों का जलवा
जिस प्रकार
आजकल ऑटो रिक्शा का चलन है उसी तरह उन दिनों कहीं आने जाने के लिए देवास में तांगे
चला करते थे। देश के कुछ इलाकों में इस घोड़ा गाड़ी को 'टमटम' भी कहा जाता है। कुछ बग्गियाँ भी थीं राज परिवारों के यहां लेकिन तब उनका
उपयोग सामान्यतः होता नहीं था। कभी कभार कुछ राजकीय परिवार के रस्मों रिवाज के
वक्त वे निकलतीं थीं।
कुछ पुरानी
बग्गियों को बेंड बाजों वालों ने खरीद लिया था तब वे शादी ब्याह में या धार्मिक
जुलूसों के लिए किराए पर उपलब्ध कराया करते थे।
यहां मैं
फिलहाल आम लोगों की सवारी तांगे की ही बात कर रहा हूँ। दो तरह के तांगे मैंने देखे
हैं। एक में लंबी सीट पीछे लगी होती थी जिसमें दो तीन व्यक्ति पीछे की ओर मुंह
करके लुढ़कते,फिसलते से बैठ पाते थे। आगे तांगा चलाने वाले की बगल में एकाध सवारी भी
बैठा ली जाती थी।
दूसरी तरह के
तांगे में पीछे सीढियां चढ़कर बैठना होता था। यह कुछ आरामदायक होता। इसमें दो-दो यात्री
आमने सामने बैठ पाते थे। एक दूसरे की शक्लें और दोनों ओर का नजारा देखने की
सहूलियत हो जाती थी। हालांकि पर्दानशी महिलाओं की सुविधा के लिए रोल किये रेग्जीन
के पर्दे भी रहते थे। जो मुहल्ले से निकलते ही ऊपर चढ़ जाते या मोहल्ले में प्रवेश
करते ही फिर से लटक जाते थे। बारिश और ठंड के दिनों में भी ये बड़े काम आते थे।
देवास में
अधिकतर तांगे दूसरी तरह के ही हुआ करते थे।
मुझे याद आता
है कुमार गंधर्व जैसी हस्तियां भी परिवार सहित आने जाने में इन्ही खुले तांगों का
इस्तेमाल किया करतीं थीं। उनकी अपनी कोई निजी कार भी नही थी। बहुत बाद में कुमार
साहब ने कार टैक्सी को बुलवाना शुरू किया था।
समर्थ
परिवारों के बच्चे भी शहर से दूर नए बने कान्वेंट स्कूल भी ऐसे ही तांगों में
बैठकर जाया करते थे। साधारण परिवार का कोई बच्चा जब तांगे से स्कूल जाने लगता तो
मोहल्ले के लोग बड़े खुश होकर बताते 'हमारा दीनू भी अब तांगे से स्कूल जाता
है!'
तांगों की
सजावट, घोड़े की सेहत और तांगे वाले के स्वभाव के कारण कुछ खास तांगों की बड़ी मांग
हुआ करती थी। ऐसा ही एक अच्छा 'एहमद भाई का तांगा' हमारे एक दादाजी ने भी मासिक रूप से लगा रखा था। दादाजी को सभी लोग आदर से
'भैया साहब' कहते थे।
भैया साहब उस
समय न सिर्फ नगर की शान थे बल्कि कपड़ा मिल समूह का सेठ भी उनकी बहुत कद्र करता था।
मुम्बई सूरत आदि में उनकी कई कपड़ा मिलें थीं, सेठ मुंबई में ही रहते थे,कभी कभार ही देवास आना होता था। देवास मिल की पूरी जिम्मेदारी भैया साहब
के जिम्मे ही थी। मैनेजर थे वे देवास की कपड़ा मिल के।
घर से दस
किलोमीटर दूर स्थित कपडा मिल तक आने-जाने के लिए उनके लिए ही वह खास 'एहमद भाई का तांगा'
रखा हुआ था। प्रतिदिन भैया साहब तांगे से ही मिल जाते और शाम को उसी
तांगे से लौटते थे। दिन भर अहमद भाई तांगे से अन्य सवारियों को बस स्टैंड से लाना
ले जाना किया करते थे।
यह भी बडा
दिलचस्प हुआ करता था कि जब सुबह भैया साहब को मिल छोडकर आने के बाद एहमद भाई बस
स्टेंड से किसी सवारी को लेकर मुहल्ले से गुजरते तो घोडा हमारे घर के आगे जाने से
इंकार कर देता था। सुभद्रा कुमारी चौहान की 'झांसी की रानी' कविता की एक पंक्ति 'घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था' वाला दृश्य उपस्थित हो जाता था। तब
एहमद भाई तांगे से उतरकर घोडे की लगाम खींच कर उसे थोडा आगे बढाते। घर से आगे जोर
जबरदस्ती करके निकल जाने के बाद ही घोडा सडक पर आगे बढता। मशीनी प्रवत्ति के उस
घोड़े की स्मृति आज भी गुदगुदाती रहती है।
अहमद भाई के
तांगे के जिक्र के साथ 'मोर खां तांगे वाले' की याद आ जाती है। सिनेमा और नई
