स्मृति के एकांत से...
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खुशियों का गुलदस्ता
प्राथमिक
शिक्षा के हमारे समय में अप्रैल माह के अंतिम दिन परीक्षाओं के परिणाम घोषित होते
थे। 30 अप्रैल याने 30 अप्रैल। उस दिन बड़ा उत्साह रहता था
मन में। पुरानी कक्षा से नई कक्षा में जाने की बहुत खुशी रहती। नई नवेली किताबों
की नई खुशबू और किताबों में छपे चित्रों रेखांकनों का आकर्षण अलग सी अनुभूति जगाता
था। उचित शब्द नहीं मिल रहा उस अनोखी अनुभूति के लिए।आज भी बस महसूस ही किया जा
सकता है।
सुबह सुबह
उंमग और उत्साह से फूलों की तरह चेहरे खिले रहते सब बच्चों के। उस जमाने में
रिजल्ट वाले दिन परेंट्स को स्कूल बुलाए जाने का रिवाज नहीं था। एक बार पाठशाला
में दाखिल कराया कि बच्चा स्कूल परिवार का सदस्य हो जाता। उसके अच्छे बुरे के
जिम्मेदार उसके गुरुजी याने क्लास टीचर ही हो जाते थे। बाप से ज्यादा 'मास्टर' बच्चे के करीब होता था। उसकी रग रग को जानता था। उसे पता होता था कि कौन
सा छात्र मंडी में हम्माली करेगा,कौन पिता की गद्दी पर बैठकर
तिजोरी भरेगा और कौन कलेक्टर बनेगा।
गुरूजी किसी
किसी बच्चे को शुरुआत में ही परख लेते थे कि उनका फलां छात्र उनकी तरह शिक्षक धर्म
निभाने की योग्यता रखता है। वह बच्चा उनका प्रिय विद्यार्थी हुआ करता था। मुझे भी
यह सौभाग्य प्राप्त हुआ था। यह अलग बात है कि कालांतर में यह हो नहीं हो पाया।
बैंक में मुलाजिम हो गया। यह जरूर कहते मित्र कि तुम्हे तो किसी कॉलेज में होना था
यहाँ कहाँ आ फसे...यह फसाना फिर आगे कभी....
बहरहाल, 30 अप्रैल को सुबह खिले
कुछ फूल 'प्रगति पत्र' पाकर मुरझा
जाते। कुछ उल्लास से चहकते महकते किसी गुलदस्ते में बदल जाते। मगर जो अनुत्तीर्ण
हो जाते उनको गुरुजी ढाढस बंधाते। और अधिक तैयारी करने को प्रोत्साहित करते। जो एक
दो विषयों में फेल हो जाते उनके लिए जून जुलाई माह में पूरक परीक्षा होती। कुछ को
कृपांक देकर उत्तीर्ण घोषित कर दिया जाता।
आज जब पीछे
मुड़कर देखता हूँ तो लगता है परीक्षा में उस वक्त असफल हुए दोस्त जीवन की परीक्षाओं
में कभी असफल नहीं हुए। 30 अप्रैल को बना मुस्कुराते फूलों का गुलदस्ता अब न जाने कहाँ है लेकिन उस
दिन के मुरझाए फूल आज भी खिले हुए हैं और अपनी खुशबू से लोगों के जीवन में बहार
लाने में जुटे हुए हैं....