फिल्म के प्रचार में इसकी बड़ी भूमिका हुआ करती थी। उसके तांगे में नई फिल्म के
आकर्षक पोस्टर दोनों ओर लगे होते थे। लाउड स्पीकर भी कसा होता। वह तांगा उस वक्त
के देवास के तीन सिनेमागृहों 'नावेल्टी टॉकीज', 'महेश टॉकीज', और 'नगर निवास'
में लगने वाली हर फिल्म का बड़े जोशो खरोश के साथ विज्ञापन करता
पूरे नगर में घूमता था, फिल्म की तारीफों के पुल बांधने वाला
कैलाश एनाउंसर अमीन सयानी की तरह दिलचस्प अंदाज में बोलते हुए फ़िल्म देखने का
जबरदस्त आमंत्रण देता रहता। बम्बई (मुम्बई) और मद्रास (चेन्नई) में निर्मित
फिल्मों के विज्ञापन पर्चों और गीतों की पुस्तिकाएं भी तांगे के पीछे से उड़ाई
जातीं तो बच्चों का झुंड उनके पीछे पीछे दौड़ने लगता था। जैमिनी और एवीएम फ़िल्म
कम्पनियों के पर्चे बहुत सुंदर और गेवा कलर फ़िल्म की तरह दो रंगी हुआ करते थे। उन
पर्चों को जमा करने का शौक भी बच्चों में उसी तरह का होता था, जैसे कोई डाक टिकटों व माचिस की डिब्बियों का संग्रह करता है।
इसी तरह पहले
साइकिल पर बैठकर भोंगे में मुँह घुसेड़कर सरकारी घोषणाएं करने वाले की जगह धीरे
धीरे तांगों और लाउडस्पीकर के एनाउंसरों ने ले ली।
अब न अहमद और
मोर खां के शानदार तांगे रहे,न उस जमाने के स्वप्नीले सिनेमाघर और सिनेमा का वैसा जलवा।
वक्त वक्त की
बात है.... अब तो सब स्मृतियों में ही रह गया है...मन करता है तो बांट लेते हैं
अपनी यादें ....कुरेद देते हैं थोड़ी सी आपके भीतर जमी धूल।
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पानी की परेशानी
आज भी खरे हैं तालाब और बावड़ियां
लॉक डाउन समय
में एक रात मौसम में बारिश पूर्व की उमस के चलते टिड्डी दल की तरह असंख्य कीट
पतंगों ने हमारे बरामदे के बल्ब पर आक्रमण कर दिया। वहीं पर नीचे 'अंडर ग्राउंड वाटर स्टोरेज
टैंक' है। पता नहीं कहाँ से वे पतंगे टैंक में प्रवेश कर गए।
बहुत से तो हमने निकाल दिए किन्तु वे इतने अधिक थे कि सम्पूर्ण सफाई हमसे सम्भव
नही हुई।
पानी के
प्रदूषित होने के कारण हमने उसका उपयोग बन्द कर दिया। छत की टंकी में भी पानी नहीं
चढ़ाया। सारे नल आदि बन्द कर दिए।
दो दिन जब कम
पानी से काम चलाना पड़ा तो तीस पैतीस साल पहले के देवास में पानी की कमी और उसकी
वजह से होने वाली परेशानियों की याद आ गई। पानी को किफायत से खर्च करना पुराने
किसी देवास वाले को बहुत अच्छी तरह से आता है। फिजूल बहते पानी को देखकर बहुत दुख भी
होता है।
अंधाधुन्ध विकास
के नाम पर हमारे पारंपरिक जलस्रोत किस तरह से खत्म होते गए हैं, देवास के उदाहरण से ठीक
से समझा जा सकता है। छोटे से सांस्कृतिक शहर को जब औद्योगिक नगरी के रूप में अस्सी
के दशक में चिन्हित किया गया तो विकास कुछ इस तरह होने लगा कि क्षेत्र के बहुत से
तालाब और खूबसूरत बावड़ियां उसकी चपेट में आ गए।
बड़े तालाबों
को किसी छोटे से सरोवर में सीमित कर उन पर कॉलोनियां और काम्प्लेक्स खड़े कर दिए
गए। भूगर्भीय जल का अति दोहन नल कूपों से ऐसा हुआ कि उसका स्तर पाताल में पहुंचता
नजर आने लगा।
औद्योगिक
विकास और नए कल कारखानों में रोजगार के कारण बाहर से कई लोग आए तो उनके परिवार भी
बड़ी संख्या में देवास में बसते चले गए। क्षिप्रा नदी और कुओं, तालाबों से जितना पानी
मिल पाता था, वह अब बड़ी जनसंख्या और औद्योगिक आवश्यकताओं के
लिए पर्याप्त नही था।
नगर परिषद से
जो पानी नलों से मिलता उसका दबाव भी कम होता था और बहुत कम समय के लिए नल चलते थे।
कुछ लोग सीधे मोटर लगाकर पानी खींचते तो कुछ लोगों तक तो पानी पहुंच ही नहीं पाता
था। वे लोग सड़क किनारे गड्ढों में उतरकर बहुत नीचे से पानी भरते थे। मैंने एक
व्यंग्य पत्र (अंतिम पत्र) तब नईदुनिया अखबार में भेजा था...