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भीतर का जूम लाइव
पिछली कक्षा
के परीक्षा परिणाम जब अप्रैल के अंतिम दिन घोषित हो जाते तो परीक्षा में उत्तीर्ण
होने की उतनी खुशी नहीं होती थी जितनी पूरे दो माह के लिए पढ़ाई लिखाई और स्कूल के
अनुशासित बंधनों से मुक्त हो जाने की होती थी।
दिलचस्प यह भी
होता था कि जो बच्चे फेल हो जाते वे और ज्यादा प्रफुल्लित नजर आते। एक वजह तो यह
कि पास होने वालों की तरह ही उनके लिए भी दो माह का मुक्त आनन्द व बेफिक्र मस्ती
के दिन समान रूप से उपलब्ध रहते। एक अतिरिक्त खुशी यह होती कि अगली कक्षा में
पुराने पाठ्यक्रम को ही दोहराना सुनिश्चित हो जाता था। नई किताबें खरीदने का खर्च
भी बच जाता माँ बाप का। परीक्षा में सफल,असफल हर बच्चे को छुट्टियों का मजा
लेने का समान अवसर मिलता था।
बचपन के जीवन
में साल के मई और जून, ये दो माह भले ही ग्रीष्मकाल में तपती धरती पर सबसे कठिन माने गए हों मगर
बच्चों के मन पर तो ये बहुत शीतल, राहत भरे और बहुत रसीले
हुआ करते थे। तरबूज, खरबूज और आमों की मिठास जैसे होते थे ये
दो माह।
आज के
पेरेंट्स के लिए तब के पालको पर किसी 'समर केम्प' आदि
जैसा कोई दबाव भी नहीं होता था। दबाव तो माँ बाप होने का भी नहीं होता था। संयुक्त
परिवारों में बच्चे यूँही पल जाया करते थे। दादा,दादी हो या
काका या बुआ, बच्चा तो जान ही नहीं पाता था अपनी समस्या किसे
कहनी है। माता,पिता तो बहुत बाद में आते थे, उससे पहले ही परिवार के अन्य लोग स्थितियां संभाल लेते थे।
बच्चे भी अपने
आनन्द के रास्ते स्वयं खोज लेते थे। इंडोर और आउट डोर सब तरह के खेल और मनोरंजन की
कोई कमी नहीं थी। दादा,दादी के पास चौपड़,शतरंज होता था। बुआ,चाचा के पास ताश के पत्ते और कैरम। कुछ नहीं तो फर्श पर चौकड़ी बना कर इमली
के बीज की गोटियों से 'अष्टा, चंगा,पे' में दोपहर निकल जाती थी।
जो थोड़े
रचनात्मक रुझान के होते वे चित्रकारी करते,पुस्तकें और बच्चों का अखबार और
पत्रिकाएं पढ़ते। प्रेरित होकर खुद भी लिखते। रात को जब परिजनों को अपना लिखा
सुनाते तो प्रशंसा भी मिलती और इनाम भी। मुझे चित्र बनाना, किताबें
पढ़ना पसंद था। थोड़ा बहुत लिखने की कोशिश भी करता रहता था।
काका जीनियस
रहे हैं। पेशे से वे गणित व विज्ञान के आदर्श शिक्षक थे लेकिन हिंदी में लिखते,छपते थे,चित्रकार और क्राफ्टकला और रंगोली बनाने में सिद्धहस्त थे। उन्होंने
एमएससी के अलावा पांच विषयों में एमए किया था। अध्ययन और सृजन में उन्होंने सदैव
अपने को व्यस्त रखा।
पिताजी के हर
दो साल में ट्रांसफरों के कारण पढाई में मेरा कोई नुकसान न हो इस वजह से मुझे दादा
दादी और अपने काका जी के साथ ही ज्यादातर बचपन बिताने और सीखने समझने का लाभ मिल
सका।
पिता संत
प्रवत्ति के ईमानदार और विनम्र व्यक्ति थे और माँ में उनकी कर्मठ माँ और आदर्श
शिक्षक,संगीतप्रेमी पिता के संस्कार आए थे। वे बहुत समझदार और साहित्य और
कलाप्रेमी स्त्री थीं। बहुत अच्छा गाती थीं। क्या कहूँ उनके बारे में...वे बस माँ
थी...जैसी हर माँ हुआ करती हैं।
स्मृति के
एकांत में इन दिनों मैं अपने भीतर के जूम लाइव में दादा दादी, माँ पिताजी और काका जी के
साथ एक साथ बतियाता रहता हूँ।
3
ईंट
का वह ठिया
वर्ष 1995-96 का समय रहा होगा। बैंक में
कार्यरत लेकिन रचनात्मक रुचि रखने वाले साथियों को जोड़ते हुए एक साहित्यिक संस्था,बल्कि कहें संगठन बनाया था। जिसके अंतर्गत साथियों में बेहतर रचना और
विचार को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक आयोजन किये जाते थे। संगठन का नाम 'प्राची' था और उसमें आज के वरिष्ठ कवि कुमार अम्बुज,
मैं ब्रजेश कानूनगो, रंगकर्मी और लेखक सुरेश
उपाध्याय, लघुकथाकार सतीश राठी, राजेन्द्र
पांडेय,संगीता चौधरी आदि काफी सक्रिय थे।
'प्राची'
के बारे में कुछ अंतराल से बात करेंगे लेकिन यहां मैं उस दौर के उस
अविस्मरणीय जायके का जिक्र करना चाह रहा हूँ जिसे उस खास संग साथ और मित्रों के
साथ दोबारा फिर कभी नहीं प्राप्त कर सका।
हमारा वह समय बहुत
रचनात्मक ऊर्जा से भरा हुआ था। प्राची की रतलाम इकाई ने एक कार्यक्रम रतलाम में
आयोजित किया था। इकाई के मुख्य कर्ताधर्ता सुरेश उपाध्याय थे। कार्यक्रम में रतलाम
के वरिष्ठ साहित्यकार जयकुमार जलज, डॉ रतन चौहान, यूसुफ
जावेदी, विष्णु बैरागी जी आदि तथा देवास से श्री जीवनसिंह
ठाकुर भी अतिथी के रूप में शामिल हुए थे। इस शानदार और सफल कार्यक्रम का उल्लेख
करना और विवरण प्रस्तुत करना भी मेरा उद्देश्य नहीं है। बात तो उस जायके की है
जिसका लुत्फ आमंत्रितों अतिथियों के जाने के पश्चात जो हम कुछ साथियों ने लिया।
रतलाम की अनाज मंडी की
एक दुकान में जो गरमा गरम दाल बाटी और लड्डू खाए थे, वह किसी मालवा वासी के लिए नई बात नहीं हो सकती,
लेकिन फिर भी वह हमारे लिए सचमुच बहुत अनोखी बात थी। जो आत्मीयता,
परोसगारी और प्रस्तुति वहां अनुभव करने को मिली वह निसंदेह मैने या
कुमार अम्बुज ने कभी महसूस नहीं की थी। ऊंची किनार वाली पीतल की थाली में बाफले को
ओखली में मूसल से चूरकर गरमा गरम शुद्ध घी डाल दिया जाता था। साथ में तड़का लगाकर
दाल दी जाती थी। सबको अलग अलग तपेली में। जी हाँ, तपेली में!
गुजराती शैली की, लंबी लेकिन लबालब भरी हुई।
लकड़ी की बेंच के सामने
लकड़ी की ही टेबल और उस पर थाली और लम्बी तपेली बस। एक लड़का ईंट के छोटे छोटे टुकड़े
टेबल पर रख गया। हम एक दूसरे का मुंह ताकने लगे। क्या करें इस टुकड़े का? अम्बुज बोले 'ये