'हमने सीता को धरती में उतरते देखा है/ नगर पालिका का नल जमीन के नीचे ही
चलता है।'
कुछ समय बाद
तो समस्या इतनी गहरा गई कि परिवार के सदस्य एक दिन अंतराल से स्नान करते। रसोई के
काम और कपड़े धोने के बाद पानी को पुनः इस्तेमाल में लेने की गुजाइश देखते। पेड़
पौधों और साफ सफाई में उसका पुनरुपयोग किया जाता।
इंदौर तो इस
समस्या से पहले ही जूझ चुका था। जनांदोलनों और संघर्षों की बदौलत नर्मदा परियोजना
के कुछ चरण जमीन पर रूप ले रहे थे। इंदौर के पड़ोस में बसे हमारे देवास शहर का
किस्सा तो विचित्र ही था। जन आंदोलन तो दूर पिछले तीस पैंतीस वर्षों में यहां के
सभी छोटे-बड़े तालाब मिट्टी से भर दिए गए और उन पर मकान और कारखाने खुल गए। जब पता
चला तो बहुत देर हो चुकी थी। देवास को पानी देने का कोई स्रोत ही नहीं बचा। यहां
तक कि शहर के खाली होने तक की खबरें छपने लगी। सबसे बड़ी समस्या उस वक्त किसी तरह
पानी जुटाना था। पानी कहां से आए?
फिर देवास के
तालाबों कुओं के बजाए रेलवे स्टेशन पर 10 दिन तक दिन रात काम चलता रहा।
25 अप्रैल 1990 को इंदौर से 50 टैंकर पानी लेकर एक रेलगाड़ी देवास आई। स्थानीय शासन मंत्री की उपस्थिति
में ढोल नगाड़े बजाकर पानी की रेल का स्वागत हुआ। मंत्री जी ने इंदौर से देवास
स्टेशन आई नर्मदा का पानी पीकर इस योजना का उद्घाटन किया।
यद्यपि संकट
के समय इससे पहले भी गुजरात और तमिलनाडु के कुछ इलाकों में रेल से पानी पहुंचाया
गया था। पर देवास में तो अब हर सुबह पानी की रेल आती। टैंकरों का पानी पंपों के
सहारे टंकियों में चढ़ता।निश्चित ही वह पानी बड़ा महंगा पड़ता था। रेल का भाड़ा हर
रोज का 40000 रुपये। बिजली से पानी ऊपर चढ़ाने का खर्च अलग। इंदौर प्रशासन को भी पानी
का कुछ दाम तो चुकाना ही होता होगा।
सच तो यह था
कि उस वक्त यदि यह योजना न आती तो देवास को 'नरकवास' बनने
में कोई देर नहीं लगने वाली थी।
यह बहुत सुखद
है कि कुछ वर्षों पूर्व नर्मदा को सीधे नेमावर से देवास तक लाया गया है। इससे
पूर्व सिया गांव में सैंकड़ों जल कूप समूह से निकाले पानी से भी देवास की आंशिक
प्यास बुझती रही। क्षिप्रा नदी पर भी नया बांध बनाकर पानी का संग्रहण क्षेत्र
बढ़ाया गया है।
पानी की अब
भले ही देवास में कोई कमी नहीं है किंतु जिन खूबसूरत बावड़ियों, चौपड़ों और तालाबों को जो
हमने खोया है,उस का दुख तो सालता ही रहता है...!
प्रसंगवश
बताना चाहता हूँ। देवास की इस जल समस्या पर मैंने उस वक्त एक पत्र लिखा था। जिसे
नईदुनिया में पढ़कर ख्यात पर्यावरणविद श्री अनुपम मिश्र ने मुझे पत्र लिखकर विस्तार
से आलेख भेजने को कहा था। जिसे पहले तो उन्होंने उसे गांधी शांति प्रतिष्ठान की
महत्वपूर्ण पत्रिका 'गाँधी मार्ग' में प्रकाशित किया, बाद में पर्यावरण साहित्य की विश्वप्रसिद्ध पुस्तक 'आज
भी खरे हैं तालाब' में देवास पर सामग्री के तौर पर शामिल
किया। स्व. अनुपम मिश्र जी की स्मृति को नमन करते हुए आज का यह 'स्वान्तः सुखाय'....
ब्रजेश कानूनगो
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