स्टार्टर है क्या?' स्थानीय मित्र सुरेश उपाध्याय हमारी
परेशानी समझ गए। मुस्कुराते हुए उन्होंने ईंट का टुकड़ा थाली के नीचे एक किनारे पर
लगा दिया। बाद में पता चला यह 'ठिया' कहलाता
है। ठिया रखते ही थाली एक ओर से ऊंची हो गई। बाफले के चूरे पर अब उन पर सहजता से
दाल डाली जा सकती थी। ‘खेत तालाब’ की तरह हमारी परात में एक किनारे पोखर सा बन गया
था, जिसमें बाफला-दाल मिक्स तैयार था। थोड़ी ही देर में ऊंचे
किनारे पर प्याज मसाला, धनिया चटनी, टमाटर,
गाजर आदि भी सज गए। लड्डू सबसे अंत मे दिया जाता था।
यह सब देखकर ही भूख बढ़
गई थी। दोपहर दो बजे का समय वैसे भी भोजन का हो गया था। खूब छक कर उस दिन दाल
बाफले,लड्डू
उड़ाए। उस भोजन का मुकाबला और तुलना किसी स्टार रेस्टोरेंट या किसी स्वीगी,झमाटो सप्लाय से नहीं किया जा सकता।
रतलाम की धान मंडी का वह
भोजनालय सैकड़ों हम्मालों के पसीने की गंध से महक रहा था। हम लोग विशेषकर कुमार
अम्बुज तो उस दिन धान मंडी के दाल बाफलों से इतने प्रभावित हुए की रतलाम के बर्तन
बाजार से गुजरते हुए एक जोड़ी परात और दो वे विशिष्ठ तपेलियाँ ही खरीद लीं। जिन्हें
वे बहुत दिनों तक अपने घर पर उपयोग भी करते रहे।
हाँ, इंदौर में अपने घर पर भी ईंट के
टुकड़े का वह 'ठिया' लगाना भी नहीं
भूलते थे। वही तो असली मजा देता था। भोजन का आनन्द बढ़ा देता था।
4
व्यस्त रहकर मस्त रहने का जीवन
बहुत पुराना
मुहावरा है कि 'सीखने की कोई उम्र नहीं होती'। ऐसे उदाहरण हमारे
आसपास भी बहुत से मिल जाते हैं। एक हमारे साथी हैं श्री केसरीसिंह चिडार जिन्होंने
सेवानिवृत्ति के बाद संगीत महाविद्यालय में बाकायदा प्रवेश लिया और 'वायलिन वादन' विषय के साथ ग्रेजुएशन कर रहे हैं।
यद्यपि संगीत का उनका कोई बैकग्राउंड नहीं रहा। बस मन किया और 'व्यस्त रहकर मस्त' रहने का अभियान शुरू कर दिया। गत
वर्ष उन्होंने परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली। अब अगले वर्ष के पाठ्यक्रम की तैयारी
में लगे हैं।
एक अन्य हमारे
आदरणीय साथी हैं श्री उमाशंकर नागर जी। वे तो 'व्यस्त रहकर मस्त रहने' के मामले में अनुसरण योग्य हैं। जीवन के 71 वर्ष
पूरे करते हुए इस आयु में उन्होंने हारमोनियम सीखा है। बाकायदा एक उस्तादजी की
क्लास में युवाओं के साथ बैठकर न सिर्फ हारमोनियम सीखा बल्कि राग रागिनियों के
प्रारंभिक ज्ञान के बाद सस्वर हारमोनियम की संगत पर आलाप भी लेते हैं।
पिछले दिनों
वरिष्ठ कवि स्व. बालकवि बैरागी जी को याद करते हुए मैंने फेसबुक पर एक संस्मरण
पोस्ट किया था, जिसमें उनके लिखे 'रेशमा और शेरा' फ़िल्म के यादगार गीत ' तू चन्दा मैं चांदनी' का उल्लेख था। नागर जी ने उसी दिन गूगल पर सर्च करके गीत के बोल ढूंढे और
रात तक उसको हारमोनियम पर गा, बजाकर प्रेषित कर मुझे
सरप्राइज ही दे डाला - 'यह लीजिये आपका प्रिय गीत, सुनिए इस लॉक डाउन एकांत में।'
बात यहां उनकी
गीत संगीत प्रस्तुति की श्रेष्ठता की कदापि नहीं है किन्तु इस उम्र में उनकी यह
लगन देखते ही बनती है। व्यस्त रहकर मस्त रहने का गुण उनके स्थायी स्वभाव का हिस्सा
है। खुशियों को वे कभी छोड़ते नहीं, पकड़कर अपने पास बंधक बना लेते हैं।
आपको बड़ा
आश्चर्य होगा 71 वर्षीय इस नौजवान का जीवन भारतीय फौज में एक जवान के रूप में ही शुरू हुआ
था। खेत खलिहान से जुड़े नागर जी ने जमीन पर 'जय जवान,जय किसान' को प्रमाणित किया है।
सेना से
सेवानिवृत्ति के बाद ग्रेजुएशन किया। कॉलेज में सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय
रहते हुए नाटकों में हिस्सा लेते रहे। और जब 1977 -78 में राष्ट्रीयकरण के बाद
बैंकों का विस्तार होने लगा, नागर जी की भी बैंक में नौकरी
लग गई। अब वे हमारे सहकर्मिभी हो गए थे। मेरी भी नौकरी उनके साथ ही उसी बैंक में
लग गई थी।
इसी समय
साहित्य जगत के मित्र कुमार अम्बुज भी बैंक में नौकरी में लगे थे किंतु उनसे तब तक
परिचय नहीं हुआ था। बल्कि बहुत बाद पता चला था कि हम एक ही बैंक में काम करते हैं।
जबकि नागर जी हमारे घर में किराएदार थे जो बड़े भाई की तरह रहते हुए बाद में
सहकर्मी बन गए थे।
बात व्यस्त
रहकर खुश और मस्त रहने की ही करते हैं। इस फार्मूले के सफल कार्यान्वयन को नागर जी
से सीखा जा सकता है। बैंक में नौकरी करते हुए वे कवि हुए, व्यंग्य भी लिखने लगे।
सीखने में कैसी शर्म। लिखते और दिखाते। लिखे को सुधारते। फिर गोष्ठियों में रचना
भी पढ़ने लगे। कुछ दिनों बाद उन्होंने आयुर्वेद का रुख किया। आयुर्वेद की परीक्षाएं
उत्तीर्ण की और डॉक्टर हो गए। मस्ती और खुशी की तलाश में व्यस्त रहने का ही परिणाम
रहा कि वे अब सम्मान के साथ डॉ उमाशंकर नागर कहाने लगे थे।
वरिष्ठता की
इस वय में लोकप्रिय कार्यक्रम 'कौन बनेगा करोड़पति' में प्रविष्ठि के
कुछ चरणों के लिए भी गए। वकीलों की संगत अच्छी लगी तो दोस्त बनाए। एलएलबी तो
उन्होंने कर ही रखा था। काला कोट भी पहन लिया।
सबसे बढ़िया
बात तो यह है कि वे जिनके मित्र बनते, उतने ही गहरे व आत्मीय वे परिवार के
अन्य परिजनों के हो जाते हैं। मेरे दोस्त थे तो उससे गहरे से उनकी मेरे पिता और
माँ से पटती।
बहरहाल, व्यस्त रहकर मस्त रहने की
कला पर बात करते हुए मुझे इस लॉक डाउन एकांत में देवास के अपने परिजन जैसे मित्र,सहकर्मी नागर जी अंतर्मन से याद आ रहे हैं.....!
यह वक्त नागर
जी जैसे जिंदादिल इंसानों का ही है। हारमोनियम के स्वर इन दिनों उनकी धड़कन बने हुए
हैं।
उनकी साधना, जीवटता और लगन को हृदय से
प्रणाम!
5
हवा में उड़ता जाए मोरा लाल दुपट्टा मलमल का...
पिछली पोस्ट
में अपने 71 वर्षीय मित्र के व्यस्त रहकर मस्त रहने के उपक्रम के तहत उनके हारमोनियम
सीखने और संगीत साधना का उल्लेख किया था।
लिखते हुए
मुझे अपना ननिहाल याद आ गया।
दरअसल नानाजी
भले ही मन्दसौर जिले के कई गांवों कस्बों में प्राथमिक शालाओं के प्रधान अध्यापक
रहे थे, लेकिन उनकी गहरी सामाजिक और सांस्कृतिक अभिरुचियाँ थीं। वे संगीत के बड़े
रसिक थे।
उनके पास एक
हारमोनियम तथा बड़ा सा ग्रामोफोन था। जिसे सामान्य बोलचाल में चूड़ी का बाजा भी कहा
जाता था। सैकड़ों की संख्या में गानों के रिकार्ड्स एक बॉक्स में रखे होते थे।
गर्मी की
छुट्टियों में जब हम माँ के साथ वहां जाते तो नानाजी किसी रिकॉर्ड को बाजे की
डिस्क पर लगाकर हमें सुनाते थे। छोटी सी डिबिया से एक नई सुई निकालकर बाजे में
लगाते। सुई घूमती डिस्क पर रखे रिकॉर्ड को छूकर थिरकने लगती तो बाजे का भोंगा गाने
लगता था। बड़ा कुतूहल का दृश्य होता था वह।
'हवा में उड़ता जाए मेरा लाल दुपट्टा मलमल का' पहली
बार नानाजी के उसी बाजे पर सुना था।
मेरे मन में
यह इच्छा हमेशा रहती थी कि नानाजी खुश होकर यह 'चूड़ी का बाजा' मुझे
गिफ्ट कर दें। छोटे मामा और मुझ में अक्सर इस बात पर थोड़ा झगड़ा भी हो जाता था कि
नानाजी हारमोनियम किसे देंगें और चूड़ी का बाजा किसे?
बचपन में तो
यह हो नहीं पाया, लेकिन जब अवसर आया, तब न नानाजी रहे और न उस बाजे का
वक्त रहा। तब का श्वेत श्याम लाल दुपट्टा सतरंगी हो गया।
रिकार्ड्स,ग्रामोफोन के बाद टेप रेकॉर्डर,
कैसेट,सीडी, प्लेयर का
युग आया और आहिस्ता से गुजर भी गया। अब तो मोबाइल में ही सब कुछ उपलब्ध है। लग तो
यह भी रहा कि टीवी भी अब अपने पतन की राह पर ही है। दुनिया भर में मनोरंजन के कई
नए साधन आ गए हैं।
लेकिन असल बात
तो फिर छूट गई। बात हारमोनियम की हो रही थी। नानाजी को हारमोनियम का बड़ा शौक था।
उनका अपना हारमोनियम था। अपनी पोस्टिंग वाले गाँव मे उनकी एक संगीत मंडली भी बन
जाये करती थी। जो नियमित कबीर,मीरा आदि के गीत गाया करती थी। अपने एक इंटरव्यू में दादा
बालकवि बैरागी जी ने मेरे नाना की इस प्रतिभा का उल्लेख मुझ से किया था। चिताखेड़ा
(मन्दसौर) में निवास के दिनों में नानाजी का यह शौक चरम पर था। मैं तो शायद दो तीन
वर्ष का बालक ही रहा होऊंगा। मुझे तो यह सब बाद में माँ और बैरागी जी से ही पता
चला था।
बहरहाल, कितने ही नए और आधुनिक
वाद्य यंत्र भारतीय संगीत में आये हैं , कई लुप्त भी हो गए
लेकिन हारमोनियम आज भी आम लोक समाज में दिख ही जाता है। गली मोहल्लों की कथा भागवत,
भजन मंडलियों, रामलीला,सत्संग,माच से लेकर कव्वाली की महफिलों की शान बना हुआ है।
प्रतिदिन
'वीणा
वादिनी वर दे' गाने वाले विद्यार्थियो में से वीणा
बहुत कम बच्चों ने देखी सुनी होगी मगर 'हारमोनियम' से हर
कोई परिचित है।
और ऐसे
में 71 की उम्र में नागर जी हॉर्मोनियम बजाना
सीखते हैं। और कवि कुमार अम्बुज के सृजन में आया अवरोध 'हारमोनियम
की दुकान' पर उपजी संवेदनाओं से खत्म होता है और
डेढ़ साल बाद वे कोई कविता लिख पाते हैं तो इसका महत्व कुछ अलग नजरिये से भी पता
चलता है।
(जारी है आगे...)
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